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Uttarakhand

कटघरे में संस्थानों की साख

हिमालय में पर्यावरण विकास को खुद सरकारी अधिकारी ही पलीता लगा रहे हैं। इसमें कुमाऊं विश्वविद्यालय भी उनका बखूबी साथ दे रहा है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान के प्रशासनिक अधिकारी अनिल कुमार यादव ने संस्थागत छात्र के तौर पर कुमाऊं विश्वविद्यालय से एलएलबी के पांच सेमेस्टर की परीक्षाएं दे दी। इस दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक कार्यकर्ता लगातार सवाल उठाते रहे कि आखिर कोई व्यक्ति कैसे एक साथ सरकारी सेवा और कानून की पढ़ाई कर पा रहा है? सरकारी सेवा में रहते कैसे लॉ की कक्षाओं में अनिवार्य 75 प्रतिशत उपस्थिति दे पा रहा है? खासकर तब जबकि उसके विभाग ने दो टूक कह दिया हो कि कार्य के दौरान लॉ की पढ़ाई की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारी ने अपने अवकाशों में ही कैसे लॉ की कक्षाओं की अनिवार्य हाजिरी व्यवस्थित कर ली? कितने अवकाश उन्हें सालभर में मिलते हैं? इन तमाम सवालों पर कुमाऊं विश्वविद्यालय और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान दोनों ही प्रतिष्ठित संस्थानों की साख कटघरे में है 
लगभग दो वर्ष पूर्व हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद की प्रत्याशी मीमांसा आर्य के डिग्री विवाद के चलते कॉलेज के प्राचार्य, उच्च शिक्षा निदेशक सहित कई प्राध्यापकों पर गाज गिरी थी। कुमाऊं विश्वविद्यालय की गलतियां करने की आदत ने कई लोगों को मुश्किल में डाला है। हालांकि विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित करने का दावा तो करता है, लेकिन इसकी लचर कार्य प्रणाली इन दावों को आईना दिखाने का काम करती है। शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए पूरे शैक्षणिक सत्र में 75 प्रतिशत की अनिवार्य उपस्थिति के नियम का खुद विश्वविद्यालय ने मजाक बनाकर रख दिया है। एक ही डिग्री के लिए मानदंडों में दोहरापन यहां कोई नई बात नहीं है। विश्वविद्यालय के एसएसजे परिसर का विधि संकाय भी इस तरह की खामियों से अछूता नहीं है। नियमों को ताक पर रखकर लोग यहां विधि के छात्र बन जाते हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन इस संबंध में शिकायतों के बावजूद नजरें फेरता रहा है या फिर इसे जान बूझकर नजरअंदाज करता रहा है। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान कोसी कटारमल, अल्मोड़ा में कार्यरत प्रशासनिक अधिकारी अनिल कुमार यादव का उदाहरण ही काफी है। यादव सरकारी सेवा के साथ एसएसजे परिसर अल्मोड़ा के विधि संकाय से लॉ की पढ़ाई भी कर रहे हैं।
वर्ष 2015 से अनिल यादव कुमाऊं विश्वविद्यालय के एसएसजे परिसर अल्मोड़ा में विधि संकाय के संस्थागत (रेगुलर) छात्र हैं। प्रवेश प्रक्रिया के नियमों से साफ पता चलता है कि विधि पाठ्यक्रम नियमित है और इसमें पर्याप्त उपस्थिति दर्ज करवाकर नियमित कक्षाओं में पढ़ाई के लिए आना अनिवार्य है। सरकारी अथवा निजी संस्थानों में नौकरी करने वाले कर्मचारियों को अपने विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लाना आवश्यक होता है। लेकिन अनिल कुमार यादव ने अनापत्ति प्रमाण पत्र के रूप में जो प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया है उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि संस्थान उन्हें विभागीय कार्यावधि के दौरान लॉ की पढ़ाई करने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दे सकता। फिर भी वे अपने अवकाश आदि से इसे व्यवस्थित कर सकते हैं। खास बात ये है कि अनापत्ति प्रमाण पत्र न देने के बावजूद संस्थान ने उन्हें खुली छूट भी दे दी। लॉ की पढ़ाई के लिए 180 दिन की 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति की बाध्यता को अनिल कुमार यादव कैसे पूरा कर पाए होंगे, ये आसानी से समझा जा सकता है। कानूनों की व्याख्या करने वालों को तैयार करने वाला विधि संकाय स्वयं ही नियम-कानूनों को व्यक्ति विशेष की सहूलियत के हिसाब से तोड़ता-मरोड़ता नजर आ रहा है। सवाल है कि जब संबंधित व्यक्ति के विभाग द्वारा उसे अनापत्ति प्रमाण पत्र देने से स्पष्ट इंकार कर दिया गया, तो किस आधार पर विधि जैसे गंभीर विषय में उसे प्रवेश दे दिया गया? अनिल कुमार यादव विभागीय अनापत्ति प्रमाण पत्र न होने के बावजूद विधि संकाय में प्रवेश ले गए और पांच सेमेस्टर की परीक्षाएं निर्बाध रूप से दे भी चुके हैं।
ं‘दि संडे पोस्ट’ संवाददाता संजय स्वार ने प्रशासनिक अधिकारी अनिल कुमार यादव का पक्ष जानने के लिए इमेल के जरिए उनसे कुछ सवाल किए थे जो इस प्रकार हैं :-
प्रिय अनिल जी,
आपके कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर से विधि स्नातक डिग्री में संस्थागत छात्र के रूप में प्रवेश पर कुछ
प्रतिनिधियों द्वारा शिकायत के संदर्भ में न्यायहित में आपका पक्ष जानना आवश्यक हो जाता है। अगर आप निम्न बिंदुओं पर अपना पक्ष देना चाहें तो :-
1. आपके द्वारा सरकारी सेवा के दौरान अपने विभाग से बिना अनापत्ति प्रमाणपत्र के विधि की डिग्री में प्रवेश का आरोप कितना सही है?
2. विधि कक्षा और आपके अपने संस्थान में आपकी एक ही दिन दोनों जगह उपस्थिति पर आप क्या कहना चाहेंगे?
3. सरकारी सेवा के दौरान पिछले पांच सेमेस्टर में आपके द्वारा विधि की परीक्षाओं के लिए कक्षा में 75 प्रतिशत की उपस्थिति की अनिवार्य शर्त को कैसे पूरा किया गया?
4. आप पर लगाए गए आरोप पर आपका क्या पक्ष है?
आशा है आप अपना पक्ष शीघ्र उपलब्ध कराएंगे।
आदर सहित!
संजय स्वार, प्रभारी ‘दि संडे पोस्ट’
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‘दि संडे पोस्ट’ के सवालों पर जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान के प्रशासनिक अधिकारी अनिल कुमार यादव का पक्षः-
प्रिय संजय स्वार जी,
आपकी इमेल दिनांक 17 जून 2019 के क्रम में आपके द्वारा पूछे गए बिंदुओं
पर पक्ष निम्नवत हैः-
1. आरोप पूरी तरह से गलत है, क्योंकि विभाग द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
2. एक ही दिन दोनों जगह पर उपस्थिति किसी भी दिन नहीं है।
3. नियमानुसार स्वीकृत अवकाश लेकर उपस्थिति को पूरा किया गया।
4. आपकी इमेल में वर्णित आरोप पूरी तरह से गलत हैं तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित कर कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने हेतु लगाए गए प्रतीत होते हैं। कृपया उपरोक्त आरोप लगाने वाले व्यक्ति के नाम एवं पते से अवगत कराएं जिससे मानहानि के संबंध में अग्रिम कर्यवाही की जा सके।
आदर सहित!
