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Uttarakhand

आपदा घोटाले को क्लीन चिट

किसी भी घोटाले की जांच के बाद जनता को उम्मीद जगती है कि अब ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो जाएगा। लेकिन उत्तराखण्ड में तो ठीक इसके उलट होता है। ‘दि संडे पोस्ट’ तमाम घोटालों की गहराई से छानबीन करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि राज्य में घोटालों की जांच वास्तव में उन पर पर्दा डालने के लिए ही होती है। यहां सूचना अधिकार के तहत उजागर सरकारी विभागों और अधिकारियों के भ्रष्ट कारनामों को कैसे लिपिकीय त्रुटियां बताकर लीपापोती की जाती है, यह 2013 की आपदा के दौरान हुए भ्रष्टाचार की जांच रिपोर्ट से समझा जा सकता है। ‘दि संडे पोस्ट’ जांच की आड़ में घोटालों पर पर्दा डालने के खेल का सिलसिलेवार ढंग से पर्दाफाश करता रहेगा। इस बार 2013 की आपदा राहत के नाम पर हुए भ्रष्टाचार और उसे दबाने की कोशिश का खुलासा

 

सो लह एवं 17 जून 2013 की वह काली रात हजारों लोगों पर कहर बनकर टूटी थी। उत्तराखण्ड के स्थानीय लोगों सहित देश के कोने-कोने से पहुंचे करीब 10 हजार तीर्थयात्री असमय काल के गाल में समा गये थे। उस भयंकर आपदा के 6 साल बाद भी पीड़ित लोग आज तक उबर नहीं पाए हैं। आपदा में लापरवाही के कारण कांग्रेस ने अपने तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाकर सूबे की कमान हरीश रावत को सौंपी थी। तब केंद्र सरकार ने करोड़ों रुपये की धनराशि आपदा प्रभावित लोगों की सहायतार्थ दी थी। जिसे आपदा पीड़ितों के लिए खर्च किया जाना था। लेकिन यह धनराशि पीड़ितों को समुचित मात्रा में मिल ही नहीं पाई। आपदा राहत के नाम पर करोड़ों के वारे- न्यारे हुए। एक ओर जहां आपदा पीड़ितों के लिए पानी तक मयस्सर नहीं था, वहीं अधिकारियों के लिए आधा किलो दूध 200 रुपये में भी खरीदा गया। खूब चिकन खिलाए गए। रसगुल्लों की दावतें चली। आरोप यहां तक लगे कि आपदा में लोग मर रहे थे तो सरकारी अधिकारी पिकनिक मना रहे थे। राहत के लिए जारी धनराशि की बंदरबांट की गई। इस राशि को ठिकाने लगाने का आलम यह रहा कि स्कूटर और मोटर साइकिलों में 30-30 लीटर डीजल डलवाने के फर्जी बिल बनवाए गए। आपदा से कई महीनों पहले के फर्जी बिल भुगतान कर दिए गए। जब जांच हुई तो मानवीय भूल बताकर सबकुछ, माफ कर दिया गया। सभी घपले-घोटाले और अनियमितताएं आपदा अधिनियम की प्रक्रियाएं बताकर सबकुछ जायज ठहरा दिया गया। देहरादून निवासी भूपेंद्र कुमार ने इस मामले पर सूचना आयोग को शिकायत की। आपदा राहत राशि में हुए भ्रष्टाचार को लेकर जब लोगों ने राज्य के सूचना आयोग में आवेदन और अपीलें की तो 15 अप्रैल 2015 को राज्य सूचना आयोग ने जांच की संस्तुति की। शासन से प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव को इस विषय पर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश हुए। मुख्य सचिव ने संबंधित जिलाधिकारियों से प्राप्त तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर जांच तो की, लेकिन साथ ही जांच में सभी आरोपियों को बख्श दिया गया, जबकि हकीकत कुछ और ही है। विभिन्न विभागों के 85 अधिकारियों और कर्मचिरयों को क्लीन चिट भी दे दी।

