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Uttarakhand

आयुक्तों की नियुक्ति पर टकराव

प्रदेश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर पक्ष-विपक्ष में सहमति नहीं बन पा रही है। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने स्टैंड लिया है कि वे संद्घ के थोपे हुए नामों पर सहमति नहीं देंगी? वे चाहती हैं कि मैरिट के आधार पर ही नियुक्तियां हों। जाहिर है कि दो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति एक बार फिर ठंडे बस्ते में पड़ सकती है। ऐसे में इन पदों पर बैठने को इच्छुक उम्मीदवार बेचैन हैं

उत्तराखण्ड में यह चर्चा आम है कि हल्द्वानी की विधायक और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश सत्ता पक्ष के प्रति तीखे तेवर नहीं अपना रही हैं। हल्द्वानी में अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे के मुद्दे को छोड़ दें तो वह किसी भी अन्य मुद्दे पर सरकार को नहीं द्घेर पाई हैं। शायद यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष की इस शैली के चलते सूबे के लोगों ने इसे मित्र विपक्ष की संज्ञा दी है। लेकिन राज्य सूचना आयोग में दो आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में इंदिरा हृदयेश ने मित्र विपक्ष की छवि को तोड़ने का प्रयास किया है। इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष ने तीखे तेवर अपना लिए हैं। इससे प्रदेश सरकार के मुखिया परेशानी में आ गए हैं। इंदिरा हृदयेश के तीखे तेवरों को देखकर लग रहा है कि एक बार फिर आयुक्तों की नियुक्ति में रोड़ा अटक सकता है। इंदिरा हृदयेश ने यह कहकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है कि उन पर संद्घ के आदेशों को थोपने का दबाव बनाया जा रहा है। सूचना आयुक्तों के लिए सरकार जिन दो नामों पर उनसे सहमति चाहती है वह संद्घ द्वारा सुझाए गए हैं। पक्ष-विपक्ष में आयुक्तों की नियुक्ति पर सहमति न बन पाने से सूचना लेने वाले लोगों को परेशानी हो रही है। आयोग में अपीलों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल आयोग में दायर तीन हजार के करीब वाद सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। प्रदेश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति तभी संभव है जब पक्ष- प्रतिपक्ष की सहमति बन जाएगी। सहमति बनाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक सत्ता पक्ष की तरफ से हैं, जबकि विपक्ष की तरफ से नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश की इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका है। बहरहाल इंदिरा हृदयेश को साधना सरकार के लिए तलवार की धार पर चलने जैसा है। २९ मई को इंदिरा हृदयेश सहमति बनाने के उद्देश्य से हुई पहली मीटिंग में अवश्य पहुंची थीं। मगर इसके बाद ९ जून को मुख्यमंत्री आवास में हुई बैठक में वे शामिल नहीं हुईं। इस दिन इंदिरा हृदयेश स्वास्थ्य कारणों के चलते उपस्थित नहीं हो सकीं। इसी तरह १२ जून को मीटिंग में भी नेता प्रतिपक्ष का न पहुंचना चर्चा में है। गत्‌ ७ मार्च को एक दैनिक समाचार पत्र में नियुक्ति की बाबत विज्ञापन जारी किया गया था। जिसमें सूचना आयुक्त के दो पदों के लिए ९ मार्च २०१८ से ९ अप्रैल २०१८ तक आवेदन मांगे गए थे। आवेदन वही लोग कर सकते हैं जो विधि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, पत्रकारिता और मास मीडिया में बेहतर कार्य कर रहे हैं। बताते हैं कि इस दौरान कुल १३८ आंवदेन आए थे। दो लोग ऐसे भी बताए जा रहे हैं जिनके आवेदन समय सीमा पूरी होने के बाद स्वीकार किए गए हैं। जबकि प्रदेश की प्रमुख सचिव राधा रतूड़ी द्वारा जारी विज्ञप्ति में स्पष्ट कहा गया है कि समय सीमा समाप्त होने के बाद कोई भी आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार दो नाम ऐसे हैं जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ द्वारा सुझाए गए हैं। उन्हीं दो नामों पर सरकार विपक्ष की नेता के साथ सहमति बनाने का प्रयास कर रही है। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की सूची में कई नाम ऐसे हैं जो चर्चाओं में हैं उनमें कुमाऊं के पूर्व कमिश्नर चंद्र शेखर भट्ट, हल्द्वानी के पत्रकार दिनेश मानसेरा, रुड़की के पत्रकार अजीत राठी, बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष अजय सेतिया के नाम प्रमुख हैं। प्रदेश में कम से कम दो सूचना आयुक्त और होने जरूरी हैं। जिससे अपीलों की सुनवाई हो सके। लेकिन वर्तमान में महज एक ही सूचना आयुक्त प्रदेश में तैनात हैं। प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर है। उनके कार्यकाल में दो-तीन माह का ही समय शेष बचा है। ऐसे में वे मुख्य सूचना आयुक्त के पद से स्वतः हट जाएंगे। नियम यह भी है कि ६५ वर्ष के बाद कोई भी व्यक्ति सूचना आयुक्त नहीं बन सकता है। पिछले माह २८ मई को एक सूचना आयुक्त सुरेंद्र सिंह रावत रिटायर्ड हो चुके हैं। सुरेंद्र सिंह रावत सितंबर २०११ से जून २०१३ तक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सचिव रह चुके थे। राज्य सूचना आयोग में ५ सूचना आयुक्तों के साथ एक मुख्य सूचना आयुक्त होने की परंपरा रही है। लेकिन यह भी सच है कि जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच एक राय होगी तभी राज्य सूचना आयुक्तों के चयन पर मुहर लगती है। ज्यादातर देखने में आता है कि जो नाम सरकार तय करती है उन्हीें पर मुहर लगती है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने २९ मई को इस मामले में हुई पहली बैठक में ही तीखे तेवर दिखाते हुए साफ कर दिया कि सरकार जिन नामों को थोपेगी वे उन नामों के साथ नहीं होंगी। ऐसे दो नामों को सरकार आगे रखे जिनसे वे सहमत हैं। इंदिरा हृदयेश को आपत्ति इस बात पर है कि बैठक में चर्चा तो ११५ नामों पर की जाती है। लेकिन सरकार दो नामों पर सहमति बनाने का दबाव डाल रही है। जिस पर वे सहमत नहीं हैं। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष की तरफ से प्रस्ताव रखा गया कि मैरिट के आधार पर नाम तय हों, फिर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सूचना आयुक्त के नाम पर एक राय बनाने को लेकर पहले भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति न होने के चलते मामले फंसते गए हैं। जिसके परिणामस्वरूप सूचना आयोग में अपील करने वाले अपीलकर्ताओं को अभी तक भुगतने पड़ रहे हैं। पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार में भी जब नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट थे तब भी एक पद के लिए मांगे गए आवेदन पर सरकार और विपक्ष में नाम को लेकर सहमति नहीं बन सकी थी। जिसके चलते राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई थी। याद रहे कि पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा के पुत्र एवं वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा को हरीश रावत सरकार ने राज्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त करने का पूरा मन बना लिया था। तब बहुगुणा का राज्य सूचना आयुक्त बनना तय बताया जा रहा था। लेकिन सरकार और विपक्ष में सहमति न बनने से राजीव नयन बहुगुणा सूचना आयुक्त बनते-बनते रह गए थे। इस तरह राज्य सूचना आयोग में रिक्त दो पदों में से एक पद हेतु वर्ष २०१५ एवं वर्ष २०१६ में भर्ती के लिए जारी की गई विज्ञप्ति बिना कोई कारण बताए तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दी गई थी।

