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Uttarakhand

‘देश के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है कांग्रेस’

राज्य की दशा और दिशा को लेकर ‘दि संडे पोस्ट’ के विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार की मनीष खण्डूड़ी संग विस्तृत बातचीत

 

पलायन शब्द कोई बुरा नहीं है। मैं हिंदुस्तान, यूरोप और अमेरिका में रहा हूं, मेरा जो तर्जुबा है उससे मैं यह कह सकता हूं कि पलायन दुनिया के हर देश के पहाड़ी क्षेत्र में होता है। अमेरिका और यूरोप के पहाड़ी क्षेत्रों से खूब पलायन हुआ है। हर आदमी अपनी सुविधा के लिए पहाड़ से मैदान की ओर बसने का प्रयास करता है। मैं राजनीतिक व्यक्ति के तौर पर पलायन की बात कर रहा हूं। पलायन तो मैंने भी किया है और आपने भी किया है। हम जनता को कह रहे हैं कि पहाड़ में रहो पहले तो हमें ही वहां रहना चाहिए। हमारे मुख्यमंत्री जो भी रहे हों, उनको पहाड़ में ही रहना चाहिए, जब सेशन हो तब आ जाए देहरादून में। इन पांच सालों में मैंने 14 विट्टाानसभा क्षेत्रों को नजदीक से देखा है। वहां पलायन चिकित्सा से नहीं हो रहा है, पलायन हो रहा है बच्चों की शिक्षा के लिए

मनीष का सफर
जीवन परिचय: जन्म 16 अक्टूबर 1968। जन्म स्थान गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

सुपुत्र: मेजर जनरल (से.नि.) बी.सी. खण्डूड़ी, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

शिक्षा: नेताजी सुभाष चंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 2003-05 में केलॉग्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए किया।

राजनीतिक यात्रा: 2019 में कांग्रेस में शामिल। पौड़ी गढ़वाल से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े। दो लाख मत मिले लेकिन भाजपा के तीरथ सिंह रावत से चुनाव हारा। ‘जय दुर्गा’ सामाजिक कल्याण संस्था के जरिए सामाजिक कार्यों में सक्रिय। कांग्रेस ने दी थी प्रोफेशनल कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी जिसके जरिए पूरे देश में प्रोफेशन सेवाएं देने वाले लोगों को जोड़ने का काम किया। 2023 में कांग्रेस ने तेलंगाना विधानसभा चुनाव में मनीष खण्डूड़ी को बनाया था ऑब्जर्वर।

विजन: उत्तराखण्ड के युवाओं को सबसे अच्छी शिक्षा देना जिससे वे बेहतर रोजगार पा सके। इंडस्ट्रीयल सेक्टर हो या टूरिस्ट सेक्टर, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा प्रदेश को लाभ कैसे हो इस पर फोकस करना। सबसे बड़ी प्राथमिकता महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारने की। फोकस कोटद्वार से लेकर श्रीनगर तक पर्यटन और उद्योग क्षेत्र में डेवलपमेंट पर रहेगा।
राजनीतिक जीवन में शुचिता और जनता के प्रति जवाबदेही।

उत्तराखण्ड राज्य बने हुए 23 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 24 वर्ष की आयु-एक परिपक्व आयु होती है। आप 24 बरस के उत्तराखण्ड को कैसे देखते हैं?

