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Uttarakhand

पीढ़ीगत बदलाव के भंवरजाल में कांग्रेस

सर्वविदित है कि बीते पांच वर्षों में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने अपना पूरा जोर हरीश रावत की राजनीति का प्रतिरोध करने में जाया कर दिया था। अब देखना होगा कि करन माहरा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर कांग्रेस को नया स्वरूप देते हैं या फिर प्रीतम सिंह की भांति कॉकस से घिरे रहते हैं जिसकी राजनीति का आधार सिर्फ हरीश रावत का विरोध है। अगर करन माहरा इस कॉकस की राजनीति से बच पाए तो वे अपने लिए तथा उत्तराखण्ड में कांग्रेस के लिए नया मुकाम स्थापित कर पाएंगे। उन्हें याद रखना होगा कि राजनीति में ऐसे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते हैं जब आप अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर एक नई मिसाल बनाते हैं। सभी आशाओं और आशंकाओं के बीच सबसे बड़ी चुनौती करन माहरा, यशपाल आर्या और भुवन कापड़ी के लिए है। इस तिकड़ी को तय करना होगा कि वो कांग्रेस की गुटीय राजनीति को बरकरार रखते हैं या फिर उत्तराखण्ड में कांग्रेस की नई भूमिका की ओर कदम बढ़ाते हैं

उत्तराखण्ड राज्य के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने नेता प्रतिपक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और उप नेता का एलान क्या किया कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में उबाल आ गया। एक ऐसा फैसला जो कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी गुटों को न उगलते बन रहा है न निगलते बन रहा है। कांग्रेस आलाकमान के एक जोखिम मगर साहस भरे निर्णय ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को एक झटके में बदल पिछले पांच सालों से आपस में टकरा रहे हरीश और प्रीतम गुट को सकते में डाल दिया है। आज कांग्रेस जिस स्थिति में उत्तराखड में है उसे दुरुस्त करने के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को ऐसे ही निर्णय की दरकार थी जो एक कठोर संदेश पार्टी के उन वरिष्ठ नेताओं को दे जिनके चलते कांग्रेस 2022 के विधानसभा चुनावों में सत्ता पाने का अपना सपना पूरा नहीं कर सकी। करन माहरा के रूप में प्रदेश अध्यक्ष और यशपाल आर्या के रूप में नेता प्रतिपक्ष और उप नेता के रूप में भुवन कापड़ी की नियुक्ति कर कांग्रेस आला कमान ने एक स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया कि वो अतीत को पीछे छोड़ भविष्य के लिए नई शुरुआत करना चाहता है जो हरीश रावत और प्रीतम सिंह सरीखे नेताओं की भूमिका सीमित रहने की ओर स्पष्ट संकेत है।

उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी जिस प्रकार पीढ़ीगत बदलाव के संकेत देते हुए पुराने नेताओं को विदाई का संकेत दिया है। उसी तर्ज पर कांग्रेस ने भी महत्वपूर्ण नियुक्तियों के जरिए संदेश देने की कोशिश की है कि वो पीढ़ीगत बदलाव का मन उत्तराखण्ड में बना चुकी है। इसके लिए क्षेत्रीय समीकरण उतना महत्व नहीं रखते हैं जिस सोच के साथ राजनीतिक दल उसे देखते हैं। विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के सामने नई टीम चुनना आसान नहीं था क्योंकि 2017 की हार के बाद अगले पांच वर्षों तक कांग्रेस ने वो अंदरूनी लड़ाई देखी थी जिसके चलते कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में नहीं कर पाई।

पहले बात करें नई टीम की तो यशपाल आर्या का अनुभव और करन माहरा, भुवन कापड़ी की युवा सोच का समन्वय उत्तराखण्ड में कांग्रेस को खोई जमीन दिला सकता है। जातिगत संतुलन साधते हुए कांग्रेस ने बड़े दलित चेहरे यशपाल आर्या को नेता प्रतिपक्ष, ठाकुर करन माहरा को प्रदेश अध्यक्ष और ब्राह्मण चेहरे के रूप में भुवन कापड़ी को उपनेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया है। हालांकि इस संतुलन साधने की कवायद में क्षेत्रीय संतुलन नहीं सध पाया। गढ़वाल का प्रतिनिधित्व इसके चलते फिलहाल शून्य नजर आता है। यशपाल आर्या का नेता प्रतिपक्ष के रूप में चयन कांग्रेस द्वारा अपने कोर वोटर को साधने की कवायद है। लगातार पांचवीं बार विधानसभा में पहुंचे आर्या विधानसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। 2007 से 2014 तक सात साल तक प्रदेश अध्यक्ष रहे यशपाल आर्या की कप्तानी में ही 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी। साथ ही 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने लोकसभा की पांचों सीटों पर कब्जा किया था। 2017 में आर्या जरूर भाजपा में चले गये थे। उनकी नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति पर सवाल इस आधार पर उठाए जा रहे हैं कि आर्या भाजपा से कांग्रेस में हाल ही में शामिल हुए हैं लेकिन स्मरण रहे 2007 से 2012 तक विपक्ष के नेता रहे डॉ ़ हरक सिंह रावत की पृष्ठभूमि भी खांटी कांग्रेस की नहीं रही है। वे भी भाजपा और बसपा का सफर तय करके कांग्रेस में आए थे। यशपाल आर्या के सामने कांग्रेस आलाकमान की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती है। उनका राजनीतिक अनुभव कांग्रेस की ढलती उम्मीदों को रोशनी की किरण दिखा सकता है।

