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Uttarakhand

विवादों में त्रिवेंद्र के करीबी

केदारनाथ आपदा में टूटी सड़कें अभी तक नहीं बन पाईं, पहाड़ के गांवों में लोग आजादी के समय से सड़कों की मांग कर रहे हैं। मगर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, त्रिवेंद्र सरकार उन जगहों पर सड़कें और सुविधाएं पहुंचाने में उतावली रही जहां मुख्यमंत्री के चहेतों ने कौड़ियों के भाव जमीनें खरीदी। सूर्यधार में त्रिवेंद्र रावत के करीबी कारोबारी मित्र ने जमीनें खरीदी तो वहां तत्काल झील निर्माण की घोषणा कर दी गई। इसी तरह सिंधवाल गांव में त्रिवेंद्र के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट और ओएसडी धीरेंद्र पंवार ने जमीनें खरीदी तो वहां पहुंचने के लिए त्वरित गति से न सिर्फ पुल, बल्कि सड़क का निर्माण भी हो गया। अन्य जगहों पर सड़क बनाने के लिए बजट का रोना रोते रहे लोक निर्माण विभाग ने सिंधवाल गांव को सड़क से जोड़ने में जो तेजी दिखाई उससे सभी हैरान हैं। चर्चा है कि अब कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की खरीदी जमीन तक भी सड़क पहुंचाई जा रही है

 

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भाजपा के नेता और उनके समर्थक जमीन से जुड़े नेता के तौर पर प्रचारित करते रहे हंै। चार वर्ष के कार्यकाल में त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखण्ड का जमीनी नेता बताकर खूब प्रचारित किया गया। लेकिन हकीकत यह भी है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने कार्यकाल में जमीन के कारोबारियों को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाने की नीतियां बनाई और उन्हें लागू किया। चाहे वह गैरसेंैण में बहुगुणा सरकार के कार्यकाल के दौरान भूमि की खरीद-फरोख्त पर लगाई गई रोक हटाने की नीति रही हो, उत्तराखण्ड में आजादी के बाद लागू जमींदारी उन्मूलन एक्ट हो, कुमायूं गढ़वाल भूमि कानून (कूजा) एक्ट को खत्म करने की बात हो या फिर नगरीय क्षेत्रों में ग्रुप हाउसिंग को बढ़ावा देने के नाम पर बिल्डरांे को बड़ी राहत और छूट देने के लिए नियमों को रातों-रात बदलने की नीति रही हो, कमोबेश हर नीति से कहीं न कहीं जमीन के करोबारियों को ही लाभ पहुंचता रहा है। या यूं कहे कि लाभ पहुंचाया जाता रहा है, तो गलत नहीं होगा। जमीन के करोबारियों को त्रिवेंद्र रावत किस तरह से फायदा पहुंचाते थे, इसके कई प्रमाण सामने आ चुके हैं। खास तौर पर दो मामले बेहद चर्चाओं में रहे हैं।

संजय गुप्ता द्वारा खरीदी गई सूर्यधार गांव की जमीन

सबसे पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के दो करीबियों द्वारा डोईवाला विकास खंड के सिंधवाल गांव में 19 बीघा जमीन खरीदने के मामले की बात करते हैं। मुख्यमंत्री के सबसे चर्चित मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट और मुख्यमत्री के विशेष कार्याधिकारी यानी ओएसडी धीरेंद्र सिंह पंवार ने साझेदारी में 1.4620 हेक्टेयर यानी लगभग 19 बीघा भूमि खरीदी। इस भूमि का बाजारी मूल्य 25 लाख 25 हजार रुपए बताया गया, जबकि सर्किल रेट प्रति हेक्टेयर 16 लाख 80 रुपए हजार विक्रय पत्र में अंकित किया गया है। हैरानी की बात यह हेै कि सिंधवाल गाव में जहां प्रोपर्टी के रेट 40 से 50 लाख प्रति बीघा हैं, जैसा कि सोशल मीडिया फेसबुक के मार्किट प्लस पेज पर हर रोज प्रोपर्टी डीलरों द्वारा विज्ञापन दिए जा रहे हैं, वहां महज 1 लाख 32 हजार रुपए बीघा जमीन बड़ी आसानी से खरीद ली गई। हर कोई मान रहा है कि जमीन को कम से कम भाव 40 लाख रुपए प्रति बीघा के हिसाब से 7 करोड़ 60 लाख में खरीदा गया। इस जमीन की सेल डीड के अनुसार भूमि को 26,2000 में खरीदा गया है। इससे साफ है कि कई करोड़ कालाधन इस जमीन को खरीदने में लगाया गया। लेकिन सवाल कालेधन को लेकर नहीं, बल्कि इस खरीद के बाद यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किए गए सरकारी धन को लेकर उठ खड़े हुए हैं।

