[gtranslate]
Uttarakhand

सीएम फेस कर्नल बने गले की फांस

कर्नल (सेवानिवृत्त) अजय कोठियाल को उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किए जाने के बाद से आप की प्रदेश इकाई में असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। वरिष्ठ नौकरशाह, सेवानिवृत्त आईएएस सुवर्धन और आईपीएस अनंत राम चैहान ने पार्टी छोड़ दी है तो कई नेता अपने लिए अन्य दलों में जगह तलाशनी शुरू कर चुके हैं। आप के सामने एक बड़ा संकट राज्य के जातिगत समीकरणों को साधने का भी है। ‘ब्राह्माण-ठाकुर’ राजनीति का राज्य में वर्चस्व रहता आया है। कोठियाल के रूप में आप के पास एक बड़ा ब्राह्माण चेहरा तो मौजूद है, लेकिन ठाकुर मतदाताओं को लुभाने के लिए उसके पास दमदार चेहरा न होना एक बड़ी कमजोरी मानी जा रही है। सैनिक बाहुल्य राज्य में सैनिकों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद सरकारी नौकरी दिए जाने का वायदा पूर्व सैनिकों को तो लुभा रहा है, मगर प्रदेश के लाखों बेरोजगार युवाओं के मध्य इस वायदे के चलते आप अलोकप्रिय हो चली है

भले ही आम आदमी पाटी ने प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके भाजपा और कांग्रेस से नैतिक बढ़त हासिल कर ली हो लेकिन अब स्वयं पार्टी के लिए ही उनका मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करना एक तरह से गले की फांस बनता नजर आ रहा है। रिटार्यड कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होने के बाद से लगातार आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेता पार्टी को अलविदा कह रहे हैं, साथ ही अन्य दलों के नेताओं ने भी आप में शामिल होने से दूरी बना ली। इससे आम आदमी पार्टी भी सकते में है। इसका असर चुनाव में टिकट बंटवारे के तौर पर देखा जा सकता है। आप ने अधिकांश अंजान चेहरांे को मैदान में उतारा है। जबकि पूर्व में यह माना जा रहा था कि पार्टी कम से कम महत्वपूर्ण सीटांे पर मजबूत और स्थापित नेताओं को टिकट दे सकती है।

विगत दो वर्षों से आम आदमी पार्टी प्रदेश की राजनीति में तेजी से उभर कर सामने आई। कई नेताओं के अलावा पूर्व नौकरशाहांे और अधिकारियों ने भी आम आदमी पार्टी की नीतियों से प्रभावित होकर उसका दामन थामा जिससे पार्टी का जनाधार तेजी से बढ़ा। भाजपा-कांग्रेस दोनों ही आम आदमी पार्टी के बढ़ते जनाधार से खासे चिंतित दिखाई देने लगे थे। पहली बार प्रदेश में तीसरे विकल्प की सार्वजनिक तौर पर चर्चाएं भी होने लगी थी।

लेकिन विधानसभा चुनाव के निकट आते ही आम आदमी पार्टी के जनाधार में खासी गिरावट देखने को मिल रही है। तमाम तरह के सर्वेक्षणों में भी पार्टी तीसरे विकल्प के तौर पर नहीं देखी जा रही है। यहां तक कि कई बड़े नेता भी पार्टी का दामन छोड़ चुके हैं। जिनमें पूर्व आईएएस सुवर्धन और पूर्व आईपीएस अनंत राम चोैहान जो कि पार्टी के गढ़वाल मंडल अध्यक्ष के पद पर थे।