आपदा से पूर्व ही कर दिखाए राहत कार्य

डीडीहाट में जल संस्थान ने विचित्र कारनामा कर दिखाया। आपदा मद में जो राशि यहां जल संस्थान को दी गई थी उसे आपदा आने से छह माह पूर्व ही खर्च कर दिया गया। इसी के साथ जल संस्थान की यह भी अनियमितता सामने आई कि जो कार्य किए गए उनकी कार्य समाप्ति की कोई तिथि तक अंकित नहीं की गई, जबकि कार्य शुरू होने की तिथि 22 जनवरी 2013 दर्शाई गई है। इसके अलावा डीडीहाट के ही जल संस्थान ने एक अन्य मद में खर्च का विवरण देते हुए कार्य शुरू होने की तिथि 28 दिसंबर 2013 दशाई है। जबकि कार्य पूर्ण होने की तिथि 16 नवंबर 2013 अंकित है।

चौंकाने वाली बात यह है कि जो कार्य 28 दिसंबर 2013 को शुरू हुआ वह 16 नंवबर 2013 को 43 दिन पूर्व ही खत्म हो गया। यानी की काम शुरू होने के 43 दिन पहले ही काम खत्म पैसा हजम। उक्त कार्य बरम- बचकुड़ी पेजयल योजना की मरम्मत का था। इसी तरह पिथौरागढ़ के जल संस्थान में कार्य आरंभ होने की तारीख 21 दिसंबर 2013 दशाई गई है, जबकि कार्य पूर्ण होने की तिथि 10 दिसंबर 2013 अंकित है। आश्चर्यजनक रूप से कार्य शुरू होने से पहले ही काम 12 दिन पूर्व समाप्त कर दिया गया। जिलाधिकारी पिथौरागढ़ द्वारा इसकी पुष्टि हुई। जिलाधिकारी के अनुसार उक्त कार्य पपदेव में क्षतिग्रस्त टैंक के मरम्मत का था जो अभिलेखों के अनुसार 21 नवंबर 2013 को प्रारंभ हुआ और कार्य शुरू होने के 12 दिन पूर्व ही 10 दिसंबर 2013 को समाप्त भी हो गया। इसके अलावा पिथौरागढ़ की ही निर्माण शाखा के अधिशासी अभियंता ने आपदा संबंधी कार्य शुरू होने की तिथि 20 मार्च 2013 दशाई है। जबकि आपदा 17 जून 2013 को आई थी। मतलब साफ है कि आपदा मद में घपला किया गया। जो पैसा आपदा में खर्च किया जाना था वह आपदा आने के 4 माह पूर्व ही खर्च करना दिखा दिया गया। यह कुल 12 कार्य हुए थे। जो लुगती गुगुवां, सिरगौन-दर, बरमला- तोती, सिपुमार्छा, रूदीला, रांथी, फल्याटी, वाटा उमडांडा, मल्ला भैंसकोट, धापा, टांगा आदि की पेजयल योजनाओं के थे। जिनकी कुल लागत 26 ़50 लाख रुपए थी। पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी ने बाद में मामले को मैनेज करते हुए जांच रिपोर्ट में लिखा कि ऐसा टंकण त्रुटि के कारण पूर्व की आख्या त्रुटिपूर्ण हो गई थी।

