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Uttarakhand

‘श्मशान-क्रबिस्तान की राजनीति कांग्रेस नहीं कर सकती’

लगभग 50 वर्षों से राजनीति में सक्रिय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत कई बार के सांसद, केंद्र में मंत्री, उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री और वर्तमान में कांग्रेस की शीर्ष संस्था सीडब्ल्यूसी के स्थायी सदस्य हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के समक्ष कांग्रेस कम हरीश रावत ज्यादा बड़ी चुनौती बन चुके हैं। उनकी बढ़ती लोकप्रियता को न तो भाजपा थाम पा रही है और न ही कांग्रेस भीतर मौजूद उनके घोर विरोधी नेता। कुमाऊं क्षेत्र में गत् दिनों आई भीषण आपदा के समय प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे हरीश रावत संग ‘दि संडे पोस्ट’ के मुख्य संवाददाता संजय स्वार ने समसामयिक विषयों पर लंबी बातचीत की। पेश है उसके मुख्य अंशः

उत्तराखण्ड राज्य 21 वर्ष पूरे करने जा रहा है। इन इक्कीस वर्षों की यात्रा में आज उत्तराखण्ड को कहां पाते हैं?
देखिए, आज हमारे पास एक परिपक्व राज्य की दृष्टि से सक्षम न्यायपालिका है, सक्षम नौकरशाही है, सक्षम विधायिका है। हमारा तंत्र किसी भी पुराने राज्य से प्रतियोगिता में खड़े होने लायक है। हमारा आधारभूत औद्योगिक ढ़ांचा इन 21 वर्षों में तैयार हुआ है। कृषि के क्षेत्र में हमारे कुछ जिले राष्ट्रीय मानकों पर शीर्ष 20-25 में से हैं। कुछ असिंचित क्षेत्र है उनके लिए नयी संभावनाएं तलाशी जा रही है ताकि वहां के जो स्थानीय उत्पाद है उनको अच्छा बाजार मिल सके, अच्छी आमदनी मिल सके, वो खेती में भी आगे आए। कृषि के दूसरे क्षेत्र है जैसे पिंक एरिया मछली पालन, ब्लू एरिया दूध का क्षेत्र, औद्योनिक क्षेत्र इत्यादि जहां हमने प्रगति की है। ऐसा नहीं है कि राज्य ने तरक्की नहीं की है। आज हमारे पास सरकारी नौकरी का प्रतिशत अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है, इसका मतलब है हमने ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरी दी है। मगर पिछले साढ़े चार के शासनकाल में सारे मानक गड़बड़ा दिए हैं अन्यथा जब हम 2017 में पराजित हुए और भाजपा ने नई सरकार की बागडोर संभाली उस समय उत्तराखण्ड में न्यूनतम बेरोजारी दर 1 ़5 प्रतिशत थी। मैंने एक लाख तिहत्तर हजार प्रति व्यक्ति आय का औसत प्राप्त किया जो राष्ट्रीय औसत आय से काफी ज्यादा था। राजस्व वृद्धि दर में हम कर्नाटक के बाद दूसरे नंबर के राज्य थे। तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि राज्य ने कुछ प्राप्त नहीं किया लेकिन राज्य की आबादी का बड़ा हिस्सा जो करीब 30 से 40 प्रतिशत है वो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा भोजन, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिले और अच्छे अवसर उनके लिए पैदा हों इस पर फोकस करने की जरूरत है।

मुझे अफसोस है कि बड़े बहुमत में आने के बाद भी प्रदेश में भाजपा सरकार कुछ कर नहीं पाई। मुझे लगता है उनके पास कोई विकास संबंधी सोच नहीं है, कोई ब्लू प्रिंट नहीं है। इनकी पहली अंतरिम सरकार बनी वो कुछ नहीं कर पाई। 2007 में इनकी निर्वाचित सरकार आई जिसमें अच्छे नामचीन लोग मुख्यमंत्री रहे। वो भी कुछ नहीं कर पाए और अब इस समय की जो सरकार है उसको देखकर लगता है उनके सामने कैसे चला जाए, किस रास्ते पर चला जाए इसी में असमंजस कायम है जिसे वे दूर नहीं कर पा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने डबल इंजन की बात की, डबल इंजन बना भी मगर वो डबल इंजन तो स्टार्ट ही नहीं हुआ। तो ये उपलब्धि शून्य सरकार है जिसके पास लफ्जों के अलावा ठोस कुछ नहीं है

उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार के पिछले साढ़े चार सालों के कार्यों का मूल्यांकन आप किस रूप में करते है?
मुझे अफसोस है कि बड़े बहुमत में आने के बाद भी ये कुछ कर नहीं पाए। मुझे लगता है उनके पास कोई विकास संबंधी सोच नहीं है, कोई ब्लू प्रिंट नहीं है। इनकी पहली अंतरिम सरकार बनी वो कुछ नहीं कर पाई। 2007 में इनकी निर्वाचित सरकार आई जिसमें अच्छे नामचीन लोग मुख्यमंत्री रहे। वो भी कुछ नहीं कर पाए। अब इस समय की जो सरकार है उसको देखकर लगता है उनके सामने कैसे चला जाए, किस रास्ते पर चला जाए इसी में असमंजस कायम है जिसे वे दूर नहीं कर पा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने डबल इंजन की बात की, डबल इंजन बना भी मगर वो डबल इंजन तो स्टार्ट ही नहीं हुआ। जिस प्रकार इन्होंने ताश के पत्तों की तरह फेंट कर मुख्यमंत्री बदले उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है अपनी असफलता को। पहला मुख्यमंत्री बदला, फिर दूसरा मुख्यमंत्री लाए, उनको बदला। पहले दो मुख्यमंत्री के चलते जो ‘एंटी इन्कम्बैंसी’ पैदा हुई उससे निपटने के लिए तीसरा मुख्यमंत्री ले आए। आप देखिएगा बड़ी संख्या में भाजपा विधायकों के टिकट काटने जा रही है। कई मंत्रियों को टिकट नहीं मिल रहा है। ये टिकट इसलिए कटेंगे क्योंकि ‘एंटी इन्कम्बैंसी’ से बचना है। तो ये उपलब्धि शून्य सरकार है जिसके पास लफ्जों के अलावा ठोस कुछ नहीं है उपलब्धि के नाम पर।

पहले मैं स्पष्ट कर दूं कि यशपाल आर्या, संजीव आर्या का मामला बिल्कुल अलग है। उनके जाने का मुझे भी अफसोस था। सरकार बचाने में वो हमारे साथ थे लेकिन कुछ परिवारिक कारण होते हैं, कुछ परिस्थितियां होती हैं जिनके चलते पार्टी उनकी बात के अनुसार निर्णय नहीं ले सकी तो वो नाराज होकर चले गए। लेकिन अन्य की बात करें तो हर किसी ने कहा कि वो हरीश रावत के कारण गए। दो लोग खुद को मुख्यमंत्री का मैटीरियल समझते थे। वो समझते थे कि भाजपा में मुख्यमंत्री की समझ रखने वाले व्यक्तित्व नहीं है। शायद वो अवसर पा जाएं लेकिन अब उन्हें भाजपा के अंगूर खट्टे लगने लगे हैं और भाजपा में भगदड़ मची है। ये तो मैं इस भगदड़ को प्रश्रय नहीं दे रहा हूं, नहीं तो आपको बड़ी संख्या में भाजपाई कांग्रेस में आते दिखेंगे

जब सरकार के कार्यों का आकलन करते हैं तो क्या ये जरूरी नहीं कि पिछले साढ़े चार सालों में विपक्ष की भूमिका का भी मूल्यांकन किया जाए खासकर तब जब कि विपक्ष पर मित्र विपक्ष होने का आरोप लगें। क्या कहेंगे?

पिछले साढ़े चार सालों से जिस दिन से मैं चुनाव हारा, मैं उसी दिन से लगातार सक्रिय हूं और जनता के सवालों को उठा रहा हूं। मीडिया भी उसका साक्षी है। मेरा सोशल मीडिया में एकाउंट उसकी ताकीद करता है। लेकिन एक धारणा बन गई है। अब वो क्यों गई, किन लोगों की वजह से बन गई मैं समझ नहीं पा रहा हूं। अन्यथा कांग्रेसजन निरंतर लड़ रहे हैं। निरंतर लड़ेंगे। सक्रिय विपक्ष के रूप में गांव-गांव में कांग्रेस का कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

पिछली बार आप दो सीटों से चुनाव लड़े क्या इस बार आप चुनाव लड़ेंगे?
मेरे चुनाव लड़ने पर निर्णय पार्टी को करना है। हमने 2002 में बाहर रहकर पार्टी को चुनाव लड़वाया उसके अच्छे परिणाम आए। 2012 में भी ऐसा ही किया उसके भी अच्छे परिणाम आए। पार्टी जो निर्णय करेगी हम उसका अनुसरण करेंगे। लेकिन 2017 वाली स्थिति मैं पैदा नहीं करना चाहता। तब मैं समय नहीं दे पाया। हरिद्वार तो मैं गया ही नहीं। किच्छा में नाम मात्र को गया। अगर पार्टी को सघन प्रचारक के रूप में आवश्यकता होगी तो मैं उस रूप में उपस्थित रहूंगा। अगर पार्टी कहेगी कि आप भी चुनाव लड़िए, प्रचार आंशिक रूप से सब शेयर करेंगे तो मैं चुनाव लड़ने के साथ आंशिक प्रचारक के रूप में भी कार्य करने को तैयार हूं।

अब हम श्मशान-कब्रिस्तान के नारे पर तो चुनाव नहीं लड़ सकते, दीवाली पर चुनाव नहीं लड़ सकते। जब प्रधानमंत्री व्यक्ति के पहनावे को लेकर टिप्पणी करंे तो हम उस स्तर पर तो नहीं उतर सकते। हम उत्तर भारत की राजनीति में जातीय बंटवारे, धार्मिक बंटवारे का तोड़ नहीं निकाल पा रहे शायद। जिस दिन देश की जनता और हम उनके जातीय और साम्प्रदायिक बंटवारे की नफरत भरी राजनीति का तोड़ ढूंढ़ लेंगे उस दिन हर जगह आपको कांग्रेस ही कांग्रेस नजर आएगी। ये कांग्रेस का नहीं, शायद भारतीय राजनीति के संक्रमण का दौर है। लेकिन भारतीय राजनीति इस दौर से जल्द ही निकल जाएगी और विभाजक ताकतों को जनता उसका सही स्थान दिखाएगी, इंतजार कीजिए।