राजनीतिक जानकारांे की मानें तो आम आदमी पार्टी का यह हाल मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर कर्नल अजय कोठियाल को घोषित करने के बाद से होने लगा है। पार्टी के नीति निर्धारको का यह कदम एक तरह से अदूरदर्शी निर्णय साबित हो रहा है।
प्रदेश की राजनीति में चुनावी हार-जीत का गणित प्रदेश के जातिगत और क्षेत्रगत समीकरणों से इस कदर गुंथा हुआ है कि कोई भी राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं रह पाया। जिस ने भी इन समीकरणो की अनदेखी करने का प्रयास किया उस दल को चुनाव में भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इसी समीकरण के चलते एक मुख्यमंत्री भी चुनाव हार चुके हैं। गढ़वाल-कुमाऊं, ठाकुर- ब्राहमण का राजनीतिक समीकरणों को बैठाने में भी आम आदमी पार्टी नकाम रही है। सेंटर फाॅर दि स्टडी आॅफ डवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) की 2007 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 25-28 प्रतिशत ब्राह्मण, 32-35 प्रतिशत क्षत्रीय, 18.3 प्रतिशत ओबीसी, 18.76 प्रतिशत एससी एवं 2.8 प्रतिशत एसटी की जनसंख्या है। खास बात यह हेै कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में दलितों की आबादी का समीकरण प्रदेश की राजनीति में बेहद मजबूत माना जाता रहा है। इन समीकरणों की अनदेखी आप की चुनावी रणनीति में खासा असर डाल सकती है।

दिलचस्प बात यह हेै कि भाजपा और कांग्रेस ने इसी जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणांे के चलते मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है। भले ही कांग्रेस से हरीश रावत और भाजपा से पुष्कर सिंह धामी को चेहरा बनाए जाने की बातंे होती रही हैं। इन दलों ने अभी तक कोई अधिकारिक घोषणा नहीं की है।

हरक सिंह रावत का प्रकरण इस जातिगत समीकरणों को समझने के लिए सटीक उदाहरण है। पूर्व में हरक सिंह रावत के बारे में चर्चाएं थी कि वे आम आदमी पार्टी में जा सकते हैं। सूत्रों की मानें तो हरक सिंह के लिए आप में रेड कार्पेट तक बिछाया जा चुका था लेकिन जैसे ही कर्नल कोठियाल को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया गया हरक सिंह रावत ने भी आप से दूरियां बना ली और आप के बजाय कांग्रेस को ही उन्होंने ज्यादा फायदेमंद माना। हरक सिंह क्षत्रीय हैं। उनका अपने क्षेत्र के ठाकुर मतदाताओं में खासा प्रभाव है।

पूर्व सेैनिकों को लेकर आम आदमी पाटी खासी उत्साहित दिखाई दे रही है। राजनीतिक तौर पर यह समीकरणा भी आप के लिए आने वाले समय में कोई खास फासदा पहुंचाएगा इस पर भी तमाम तरह की आशंकाएं जाताई जा रही है। आप ने पूर्व
सैनिकों के लिए ऐसी घोषणाएं और वादे किए हैं जिनसे प्रदेश की राजनीति में भी हलचल मची हुई है।

आप नेता अरविंद केजरीवाल द्वारा शहीद होने वाले सैनिकों के लिए एक करोड़ की धनराशि दिए जाने की घोषणा का स्वागत तो प्रदेश में बखूबी हो रहा है लेकिन रिटायर होने वाले सैनिक को रिटायरमेंट के तुंरत बाद प्रदेश में सरकारी नौकरी दिए जाने का वादा पार्टी के लिए गले की फंास बनता नजर आ रहा है।

एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश में प्रतिवर्ष तकरीबन 3 हजार से 4 हजार सैनिक रिटायर होने के बाद वापस आ जाते हैं। लगभग 26 हजार रुपए प्रतिमाह की पंेशन एक सामान्य सैनिकों को मिलती है। यहां तक कि जीवन भर स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा अन्य सुविधाएं और पारिवारिक संरक्षण भी भारत सरकार द्वारा एक सैनिक को दिया जाता है। कमशर््िायल वाहनांे के लिए परमिट में वरीयता, सरकारी गल्ला आदी की दुकानों में भी वरीयता दी जाती है। प्रदेश में पूर्व सैनिकों को सरकारी उपक्रमों में संविदा पर नौकरी देने के लिए ‘उपनल’ का गठन पहले से ही किया गया है जिसमें पूर्व सैनिकों को ही भर्ती किया जाता है। जबकि इसके विपरीत प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को 42 वर्ष के बाद सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती।
प्रदेश में 10 लाख से भी ज्यादा पंजीकृत बेरोजगार हैं। हर वर्ष इसमें हजारों का इजाफा होता आ रहा है। हाल ही में प्रदेश में बेरोजगारी की दर सबसे उंची पाई गई है। इन सबके बावजूद रिटायर्ड सैनिक जो कि 26 हजार की प्रतिमाह पंेशन ले रहा हो, उसको सरकारी नौकरी दिए जाने की घोषणा प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के हितों पर कुठाराघात समझा जा रहा है। हालांकि राजनीतिक तौर पर इन वादों और घोषणाओं का कोई राजनीतिक दल विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है लेकिन प्रदेश के बेरोजगार युवाओं में इसका बड़ा असर पड़ता दिखाई देने लगा है।