सिंधवाल गांव में आजादी के बाद एक इंच सड़क नहीं बनाई जा सकी। अविभाजित उत्तर प्रदेश में हो या उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद गांव वालों को सड़क तक सरकारें मुहैया नहीं करवा पाई हैं, मगर सिंधवाल गांव के लिए अचानक ही सरकार ने महज 18 माह के भीतर ही एक बड़ा भारी वाहन पुल और ढाई किलोमीटर लंबी सड़क न केवल स्वीकृत की, बल्कि इसी दौरान निर्माण कार्य पूरा करके नया रिकाॅर्ड तक बना डाला।

सिंधवाल गांव में जमीन का कारोबार बड़ी तेजी से फलफूल रहा है। सड़क और पुल न होने के चलते जमीनें कौड़ियों के भाव में कारोबारियों के द्वारा खरीदी गई और जब जमीनें खरीद ली गई तो सरकार द्वारा सड़क और पुल का निर्माण किए जाने पर कौड़ियों के भाव में खरीदी गई जमीनें सोना उगलने लगी। आज सिंधवाल गांव और इसके आस-पास की जमीनों के बाजारी भाव 40 से 50 लाख रुपए प्रति बीघा तक पहुंच चुके हैं।

त्रिवेंद्र सरकार द्वारा सिंधवाल गांव के लिए 6 कारोड़ 74 लाख 78 हजार की लागत से ढाई किमी लंबी सड़क और बिडालना नदी पर एक 100 मीटर लंबा पुल स्वीकृत किया गया जिसके लिए कार्यदायी संस्था अस्थाई निर्माण खण्ड लोक निर्माण विभाग ऋषिकेश को बनाया गया। इसका ठेका मैसर्स दून इंफ्रास्ट्रक्चर नामक कंपनी को दिया गया।

लेट-लतीफी और लापरवाही के लिए कुख्यात राज्य के लोक निर्माण विभाग ने यहां कमाल कर डाला। महज 18 माह में ही सड़क और पुल का निर्माण रिकाॅर्ड गति से करवा दिया। विभाग द्वारा लगाए गए साइनबोर्ड में पूरी जानकारी दी गई है। सड़क और पुल के कार्य निर्माण की आरंभ तिथि 29 मई 2018 तथा कार्य पूर्ण की तिथि 28 नवंबर 2019 अंकित की हुई है। यह अपने आप में ही एक रिकाॅर्ड माना जा सकता है, क्योंकि आज तक केदारनाथा आपदा से क्षतिग्रस्त पुलों और सड़कांे का पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है। दर्जनों गांवों के लिए संपर्क पुलों और पुलिया का निर्माण सरकार नहीं करवा पाई है। लेकिन सिंधवाल गांव के लिए 18 महीने में ही रिकाॅर्ड गति से निर्माण करवाया गया जो कि कई सवाल भी खड़े करता है।

सूत्र बताते हैं कि रमेश भट्ट और धीरेंद्र सिंह पंवार द्वारा पुल स्वीकृत होने से पूर्व ही जमीनों का सौदा कर लिया गया था। कारोबारियों द्वारा सिंधवाल गांव में जमीनों के सौदे कर लिए गए थे। तब न तो इस गांव के लिए कोई सड़क थी और न ही नदी पर कोई पुल था। मगर जैसे ही जमीनों के सौदे हुए तो सरकार ने सड़क और पुल भी स्वीकृत करने में देरी नहीं की। हालांकि रमेश भट्ट और धीरेंद्र पंवार द्वारा 16 नवंबर 2019 के विक्रय पत्र द्वारा भूमि पंजीकरण करवाया गया है। चर्चा है कि यह सावधानी इसलिए बरती गई ताकि यह आरोप न लग सके कि पुल बनने से पूर्व जमीन खरीदी गई है, जबकि जमीनों के सौदे पुल और सड़क के निर्माण से पूर्व ही हो गए थे।

सूर्यधार में बनी झील

सिंधवाल गांव के लिए जो सड़क बनाई गई है वह पूर्व में थानो से बडेरना गांव के लिए स्वीकृत थी। त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा पुल के बाद सिंधवाल गांव के लिए सड़क स्वीकृत की गई है, लेकिन इसका कोई विवरण विभाग ने नहीं दर्शाया है। हैरत की बात यह है कि इसी पुल के पूर्वी छोर जहां से सिंधवाल गांव के लिए सड़क जाती है, के बायीं ओर से एक कच्चा मार्ग जिले के दूरस्थ गांव नाहींकला के लिए भी गया है जिस पर अत्यंत धीमी गति से काम हो रहा है। वर्षों से इस मार्ग पर सड़क कटिंग का काम चल रहा है, लेकिन आज तक इस सड़क का काम पूरा नहीं हो पाया है।

इसी तरह से पुल के पश्चिमी छोर पर एक सड़क थानो गोदी बडेरना के लिए वर्षों पूर्व बनाई गई थी। जो कि आज तक कच्ची ही है। हालांकि इस सड़क पर कुछ वर्ष पूर्व एक पुल का निर्माण किया जा चुका है, लेकिन आज तक बडेरना के लिए स्वीकृत सड़क पर न तो रोड कटिंग का काम पूरा हो पाया है और न ही डामरीकरण हो पाया है, जबकि सिंधवाल गांव के लिए दु्रत गति से पुल और सड़क का निर्माण करवाया गया है।