क्या पिछली बार आपका दो सीटों से चुनाव लड़ना सही फैसला था? ये फैसला पार्टी का था या आपका निजी फैसला था?
देखिए, नाम से तो पार्टी का ही फैसला हुआ लेकिन इसमें थोड़ी बहुत स्थानीय परिस्थितियां भी रहीं। किच्छा, हरिद्वार में जब हमें मालूम हुआ कि बसपा जिसके वोट को हमने अपनी तरफ कर लिया था वो इस वक्त फायदा उठा सकती है उससे कांग्रेस दिक्कत में आ जाएगी, मैंने किच्छा से लड़ने का फैसला किया। कालांतर में हरिद्वार से लड़ने का फैसला किया वो भी हाथ से निकल गया। वहां मैंने देखा कि बहुजन समाज पार्टी शिद्दत से खड़ी हो गई है। लेकिन वो फैसला जनता और मतदाताओं को शायद पसंद नहीं आया।

‘दि संडे पोस्ट’ को 2017 में दिए गए साक्षात्कार में आपने स्वीकार किया था कि कांग्रेस संक्रमणकाल से गुजर रही है। क्या आपको नहीं लगता कि संक्रमण काल काफी लंबा हो गया है और कांग्रेस अभी वहीं खड़ी है?
नहीं ऐसा नहीं है। देखिए, हमारी पुरानी और नई पीढ़ी के समन्वय की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है। ये दौर हर राजनीतिक दल में आता है। कम्युनिस्ट पार्टियां इस दौर से गुजर रही हैं। एक समय भाजपा इस दौर से गुजरी है और भाजपा फिर उसी दौर में आ रही है। राष्ट्रीय परिदृश्य को देखिए तो हर पार्टी कभी न कभी इस दौर से गुजरती है। पीछे मुड़कर देखें तो कांग्रेस इस दौर से पहले भी गुजरी है। इंदिरा जी, राजीव जी सरीखे व्यक्तित्व आए और हम उस दौर से निकल गए। फिर सोनिया जी ने निराशा के दौर से उबारा। 2004 से लगातार दस साल सरकार चलाने के बाद की ‘एंटी इन्कम्बैंसी’ का दौर आया। हम संक्रमण काल या कैडर के कारण नहीं हारे। हम हार इसलिए रहे हैं कि दूसरे पक्ष ने कुछ ऐसे मुद्दों पर चुनाव को भटका दिया जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ने की कांग्रेस आदी नहीं रही। अब हम श्मशान- कब्रिस्तान के नारे पर तो चुनाव नहीं लड़ सकते, दीवाली पर चुनाव नहीं लड़ सकते। जब प्रधानमंत्री व्यक्ति के पहनावे को लेकर टिप्पणी करंे तो हम उस स्तर पर तो नहीं उतर सकते। हम उत्तर भारत की राजनीति में जातीय बंटवारे, धार्मिक बंटवारे का तोड़ नहीं निकाल पा रहे शायद। जिस दिन देश की जनता और हम उनके जातीय और साम्प्रदायिक बंटवारे की नफरत भरी राजनीति का तोड़ ढूंढ़ लेंगे उस दिन हर जगह आपको कांग्रेस ही कांग्रेस नजर आएगी। ये कांग्रेस का नहीं, शायद भारत राजनीति के संक्रमण का दौर है। लेकिन भारतीय राजनीति इस दौर से जल्दी निकल जाएगी और विभाजक ताकतों को जनता उसका सही स्थान दिखाएगी, इंतजार कीजिए।

मेरा मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी ये फैसला ले कि राज्यों में चुनाव से पहले चुनावी चेहरे घोषित कर दिए जाएं ताकि उन राज्यों में राजनीतिक स्थिरता आ सके। तो मैं आज भी राष्ट्रीय स्तर पर इस बाबत एक पॉलिसी डिसिजन के लिए अपनी बात के साथ खड़ा हूं। उत्तराखण्ड में चूंकि मेरा लक्ष्य 2022 में कांग्रेस को लाना है। उसके लिए पार्टी हित में अपनी सोच के साथ किसी हद तक कम्प्रोमाइज करना पड़े तो मैं किसी भी सीमा तक समझौता करने के लिए तैयार हूं।