पिथौरागढ़ के ही गंगोलीहाट में घोटाले को छुपाने के उद्देश्य से आपदा मद में खर्च की गई राशि का विवरण स्पष्ट नहीं दिया गया। यहां की निर्माण शाखा, पेयजल निगम में हुए कार्यों की तिथि नहीं बताई गई। कार्य शुरू होने और कार्य पूर्ण होने की तिथि छुपाई गई। इससे लगता है कि इन कार्यों में घोटाला किया गया। गंगोलीहाट में पेयजल निगम ने जो कार्य दिखाए हैं, वह गोल्थीचौड़ा पेजयल योजना की मरम्मत एवं जुजुठ पेयजल योजना की मरम्मत आदि हैं। दोनों योजनाओं की मरम्मत कार्ययोजना की लागत 3 ़75 रुपए लाख थी। डीडीहाट में आपदा से टूटे सड़क मार्गों को सुचारू करने के नाम पर भी अनियमितता की गई। आपदा के दौरान कुल 23 सड़क मार्ग मलबे से अट गए थे। जिनमें जेसीबी अन्य मशीनें लगाने की बात कही गई। चौंकाने वाली बात यह है कि जो मार्ग महीनों तक मलबे से अटे पड़े थे वह कागजों में महज 10 से 12 दिन तक खुले हुए दर्शा दिए गए। डीडीहाट में आपदा मद में किए गए घोटाले सबसे ज्यादा प्रकाश में आए हैं। लोक निर्माण विभाग द्वारा किए कार्यों में अनियमितता का आलम यह है कि जो कार्य पूर्ण होने की तिथि 2 दिसंबर 2013 थी उनके पूर्ण होने की तिथि एक फरवरी 2013 दर्शाई गई है। यानी कि कार्य प्रारंभ होने से 10 माह पूर्व ही समाप्त हो गया। जबकि जिस आपदा मद में वह धनराशि खर्च दिखाई गई है वह 17 जून 2013 थी। इस तरह देखा जाए तो आपदा के राहत कार्य आपदा आने से 5 माह पूर्व ही निपटा दिए गए। ऐसा केवल पीडब्ल्यूडी यानी लोक निर्माण विभाग की फाइलों में ही हो सकता है। इसे उत्तराखण्ड शासन के आपदा प्रबंधन का घोटाला कहा गया है। नगर पंचायत डीडीहाट में आपदा मद में 30 ़45 लाख के कार्य हुए। जिनमें हुए घोटाले पर पर्दा डालने की पूरी कोशिश की गई है। इन कार्यों के न तो शुरू होने की तिथि ही अंकित की गई है और न ही कार्य पूर्ण होने का विवरण दिया गया है। उक्त कार्य डीडीहाट शहर के अंतर्गत विभिन्न मार्गों और दीवारों के मरम्मत संबंधी किए गए। बाद में इन मामलों में लिपिकीय त्रुटियां मानकर मामला इतिश्री कर दिया गया। मामले को मैनेज कर लिया गया और कहा गया कि दोबारा की गई जांच में यह कार्य आरंभ होने और कार्य पूर्ण होने की तिथियों में गलती पाई गई, वहां पर संबंधित कार्य से संबंधित मूल अभिलेखों में अंकित तिथियां सही हैं।

बाद में उक्त मामलों के जांच में क्लीन चिट दे दी गई जिसमें लिखा गया कि कुछ मामलों में मानवीय भूल हुई और टाइप करते समय गलत अंकित हो गया। यह भी कहा गया कि सभी कार्य मौके पर पूर्ण किए गए हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी गई सूचना में लिपिकीय त्रुटि रही है। इसके लिए जांच अधिकारी संबंधित अभियंता को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। एक अधिकारी के प्रतिदिन का खर्च 7,650 आपदा के दौरान अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खाने एवं रहने का बिल होटल को 25 ़19 लाख का भुगतान किया गया। आश्चर्यजनक यह है कि एक अधिकारी के खाने एवं ठहरने का एक दिन का खर्च 7,650 रुपया दर्शाया गया है। इसमें 6,750 रुपया ठहरने का किराया, 250 रुपये का नाश्ता एवं 300 रुपए का भोजन तथा 350 रुपया रात का भोजन दिखाया गया। सवाल यह है कि ये अधिकारी और कर्मचारी दैवीय आपदा में पीड़ितों की मदद करने गए थे या पिकनिक मनाने। इस मामले में जांच की जरूरत समझते हुए खुद सूचना आयोग ने जांच के लिए कहा। गुप्तकाशी के ही एक होटल के बिलों की बात करें तो होटल कैलाश रेजीडेंसी इसमें संदेह के दायरे में आता है। इस होटल में 2 जुलाई 2013 से 11 अक्टूबर 2013 तक कुल 621 कमरे अधिकारियों द्वारा उपयोग में लाए गए। जिसका एक कमरे का किराया 6,750 बिल में अंकित किया गया। इस तरह इस होटल द्वारा कुल 42.26 लाख रुपए का बिल बनाया गया। हालांकि जब इस मामले में घपले की आवाज गूंजी तो बाद में निगोशियेशन का खेल खेला गया। जिसके चलते होटल कैलाश रेजीडेंसी के एक कमरे का एक दिन का जो बिल 6,750 का था उसे 4000 प्रति कमरा किया गया। इस तरह रहने और खाने के नाम पर जो घपला हुआ उसे निगोशियेशन का नाम देकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया।

इस मामले में अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला और कहा कि सबसे अधिक राहत एवं बचाव कार्य जिला रुद्रप्रयाग में संचालित किए गए थे। ऐसे में राज्य सरकार, सेना, एयरफोर्स, आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एनआईएम तथा मीडिया सहित अन्य अधिकारियों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। मांसाहार भोजन सेना का अभिन्न अंग होता है एवं ऐसे कठिन समय में अच्छे भोजन की आवश्यकता प्रत्येक रेस्क्यूवर को पड़ती है। जिलाधिकारी द्वारा होटल का बिल निगोशिएट करके भुगतान किया गया। 6,750 के कमरे के किराए के स्थान पर 4,000 प्रति कमरा पर भुगतान किया गया। होटल स्वामी को जो बिल 42.26 लाख का था उसे बाद में निगोशिएट करके 25.19 लाख का भुगतान किया गया।