ऐसा सवाल हरेक उत्तराखण्डी एक-दूसरे से पूछता है कि 23 साल के बाद उत्तराखण्ड को क्या मिला? हमने क्या खोया और क्या पाया? मेरा यह मानना है कि हम संतुष्ट नहीं हो सकते। संतुष्ट होने का मतलब है कि जीवन का पूर्ण होना या खत्म होना। ऐसा ही किसी राज्य या देश का विषय भी है जिसमें आप संतुष्ट नहीं हो सकते। आपको हर समय आगे बढ़ना है और बेहतर करना है। जो नहीं कर पाए उसे करना है। मैंने उत्तराखण्ड राज्य निर्माण को बहुत करीब से देखा है। इससे हमारी अलग पहचान बनी है। पहले हमारी पहचान उत्तर प्रदेश संग जुड़ी थी। गढ़वाल और कुमाऊं की पहचान थी लेकिन राज्य बनने के बाद हमारी पहचान उत्तराखण्डी की बनी है। यह पहचान हमारे धर्म और संस्कृति से भी जुड़ी है। उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है। कोई देश के किसी राज्य, क्षेत्र से आता है तो वह कहीं न कहीं हमसे सीट्टाा जुड़ता है। कोई बदरीनाथ आता है कोई केदारनाथ गंगोत्री यमनोत्री आता है तो सीधा उत्तराखण्ड से जुड़ता है। यही हमारी देवभूमि की उपलब्धि भी है।
अब जहां तक बात इन 24 वर्षों के कालखंड में कमियों की है तो हमने अलग राज्य की मांग करते समय जो सोचा था या जो हमारी सोच थी, मेरा मानना है कि वह पूरी नहीं हुई है। सबसे बड़ी दिक्कत है पॉलिटिकल विजन की कमी। मेरा मानना है कि जो राजनीतिक सोच होनी चाहिए थी, उसमें थोड़ी कमी रही है। चाहे वह राजनीतिक हो या एडमिनिस्ट्रेटिव नेतृत्व, उसमें कमी रही है। मेरा मानना है कि हम इन वर्षों में अपनी विकास की सोच को विकसित नहीं कर पाए हैं। हमारा फोकस खास तौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में भटक गया है। आज खंडजा बनाने, नालिया बनाने पर ही ज्यादा जोर है। जबकि हमारी सोच किस तरह के प्रोजेक्ट बनें? किस तरह की स्कीम यहां चलाई जाए? इस पर रहनी चाहिए थी। इसके लिए क्षेत्र और उसकी अनुकूलता पर नीति और प्रोजेक्ट होने चाहिए। हमारे समान ही पहाड़ी राज्य हिमाचल का पॉलिटिकल विजन बहुत अच्छा था। वहां राजनीतिक सोच और ब्यूरोक्रेसी बेहतर रही है। मेरे एक बहुत अच्छे जानकार हैं जो हिमाचल कैडर के ब्यूरोक्रेट थे। एक बार मेरी उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने मुझे बताया कि आज से तीस चालीस साल पूर्व हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री, अपने सभी अधिकारियों को अपने साथ हैलीकॉप्टर में बैठा कर उनके कार्यक्षेत्रों में घुमाते थे और कहते थे कि देखो आपका कार्यक्षेत्र ऐसा है और इसी में आपने बेहतर काम करके दिखाना है। यह छोटी-सी चीज है लेकिन इसका इंपेक्ट गजब का है। मुझे यह बहुत अच्छा लगा। मेरा पूछना है कि क्या हमारे प्रदेश के ब्यूरोक्रेट को हम इसी तरह से प्रशिक्षित नहीं कर सकते? आज डीएम और एसडीएम तक को अपने क्षेत्र की पूरी जानकारी तक नहीं होती है। उन्हें सिर्फ अपने विभागीय कार्यालय के अलावा ज्यादा कुछ पता होगा मुझे नहीं लगता।

धर्म हमारे लिए महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ धर्म के नाम पर ही हम चलते रहे तो न इससे देश का भला होगा और न ही इस प्रदेश का। प्रदेश में ही देखिए, 2022 में भाजपा सरकार के खिलाफ बड़ा माहौल था। भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर मामले सरकार पर लगे, लेकिन चुनाव में क्या हुआ? भाजपा फिर से सरकार में आ गई। ऐसे ही देश में भी हुआ। मतदाताओं को भरमाने का काम बड़े जोर-शोर से किया जा रहा है। भाजपा काम की बजाय धर्म को मतदाताओं के सामने रखती है। कुछ समय तो यह चल जाएगा जैसे पहले चला लेकिन एक समय तो आएगा कि आप अपने विधायक, सांसद से विकास के लिए सवाल पूछेंगे तब वे क्या जबाब देंगे? यह सोचने की बात है

 

पलायन को लेकर आपका विजन और सोच क्या है?