जिन्हें आप ‘उज्याडू बल्द’ कहते थे उन्हें ही आप कांग्रेस में शामिल कर रहे हैं क्या कारण है?
पहले मैं स्पष्ट कर दूं कि यशपाल आर्या, संजीव आर्या का मामला बिल्कुल अगल है। उनके जाने का मुझे भी अफसोस था। सरकार बचाने में वो हमारे साथ थे लेकिन कुछ पारिवारिक कारण होते हैं, कुछ परिस्थितियां होती हैं जिनके चलते पार्टी उनकी बात के अनुसार निर्णय नहीं ले सकी तो वो नाराज होकर चले गए। लेकिन उन्होंने कभी कांग्रेस और कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ कुछ नहीं कहा। लेकिन अन्य की बात करें तो हर किसी ने कहा कि वो हरीश रावत के कारण गए। वास्तविकता ये है कि उनके क्षेत्र का विकास उनसे चीख- चीखकर कह रहा है कि ये विकास हरीश रावत के समय का है। भाजपा के शासन के विकास पर लोग उनसे सवाल पूछते हैं। जिसका जवाब उनके पास नहीं है। इन अंतर्विरोधों के चलते उनकी विधानसभा में अस्थिरता आ रही है। जिसके चलते वो भाजपा से छुटकारा चाहते हैं। दो लोग खुद को मुख्यमंत्री मैटीरियल समझते थे वो समझते थे कि भाजपा में मुख्यमंत्री की समझ रखने वाले व्यक्तित्व नहीं है। शायद वो अवसर पा जाएं लेकिन अब उन्हें भाजपा के अंगूर खट्टे लगने लगे हैं और भाजपा में भगदड़ मची है। ये तो मैं इस भगदड़ को प्रश्रय नहीं दे रहा हूं नहीं तो आपको बड़ी संख्या में भाजपाई कांग्रेस में आते दिखेंगे। यशपाल जी के आने से हमारा स्वाभाविक वोटर उत्साहित हुआ है और हमारी जीत अब और शानदार होगी।

कहते हैं कि प्रीतम सिंह उमेश शर्मा काऊ को शामिल करवाने लेकर आए थे मगर आपके विरोट्टा के चलते नहीं हो सका कहां तक सही?
आपके इस प्रश्न पर मेरा मौन रहना ही उचित रहेगा।

साढ़े चार साल तीन मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड में, कैसे देखते हैं इसे?
ये राज्य के साथ मजाक है। हटाया मगर कारण नहीं बताया गया। अगर भाजपा ये कहती कि मुख्यमंत्री हटाने का निर्णय राज्य हित में लिया गया है तो आप स्पष्ट कहिए न कि हमने अपने मुख्यमंत्री को विधानसभा सत्र के दौरान इसलिए बदला क्योंकि वो राज्य के हित नहीं साध पा रहे थे जैसा हमने विजय बहुगुणा जी को हटाते समय स्पष्ट किया था कि आपदा के समय उनकी जो ड्यूटी थी उसका उन्होंने गंभीरता से निर्वहन नहीं किया। भाजपा तो ये भी नहीं बताती कि मुख्यमंत्री बदले क्यों गए।

लेकिन कांग्रेस का तो इतिहास रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनी कांग्रेस की राज्य सरकारों में कांग्रेस का कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया फिर भाजपा के मुख्यमंत्री बदलने पर इतना शोर क्यों?
कांग्रेस ने जब भी बदलाव किया तो वो सामाजिक प्रतिनिधित्व देने के लिए किया जैसा कि हमने पंजाब में किया। पंजाब में दलित मुख्यमंत्री बनाकर पूरे देश में नैरेटिव बनाया कि गरीब के बेटे को कांग्रेस ही मुख्यमंत्री बना सकती है और कांग्रेस गरीब के साथ है। लेकिन भाजपा तो स्पष्ट ही नहीं कर पा रही कि त्रिवेंद्र सिंह को क्या बदला, तीरथ सिंह तो समझ ही नहीं पाए थे कि मुख्यमंत्री होता क्या है। एक दिन उनसे कह दिया तुम घर बैठो। धामी जी भी जाते-जाते बच गए जब तीन मंत्री नाराज हो गये थे।

आज जब आप चुनाव अभियान समिति के अट्टयक्ष हैं तो क्या आपका आज भी मानना है कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को चेहरा घोषित करना चाहिए? जब की भाजपा पुष्कर सिंह ट्टाामी को अपना चेहरा घोषित कर चुकी है?
मेरा मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी ये फैसला ले कि राज्यों में चुनाव से पहले चुनावी चेहरे घोषित कर दिए जाएं ताकि उन राज्यों में राजनीतिक स्थिरता आ सके। तो मैं आज भी राष्ट्रीय स्तर पर इस बाबत एक पॉलिसी
डिसीजन के लिए अपनी बात के साथ खड़ा हूं। उत्तराखण्ड में चूंकि मेरा लक्ष्य 2022 में कांग्रेस को लाना है। उसके लिए पार्टी हित में अपनी सोच के साथ किसी हद तक कम्प्रोमाइज करना पड़ता है। तो मैं हर संभव सीमा तक समझौता करने के लिए तैयार हूं।

उत्तराखण्ड की राजनीति और कांग्रेस की राजनीति में आदर्शों के साथ काम करने वाले नेता और कार्यकर्ता मेरे ही चारों तरफ हैं। उनको लाने का श्रेय किसी न किसी रूप में मुझे ही जाता है। हमने राजनीति में गरीब, संघर्षशील लोगों को आगे बढ़ाया। और आप किसी भी तरह देख लीजिए बल्कि जो लोग मुझसे कहते हैं कि मेरे हाथ कांप रहे हैं तो मैंने उन्हीं कांपते हाथों से लोगों को खाक से उठाकर आगे बढ़ाया। उनको एक नई पहचान देने का काम किया। जिन लोगों को आज आप मेरे विरोध में देखते हैं उनमें से किसी चेहरे को बता दीजिए जो किसी समय मेरे साथ न रहा हो। राजनीति में बहुत लंबे समय तक एक सा खाना खाते बहुत से लोग ऊब जाते हैं, ये लोग अब स्वाद बदलना चाहते हैं। कुछ लोग जो स्वाद नहीं बदलना चाहते हमारे रुखे-सूखे के साथ खड़े हैं वे हमारे साथ खुश हैं, लेकिन जो स्वाद बदलने के लिए कुछ नया प्रयोग कर रहे हैं उनको मेरी शुभकामनाएं और जो विपरीत परिस्थितियों में मेरे साथ खड़े हैं मैं उनका आभारी हूं।