अनिल कुमार यादव
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के रेग्युलेशन 2003 के बिंदु संख्या 5 .8 में ये स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि कक्षा में व्याख्यान, प्रयोगात्मक, सेमिनार आदि शैक्षिक क्रियाकलापों में न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति होने पर ही छात्र को परीक्षा के योग्य माना जाएगा। सेमेस्टर प्रणाली में ये और भी आवश्यक हो जाता है। अब ये विधि संकाय के कर्ताधर्ता ही स्पष्ट जानते होंगे कि आखिर 75 प्रतिशत उपस्थिति की अनिवार्यता अनिल कुमार यादव कैसे पूरी कर पा रहे होंगे। पिछले कई वर्षों में विश्वविद्यालय ने 75 प्रतिशत की अनिवार्य शर्त पूरी न कर पाने के कारण विधि के कई छात्रों को परीक्षा से वंचित कर दिया था, परंतु अनिल कुमार यादव पर विश्वविद्यालय की मेहरबानी समझ से परे है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि अनिल कुमार यादव प्रथम सत्र 2016 में 11 दिन, 2017 में 24 दिन एवं 2018 में 37 दिन ही उपस्थित हैं। उपस्थिति पंजिका में भी कई जगह पर उपस्थिति के शब्द ‘पी’ को ‘ए’, ए को पी कर दिया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि कई बार तो विधि संकाय ने सिर्फ अनिल कुमार यादव के लिए ही कक्षाएं चलाई और 25 दिनों में तो वे अपने सरकारी विभाग गोविंद बल्लभ पंत हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान और विधि संकाय दोनों ही जगह उपस्थित दिखाई देते हैं। कई प्राध्यापकों का अनिल कुमार यादव के पक्ष में ये तर्क देना कि ‘उपस्थिति कम होने पर 10 प्रतिशत की छूट का अधिकार कुलपति एवं विभागाध्यक्ष को है’, न्यूनतम उपस्थिति पर लागू नहीं होता है। विश्वविद्यालय द्वारा 2016 में जारी एक आदेश से स्पष्ट है कि एनसीसी या एनएसएस शिविरों में भाग लेने, विश्वविद्यालय अथवा राज्य स्तर पर खेलने, लंबी बीमारी और राज्य स्तर या विश्वविद्यालय स्तर पर किसी विशेष गतिविधि में शामिल होने के चलते विभागाध्यक्ष स्तर पर 5 प्रतिशत एवं अनुरोध पर कुलपति की ओर से 10 प्रतिशत की छूट उपस्थिति में मिल सकती है। जबकि अनलि कुमार यादव इनमें से किसी भी दायरे में नहीं आते।
एडवोकेट एक्ट 1961 का हवाला देते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी कहा है कि किसी अधिवक्ता को तैयार करने के लिए उसका सेमिनार, व्याख्यानों में रहना नितांत आवश्यक है और उसे अपने हर प्रश्नपत्र में कम से कम 66 प्रतिशत उपस्थिति देनी आवश्यक होगी, परंतु अनिल कुमार यादव कैसे इन शर्तों को पूरा किए बिना पांच सेमेस्टर पार कर गए, ये विचारणीय प्रश्न है।
इस संबंध में क्षेत्र के राजनीतिक दलों एवं जनप्रतिनिधियों की शिकायत पर भी विश्वविद्यालय प्रशासन आंख मूंदे हुए है। जीबी पंत पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल अल्मोड़ा एवं एसएसजे परिसर अल्मोड़ा के विधि संकाय की इस प्रकरण में उदासीनता आश्चर्यजनक है। विधि संकाय द्वारा इस मामले में ढुलमुल रवैया अपनाकर अनिल कुमार यादव के पक्ष में खड़ा दिखना, उसके शानदार अतीत और साख पर सवाल खड़े करता है।
बात अपनी-अपनी
अनिल कुमार यादव का वर्तमान में हमारे यहां एडमिशन नहीं हैं। मैं किसी मीटिंग के सिलसिले में जा रहा हूं। इस विषय में विस्तार से बाद में ही बात कर पाऊंगा।
प्रो. डी.के. भट्ट, डीन विधि संकाय एस.एस.जे. परिसर 
हमने अनिल कुमार यादव को किसी भी प्रकार का अनापत्ति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया है। कार्यालय के कार्य में बाधा उत्पन्न हुए बिना लॉ की डिग्री उन्हें सिर्फ अपनी छुट्टियों से व्यवस्थित करने की सलाह दी थी। लॉ में उनकी उपस्थिति 75 प्रतिशत है कि नहीं, ये विश्वविद्यालय को देखना है। उन्होंने अपनी स्थिति कैसे मैनेज की, ये न हमसे विश्वविद्यालय ने पूछा न ये हमारे संज्ञान में है।
आर.एस. रावल, निदेशक जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत् विकास संस्थान

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