अब सवाल यह है कि जो पार्टी कुछ समय पूर्व प्रदेश की  राजनीति में मजबूती से तीसरे विकल्प के तौर पर मानी जा रही थी उस पार्टी का जनाधार अचानक से कम क्यों दिखाई देने लगा है। आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में अपनी जीत के प्रति इस कदर आशावान है कि उसने अपना मुख्यमंत्री का चेहरा तक घोषित कर दिया है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि बगैर किसी कैडर वोट के आम आदमी पार्टी चुनावों में ताल ठोक रही है। पार्टी सूत्रांे की मानंे तो इस उत्साह के पीछे सिर्फ उसकी चार गांरटी योजनाएं हैं जिसमें अभी तक 27 लाख लोग पंजीकरण करवा चुके हैं। यह भाजपा के 16 लाख कार्यकर्ताओं से कहीं ज्यादा है। इन्हीं 27 लाख लोगों के भरोसे को पार्टी चुनाव में अपनी ताकत समझ रही है। साथ ही पूर्व सैनिकांे के लिए रिटायर होने के तुंरत बाद सरकारी नौकरी देने का वादा भी पार्टी अपनी जीत का आधार मान रही है, जबकि पार्टी के दावांे और उनके वोटों में तब्दील होने के दावांे का आकलन किया जाए तो अभी आम आदमी पार्टी के लिए डगर बहुत कठिन है।

सबसे पहले चार गांरटी योजनाओं के पंजीकृत 27 लाख लोगों की बात करें तो आम आदमी पार्टी ने 300 यूनिट मुफ्त बिजली, प्रत्येक बेरोजगार को 5 हजार बेरोजगारी भत्ता, महिलाओं को एक माह 1 हजार रुपए भत्ता देने के साथ-साथ बुजुर्गों को मुफ्त तीर्थयात्रा करवाए जाने की घोषणा की है औेर बकायदा इसके लिए गारंटी कार्ड तक जारी किया गया है। जिसे प्रदेश भर में 27 लाख लोगों द्वारा भरवाया गया है। आप के नेता इन्हीं 27 लाख लोगों को अपना कैडर मान रहे हंै और इसी के बलबूते प्रदेश की राजनीति में अपने आप को तीसरा विकल्प मान चुके हैं।

 

बात अपनी-अपनी

अन्य प्रदेशों में पूर्व सैनिकों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाता रहा है। इस प्रदेश में भी आसानी से सरकारी नौकरियां पूर्व सैनिकों को दी जा सकती है। प्रदेश के युवाओं को प्राइवेट सेक्टर आदि में नौकरियां दी जा सकती है।

पीसी थपलियाल, महासचिव उत्तराखण्ड पूर्व सैनिक एवं अर्द्धसैनिक संयुक्त संगठन

अरविंद केजरीवाल की घोषणा और वादे तो इस तरह है कि ‘न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।’ केजरीवाल को यह पता ही नहीं हैे कि प्रदेश में पहले से ही पूर्व सैनिकों के लिए ‘उपनल’ कर गठन किया हुआ है जिसमें पूर्व सैनिकों की क्षमता और योग्यता के अनुसार उनको समायोजित किया जाता है। एक पेंशन प्राप्त व्यक्ति को समायोजित करने की बजाय प्रदेश के लाखों बेरोजगार युवकों को नौकरियां देने का सवाल सबसे बड़ा है। पूर्व सैनिकों के लिए तो सब कुछ है लेकिन हमारे लाखों बेरोजगार युवाओं के लिए क्या साधन हैं, इस पर बात होनी चाहिए।

रविन्द्र जुगराण, राज्य आंदोलनकारी

You may also like

MERA DDDD DDD DD