मैं 15 साल अमेरिका में रहा। वहां मैं फेसबुक का डायरेक्टर था। मेरा कोई सीधा इन्वॉलमेंट पॉलिटिक्स से कभी नहीं रहा। मैं राजनीतिक परिवार से जरूर हूं और मेरे पिता का प्रदेश की राजनीति में बड़ा नाम है। इन सबके बाद भी 2019 से ही मैं राजनीति से जुड़ा। उससे पहले राजनीति से मेरा कोई लेन-देना नहीं था। हां, समय-समय पर मैं जैसे 2014 के चुनाव में मैं आया था और उसको देखता था तथा जो मुझे कहा जाता था मैं करता था। पिछले तीन-चार चुनाव भी मैंने उनके देखे थे। जहां तक रही पलायन की बात तो पलायन शब्द कोई बुरा नहीं है। मैं हिंदुस्तान, यूरोप और अमेरिका में रहा हूं, मेरा जो तर्जुबा है उससे मैं यह कह सकता हूं कि पलायन दुनिया के हर देश के पहाड़ी क्षेत्र में होता है। अमेरिका और यूरोप के पहाड़ी क्षेत्रों से खूब पलायन हुआ है। हर आदमी अपनी सुविधा के लिए पहाड़ से मैदान की ओर बसने का प्रयास करता है। मैं राजनीतिक व्यक्ति के तौर पर पलायन की बात कर रहा हूं। पलायन तो मैंने भी किया है औेर आपने भी किया है। हम जनता को कह रहे हैं कि पहाड़ में रहो, पहले तो हमें ही वहां रहना चाहिए। हमारे मुख्यमंत्री जो भी रहे हों, उनको पहाड़ में ही रहना चाहिए, जब सेशन हो तब आ जाए देहरादून में। इन पांच सालों में मैंने 14 विधानसभा क्षेत्रों को नजदीक से देखा है। वहां पलायन चिकित्सा से नहीं हो रहा है, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए हो रहा है। मैंने बहुत नजदीक से यह देखा है कि जब बच्चा छह-सात साल का हो जाता है तो उसके माता-पिता जिनके पास जमा पूंजी है, वह सबसे पहले अपने बच्चे की शिक्षा के लिए देहरादून, कोटद्वार या हल्द्वानी लेकर आ जाता है।

कांग्रेस पार्टी अग्निवीर योजना का विरोध कर रही है। आप स्वयं कई बार कह चुके हैं कि यह योजना देश की सुरक्षा के लिए बहुत ही घातक है। आपने तो यहां तक कहा कि अगर हम सरकार में आए तो योजना को खत्म करेंगे। आखिर इस विरोध के पीछे का क्या कारण है?

मैं आज भी यह मानता हूं कि अग्निवीर योजना देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। मुझे इस योजना से इतना बड़ा क्रोध है, मैं उसको बयां भी नहीं कर सकता। अगर कांग्रेस पार्टी ने अग्निवीर योजना का विरोध करना छोड़ दिया तो मैं सबसे पहले कांग्रेस का ही विरोध करना शुरू कर दूंगा। यह अमेरिका नहीं है, यह हिंदुस्तान है। हिंदुस्तान में एक आदमी फौज में जाता है तो वह एक मर्यादा के लिए जाता है, देशभक्ति के लिए जाता है। आप फौज में किसी को चार साल के लिए रखेंगे और सिर्फ एक ही व्यक्ति को परमानेंट फौज में रखेंगे तो सबसे पहले फौज में आपकी पल्टन में राजनीति होगी। जो तीन अग्निवीर परमानेंट नहीं होंगे तो उनके मन में क्या होगा? लोग कहते हैं कि देश के लिए बलिदान दिया लेकिन असल में सबसे पहले फौजी अपनी पल्टन, अपनी रेजिमेंट के लिए बलिदान देता है। बलिदान के लिए पहला दरवाजा उसका अपनी पल्टन के लिए ही होता है। अगर आप पल्टन में ही राजनीति ला रहे हैं तो सबसे पहले आप देश की रीढ़ की हड्डी को तोड़ रहे हैं। आप ऐसे देखिए, सबसे पहले यह देखा जाने लगेगा कि फौजी किस जाति का है मानो कोई खंडूड़ी है, कोई रावत है, कोई नेगी है तो क्या होगा। सबसे पहले यह देखा जाएगा कि सूबेदार किस जाति का है, अगर मेरी जाति का है तो मैं उससे अपना कनेक्शन बनाऊंगा, इससे फौज में जतिवाद हावी होगा। इसे उत्तराखण्ड से जोड़ कर देखंे तो आप देखिए, हमारे पास कोई बड़े उद्योग नहीं हैं, रोजगार के बड़े साधन नहीं हैं, सेना ही हमारे युवाओं के लिए एक सहारा रही है। अब हमसे हमारे सहारे भी छीन लिए जा रहे हैं तो युवाओं में हताशा और बेरोजगारी बढ़ेगी। इसलिए मैं अग्निवीर के सख्त खिलाफ हूं।

अयोध्या में भगवान राम की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से कांग्रेस पार्टी ने अपने को अलग कर लिया और कई नेताओं ने इसका विरोध भी किया और बयान तक दिए हैं। क्या कांग्रेस के ऊपर हिंदू विरोधी होने का ठप्पा लग रहा है?