अब सूर्यधार गांव की बात करें तो इसमें भी पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खास और चहेते पारिवारिक एवं बैडमिंटन मित्र और जमीन के कारोबारी संजय गुप्ता के सूर्यधार में जमीन खरीदने का मामला सामने आ चुका है। पत्रकार और समाचार प्लस चैनल के मुखिया उमेश जे कुमार द्वारा सूर्यधार गांव में संजय गुप्ता द्वारा बड़े पैमाने पर कौड़ियों के भाव जमीनें खरीदने के मामले में स्टिंग आॅपरेशन किया गया था जिसे फेसबुक में सार्वजनिक किया गया। इस स्टिंग आॅपरेशन में यह बात साफ हो गई कि संजय गुप्ता द्वारा सूर्यधार गांव में जमीनें खरीदने के तुरंत बाद त्रिवेंद्र रावत द्वारा सूर्यधार गांव के समीप सीला चैकी स्थान पर सूर्यधार झील का निर्माण करवाने की घोषणा कर दी गई। जिसके चलते संजय गुप्ता द्वारा कौड़ियों के भाव में खरीदी गई जमीन करोड़ों की जमीन हो चुकी है। इसी सूर्यधार से एक सड़क सिंधवाल गांव के लिए भी स्वीकृत की गई है। चर्चा है कि यह सड़क कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज द्वारा खरीदी गई जमीन तक पहुंचाई जा रही है। जिस तरह से कि सिंधवाल गांव में बनने वाली सड़क धीरेंद्र पंवार और रमेश भट्ट द्वारा खरीदी गई जमीन तक ही पहुंचाई जा रही है। अब सवाल यह है कि आखिर सरकार को तभी सड़क और पुलों के निर्माण की याद क्यों आई जब मुख्यमंत्री के सलाहकार और ओएसडी ने जमीन खरीदी, जबकि बडेरना और नाहींकला और सनगांव के निवासी आज भी सड़क का इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए सरकार ने क्यों नहीं द्रुत गति से सड़कों का निर्माण करवा दिया।

धीरेन्द्र पंवार और रमेश भट्ïट द्वारा खरीदी गई जमीन का विवरण

2013 की केदारनाथ आपदा के चिन्ह आज भी सामने दिखाई दे रहे हैं। दर्जनों पुल और पुलिया का पुनर्निर्माण लोक निर्माण विभाग और सरकार नहीं करवा पा रही है। विभाग बजट का रोना रोता रहा है। सरकार आश्वासन ही देती रही है। बावजूद इसके सिधंवाल गांव में पुल और सड़क का निर्माण दु्रत गति से करने में सरकार और विभाग देर नहीं करता।

 

बात अपनी-अपनी

यह मामला पूरी तरह से भ्रष्टाचार का ही है। जिस तरह से हरियाणा में हुड्डा सरकार ने योजना बनाकर राॅबर्ट बाड्रा को फायदा पुहंचाया था उसी तरह से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री रहते अपने सलाहकारों और ओएसडी को फायदा पहुंचाया। अपने जमीन के कारेाबारी मित्र को करोड़ों का फायदा पहुंचाने के लिए सूर्यधार झील का निर्माण करवाया गया। जब संजय गुप्ता ने सूर्यधार गांव में कौड़ियों के भाव में कई-कई बीघा जमीन खरीद ली तब त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तुरंत सूर्यधार झील का निर्माण करने की घोषणा कर दी। यह स्पष्ट है कि त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री रहते हुए जमीनों के कारोबारियों के साथ सांठ-गांठ करके सरकारी योजना लागू करवाते रहे हैं। मुख्यमंत्री के सलाहकार और ओएसडी सरकारी पद पर थे और कैसे मुख्यमंत्री को यह पता नहीं चला होगा कि जमीनें खरीदी जा रही हैं। मुझे लगता है कि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी मिले हुए हैं।
उमेश जे. कुमार, पत्रकार

हमने तो पहले ही प्रमाण सामने रख दिए थे कि त्रिवेंद्र रावत भ्रष्टाचार में शामिल रहे हैं। उनकी पत्नी जो कि एक सरकारी कर्मचारी हैं, ने करोड़ों की जमीनें सहस्रधारा में खरीदी हैं जिसकी कोई सूचना सरकार तक को नहीं दी गई। त्रिवेंद्र रावत के भ्रष्टाचार की नदी में उनके सलाहकार और अधिकारी सभी हाथ धोते रहे हैं। सूर्यधार हो या सिंधवाल गांव हर जगह मुख्यमंत्री ने भू माफियाओं और कारोबारियों को ही फायदा पहुंचाने के लिए योजनाएं बनाई हैं। अब तो यह भी साफ हो गया है कि हमारे आरोप सही थे।
रघुनाथ सिंह नेगी, अध्यक्ष जन संघर्ष मोर्चा

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