कांग्रेस कभी भी गुटबाजी से अछूती नहीं रही खासकर उत्तराखण्ड में। पहले हरीश रावत, नारायण दत्त तिवारी गुट की रार थी लेकिन अब तो अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। उत्तराखण्ड में अब हरीश रावत बनाम हरीश रावत के चेले हो चला है। आपकी राजनीतिक पाठशाला से निकले लोग ही हरीश रावत के खिलाफ खड़े हैं। ऐसा क्यों?
देखिए, ऐसा नहीं है। स्व . नारायण दत्त तिवारी जी हमारे परम आदणीय थे। इतिहास के पन्नों में ये दर्ज है कि एनडी तिवारी का व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि उसमें कांग्रेस खो जाती थी। इसलिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कहीं खो गई। मैं डरा हुआ था कि छोटा प्रदेश है उत्तराखण्ड इसमें भी तिवारी जी के व्यक्तित्व के चलते कहीं कांग्रेस खो न जाए। इसलिए मैंने स्वतंत्र रूप से पार्टी को खड़ा रखा और इसी के चलते तिवारी जी पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहें। हम 2007 में हारे जरूर पर पार्टी खड़ी रही। उसी का परिणाम था कि 2012 में कांग्रेस पुनः सत्ता में आई। अब 2022 में कांग्रेस फिर से वापस आ रही है। रही बात हरीश रावत बनाम हरीश रावत के चेलांे की तो सबको आकांक्षा, महत्वाकांक्षा रखने की छूट है। यदि उनको लग रहा है कि हरीश रावत तो बुढ्डा हो ही नहीं रहा है इस लिए वे अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कुछ सोचकर एक नई धारा बनाने की कोशिश करते हैं तो उससे भी पार्टी को ताकत मिलती है।

जब आपने मुफ्त बिजली का मुद्दा उठाया या फिर दलित मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाया तो आश्चर्यजनक तरीक से आपकी इन बातों पर सवाल आपकी पार्टी के अंदर से ज्यादा उठे। ये कैसा अंतर्विरोट्टा है कांग्रेस पार्टी के भीतर?
लेकिन आपने देखा अंततोगत्वा जो लाइन मैंने ली उसी लाइन पर आए न सब। जिन लोगों ने पहले सवाल उठाए अब उनके बयानों को देखिए अब वो मुझसे ज्यादा आक्रामक तरीके से दलित मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्षधर हैं। सिर्फ विरोध के लिए विरोध अच्छा नहीं है। किसी को मुझसे शिकायत हो सकती है लेकिन मेरा विरोध करते-करते आप इस अंतिम पायदान के आदमी का विरोध करते तो मत दिखिए जिसको हम ताकत देना चाहते हैं।

देखने में आ रहा है कि 2022 के विट्टाानसभा चुनावों में भाजपा की रणनीति कांग्रेस और अन्य नेताओं को घेरने की कम हरीश रावत को घेरने की ज्यादा है तो क्या आपकी पार्टी के अन्य नेता इतने अप्रासंगिक हो चुके हैं?
राजनीति में कोई अप्रासंगिक नहीं होता। लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगा कि कांग्रेस को इस पर विचार करना चाहिए और उत्तराखण्ड राज्य को विचार करना चाहिए कि क्यों भाजपा हरीश रावत और हरीश रावत के सहयोगियों को टार्गेट बना रही है।

कांग्रेस के अंदर की बात करूं तो कहीं ये भी सुनने को मिलता है कि हरीश रावत को रोकने के लिए कांग्रेस की सरकार के लिए कुछ बड़े नेता 2027 तक इंतजार करने को तैयार हैं?
यदि ऐसा है तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं पार्टी आनी चाहिए चाहे हरीश रावत रहे या न रहे। मैं इसके लिए 2022 का दावा छोड़ने के लिए भी तैयार हूं लेकिन कोई दावेदार आए तो सही, आगे आकर कहे तो सही कि मैं हूं दावेदार चुनाव के बाद नहीं चुनाव से पहले कहें, मैं हूं दावेदार। मैं लड़वाऊंगा चुनाव मुझे चेहरा बनाइए तो मैं उसके साथ खड़ा हो जाऊंगा। मुझे तो कांग्रेस को 2022 में जितना है, 2027 में भी कांग्रेस को जिताना है और 2032 में भी जीते इसके लिए बुनियाद डालनी है। मेरा उद्देश्य तो कांग्रेस को लाना है। हरीश रावत उतना महत्वपूर्ण नहीं है। कांग्रेस लाने के लिए मुझे खुद चुनाव लड़ने या न लड़ने के विषय में फैसला करना पड़ेगा मैं वो फैसला भी करूंगा लेकिन 2022 में कांग्रेस आनी चाहिए नहीं तो जो हरीश रावत को रोकने के चक्कर में 2027 तक कांग्रेस को इंतजार कराना चाहते हैं उनकी और कांग्रेस की डगर तब तक और कठिन हो जाएगी।