बागेश्वर : आधा किलो दूध 194 रुपए का जून 2013 को जब प्रदेश के पहाड़ों पर आपदा चरम पर थी और पीड़ित पानी तक पीने को तरस रहे थे ऐसे में आपदा में जुटे अधिकारियों और कर्मचारियों को आधा किलो दूध 194 रुपए का पिलाया गया। यही नहीं, बल्कि कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह में ठहरे लोगों के खाने के बिलों में लाखों के वारे-न्यारे किए गए। खाने के भारी-भरकम बिलों की सूची मानवता को शर्मसार करने वाली है। एक तरफ दैवीय आपदा से पीड़ित लोग भूख से मर रहे थे, वहीं अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा दिन-रात मटन, चिकन, आमलेट, अण्डों तथा मिठाई के रूप में गुलाब जामुन का स्वाद लिया गया। सवाल यह भी है कि ये लोग आपदा पीड़ितों की सेवा करने गए थे या पीड़ित लोगों की लाशों पर पिकनिक मनाने?

194 रुपए का आधा किलो दूध खरीदने के मामले में

बागेश्वर के जिलाधिकारी ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यह दूध तरल न होकर पाउडर था जो प्रभावी दरों के अनुरूप ही क्रय किया था। यह दूध पिंडारी ट्रैक पर फंसे 47 पर्यटकों के लिए चाय बनाने के लिए क्रय किया गया था। इसे 25 किलोमीटर दूर पैदल मार्ग से ले जाया जाना था एवं इसे 25 किलोमीटर दूर पैदल मार्ग में सूखे दूध या स्कीम्ड मिल्क का नाम उल्लेख नहीं हो पाने के कारण ऐसा हुआ, क्योंकि बिल में केवल दूध का उल्लेख किया गया है। इस कारण से भ्रम उत्पन्न हुआ। इस बिंदु पर जिलाधिकारी को कोई खास त्रुटि नजर नहीं आई।

पिंडर घाटी में आपदा पीड़ितों को खाद्य सामग्री एवं अन्य आवश्यक वस्तुएं आपूर्ति करने के लिए वायुसेना का एमआई-17 हैलीकॉप्टर 24 जून 2013 से 9 जुलाई 2013 तक कुल 15 दिन बागेश्वर में रहा। इसमें वायुसेना के विंग कमाण्डर, फ्लाइंग ऑफिसर एवं ग्राउंड ड्यूटी स्टाफ सहित कुल 14 अधिकारी एवं कर्मचारी तैनात रहे थे। जिन्हें कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह में कुल 7 कक्ष उपलब्ध कराए गए थे। इन कक्षों का किराया 800-900 प्रतिकक्ष, प्रतिदिन की दर से 91 हजार 500 का भुगतान किया गया। यहां अधिकारियों, कर्मचारियों ने मटन, चिकन एवं स्वीटडिश का भरपूर स्वाद लिया। जिसके लिए प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 500 रुपए का भुगतान किया गया। इस एवज में एक लाख 9 हजार 739 रुपये का भुगतान किया गया। हद तो तब हो गई जब तहसील कपकोट से उपलब्ध कराए गए बिल फर्जी पाए गए। इन बिलों में आधा किलो दूध की कीमत 194 रुपये दर्शाई गई थी। इसी के साथ ही बागेश्वर में राहत राशि वितरण में भी अनियमितता सामने आई। कपकोट के तहसीलदार को जो 12 लाख के बिल राहत राशि के उपलब्ध कराये गए थे उनमें एक ही व्यक्ति को दो-दो बार राहत राशि दे दी गई। उदाहरण के लिए पार्वती देवी पत्नी नंदन सिंह को एक ही दिनांक 11 फरवरी 2014 को 5,000 के दो चेक दिए गए। चेक संख्या- 323552 तथा चेक संख्या- 323553 दो बार आवंटित दर्शाई गई है। ऐसे में राहत राशि का वितरण संदिग्ध है। खुद सूचना आयोग ने इस बात की आशंका व्यक्त की गई है कि राहत राशि के नाम पर घपला हो सकता है। जिसकी जांच कराई जानी जरूरी है। साथ ही आयोग ने यह भी शंका जाहिर की है कि आपदा पीड़ितों का पैसा बांटा भी गया है या नहीं?