कांग्रेस ने कभी अपने आप को इससे अलग नहीं किया। जब सबसे पहले अयोध्या के ताले खुले थे तो वह कांग्रेस के समय में ही खुले थे। लेकिन जैसे चुनाव को लेकर फिर से माहौल बनाया जा रहा है वह सही नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय में पुलवामा हुआ तो इस बार राम मंदिर को लेकर माहौल बनाया जा रहा है। इससे कांग्रेस ने अपने को अलग किया है। राजनीति में ऐसा हो रहा है कि जो नफरत और भय का माहौल बना दिया जाता है उसके बेसिस पर लोग वोट देते हैं। मैं शिव भक्त हूं, मेरी धार्मिक मान्यताएं हैं जिनके अनुसार मैं अपने देश के लिए लड़ता हूं, काम करता हूं। धर्म को आधार बना देश नहीं चलाया जा सकता है। आप रोजगार नहीं दे सकते, देश की तरक्की नहीं कर सकते। सिर्फ आप ट्टार्म के माध्यम से यह करेंगे तो कभी न कभी देश का सर्वनाश तो होगा ही। इसी को लेकर राहुल गांधी ‘न्याय यात्रा’ कर रहे हैं। पहले ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की जिसका हमें फायदा भी हुआ। कर्नाटक और तेलंगाना में मतदाताओं ने कांग्रेस की नीति और नियत को देखकर कांगेस की सरकार बनाई। हमारी लड़ाई एक-दो साल के लिए नहीं है। हमारी लड़ाई देश के अस्तित्व के लिए है और यह लंबी लड़ाई है।

आपने कहा कि राम मंदिर के ताले कांग्रेस सरकार ने ही खुलवाए थे, लेकिन कांग्रेस की ही मनमोहन सिंह सरकार ने भी तो सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राम एक कल्पना हैं। आज भी भाजपा इसको बड़ा मुद्दा बनाकर प्रचारित करती है?

भाजपा जो कह रही है अगर मैंने उस पर रिएक्ट करना है तो भाजपा क्या-क्या कहती रही है मुझे उस पर बात करनी होगी। देखिए, हम किस दिशा में जा रहे हैं यह सबसे पहले सोचना है। धर्म हमारे लिए महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ ट्टार्म के नाम पर ही हम चलते रहे तो न तो इससे देश का भला होगा और न ही इस प्रदेश का। प्रदेश में ही देखिए, 2022 में भाजपा सरकार के खिलाफ बड़ा माहौल था। भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर मामले सरकार पर लगे, लेकिन चुनाव में क्या हुआ? भाजपा फिर से सरकार में आ गई। ऐसे ही देश में भी हुआ। मतदाताओं को भरमाने का काम बड़े जोर-शोर से किया जा रहा है। भाजपा काम की बजाय धर्म को मतदाताओं के सामने रखती है। कुछ समय तो यह चल जाएगा जैसे पहले चला लेकिन एक समय तो आएगा कि आप अपने विधायक, सांसद से विकास के लिए सवाल पूछेंगे तब वे क्या जबाब देंगे? यह सोचने की बात है।

प्रदेश कांग्रेस संगठन के कमजोर होने की बात कही जाती है? क्या आप मानते हैं कि प्रदेश कांग्रेस संगठन को दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है?

