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भाजपा संगठन और सरकार के बीच टकराव गहराता जा रहा है। यौन उत्पीड़न, स्टिंग प्रकरण के चलते प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट को जिस तरह टारगेट किया गया उससे संगठन में रोष है कि ऐसा मुख्यमंत्री की एक लॉबी ने किया। टकराव का असर अब निकाय चुनावों में भी देखा गया है। पार्टी के भीतर अंदरूनी खींचतान का ही नतीजा रहा कि दिग्गज नेता अपने-अपने गढ़ बचाने में नाकाम रहे
प्रदेश में कौन बड़ा है? मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष? उत्तराखण्ड में यह सवाल हर सरकार के समय उठता है। इसलिए यहां सरकार और संगठन के बीच हमेशा टकराव होता रहा है। यहां तक कि कई बार दोनों के बीच जबरदस्त टकराव सतह पर भी दिखाई देने लगता है। जिसका नुकसान अंततः पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ता है। केंद्रीय नेतृत्व दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए काफी मशक्कत करता है। लेकिन इस मशक्कत का दीर्घकालिक असर कभी किसी संगठन या सरकार पर नहीं पड़ा। नगर निकाय चुनाव में भाजपा की कई महत्वपूर्ण निकायों में हार के पीछे भी सरकार और संगठन के बीच की लड़ाई को ही प्रमुख कारण माना जा रहा है।
राज्य की त्रिवेंद्र सरकार के शुरूआती कार्यकाल में सरकार और प्रदेश भाजपा संगठन के बीच अच्छा तालमेल दिख रहा था। सरकार और संगठन में सामंजस्यपूर्ण रिश्ते से पार्टी कार्यकर्ता उत्साहित नजर आ रहे थे।  लेकिन अब दोनों के अच्छे रिश्तों को किसी की नजर लग गई है। डेढ़ साल के अंदर ही दोनों के बीच रस्साकशी अंदरखाने शुरू हो गयी है। देहरादून के राजनीतिक गलियारों में चर्चा यहां तक है कि बहुत जल्द दोनों के बीच की रस्साकशी सड़क पर आने वाली है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखण्ड के इस राजनीतिक इतिहास से अच्छी तरह वाकिफ है। शायद इसीलिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक साल पहले ही अपने स्टेट लीडरान को नसीहत दे दी थी।
पिछले साल सितंबर माह में अमित शाह ने प्रदेश की टॉप लीडरशिप को कहा था, ‘संगठन सरकार बनाता है न कि सरकार संगठन बनाती है।’ उन्होंने तब कहा था कि अक्सर ये देखने को मिलता है कि सत्ता पाने के बाद बड़े मंत्री और विधायक पार्टी कार्यकर्ताओं को भूलने लगते हैं, उनके बीच नहीं जाते। और तो और वे जनता से भी दूर हो जाते हैं। यह सही ट्रेंड नहीं है। ऐसे सोच वाले लीडर इसे सुधारें। यह पार्टी से ज्यादा आपके हित में होगी। अमित शाह ने अपनी इस नसीहत से प्रदेश सरकार को साफ संदेश दे दिया था कि संगठन ही सर्वेसर्वा होता है। संगठन मजबूत नहीं रहेगी तो सरकार में आपकी कुर्सी भी सुरक्षित नहीं रहेगा। शाह ने अपने इस वक्तव्य से प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को भी आशीर्वाद दिया था। तभी तो 2017 के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट के अध्यक्षीय नेतृत्व ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। मगर वे खुद चुनाव हार गए तो उन्होंने अमित शाह को अपना इस्तीफा दे दिया था। शाह ने अजय भट्ट का इस्तीफा नामंजूर करते हुए, उन्हें काम करते रहने को कहा था।
