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Uttarakhand

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारती रही कांग्रेस

कांग्रेस नेता गुटबाजी में इस कदर उलझे रहे कि अच्छे मौके भी उनके हाथ से निकल गए

प्रदेश कांग्रेस के लिए वर्ष 2018 आपसी लड़ाई और गुटबाजी के लिए जाना जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश, पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के चलते आज पार्टी कार्यकर्ता तक बंट गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस को अपनी जो ऊर्जा भाजपा और राज्य सरकार के खिलाफ खर्च करनी थी वह ऊर्जा पार्टी में अपने विरोधियों को हाशिये पर धकेलने में ही खर्च की गई। इसके कारण निकाय और सहकारिता चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। यही नहीं थराली विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस पीछे रह गई। सबसे अजीब बात यह है कि कांग्रेस का हर नेता भाजपा के खिलाफ चुनाव में बड़ी ताकत के साथ लड़ने की बात तो करता रहा, लेकिन पार्टी की चुनावी रणनीति पर काम करने से परहेज भी करता रहा। इसी का नतीजा रहा कि निकाय चुनावों में पार्टी की रणनीति फेल हो गई। प्रदेश सरकार के ढीले रवैये के चलते राज्य में निकाय चुनाव टलते रहे। जबकि कांग्रेस निकाय चुनावों में अपनी तैयारी करने और रणनीति बनाने के बजाए सरकार के रुख पर ही निगाह रख हाथ पर हाथ धरे इंतजार करती रही।


राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के लिए निकाय चुनावों का टलना एक तरह से अपनी मजबूत रणनीति और तैयारी का सुनहरा अवसर था जिसे कांग्रेस नेताओं ने आपसी झगड़े में गंवा दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट का भी मानना है कि कांग्रेस सरकार के साथ अपनी स्वंय की रणनीति बनाने के बजाय सरकार के रुख को देखती रही, जबकि कांग्रेस को एक वर्ष से ही निकाय चुनाव की तैयारियां आरम्भ कर देनी चाहिये थी। पार्टी हर मोर्चे पर असफल रही तो इसकी प्रमुख वजह कहीं न कहीं नेताओं के बीच खेमेबाजी ओैर वरर्चस्व की जंग रही है। प्रीतम सिंह प्रदेश अध्यक्ष के पद पर डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बावजूद अपनी नई कार्यकारीणी का गठन नहीं कर पाये। वे अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास नहीं करा पाए, जबकि प्रदेश संगठन से नाराज कई नेता एक के बाद एक कर पार्टी छोड़ गए।

अनुशासनात्मक कार्यवाही के नाम पर हरीश रावत खेमे के नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के चलते कांग्रेस के हालात ओैर भी खराब होते दिखाई दे रहे हैं। निकाय चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद हरीश रावत ओेर प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बीच तलवारें खिंच गई। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की नाराजगी भी निकाय चुनाव में साफ तौर पर झलकी। नतीजों के बाद उन्हें लगा कि हल्द्वानी में उनके पुत्र सुमित हृदयेश के लिए पार्टी के दूसरे खेमों के लोगों ने काम नहीं किया।

पिछले विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद कोई सबक लेने के बजाये नेता अपनी- अपनी व्यक्तिगत राजनीति को ही एक बड़े अवसर के तौर पर देखते रहे। ऐसा नहीं है कि जनता में कांग्रेस के पक्ष में माहौल नहीं रहा। उपचुनाव में सत्ताधारी भाजपा के सामने कांग्रेस के पक्ष में जनता ने मतदान किया और महज दो हजार मतां से ही भाजपा जीत हासिल कर पाई। इसी तरह से उत्तरकाशी जिला पंचायत में कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर कब्जा किया। हाल ही में गठित रायपुर क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष पद पर भी कांग्रेस ने भाजपा को करारी मात दी है।

जनता आज भी कांग्रेस को भाजपा के बड़े विकल्प के तौर पर देख रही है। आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा पूरी तरह से चुनावी मोड में आ चुकी है। लेकिन कांग्रेस आज भी भाजपा के रुख पर निगाह रखे हुये है, जबकि विपक्षी पार्टी होने के चलते कांग्रेस को अपने अपने संभावित उम्मीदवारां को चुनावी क्षेत्र में उतारने का काम आरम्भ कर देना चाहिये। कांग्रेस अभी भी निकाय चुनावों के समान ही ‘देखो और इंतजार करो’ की रणनीति पर अमल करती दिख रही है।

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