एक आरोप कहिए या फिर राजनीतिक ट्टाारणा कि हरीश रावत ने एक अच्छी ‘जेंट्री’ अपने आस-पास नहीं रखी जिसका परिणाम आज हरीश रावत के सामने है। इसमें कितनी सच्चाई है?
इसमें कोई सच्चाई नहीं है। आप देखिए उत्तराखण्ड की राजनीति में और कांग्रेस की राजनीति में आदर्शों के साथ काम करने वाले नेता और कार्यकर्ता मेरे ही चारों तरफ हैं। उनको लाने का श्रेय किसी न किसी रूप में मुझे ही जाता है। हमने राजनीति में गरीब, संघर्षशील लोगों को आगे बढ़ाया। और आप किसी भी तरह देख लीजिए बल्कि जो लोग मुझसे कहते हैं कि मेरे हाथ कांप रहे हैं तो मैंने उन्हीं कांपते हाथों से लोगों को खाक से उठाकर के आगे बढ़ाया। उनको एक नई पहचान देने का काम किया। जिन लोगों को आज आप मेरे विरोध में देखते हैं उनमें से किसी चेहरे को बता दीजिए जो किसी समय काल में मेरे साथ न रहा हो। राजनीति में बहत लंबे समय तक एक सा खाना खाते बहुत से लोग अब जाते हैं, ये लोग अब स्वाद बदलना चाहते हैं। कुछ लोग जो स्वाद नहीं बदलना चाहते हमारे रुखे-सूखे के साथ खड़े हैं वे हमारे साथ खुश हैं, लेकिन जो स्वाद बदलने के लिए कुछ नया प्रयोग कर रहे हैं उनको मेरी शुभकामनाएं और जो विपरीत परिस्थितियों में मेरे साथ खड़े हैं मैं उनका आभारी हूं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का अपने मूल सिद्धांतों से विचलन उसके पराभव का कारण है। खासकर ट्टार्म निरपेक्षता का दामन छोड़कर ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ की ओर झुकाव। क्या ये भाजपा का भय है कि कांग्रेस राहुल गांट्टाी को जनेऊचारी साबित कर भाजपा की पिच पर खेलने चली जाती हैं?
मेरा मानना है कि ये मीडिया के एक वर्ग के दुष्प्रचार का हिस्सा है। वर्ना ऐसा नहीं है। कांग्रेस ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। अब कुछ मंदिरों में स्थिति ये है कि आप से पूछा जाता है कि आपका गोत्र क्या है? आपने जनेऊधारण किया है या नहीं? गुजरात में राहुल जी से पूछा गया, केदारनाथ में नहीं पूछा गया। केदारनाथ में तो ऐसा उन्होंने नहीं कहा। कुछ तो इसको लेकर भ्रम पैदा हो गया और कुछ इसको अलंकृत तरीके से हमारे ही नेताओं ने कह डाला अन्यथा एक आम हिन्दुस्तानी जितना धर्मपरायण होता है उतना ही राहुल जी भी हैं। जो हिन्दुस्तान का स्वभाव है, उदारता, सर्वधर्म संम्मान इसी भावना के इंसान हैं राहुल गांधी।

क्या आपको नहीं लगता कि वर्चस्व की राजनीति में व्यक्तियों के आगे पार्टी पीछे रह जाती है जैसा भाजपा, कांग्रेस दोनों में देखने को मिल रहा है?
देखिए, दोनों में समन्वय हो तो कोई दिक्कत नहीं है। समन्वय आवश्यक है। अगर व्यक्तित्व आकर्षक रहा है, प्रखर रहा है और उसके विचार लोकतांत्रिक है तो लोकतंत्र मजबूत हुआ है। जहां कहीं भी केवल तीसरी दुनिया में नहीं बल्कि पूरी दुनिया के जितने भी देश है वहां ऐसा है। कैनेडी फैमिली क्यों कही जाती है? बुश फैमली क्यों कही जाती है? एवैकी फैमली क्यों कही जाती है? लेकिन ये समन्वयवादी नेता थे। ये जो नेता थे उन्होंने देश के लोकतंत्र को, जनजीवन को प्रभावित किया और उसे शक्ति देने का काम किया। लोकतांत्रिक शासन में नेता पार्टी को प्रभावित जरूर करता है लेकिन पार्टी की पहचान को प्रभावित नहीं करता। आज भाजपा और कांग्रेस में फर्क यही है उनकी कहानी मोदी जी से शुरू होकर मोदी जी पर ही खत्म होती है। आज भाजपा की स्वतंत्र पहचान है कहां? मोदी जी ही पार्टी के पर्याय है, जब कि कांग्रेस में ऐसा नहीं है।