राहत राशि के वितरण में मुख्य रूप से यह उल्लेख किया गया है कि एक ही नाम के दो व्यक्ति को एक ही दिन में एक ही एक ही राहत मद के दो-दो चेक भुगतान किए गए। इस पर जिलाधिकारी द्वारा जांच के बाद यह स्पष्ट किया गया कि नंदन सिंह नाम से ही दो अलग-अलग परिवार हैं जहां राहत राशि के चेक इन दो अलग-अलग परिवारों को दिए गए न कि एक ही परिवार को। साथ ही यह भी लिखा गया कि आयोग ने बिल आवश्यक जांच के यह मान लिया कि राहत राशि के वितरण में त्रुटियां की गई हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि बागेश्वर में कोई भी अनियमितता प्रकाश में नहीं आई है।

उत्तरकाशी : आपदा आने से पहले ही बना दिए गए बिल

16 और 17 जून 2013 को जब आधी रात को उत्तराखण्ड में आपदा आई तब तक किसी को भी अंदेशा नहीं था कि वह रात के अंधेरे में काल के गाल में समा जाएंगे। लेकिन दूसरी तरफ उत्तरकाशी में प्रशासन को पहले से ही पता चल गया कि आने वाले कल में आपदा आएगी और देखते ही देखते लाखों रुपए की खाद्य सामग्री खरीद ली गई। क्या यह संभव है? न जाने उत्तरकाशी प्रशासन के पास ऐसा कौन सा यंत्र था, जिसके जरिए उन्होंने आपदा से पीड़ित लोगों को भूख से बचाने के लिए पहले ही खाद्य सामग्री खरीद ली? उत्तरकाशी जिला कार्यालय से प्राप्त आपदा प्रभावितों को कराए गए भोजन से संबंधित बिल पूरी तरह से फर्जी पाए गए हैं, क्योंकि आपदा के उपरांत 17 जून 2016 से 26 जून 2013 तक के खाना खिलाने के सभी बिल 16 जून 2013 की तिथि में ही बना दिए गए। आपदा पीड़ित भूखे लोगों के खाने के नाम पर भी पैसे डकारे गए। हालांकि जिला प्रशासन ने खाद्य सामग्री के नाम पर आपदा के एक दिन पहले ही जो फर्जी बिल बनाए उनको यह कहकर खिरज कर दिया गया कि 16 जून 2013 को ही जिले में बाढ़ एवं अतिवृष्टि से होने वाले संकट की सूचनाएं प्राप्त हो रही थी। जिसके चलते एक दिन पहले खाने- पीने की समुचित व्यवस्था की गई। इसमें पानी, बिस्कुट, ग्लूकोज, खाना दूध, फल एवं टैंट आदि की खरीद की गई। यही नहीं, बल्कि होटल में रहने एवं खाने के बिल तक फर्जी बनाए गए। 16 एवं 17 जून 2013 को जनपद में आई आपदा के बाद गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर लाखों यात्री फंसे थे। जिनके खाने एवं ठहरने की व्यवस्था होटलों में की गई। इस दौरान होटल विजय लॉज डुण्डा, होटल देवगंगा रिसोर्ट मनेरी, होटल मनेरी लेक, होटल टूरिस्ट लॉज मनेरी, होटल श्री कृष्ण मनेरी एवं गंगा दर्शन मनेरी में 50 से अधिक यात्रियों को ठहराया गया। जिनके बिलों में दिनांक तो अंकित है, लेकिन संबंधित होटल में रुकने वाले व्यक्ति का नाम एवं खाना खाने वाले व्यक्ति का नाम और पता तक अंकित नहीं है।