जहां तक नए प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा का सवाल है तो राजनीति उन्हें विरासत में मिली है। उनके पिता स्व ़ गोविंद सिंह माहरा उत्तर प्रदेश के समय पहाड़ के बड़े नेताओं में शुमार होते थे। 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त को रानीखेत विधानसभा में नाको चनों चबवा देने वाले गोविंद सिंह माहरा ने पृथक पर्वतीय राज्य की मांग को मजबूत आवाज दी थी। करन माहरा के बड़े भाई पूरन सिंह माहरा भी रानीखेत से विधायक रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के साले करन माहरा ताड़ीखेत के ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं। 2017 में कांग्रेस विधायक दल के उपनेता रहे करन माहरा ने विधानसभा में अपनी बुलंद आवाज से खासा प्रभाव छोड़ा था। इंदिरा हृदयेश की मृत्यु के बाद नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में शामिल करन माहरा कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गये और नेता प्रतिपक्ष का पद प्रीतम सिंह के खाते में गया। हालांकि कहा जाता है कि प्रीतम सिंह इस पद पर करन माहरा की ताजपोशी के पक्ष में थे। करन माहरा 2022 का चुनाव भले ही हार गये हों लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अब युवाओं पर दांव खेलकर उत्तराखण्ड में भविष्य का नेतृत्व आगे बढ़ाने का संकेत दे दिया है। करन माहरा के सामने चुनौती कठिन जरूर है मगर असंभव कुछ भी नहीं है। अगर गुटबाजी से दूर हटकर वे कांग्रेस को एक कर पाए तो कांग्रेस नेतृत्व का उनको अध्यक्ष बनाने का निर्णय पार्टी को उत्तराखण्ड में संजीवनी दी जाएगी। युवा कांग्रेस के अध्यक्ष और वर्तमान में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष भुवन कापड़ी को उपनेता प्रतिपक्ष देकर उन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हराने का इनाम तो दिया ही है साथ में भविष्य के युवा नेतृत्व के रूप में उन पर कांग्रेस ने भरोसा भी जताया है।

प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और विधायक दल के नेता पर आलाकमान द्वारा लिए गए फैसले बाद कांग्रेस के अंदर से जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं आई संभवतः वह स्वाभाविक ही थी लेकिन मीडिया के एक वर्ग द्वारा जिस प्रकार इन नियुक्तियों को कुमाऊं व गढ़वाल के चश्मे से देखने की कोशिश की उससे लगता है कि राज्य बनने के बाद भी एक बड़े तबके का संकीर्ण नजरिया अभी बदला नहीं है। ये पहली बार नहीं है जब राजनीतिक दलों ने जातिगत या क्षेत्रीय संतुलन की अनदेखी की है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद अंतरिम विधानसभा और सरकार में भगत सिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री तो विधानसभ अध्यक्ष प्रकाश पंत कुमाऊं से थे। तब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में हरीश रावत और नेता प्रतिपक्ष डॉ ़ इंदिरा हृदयेश भी कुमाऊं से ही थे। 2002 में नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री के रूप में नारायण दत्त तिवारी और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के रूप में हरीश रावत कुमाऊं से ही थे। 2012 की बात करें तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या और सितारगंज से चुनकर गये विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री के रूप में कुमाऊं से ही थे। भाजपा ने तो 2012 से लेकर 2017 तक क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण को दरकिनार कर अजय भट्ट को नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष पर बैठाया था। उस वक्त मीडिया ने भाजपा पर जातीय व क्षेत्रीय असंतुलन का कोई आरोप नहीं लगाया था।

इसी प्रकार तीरथ सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते मदन कौशिक का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना किसी को नहीं खटका था। हाल के समय में प्रीतम सिंह के नेता प्रतिपक्ष और गणेश गोदियाल के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने से दोनों पद गढ़वाल के हिस्से में चले गये थे। जरूरी नहीं राजनीतिक दल मीडिया के एक वर्ग और कुछ नेताओं से इत्तेफाक रखें। जहां तक कांग्रेस के नेताओं की प्रतिक्रिया की बात करें तो नेता प्रतिपक्ष की दोबारा आस लगाए प्रीतम सिंह के लिए ये खासा झटका है वहीं हर छोटी-छोटी घटना पर सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया जताने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा नई टीम को बधाई तक न देना संकेत देता है कि वो हाईकमान के निर्णय से इत्तेफाक नहीं रखते। हरीश रावत का मौन और उनके समर्थक विधायकों की तीखी प्रतिक्रिया कुछ और ही कहानी कहती है। ये गुस्सा सिर्फ विधायकों का है या हरीश रावत की ही भावनाओं की अभिव्यक्ति उनके समर्थकों की जुबानी बाहर आ रही है, ये समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है।