नौकरशाह की क्यों?

सोलह जनवरी २०१८ को नैनीताल हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई पर महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि यह कोई जरूरी नहीं है कि सिर्फ पूर्व मुख्य सचिव को ही राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया जाए। हाईकोर्ट ने पाया कि पहले जो मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए, वे पूर्व मुख्य सचिव थे। जस्टिस यूसी ध्यानी और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच ने टिप्पणी की कि जरूरी नहीं कि पूर्व मुख्य सचिव ही मुख्य सूचना आयुक्त बनाए जाएं। याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने दलील दी थी कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिटायर्ड नौकरशाहों के लिए डंपिंग ग्राउंड बन गया है। जिन्हें राज्य सरकार के प्रति उनकी वफादारी के लिए पुरस्कृत किया जाता है। जब नियुक्ति खुद वफादारी के लिए इनाम है, तो इस तरह के नियुक्त व्यक्ति की निष्पक्षता और विश्वसनीयता खुद संदिग्ध हो जाती है। राज्य मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए अर्हता आरटीआई अधिनियम की धारा १५(५) के तहत प्रदान की गई है। जिसमें किसी सेवानिवृत्त नौकरशाह की ही नियुक्ति आवश्यक नहीं है, बल्कि यह निर्धारित करती है कि सार्वजनिक जीवन में कानून, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सामाजिक सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मास मीडिया या प्रशासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव वाला व्यक्ति इस पद के लिए श्रेष्ठ होगा

बात अपनी-अपनी

हम कोई संद्घ के नौकर थोड़े ही हैं जो उसके लोगों को सूचना आयुक्त बनवाएंगे। मैंने कहा है कि या तो मैरिट पर नियुक्ति कराओ नहीं तो सहमति बनाओ। सहमति बनाने के लिए एक सूचना आयुक्त पक्ष का तो दूसरा विपक्ष का भी हो सकता है।
इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष

अगर किसी गलत आदमी का सलेक्शन हो रहा है तो नेता प्रतिपक्ष का विरोध जायज है। लेकिन अगर सही और उपयुक्त व्यक्ति आयुक्त बनाए जा रहे हैं तो उनकी असहमति ठीक नहीं है। संबंधित पदों पर कोई त्रुटि हो तो विरोध तभी अच्छा लगता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष जब विरोध कर रही हैं तो वह उनके नाम भी जाहिर करें जिनका वह विरोध कर रही हैं। महज व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए मुद्दे बनाना सही नहीं है। मैं भी जब नेता प्रतिपक्ष था तो हमने भी अपना संवैधानिक विरोध किया था। जिसकी वजह से आयुक्त नियुक्त नहीं हो पाए थे।
अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत चाहते हैं कि जल्द नियुक्तियां हो जाएं जिससे कि सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगने वालों की अपीलें सुनी जा सकें। लेकिन विपक्ष का रुख इस पर सकारात्मक नहीं है।
देवेंद्र भसीन, प्रदेश मीडिया प्रभारी

भाजपा जिस तरह उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस कर चुके वरिष्ठ अधिवकत्ता का चयन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए होता है। कुछ ऐसा ही सूचना आयुक्त के लिए भी होना चाहिए। जिनको सभी बारीकियों का तजुर्बा होता है, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है। सत्ता के गलियारों तक पहुंच रखने वाले रसूखदार पद में आसीन होते आए हैं। यही वर्तमान में भी सुनने में आ रहा है। मेरे द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम लागू होने से वर्तमान तक हजारों सूचनाएं मांगी जा चुकी हैं। उनसे कई सकारात्मक कार्य हुए हैं। लोगों को न्याय दिलवाया हैं, लेकिन मुझे हर बार साइड लाइन कर दिया जाता है। शायद काम की कद्र नहीं, सिफारिशों की मांग है।
गुरविंदर चड्ढ़ा, सामाजिक कार्यकर्ता

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