जनपद उत्तरकाशी में आपदा आने से एक दिन पहले ही 16 तारीख को खाने-पीने की सामग्री के क्रय पर जिलाधिकारी द्वारा स्पष्ट किया गया कि 16 तारीख को एक बजे के बाद से नदियों के जलस्तर में वृद्धि एवं सड़क मार्गों के अवरुद्ध होने की सूचनाएं कंट्रोल रूम में प्राप्त हो रही थी। यात्रियों को सुरक्षित स्थानों एवं राहत कैम्पों में रखना प्रारंभ कर दिया गया था। इसी के लिए खाद्य सामग्री का क्रय हुआ। इसके साथ ही होटलों के बिलों पर कहा गया कि उत्तरकाशी में भी वायुसेना, सेना, एवं राज्य के अधिकारियों-कर्मचारियों एवं यात्रियों पर यह क्रय हुआ। जो 21 दिनों की अवधि के लिए 4 लाख 70 हजार का बिल था, यह किसी भी दृष्टि से अनियमित नहीं कहा जा सकता है।

 

चमोली : स्कूटर में भरा दिया 30 लीटर डीजल

आपदा के नाम पर वाहनों में डीजल-पेट्रोल भरवाने पर बड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं। चमोली जिले के परिवहन विभाग ने एक अजब कारनामा कर दिखाया। जिसके अनुसार 30 जून 2013 को वाहन संख्या यूए12-0310 में 40 लीटर डीजल भराने का बिल बनवा दिया गया। लेकिन फर्जी बिल बनवाते समय यह भी ध्यान नहीं दिया गया कि उक्त वाहन कोई कार या बस नहीं बल्कि एक स्कूटर है। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि उक्त नंबर का वाहन बजाज चेतक स्कूटर है जो कि पेट्रोल से चलता है न कि डीजल से। मामला पेट्रोल से चलने वाले वाहन में डीजल भरवाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जिस स्कूटर में महज 8 लीटर तेल तक भराया जा सकता है उसमें 30 लीटर डीजल भरा हुआ दिखा दिया गया। इसी तरह 23 जून 2013 के दिन वाहन संख्या यूके08टीए 0844 में 30 लीटर डीजल डलवाना दर्शाया गया है। जबकि यह वाहन कोई कार या बस नहीं, बल्कि पैसेंजर थ्री व्हीलर है। चौंकाने वाली बात यह है कि एक ऐसे वाहन में 30 लीटर डीजल भरवा दिया गया जो कि एजेंसी से बाहर ही नहीं निकला था। यानी की वह ए/एफ था और कंपनी से उसकी बिक्री भी नहीं की गई। घपले में जांच होने पर इसकी पुष्टि हुई। 5 जुलाई 2013 को आपदा कंट्रोल के जोशीमठ प्रभारी राजीव रंजन ने बकायदा उक्त ए/एफ वाहन को 30 लीटर तेल की पर्ची का बिल बनाया है। 23 जून 2013 के डीजल एवं पेट्रोल के बिलों से लगता है कि अधिकतर वाहनों में ईंधन नहीं डलवाया गया। एक वाहन संख्या यूए07,2935 में 30 लीटर डीजल डलवाना दर्शाया गया है जबकि यह एक मोटर साइकिल का नंबर है। जिसकी पुष्टि परिवहन विभाग देहरादून द्वारा की जा चुकी है। पहली बात तो मोटर साइकिल डीजल से नहीं पेट्रोल से चलती है। इसी के साथ उसके तेल की टंकी की क्षमता भी 10 लीटर तक होती है। ऐसे में 30 लीटर डीजल मोटर साइकिल में भरवाने का कारनामा आश्चर्यचकित करने वाला है। इसी तरह 29 जून 2013 को एक वाहन संख्या यूए07ए, 0881 में 25 लीटर डीजल तथा यूके05ए, 0840 में 15 लीटर डीजल डलवाना दर्शाया गया। ये दोनें ही वाहन मोटर साइकिल हैं। उपजिलाधिकारी जोशीमठ के नाम से दिनांक 21 जून 2013, 30 जून 2013 एवं 9 जुलाई 2013 को डीजल के 51 हजार 795, 49 हजार 329 तथा 24 हजार 733 के बिल दर्शाए गए थे। लेकिन इन रुपयों से किन वाहनें में तेल भरवाया गया यह नहीं दर्शाया गया है। उक्त मामलों को मानवीय भूल करार देकर मामले को मैनेज करने की कोशिश की गई है। तहसील जोशीमठ के नाम से 3200 का कम्प्यूटर काटेज का बिल लगाया गया इसमें दिनांक ही अंकित नहीं है। इसी के साथ उपजिलाधिकारी के नाम से गढ़वाल विकास निगम जोशीमठ, चमोली में 15 दिन रहने का बिल 4 लाख रुपया दर्शाया गया है। इसमें पूर्णतः घोटाले की आशंका है। लेकिन इसकी कोई जांच नहीं हुई।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कर्णप्रयाग के कानूनगो, तहसीलदार और रजिस्ट्रार आदि के द्वारा डेढ़ माह पूर्व के आपदा के ईंधन बिल पेश किए गए। यह बिल 7 मई 2013, 23 मई 2013, 1 जून 2013 तथा 10 जून 2013 की तिथियों के हैं। ऐसे ईंधन बिलों का भुगतान घोटाले की ओर इशारा करता है। इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि इन बिलों का भुगतान 20 फरवरी 2014 को किया गया । पहले तो इन ईंधन बिलों को आपदा के नाम पर दर्शाया गया। इसके बाद जब यह साफ हो गया कि यह बिल आपदा से डेढ़ माह पूर्व के हैं, तो इनका भुगतान मुख्यमंत्री राहत कोष से करा दिया गया जो कि घोटाले पर घोटाला है। यही नहीं बल्कि कर्णप्रयाग के उप जिलाधिकारी को जिला युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल अधिकारी द्वारा 19 मई 2013, 25 मई 2013, 26 मई 2013 और 4 जून 2013 को होटल एवं लॉजिंग के बिल 26 जुलाई 2013 के दिन प्रस्तुत किए गए। इस प्रकार आपदा के एक माह पूर्व ही आपदा व्यवस्था के बिल दर्शाए गए और उनका भुगतान कर दिया गया। डेक्कन हेलीकॉप्टरों की सेवा के नाम पर भी घोटाले की सूचनाएं प्राप्त हुई। डेक्कन हैलीकॉप्टर के उत्तरी क्षेत्र प्रबंधक दीप के. शर्मा द्वारा सिर्फ 4 दिन हैलीकॉप्टर उपयोग के बिल 98 लाख 8 हजार का भुगतान किए गए। यह एक हैलीकॉप्टर कंपनी को अनुचित फायदा पहुंचाने की योजना के तहत किया गया गैरकानूनी कार्य कहा जाएगा। आपदा के मद में घोटाले किस तरह किए गए इसे बरसाती रैनकोट वितरण मामले से समझा जा सकता है। क्या एक ही दुकान में एक हजार 800 बरसाती रैनकोट रखे हो सकते हैं। आपका जवाब होगा कि ऐसा तो गोदामों में भी नहीं हो सकता है। वहां भी 100-200 बरसाती या रैनकोट ही रखे रहते हैं। लेकिन बद्रीनाथ की एक दुकान के बिलों को देखें तो ऐसा अनोखा काम हुआ और गोपेश्वर के परियोजना निदेशक ने यह अद्भुत काम कर दिखाया यानी कि एक ही दुकान से 1800 रैन कोट खरीद लिए गए। जिनके 36000 के बिल भुगतान कर दिए गए। हालांकि इस कारनामे को जांच में तात्कालिक दृष्टि से आवश्यक बताकर क्लीन चिट दे दी गई।