मैंने यह कभी नहीं कहा कि प्रदेश कांग्रेस संगठन में कमी है। मैंने कहा हेै कि इसमें सुट्टाार की बहुत बड़ी जरूरत है। इन चार सालों में मैंने गांव-गांव जाकर कांग्रेस का संगठन देखा है। वहां हर एक गांव, हर एक घर में कांग्रेस का कार्यकर्ता मजबूती से कांग्रेस के साथ खड़ा है। यानी हमारे पास कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं का एक भरपूर संगठन है। हमें यह देखना है कि हम कैसे उनको अपने साथ लेकर काम करें। मेरा यह मानना है कि हम अगर एक साथ मेहनत करें तो कांग्रेस के पक्ष में बेहतर माहौल बन सकता है। परिणाम क्या आएगा वह तो जनता ही निर्धारित करती है। लेकिन हमें अपनी मेहनत और तेज करनी होगी। हमारा संगठन इसके लिए भरूपर प्रयास कर रहा है। मुझे पूरी उम्मीद है कि माहौल हमारे पक्ष में ही होगा।

अगर कांग्रेस पार्टी ने अग्निवीर योजना का विरोध करना छोड़ दिया तो मैं सबसे पहले कांग्रेस का ही विरोध करना शुरू कर दूंगा। यह अमेरिका नहीं है, यह हिंदुस्तान है। हिंदुस्तान में एक आदमी फौज में जाता है तो वह एक मर्यादा के लिए जाता है, देशभक्ति के लिए जाता है। आप फौज में किसी को चार साल के लिए रखेंगे और सिर्फ एक ही व्यक्ति को परमानेंट फौज में रखेंगे तो सबसे पहले फौज में आपकी पल्टन में राजनीति होगी। जो तीन अग्निवीर परमानेंट नहीं होंगे तो उनके मन में क्या होगा? लोग कहते हैं कि देश के लिए बलिदान दिया लेकिन असल में सबसे पहले फौजी अपनी पल्टन, अपनी रेजिमेंट के लिए बलिदान देता है। बलिदान के लिए पहला दरवाजा उसका अपनी पल्टन के लिए ही होता है। अगर आप पल्टन में ही राजनीति ला रहे हैं तो सबसे पहले आप देश की रीढ़ की हड्डी को तोड़ रहे हैं

आप भाजपा की बजाय कांग्रेस में शामिल होकर राजनीति में आए। इसके क्या कारण थे?

यह सवाल अब कोई मायने नहीं रखता। राजनीति में आना मेरे लिए बहुत आसान था। मैं आया भी तो कुछ कारण होंगे। आज मैं चल रहा हूं तो मैं उत्तराखण्ड के लिए चल रहा हूं। मैं एक पार्टी के लिए नहीं चल रहा हूं, मैं किसी पद के लिए काम नहीं कर रहा हूं। अगर मुझे एक पार्टी या खुद के लिए करना होता तो मैं ये काम क्यों कर रहा होता। मैं इसलिए कर रहा हूं कि गढ़वाल, उत्तराखण्ड का मैं कुछ भला कर सकूं। मैं मानता हूं कि मैं पढ़ा-लिखा हूं, देश-विदेश में मैंने काम किया। मेरा अपना तर्जुबा है तो मैं उसका उपयोग भी अपने प्रदेश के हित में करूं, चाहे वह मैं किसी राजनीतिक पार्टी के माध्यम से करूं, चाहे वह व्यक्तिगत करूं या फिर चाहे नॉन प्रॉफिट के माट्टयम से करूं, यही मेरा उद्देश्य है।

2019 में मतदाता आपको बीसी खण्डूड़ी के पुत्र के तौर पर जानते थे जिसका फायादा आपको वोटों के तौर पर मिला। लेकिन अब आप पूरी तरह से कांग्रेस के नेता के तौर पर जाने जाते हैं जिसे मतदाता भी मानता है तो क्या 2019 में मिले 2 लाख मतों की सीमा को 2024 में पार कर पाएंगे?

देखिए, पहले तो मैं आपको यह बता दूं कि मुझे अपने पिता पर बहुत गर्व है। लेकिन मैं उनको अपना भगवान मानता हूं। मेरी जिंदगी में मैं उनका बेटा हो गया उससे ज्यादा मुझे कुछ और नहीं चाहिए। उनका अशीर्वाद हमेशा से मुझ पर रहा है। लेकिन मैं अपने पिता का नाम अपने राजनीतिक फायदे के लिए करूं यह मैंने कभी सोचा भी नहीं। आज मतदाता मुझे जनरल साहब का बेटा कहते हैं तो मेरे लिए तो यह गर्व की बात है। मतदाता मुझे किस तरह से देखते हैं और कैसे देखता है यह तो उनका प्यार है। मैं आपको बार-बार यही कह रहा हूं कि मेरे लिए पार्टी, पद कुछ मायने नहीं रखती। मैं उत्तराखण्ड के लिए क्या कर सकता हूं, मेरा इसी पर फोकस है।

आगामी लोकसभा चुनाव में आप, हरीश रावत और हरक सिंह रावत ही को छोड़ दे तो कांग्रेस के कई बड़े नेता चुनाव से परहेज करने की बात कह रहे हैं। क्या कांग्रेस में चुनाव में अपने प्रदर्शन को लेकर अभी से ही घबराहट है या भाजपा से भय हो रहा है?

