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Uttarakhand

श्रमिकों के हितों के दावे और ईएसआई का भुगतान नहीं

एक ओर राज्स सरकार प्रदेश के श्रमिकों के हितां के बड़े-बड़े दावे कर रही है तो वहीं दूसरी ओर श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए चलाई जा रही स्वास्थ्य योजनाओं पर ही सरकार की लापरवाही सामने आ रही है। प्रदेश में श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित कर्मचारी स्वास्थ्य योजना यानी ईएसआई के संचालन को लेकर राज्य सरकार का ढुलमुल रवैया सामने आ रहा है। इस अतिमहत्वपूर्ण योजना के तहत शामिल अस्पतालों के करोड़ों के भुगतान को राज्य सरकार द्वारा जारी ही नहीं किया गया है। इसके चलते ईएसआई पैनल में शामिल कई अस्पतालों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इनमें सबसे ज्यादा बुरा हाल छोटे अस्पतालों के हो चुके हैं जिसके कारण मौजूदा हालात में इन अस्पतालों के पास अपने चिकित्सकों और अन्य स्टाफ को वेतन तक देने के लाले पड़ गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्य सरकार को तकरीबन 100 करोड़ रुपए ईएसआई पैनल में शामिल अस्पतालों का भुगतान करना है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कोरोना संकट के दौरान भी राज्य सरकार और शासन अभी तक यह भुगतान नहीं कर पा रहा है।

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार देशभर में श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना ईएसआई का संचालन करती है। इस योजना में केंद्र सरकार राज्यों को धनराशी मुहैया करवाती है। जिसमें केंद्र सरकार 12 फीसदी धनराशी राज्य सरकार को इस योजना के संचालन के लिए देती है।

ईएसआई योजना में राज्यों में डिस्पेस्रियां स्थापित हैं जिसमें मरीज का उपचार किया जाता है लेकिन ज्यादातर डिस्पेंसरियां सुविधाविहीन होने के चलते आज भी उन अस्पतालों जो कि इस योजना के पैनल में श्िमल किए गए हैं, में उपचार के लिए रेफर किए जाते हैं। इन्हीं रेफर अस्पतालों को मरीज के उपचार का भुगतान राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।

प्रदेश में स्वास्थ्य बीमा की दो बड़ी योजनाएं चलाई जा रही है। जिसमें केंद्र सरकार पूर्ण रूप से संचालित आयुष्मान भारत योजना है और दूसरी उत्तराखण्ड सरकार द्वारा अटल आयुष्मान योजना है। दोनों ही योजनाओं में पांच लाख तक का इलाज किए जाने का प्रावधान है। यह दोनों ही योजनाएं मुफ्त हैं लेकिन ईएसआई योजना पूर्णतः स्वास्थ्य बीमा योजना के ही तरह संचालित की जाती है। जिसमें कर्मचारी और श्रमिकों से प्रतिमाह एक निश्चित धनराशी उसके वेतन से काट ली जाती है और इस धनराशी का 1-79 प्रतिशत कर्मचारी या श्रमिक के नियोक्ता द्वारा केंद्र सरकार को दिया जाता है। इस तरह से इस योजना में राज्य सरकार के लिए बहुत ज्यादा धनराशी देने का बोझ भी नहीं पड़ता। बावजूद इसके आज ईएसआई अस्पतालों का 100 करोड़ का भुगतान लंबित है जबकि राज्य सरकार इस मामले में केंद्र सरकार से सामंजस्य करके आसानी से इन अस्पतालों का भुगतान कर सकती है।

इस पूरे मामले में एक बात यह भी देखने में आ रही है कि राज्य सरकार का पूरा फोकस अटल आयुष्मान योजना को लेकर ही है जिसके चलते ईएसआई योजना में सरकार और सरकारी मशीनरी द्वारा ढिलाई बरती जा रही है। जिसके चलते अब कई अस्पतालों ने ईएसआई पैनल से अपने आप को अलग करने का भी निर्णय ले लिया है।

कोरोना संकट के दौरान केंद्र सरकार जल्द से जल्द ईएसआई अस्पतालों का भुगतान किए जाने का आदेश भी जारी कर चुकी है लेकिन जिस तरह से हालात प्रदेश में दिखाई दे रहे हैं उससे तो नहीं लगता कि इस पर कोई ठोस निर्णय हो पाएगा। वैसे राजनीतिक तौर पर ईएसआई योजना हमेशा से ही राजनीति का शिकार भी रही है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय में भी हरिद्वार में ईएसआई अस्पताल की स्थापना के मामले में जमकर राजनीति हुई यहां तक कि अस्पताल के लिए भूमि का चयन तक नहीं हो पाया। वर्तमान में कोटद्वार में बड़ा और आधुनिक सुविधाओं का एक ईएसआई अस्पताल का निर्माण आरंभ हो चुका है, जबकि देहरादून में ईएसआई अस्पताल के निर्माण योजना का कोई अता-पता तक नहीं है। माना जाता है कि प्राइवेट अस्पतालों की एक बड़ी लॉबी हमेशा से ईएसआई अस्पताल के निर्माण का विरोध करती रही है और इसके लिए राजनीतिक दबाव बनाए जाने की चर्चाएं भी सामने आ चुकी है। संभवतः भुगतान के मामलो में भी ऐसा ही कुछ होने की आंशकाएं जताई जा रही है। अब देखना यह होगा कि कब तक श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए चलाई जा रही इस योजना का भुगतान हो पाता है।

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