अगर संगठन कमजोर हो तो नेताओं के लिए पार्टी छोड़ना आसान हो जाता है आप कितना सहमत हैं?
1977 में जिला स्तर तक के नेता भी पार्टी छोड़कर चले गए लेकिन 1980 में कांग्रेस फिर लौटकर आई। 1989, 1996 और 1998 में भी ऐसी स्थितियां आई जब लोग कांग्रेस छोड़कर चले गये लेकिन नेहरू गांधी परिवार एक चुम्बक है कांग्रेस का क्यों कि एक इतिहास है, एक सोच उसके साथ है, एक भारत की दृष्टि है इसलिए कांग्रेस बार-बार उठ खड़ी हुई। आज भी हमें पूरी उम्मीद है कि हम फिर से उठ खड़े होंगे। ये जो नेता आज पार्टी छोड़ रहे हैं, जब कांग्रेस सत्ता में आएगी तो कांग्रेस के संघर्षशील लोगों का हक मारने के लिए कांग्रेस में शामिल होने की कतार में खड़े दिखाई देंगे।

क्या वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के बिना मजबूत विपक्ष की कल्पना की जा सकती है?
आपका सवाल बहुत ही गहरा है। लोकतंत्र में सभी दलों को एक दूसरे का सम्मान करना सीखना चाहिए। खासकर सत्ता पक्ष को इस मामले में संवेदनशील होना चाहिए। विपक्ष जितना सक्षम होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। भाजपा अहंकारी, तानाशाही प्रवृत्ति की है इसीलिए वो कांग्रेस मुक्त भारत की बात करती है। सच तो यह है कि वे कांग्रेस मुक्त भारत नहीं वो लोकतंत्र मुक्त भारत की मंशा रखते हैं, जो उनके आचरण में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज हिन्दुस्तान का लोकतंत्र खतरे में है और कठिन दौर से गुजर रहा है। ऐसे में आज कांग्रेस पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि आज के राष्ट्रीय परिदृश्य के संदर्भ में बात करू तो कांग्रेस के बिना मजबूत विपक्ष की कल्पना अधूरी है।

आज जब भारतीय जनता पार्टी पीढ़ीगत बदलाव की ओर अग्रसर है तो क्या आपको नहीं लगता कि कांग्रेस के पुराने और उम्रदराज नेताओं को भी नई पीढ़ी के लिए जगह छोड़ युवा नेतृत्व को आगे लाना चाहिए?
बिल्कुल करना चाहिए। समय-समय पर हमने किया भी है। युवा जोश और अनुभव का समन्वय हमारी पार्टी में पहले से है। हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व भी इसी समन्वय का उदाहरण है। हम पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया में संवेदना के साथ काम करते हैं। भाजपा की तरह नहीं कि संवेदनहीन होकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डालकर उनका अपमान करें। उत्तराखण्ड के संदर्भ में बात करूं तो जब हमने ललित फर्सवाण को चुनाव लड़वाया वो 30 वर्ष के थे। हेमेश खर्कवाल 27वें वर्ष में प्रवेश ही कर रहे थे। हरीश धामी, मनोज तिवारी, प्रकाश जोशी, करण माहरा से लेकर हम नाम गिनाए तो हम भाजपा से पहले ‘जेनरेशन चेंजेज’ कर चुके हैं। भाजपा, कांग्रेस में फर्क इतना है कि हमारी पार्टी में युवा और अनुभव का समन्वय है जबकि भाजपा में ऐसा समन्वय नहीं है क्योंकि उनके पास व्यक्तित्व नहीं है, प्रतिभाएं नहीं है। वे सिर्फ एक व्यक्ति के सहारे चल रहे हैं। कांग्रेस अपने सभी स्तम्भों के सहारे चल रही है। कांग्रेस हमेशा टीम भावनाओं से जीतती है जबकि भाजपा एकांगी स्तंभ के सहारे जीतती है।

पंजाब में एक दलित को मुख्यमंत्री बनाना गया फिर आपने कह डाला कि आप उत्तराखण्ड में एक दलित मख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। एन चुनाव से पूर्व दलित मुख्यमंत्री का मुद्दा सिर्फ चुनावी शगूफा है कांग्रेस के बिखरते परम्परागत दलित वोट को समेंटने का या इस बात को क्रियान्वित होते भी दिखेगा उत्तराखण्ड?
नहीं ये कांग्रेस का स्वभाव है। आप देखिए जितने भी कमजोर वर्ग के या दलित मुख्यमंत्री आज तक बने, वे सब कांग्रेस ने बनाए। जगन्नाथ पहाड़िया का उदाहरण लें, राजस्थान में एक छोटा सा समुदाय है इनका। दलित समुदाय से आते थे। कांग्रेस ने ही मुख्यमंत्री बनाया। इसी प्रकार गरीब परिवारों से आए कई लोग हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। कामराज कमजोर परिवार से थे। कांग्रेस ने हमेशा कमजोर वर्ग और दलित लोगों के विषय में सोचा है। आज ऐसा लग रहा था कि नैरेटिव जो हमारा था कि हम गरीब के साथ हैं, दलित के साथ हैं, पिछड़े कमजोर के साथ हैं उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। आज दलित, अल्पसंख्यक, अति पिछड़े, महिलाएं सब अत्याचार के शिकार हैं। उस सोच के शिकार हैं जो आज सत्ता में हैं। ऐसे में बहुत आवश्यकता कि हम उसे फिर से दोहराएं जो कांग्रेस का स्वभाव है। हमने पंजाब में दलित मुख्यमंत्री बना कर शुरुआत कर दी है हम उत्तराखण्ड में भी करेंगे। इसीलिए मैंने कहा कि भगवान मुझे इतना बल दे कि मेरे जीवनकाल में एक दलित का बेटा उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री हो सके। हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मेरे इस कथन में आप राजनीति मत ढूंढ़िए।