इस बारे में किसी ने क्या टिप्पणी की है उस पर तो कुछ नहीं कहूंगा। पार्टी जो आदेश देगी, वह हर हाल में पूरा होगा। हर आदमी के अपने- अपने विचार हैं। एक बात तो आपको माननी ही होगी कि कांग्रेस में कोई भी नेता अपने विचार सामने रख देता है उसे किसी प्रकार की कोई रोक नहीं है, जबकि अन्य किसी और पार्टी में ऐसा देखने को नहीं मिल सकता। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत है। ऐसा नहीं है कि कोई चुनाव नहीं लड़ना चाहता, बल्कि बहुत से लोग हैं जो पार्टी में चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं, कई बैठकें हुई हैं उसमें कई लोगों ने अपनी चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई है।

आजकल प्रदेश में दो बड़े मुद्दे सबसे ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। उनमें एक मूल निवास और दूसरा मजबूत भू-कानून है। इसके लिए आंदोलन भी हो रहे हैं। इसको लेकर आपके क्या विचार हैं?

हमारी जो संस्कृति है या जो वे ऑफ लीविंग है उसकी सुरक्षा और संरक्षण करना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। सबसे पहले तो सबको यह समझ लेना चाहिए कि उत्तराखण्ड बना है हमारे नाम पर, किसी और के नाम पर नहीं। जब तक हमारी जो भू यानी जमीन पर हमारा अपर्ना अिधकार नहीं रहेगा, तब तक जिस कारण से उत्तराखण्ड बना था, वह नहीं कर पाएंगे। हमारा अस्तित्व ही उत्तराखण्ड है। इसलिए हमें एक मजबूत भू-कानून की जरूरत है। आपको कुछ दिया जाता है तो उसके बदले आपके पास बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी आ जाती है। मजबूत भू-कानून होना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप विकास को रोक दें। अगर कोई उद्योग यहां आता है उसे जमीन की जरूरत है तो आप दीजिए। लेकिन यह नहीं होना चाहिए कि कोई भी उद्योग के नाम पर यहां आए और सिर्फ जमीनें खरीद कर मालिक बने और कोई काम नहीं हो या जिस काम के लिए जमीन दी गई उसे न करके उसे अपने लाभ के लिए बेचने लगे। इसके लिए मजबूत निगरानी तंत्र की भी बहुत जरूरत है। ऐसे ही मूल निवास पर भी होना चाहिए। उत्तराखण्ड के मूल निवासियों के जो अट्टिाकार हैं वे उनको मिलने ही चाहिए।

उत्तराखण्ड को लेकर कौन से पांच ऐसे मुद्दे जिन पर आप का विजन है और आप इन पर काम करना चाहते हैं?

सबसे पहला जो मुद्दा है वह है ‘युवा’ का। आज हमारे प्रदेश में 44 प्रतिशत संख्या 35 वर्ष से नीचे केे युवाओं की है। यानी हर बात युवाआंे से शुरू होती है और युवाओं तक खत्म होती है। अगर आप युवाओं को लेते हैं तो उसमें रोजगार भी जुड़ जाता है आखिर रोजगार युवाओं के लिए ही तो है। अगर आप उसमें कई स्कीमें जोड़ते हैं तो भी उसमें युवा शामिल होता है। अगर महिलाओं का सम्मान की बात करें चाहे वह अंकिता भंडारी का मामला हो, वह भी युवाओं से ही जुड़ा है महिला सम्मान से भी जुड़ा है। मेरा अपना विजन है कि हम अपने उत्तराखण्ड के युवाओं को सबसे अच्छी शिक्षा कैसे दे सकंे जिससे वे अपना बेहतर रोजगार पा सकंे या उनको हम कैसे तैयार करंे जिससे वह प्रदेश के बाहर भी अपने लिए बेहतर रोजगार पा सकें।