क्लीन चिट एक इसी मामले में नहीं, बल्कि लगभग सभी मामलों में दे दी गई है। जांच रिपोर्ट के अंतिम पैरा में स्पष्ट लिखा गया है कि सभी बिन्दुओं का परीक्षण करने पर यह स्पष्ट हुआ कि लगभग सभी मामलों में उठाए गए बिंदुओं में घपले-घोटाले या अनियमितता जैसी कोई बात नहीं है। सभी मामलों में राहत बचाव कार्य के लिए तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप सभी वस्तुओं, सामग्रियों, सेवाओं का उपयोग किया गया है तथा उनका भुगतान भी अनियमित नहीं कहा जा सकता है। जिला पिथौरागढ़ एवं चमोली में सूचना अधिकार में दी गई सूचना एवं मूल अभिलेखों में सूचना में अंतर की स्थिति प्रकाश में आई है। इसमें जिलाधिकारी को दी गई सूचना में गड़बड़ी जरूर दिखी। जिससे भ्रम की स्थिति माना। इसी के साथ दोनों जिलों में हुई त्रुटियों को अलग-अलग जांच कर दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को चिन्हित कर अनुशासत्मक कार्यवाही की संस्तुति की गई है। इसके लिए गढ़वाल एवं कुमाऊं के आयुक्त को इस बिंदु पर आगे कार्यवाही के लिए निर्देश दिए जाने को उचित करार देकर इतिश्री कर दी गई है।

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