राज्य के लिए संघर्ष करने वाली क्षेत्रीय ताकतें आज हाशिए पर हैं क्या कारण रहे?
देखिए, कांग्रेस ने हमेशा स्थानीय आवश्यकताओं और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के बीच समन्वय रखा। जब-जब ये समन्वय टूटा तो क्षेत्रीय ताकतें मजबूत हुई हैं। आप हमारे एजेंडे को देखेंगे तो उस एजेंडे में वो सब चीजें ‘रिफ्लैक्ट’ करती है जो उत्तर प्रदेश में मायावती उठाती है, जो उत्तराखण्ड क्रांति दल हमारे राज्य में उठाता है। जब हम उन सवालों को उठा रहे है और एक बड़े प्लेटफॉर्म पर उठा रहे हैं तो निश्चित तौर पर क्षेत्रीय ताकतें कमजोर होंगी। जिस दिन राष्ट्रीय दल ये गलती करेंगे, जब वो अपनी सोच से स्थानीय सोच को दबाने का प्रयास करेंगे, जैसा कि भाजपा करती रही है तो क्षेत्रीय ताकतों को मजबूत होने का अवसर मिलेगा। अपने कमजोर होने के कारण पर क्षेत्रीय दलों को, खासकर उक्रांद को आत्मचिंतन जरूर करना चाहिए।

 

जितने भी कमजोर वर्ग या दलित मुख्यमंत्री आज तक बने, वे सब कांग्रेस ने बनाए। जगन्नाथ पहाड़िया का उदाहरण लें, राजस्थान में एक छोटा-सा समुदाय है इनका। दलित समुदाय से आते थे उन्हें कांग्रेस ने ही मुख्यमंत्री बनाया। इसी प्रकार गरीब परिवारों से आए कई लोग हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। कामराज कमजोर परिवार से थे। कांग्रेस ने हमेशा कमजोर वर्ग और दलित लोगों के विषय में सोचा है। आज ऐसा लग रहा है कि जो नैरेटिव हमारा रहा है कि हम गरीब के साथ हैं, दलित के साथ हैं, पिछड़े कमजोर के साथ हैं उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। आज दलित, अल्पसंख्यक, अति पिछड़े, महिलाएं सब अत्याचार के शिकार हैं। उस सोच के शिकार हैं जो आज सत्ता में हैं। ऐसे में बहुत आवश्यकता है कि हम उसे फिर से दोहराएं जो कांग्रेस का स्वभाव है। हमने पंजाब में दलित मुख्यमंत्री बनाकर शुरुआत कर दी है, हम उत्तराखण्ड में भी करेंगे। इसीलिए मैंने कहा कि भगवान मुझे इतना बल दे कि मेरे जीवनकाल में एक दलित का बेटा उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री हो सके। हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मेरे इस कथन में आप राजनीति मत ढूंढ़िए।

उत्तराखण्ड चुनाव में टिकट वितरण का पैमाना क्या होगा? विचारट्टाारा को प्राथमिकता दी जाएगी या सिर्फ जीतने की क्षमता। क्या पार्टी से बाहर से आए लोगों को जीतने की क्षमता के आट्टाार पर टिकट दिया जाएगा?
जो हमारी विचारधारा और सोच का व्यक्ति होगा उसे टिकट मिलेगा। लेकिन उनमें भी जो जीत सकने की संभावना वाला है उसे पार्टी टिकट देगी क्योंकि लोकतंत्र के अंदर ‘दुल्हन वही जो पिया मन भावे’ वाला भाव चलता हैं। जनता को जो पसंद होगा टिकट उसे ही मिलेगा।

अगर कांग्रेस की सरकार आती है तो क्या कांग्रेस या आप अपने पुराने विजन का आगे बढ़ाएंगे या फिर कुछ नया भी सोचा है?
हम दोनों का समन्वय करेंगे। जो समय की आवश्यकता भी है और चुनौती भी। जो नेता बदले हुए समय को नहीं समझता वो पीछे रह जाता है। आज ‘टेक्नोलॉजिकल एडवासमेंट’ का दौर है। नई दुनिया नई सोच इमर्ज हो रही है। उत्तराखण्ड को उससे अलग नहीं रखा जा सकता। लेकिन जो अपनी परंपराओं और धरती से जुड़ा नहीं होता वो ‘कटी पतंग’ होता है और मैं उत्तराखण्ड को कटी पतंग नहीं बनने दूंगा। मैं उसको धरती से जोड़कर भी रखूंगा और साथ- साथ उत्तराखण्ड उन ऊंचाइयों पर जा सके उसके लिए मैं एक का ऐसा ‘मांझा’ तैयार करूंगा जो उत्तराखण्ड के विकास की पतंग को चीन और यूरोप से आगे ले जा सके।

क्या मान कर चलें कि चुनाव नजदीक आते- आते हरीश रावत उत्तराखण्ड में कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे?
आपका सवाल मेरे कानों में संगीत की तरह गूंज रहा है लेकिन ये संगीत आप और मुझ तक ही सीमित रहे।

  • साथ में दिव्य सिंह रावत

 

 

 

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