दूसरा मुद्दा है उद्योग और कारोबार का। हमारे राज्य में अभी बड़ा इन्वेस्टर समिट हुआ है पहले भी हो चुका है। यह बहुत जरूरी है लेकिन इसमें हमें अपने उत्तराखण्ड के परिवेश को ध्यान में रखकर कैसे हम स्थानीय स्तर पर काम कर सकते हैं चाहे वह इंडस्ट्रीयल सेक्टर हो या टूरिज्म सेक्टर हो इसके लिए ज्यादा से ज्यादा प्रदेश को लाभ कैसे हो मेरा इस पर फोकस है।

तीसरा मुद्दा महिलाओं का है। हमारे राज्य में हमेशा से महिला एक रीढ रही है। महिलाओं को हम कमतर नहीं आंक सकते। उत्तराखण्ड चलता ही हमारी महिलाओं से है क्योंकि आप गांव-गांव में जाकर देखें तो एक महिला का दैनिक कार्य अर्ली मॉर्निंग से शुरू होकर लेट नाइट तक चलता है। सामान्य तौर पर एक व्यक्ति 8 से 10 घंटे तक ही काम करता है जबकि महिलाएं 14 से 16 घंटे तक काम करती हैं। इसलिए हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता महिलाआंे के जीवन स्तर को सुधारने के लिए होनी ही चाहिए। उनके बेहतर शिक्षा, रोजगार, उनकी सामाजिक और आर्थिक तरक्की से कैसे जोड़ा जाए तथा उनकी सुरक्षा भी प्राथमिकता में होनी चाहिए, क्योंकि आज अधिकतर गांवों में पुरुष रोजगार, नौकरी के लिए गांव से बाहर निकल चुका है जो महिलाएं गांव में रह रही हैं उनकी सुरक्षा बहुत जरूरी बन गई है।

मेरा चौथा फोकस गढ़वाल को लेकर है। पौड़ी संसदीय क्षेत्र दो भागों में बंटा हुआ है। एक भाग ऋषिकेेश से चमोली और दूसरा भाग कोटद्वार से लेकर गंगा नदी के दूसरे तट से लगकर बद्रीनाथ तक का है। दूसरे क्षेत्र के छह-सात विधानसभा क्षेत्र में कोई बड़ा डेवलपमेंट का काम नहीं हुआ है। जैसे नरेंद्र नगर में पर्यटन उद्योग आज बहुत बढ़ गया है। वैसे ही इस क्षेत्र में होना चाहिए। अगर मैं लोकसभा गया तो मेरा फोकस कोटद्वार से लेकर श्रीनगर क्षेत्र तक पर्यटन और उद्योग क्षेत्र में डेवलपमेंट का रहेगा।
राजनीतिक जीवन में शुचिता और जनता के प्रति जबाबदेही: मेरा पांचवा विजन है। आप इसको कई तरह से जोड़कर देख सकते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा हो या हर वह क्षेत्र जो जनता के हित में प्रतिनिधित्व करता है, हमें शुचिता और समर्पण का भाव सबसे पहला और सबसे आखिरी होना चाहिए।

 

सबको यह समझ लेना चाहिए कि उत्तराखण्ड बना है हमारे नाम पर, किसी और के नाम पर नहीं। जब तक हमारी जो भू यानी जमीन पर हमारा अपना अधिकार नहीं रहेगा, तब तक जिस कारण से उत्तराखण्ड बना था, वह नहीं कर पाएंगे। हमारा अस्तित्व ही उत्तराखण्ड है। इसलिए हमें एक मजबूत भू-कानून की जरूरत है। आपको कुछ दिया जाता है तो उसके बदले आपके पास बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी आ जाती है। मजबूत भू-कानून होना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप विकास को रोक दें। अगर कोई उद्योग यहां आता है उसे जमीन की जरूरत है तो आप दीजिए। लेकिन यह नहीं होना चाहिए कि कोई भी उद्योग के नाम पर यहां आए और सिर्फ जमीनें खरीद कर मालिक बने और कोई काम नहीं हो या जिस काम के लिए जमीन दी गई उसे न करके उसे अपने लाभ के लिए बेचने लगे। इसके लिए मजबूत निगरानी तंत्र की भी बहुत जरूरत है

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