अमित शाह की नसीहत का असर प्रदेश भाजपा की टॉप लीडरशिप में कुछ दिनों तक रहा। अब इसका असर उतरने लगा है। प्रदेश भाजपा की टॉप लीडरशिप में आपसी खींचतान शुरू हो गई है। सरकार में शामिल कुछ वरिष्ठ मंत्रियों की खींचतान तो पहले से ही चल रही थी। वह कई बार जगजाहिर भी हुआ। मगर सरकार और संगठन के बीच सामंजस्य बरकरार था। यह भी अब खत्म होने लगा है। सरकार की एक लॉबी संगठन को नजरअंदाज करने लगी है। सिर्फ नजरअंदाज ही नहीं वह संगठन को नीचा दिखाने के लिए भी शतरंज की चाल चलने लगी है। हाल में ही इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। सबसे पहला उदाहरण सामने आया, उमेश शर्मा प्रकरण में। वरिष्ठ नौकरशाहों और मुख्यमंत्री कार्यालय के बड़े लोगों के स्टिंग मामले में एक चैनल मालिक उमेश शर्मा की गिरफ्तारी इसी माह हुई। प्रशासनिक अमला उमेश शर्मा पर कार्यवाही कर रहा था, तो दूसरी तरफ अंदरखाने सरकार के ही कुछ लोग अपने नेताओं को नीचा दिखाने के लिए भी काम कर रहे थे।
उमेश शर्मा प्रकरण जब सुर्खियों में छाया हुआ था उसी दौरान प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और नैनीताल सांसद भगत सिंह कोश्यारी का छह साल पुराना एक पत्र सोशल मीडिया में वायरल हुया। विजय बहुगुणा कार्यकाल के दौरान 2012 में अजय भट्ट और कोश्यारी ने उमेश शर्मा के लिए मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन पर लगे आरोप को खत्म करने का आग्रह किया गया था। भाजपा के शासन में अपने ही नेताओं के इतने पुराने पत्र सार्वजनिक होने के पीछे अजय भट्ट के लोग साजिश मान रहे हैं। अजय भट्ट के समर्थकों का मानना है कि उस पुराने पत्र को जानबूझकर मुख्यमंत्री कार्यालय से लीक किया गया। यह सब प्रदेश अध्यक्ष की इमेज को नुकसान पहुंचाने के लिए रचा गया। उनके लोगों का कहना है कि वह पत्र न बहुगुणा राज में सामने आया न हरीश रावत के शासनकाल में, जबकि उमेश शर्मा ने सबसे ज्यादा नुकसान हरीश रावत को पहुंचाया है। फिर अपनी ही पार्टी की सरकार में कैसे प्रदेश अध्यक्ष का पत्र लीक हुआ।
    इसके बाद दूसरा उदाहरण सामने आता है प्रदेश संगठन मंत्री संजय कुमार के यौन उत्पीड़न मामले का। एक महिला ने जब संगठन मंत्री संजय कुमार पर आरोप लगाए और शिकायत की तो प्रदेश अध्यक्ष ने उन पर कार्यवाही नहीं की। देहरादून के स्थानीय मीडिया में कई दिनों तक यह प्रकरण सुर्खियों में रहा। लोकल मीडिया ने घटना और आरोपी से ज्यादा दिलचस्पी प्रदेश अध्यक्ष द्वारा कार्यवाही नहीं करने में दिखाई। इस पर अजय भट्ट समर्थकों का मानना है कि मुख्यमंत्री की लॉबी ने जानबूझकर मीडिया में ऐसी खबरों को लगातार चलवाया, ताकि प्रदेश अध्यक्ष की छवि खराब हो। उनके समर्थकों का स्पष्ट कहना है कि संगठन मंत्री न तो प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करता है और न अध्यक्ष को उन्हें हटाने का अधिकार है। संगठन मंत्री सीधे संघ से बनाए जाते हैं और संघ ही उन्हें हटाता है।
अजय भट्ट का खेमा ऐसी खबरों से काफी गुस्से में है। उनका स्पष्ट कहना है कि संजय कुमार का मामला प्रदेश अध्यक्ष को जहां उठाना था, वहां उन्होंने बहुत पहले अपनी बात रख दी थी। यह भी एक साजिश के तहत किया गया। प्रदेश भाजपा के विश्वसत सूत्रों की मानें तो पर्दे के पीछे सरकार और संगठन के बीच खाई बहुत बढ़ गई है। हालांकि अभी यह सार्वजनिक नहीं हुआ है। पार्टी के एक सूत्र के मुताबिक मुख्यमंत्री के ओएसडी उर्बा दत्त भट्ट ने पार्टी कार्यालय में अपना दफ्तर बनाया था। वह वहां भी नियमित बैठा करता था। मगर कुछ दिनों से उसके उस ऑफिस को बंद करवा दिया गया है। सूत्र बताते हैं कि ऐसा प्रदेश अध्यक्ष के निर्देश पर किया गया है।
