Uttarakhand

कैनवास पर कल्पनाओं के रंग

उत्तराखण्ड की कला प्राचीन समय से ही दुनियाभर में मशहूर है। यहां की प्रतिभाओं ने अपनी बेहतरीन पेंटिंग्स के जरिए पहाड़, माटी और लोक संस्कृति को नई पहचान दिलाई है। इस कड़ी में अब एक और नाम जुड़ गया है। ये हैं सरोजनी डबराल। पहाड़ से हजारों मील दूर दिल्ली-मुंबई में पली-बढ़ी सरोजनी की पेंटिंग्स में पहाड़ी झलक साफ दिखाई पड़ती है

उ त्तराखण्ड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। देश ही नहीं विदेश के कोने-कोने में यहां की प्रतिभाएं अपने हुनर से सूबे का नाम रोशन कर रही हैं। उत्तराखण्ड से दूर रहकर भी कई युवा अपनी माटी को नहीं भुला पाए हैं। ऐसी ही उत्तराखंड की एक बेटी है सरोजनी डबराल या कहें तो सरू डबराल। ‘सरू’ भले ही दो अक्षरों का छोटा सा नाम प्रतीत होता है। असल में पहाड़ के हर गांव में आपको ये नाम जरूर सुनाई देगा। पहाड़ के लोक एवं अपनत्व का अहसास कराता नाम है सरू। सरोजनी डबराल मूल रूप से देहरादून जनपद के रायपुर ब्लॉक स्थित छमरोली गांव की रहने वाली हैं। शादी के बाद वह मुंबई चली गई। वहां वह अपने परिवार के साथ रहती हैं। सरू डबराल को अपनी माटी, लोकसंगीत, लोकसंस्कूति की समझ और उनके प्रति प्यार और अपनत्व अपने पिताजी कमल नयन डबराल से विरासत में मिली। कमल नयन डबराल लोकगायक और गीतकार रहे हैं। इसलिए सरू को द्घर में ही हमेशा संगीत के सातों सुर सुनाई पड़ते थे। अपने परिवार के साथ सरू डबराल टिहरी, देहरादून और दिल्ली में रही। दिल्ली में पली बढ़ी सरू ने कभी भी अपने उत्तराखण्ड को नहीं बिसराया। सरू ने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली में बतौर फैशन डिजाइनर के तौर पर की थी। लेकिन बचपन से ही पेंटिंग के प्रति प्यार ने उन्हें आखिरकार एक पेशेवर पेंटर बना दिया। दिल्ली के बाद सरू का अगला पड़ाव मुंबई था और मुंबई में रहते हुए सरू ने पेंटिग्स के जरिए उत्तराखण्ड खासकर पहाड़ी संस्कूति को नई पहचान दिलाई है। आज हर कोई सरू की पेंटिंग का मुरीद है। सरू डबराल की अधिकतर पेंटिंग्स में आपको बरबस ही अपने पहाड़ का लोकजीवन और लोकसंस्कूति की झलक देखने को मिलती है। इन पेंटिंग्स में पहाड़ का यथार्थ नजर आता है। वहीं प्रकूति, पशु-पक्षी, नदी- झरने, खेत-खलिहान से लेकर वैभवशाली सांस्कूतिक विरासत की झलक भी दिखाई देती है। सरू भले ही आज मुंबई में रहती हों, लेकिन उनके दिल और चित्रकारी में आज भी उत्तराखण्ड धड़कता है। सरू डबराल ने कभी भी किसी संस्थान या कॉलेज से पेंटिंग की विधिवत पढ़ाई या फिर ट्रेनिंग नहीं ली है। वह तो २०१० से शौकिया ऑयल पेंट, ऐक्रेलिक और टर कलर्स से खुद पेंटिग करती आ रही हैं। वहीं वे एक बेहतरीन गायिका भी हैं। उनके कई गीत सोशल मीडिया में बेहद पंसद किए गए हैं। सरू डबराल से उत्तराखण्ड, उनके पेंटिग्स और जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर लंबी गुफ्तगू हुई। जिस पर उन्होंने अपने बेबाक शब्दों से कई राज खोले। बकौल सरू, पिताजी से लोक का ककहरा सीखा। पहाड़ की पीड़ा का अनुभव मेरे परिवार को भली-भांति है। जो मुझ तक भी तीव्रता से पहुंचा। दिल्ली में पले और बड़े होने के बावजूद मुझे महानगर के ओपन कल्चर ने छुआ तक नहीं। मैं अपने प्रदेश और पहाड़ की संस्कृति से जुड़ी रही। इसका एक मात्र कारण मेरे पिताजी हैं। मैंने कभी भी अपना गांव आना नहीं छोड़ा। बेहतर भविष्य बनाने की दौड़ में हम सभी शामिल होते हैं लेकिन मेरी ये दौड़ तब केवल निजी थी। इस दौरान कुछ तो था जो मुझे कचोटता था, क्योंकि मुझे असल में रंगों के बीच रहना था। हमारे प्रदेश के पहाड़ और जंगल हमेशा मुझे कुछ अलग करने की प्रेरणा देते हैं। अपने गांव-द्घर से हजारों किलोमीटर दूर रहने के बाद भी मुझे मेरी माटी की यादें बरबस अपनी ओर खींच लेती हैं। भारत में पेंटिग्स है मगर आम परिवार के बच्चों में बीच यह लोकप्रिय नहीं है। क्योंकि यह बहुत खर्चीला है। इसलिए युवा इसे कैरियर के रूप में नहीं चुनते। इसलिए आम लोगों से दूर है। जबकि पेंटिग्स के जरिए आप अपनी अभिव्यक्ति को दूसरों के सामने रखते हैं। पेंटिग्स का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। इससे सृजनात्मक सोच बढ़ती है। एक पेंटिंग हजारों शब्दों के समान अपनी बात आसानी से कहती है। सरू डबराल आगे कहती हैं, ‘एक दिन मुझे मेरे बहुत ही करीबी मित्र (जो कि गैर पहाड़ी हैं) ने पूछा, तुम डबराल हो तो डबरालों का मूल क्या है? उत्तराखण्ड में सामाजिक परिस्थितियां क्या हैं? शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, इत्यादि के बारे में तुम्हें कुछ पता भी है या नहीं। अपने को गर्व से उत्तराखंडी कहने वाली मैं, उस वक्त निशब्द थी। अपने मूल के बारे में जानकारी तो मुझे थी, लेकिन न जाने क्यों मैं कुछ बोल नहीं पाई। मैं हिल गयी थी। क्योंकि जिंदगी के साथ इतना आगे बढ़ गए कि पीछे मुड़ के ही नहीं देखा। मेरे मित्र के सवालों ने मुझे कई सालों पीछे भेज दिया था। बस तभी से मन में ठान लिया के अपनी क्षमता के अनुसार छोटा सा सहयोग मैं जरूर अपने उत्तराखण्ड के लिए करूंगी, ताकि लोग उत्तराखण्ड को जान सकें। कला के माध्यम से मेरी एक छोटी सी कोशिश जारी है। मेरा ये प्रयास निरंतर चलता रहेगा। आज पहाड़ पलायन से जर्जर हो चुका है। दिखावे की भागदौड़ में हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। जबकि पहाड़ ही हमारी असली पहचान है। यहां का लोकजीवन, लोकसंस्कूति, धरोहर। यहां रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है। बीते तीन-चार सालों में कुछ युवाओं ने जरूर वापस पहाड़ लौट उम्मीदें जगाई हैं। युवा पीढ़ी को चाहिए की आगे आकर अपने पहाड़ के लिए कुछ करें। वास्तव में देखा जाए तो अपने उत्तराखण्ड से हजारों किलोमीटर दूर रहने के बाद भी सरू डबराल का अपनी माटी को पेंटिंग्स के जरिए नई पहचान देने की कयावद बेहद सराहनीय और अनुकरणीय है। उम्मीद की जानी चाहिए की आने वाले दिनों में वे ऊंचाइयों को छुएं और उत्तराखण्ड का भी नाम और आगे ले जाएं।

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