पिछले पांच सालों में आपसी गुटबाजी के चलते कांग्रेस संगठन की जिस प्रकार गत हुई है उसके मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान ने गुटीय राजनीति को किनारे कर नये नेतृत्व की दिशा में जो कदम उठाया है उसने हरीश और प्रीतम गुट को तो सदमा दिया ही है, साथ ही प्रदेश में भाजपा की तर्ज पर नई राजनीति का सूत्रपात करने का एक निर्णय लिया है। केंद्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा गुटबाजी को हार का कारण मानने की रिपोर्ट के बाद प्रीतम सिंह ने प्रभारी देवेंद्र यादव और अविनाश पाण्डे के खिलाफ भले ही मोर्चा खोल दिया हो लेकिन पिछले पांच सालों में गुटबाजी के एक धुरी के केंद्र वो ही थे इसे उन्हें स्वीकार करना ही पड़ेगा। पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस के अंदर उठा-पठक के दूसरे केंद्र हरीश रावत भी थे। अब प्रीतम सिंह और हरीश रावत को ये तय करना होगा कि वो केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय के साथ चलते हैं या नई दिशा की ओर बढ़ती कांग्रेस से इतर नई भूमिका तलाश करते हैं। इन दोनों का कोई भी नकारात्मक निर्णय इन्हें कांग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति से हाशिये पर भी धकेल सकता है।

सभी आशाओं और आशंकाओं के बीच सबसे बड़ी चुनौती करन माहरा, यशपाल आर्या और भुवन कापड़ी के लिए है। इस तिकड़ी को तय करना होगा कि वो कांग्रेस की गुटीय राजनीति को बरकरार रखते हैं या फिर उत्तराखण्ड में कांग्रेस की नई भूमिका की ओर कदम बढ़ाते हैं। प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष का आपसी सामंजस्य कांग्रेस के समग्र हित में रहता है या फिर पिछले पांच वर्षों की तर्ज पर नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष का तारतम्य सिर्फ सिर्फ गुट विशेष को रोकने के लिए ताकत झोंकने में रहता है यह भी आने वाला समय बताएगा।

सर्वविदित है कि बीते पांच वर्षों में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने अपना पूरा जोर हरीश रावत की राजनीति का प्रतिरोध करने में जाया कर दिया था। अब देखना होगा कि खासकर करन माहरा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर कांग्रेस को नया स्वरूप देते हैं या फिर प्रीतम सिंह की भांति कॉकस से घिरे रहते हैं जिसकी राजनीति का आधार सिर्फ हरीश रावत का विरोध है। अगर करन माहरा इस कॉकस की राजनीति से बच पाये तो वे अपने लिए तथा उत्तराखण्ड में कांग्रेस के लिए नया मुकाम स्थापित कर पाएंगे। उन्हें याद रखना होगा कि राजनीति में ऐसे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते हैं जब आप अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर एक नई मिसाल बनाते हैं।

बात अपनी-अपनी
चुनौतियां बहुत हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व का आभार है जिसने मुझ पर विश्वास जता कर मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने मुझे प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौंपकर मुझ पर जो विश्वास व्यक्त किया है उस पर खरा उतरने का प्रयास करूंगा। भाजपा की जनविरोधी नीतियों का मुकाबला जमकर किया जाएगा। मेरी प्राथमिकता कांग्रेस के उस कार्यकर्ता के सम्मान की रक्षा करना है जो वास्तविक रूप में पार्टी के लिए जमीन पर मेहनत करता है।
करन माहरा, प्रदेश अध्यक्ष उत्तराखण्ड कांग्रेस

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी है। उसके लिए सोनिया, राहुल और प्रियंका जी का आभार। प्रदेश के नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं के साथ समन्वय बनाकर राज्य की समस्याओं को प्रखरता के साथ मिलकर सदन के पटल पर उठाऊंगा। राज्य के विकास और जनता के मुद्दों को सड़क से सदन तक उठाने का कार्य करूंगा।
यशपाल आर्या, नेता प्रतिपक्ष

मैं पहली बार विधानसभा पहुंचा हूं। युवाओं की आवाज बनकर रोजगार, शिक्षा, पलायन और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे मेरी प्राथमिकताओं में रहेंगे। पार्टी आलाकमान ने जो जिम्मेदारी सौंपकर मुझ पर विश्वास व्यक्त किया है उस पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करूंगा।
भुवन चन्द्र कापड़ी, उपनेता प्रतिपक्ष

 

 

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