पार्टी दफ्तर में इन दिनों एक और मामले पर खूब कानाफूसी हो रही है। इस कानाफूसी का लब्बो लुवाब यह है कि सरकार ने अपने ही प्रदेश अध्यक्ष का फोन सर्विलांस पर लगा रखा है। इसलिए उनके कई समर्थक अपने अध्यक्ष के मोबाइल पर खुलकर बात करने से डर रहे हैं। इस कानाफूसी में शामिल एक भाजपा नेता का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का फोन रिकार्ड किया जा रहा है। वह किससे बात करते हैं और क्या बात करते हैं। इस पर नजर रखी जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि इसकी भनक प्रदेश अध्यक्ष को भी लग गई है। सरकार और संगठन में अंदरखाने शुरू हुई इस तकरार का असर नगर निकाय चुनाव पर पड़ना लाजमी था और ऐसा ही हुआ भी। बेशक पार्टी मेयर की सात सीटों में से पांच पर जीत को अपनी उपलब्धि बताए मगर यह उपलब्धि नहीं है।
भाजपा के बेशक मेयर के पांच सीटों पर कब्जा जमाया हो। यह नतीजा सत्ताधारी भाजपा के लिए संतोषप्रद कहा जा सकता है। लेकिन यदि इसे पूरे प्रदेश के परिपेक्ष में देखें तो भाजपा को जबरदस्त शिकस्त भी मिली है। पिछले निगम चुनावों सहित लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समतुल्य तो यह नतीजा नहीं है। इन तीनों चुनावों में पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। 2013 में पांच निगमों में से भाजपा चार मेयर बनाने में कामयाब हुई थी। कांग्रेस का एक भी मेयर नहीं जीता था। रुड़की में यशपाल निर्दलीय मेयर बने थे। हालांकि वह भाजपा से टिकट मांग रहे थे। टिकट नहीं मिलने पर वह निर्दलीय चुनाव लड़े थे। उन पांच में से इस बार चार पर चुनाव हुए। जिसमें एक हरिद्वार मेयर सीट कांग्रेस ने भाजपा से छीन ली। जबकि हरिद्वार प्रदेश सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री मदन कौशिक का क्षेत्र है।
हरिद्वार की मेयर सीट ही क्यों भाजपा के कई टॉप लीडर के क्षेत्र में पार्टी चुनाव हार गई है। सबसे बड़ा झटका सरकार यानी मुख्यमंत्री को अपने विधानसभा क्षेत्र में लगा। डोईवाला से विधायक त्रिवेंद्र वहां अपनी पार्टी का पालिका अध्यक्ष नहीं जितवा पाए। भाजपा उम्मीदवार नगीना रानी कांग्रेस की सुमित्रा मनवाल से करीब दो सौ वोट से हारी। नगीना रानी को मुख्यमंत्री ने अपनी पसंद से टिकट दिया था।
कोटद्वार सरकार के वरिष्ठ मंत्री हरक सिंह रावत का क्षेत्र है। उन्होंने कांग्रेस सरकार के कद्दावर मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी को हराया था। मगर नया निगम बने कोटद्वार के मेयर चुनाव में हरक सिंह रावत अपनी पार्टी के उम्मीदवार को नहीं जितवा पाए। वहां कांग्रेस के पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की पत्नी हेमलता नेगी ने जीत दर्ज की।
देहरादून से लगे मसूरी पालिका में तो पार्टी की और बुरी दुर्गाति हुई। इस पालिका में अध्यक्ष सीट तो दूर भाजपा एक सभासद तक नहीं जिता पाई। यहां अध्यक्ष की सीट पर निर्दलीय ने जीत दर्ज की। इसके अलावा सभासद की कुल 13 सीटों में से 9 पर निर्दलीय ने कब्जा किया तो 4 कांग्रेस के सभासद चुने गए। मसूरी से भाजपा के विधायक गणेश जोशी की पहचान प्रदेश में दबंग नेता की हो गई है। मसूरी के बाद नैनीताल, भीमताल, रामनगर जैसी महत्वूपर्ण सीटों पर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। नैनीताल और रामनगर में भी भाजपा के ही विधायक हैं। इसके अलावा पौड़ी जैसे ऐतिहासिक महत्व वाले शहर और गढ़वाल मंडल मुख्यालय में भी भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। इस नतीजे के बेशक कई कारण होंगे। मगर कुछ समय से सरकार और संगठन में शुरू हुई रार भी एक बड़ा कारण है। यदि यह रार खत्म नहीं हुई तो 2019 में मोदी का रथ कैसे फर्राटा मारेगा।

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