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Uttarakhand

मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट या भ्रष्टाचार के प्लान

वैसे तो प्रदेश में सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर घोटाले और अनियमिताओं के आरोप लगते रहे हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट खुले में शौच मुक्त और स्किल इंडिया प्रोजेक्ट यानी कौशल विकास मिशन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पहले ही लग चुके हैं। लेकिन अब इस की पकड़ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के ड्रीम प्रोजेक्टां तक में हो चुकी है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर क्या कारण हैं कि राज्य में चलाए जा रहे ड्रीम प्रोजेक्टां पर ही सबसे ज्यादा विवादों की छाया और घोटालां के आरोप लग रहे हैं।

हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा चलाई जा रही सोलर ऊर्जा परियोजना में भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं। हैरत की बात यह है कि स्वयं मुख्यमंत्री के सामने ही मामलां की पोल खुली तो उन्हें कड़ी कार्यवाही करने का आदेश जारी करना पड़ा जिसमें उत्तरकाशी के जिला सहकारी बेंक के महाप्रबंधक को घूस लेने के आरोप में निलंबित किया गया।

दरअसल, यह मामला बेहद ही दिलचस्प है। राज्य सरकार सौर ऊर्जा योजना के तहत उत्तरकाशी के अमोद पंवार को सरकार ने सौ किलोवाट सौर ऊर्जा का प्रोजेक्ट पास किया था। जिसके निर्माण के लिए सरकार से सहकारी विभाग और सहकारी बैंकों को जरूरी ऋण की व्यवस्था के लिए अधिकृत किया है। यानी पर्वतीय जिलों में सौर ऊर्जा योजना के लिए विकासकर्ताओं को सहकारी बैंकों से ऋण दिए जाने की व्यवस्था लागू की गई।
इसी के तहत आमोद पंवार ने उत्तरकाशी जिला सहकारी बैंक से ऋण के लिए आवेदन किया। सहकारी विभाग ने अमोद पंवार का 80 लाख का ऋण स्वीकृत किया जिसमें जिला सहकारी बैंक उत्तरकाशी से पवार को 40 लाख का ऋण दिया जाना था।

आमोद पंवार का आरोप है कि जिला सहकारी बैंक उत्तरकाशी के महाप्रबंधक सुरेंद्र प्रभाकर ऋण को लटकाने का काम किया और इसके लिए मोटी रकम रिश्वत के तौर पर मांग की गई। अरोप तो यहां तक लगाए गए कि रिश्वत की धनराशी को उच्चाधिकारियों तक हिस्सा पहुंचाने तक की बात बैंक महाप्रबंधक द्वारा कही गई।

अखिरकार आमोद पंवार ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत औेर सहकारिता राज्य मंत्री धनसिंह रावत से की। इस पर मुख्यमंत्री ने तुरंत सहकारिता विभाग की बैठक बुलाकर सारे मामले को अपने सामने सुना। विधानसभा में हुई बैठक में सहकारिता विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ शिकायतकर्ता आमोद पंवार को भी शामिल किया गया। जानकारी के अनुसार आमोद पंवार ने बैठक में मुख्यमंत्री से साफ तौर पर कहा कि उत्तरकाशी जिला सहकारी बैंक के महाप्रबंधक सुरेंद्र प्रभाकर ने 4 लाख रुपए रिश्वत की मांग की।

सूत्र बताते हैं कि इस आरोप पर मुख्यमंत्री बेहद नाराज हुए और सहकारिता राज्यमंत्री धन सिंह रावत से कड़ी कार्यवाही करने को कहा। इस पर धनसिंह रावत ने सुरेंद्र प्रभाकर को निलंबित करने के आदेश दिए और मामले की जांच के आदेश भी जारी किए। अब मामले की जांच के लिए सहकारी विभाग के अपर निदेशक निबंधन आनंद शुक्ला को जांच अधिकारी बनाया गया है।

भले ही यह मामला मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस की नीति के खिलाफ मजबूत उदाहरण दिखाई दे रहा हो मगर सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्टों पर ही भ्रष्टाचार की छाया बन रही है। एक के बाद एक ड्रीम प्रोजेक्टों पर विवाद और घोटालों के आरोप से साफ होता है कि राज्य में नौकरशाही और विभागीय अधिकारी इतने निरंकुश हो चुके हैं कि मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्टों से भी भ्रष्टाचार करने से नहीं चूक रहे।

मुख्यमंत्री के कई प्रोजेक्टों को ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर जमकर चर्चित किया जाता रहा है। देहरादून शहर को पेयजल संकट से दूर करने के लिए सरधार झील योजना को भी मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर चर्चित किया गया। लेकिन अभी तक यह योजना पूरी नहीं हो पाई है और इस योजना में भी आरोप लग हैं। मुख्यमंत्री ने इस योजना की घोषणा की उससे कुछ ही समय पूर्व उनके ही एक मित्र ने सुरधार में जमीनों की जमकर खरीदारी की है। इससे आरोप लगा कि योजना व्यक्ति विशेष के हितों को फायदा पहुंचाने के लिए लाई गई है।

इसी तरह रायपुर और थाने रोड पर तीन पुलों के निर्माण को भी मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर प्रचार किया गया। यह तीनों पुल मुख्यमंत्री की विधानसभा क्षेत्र डोईवाला में आते हैं। लेकिन इन पुलों में से एक पुल बड़ासी पुल की रिटर्निंग वाला उदघाटन के तुरंत बाद ही दरार आने से पुल को गंभीर खतरा पेदा हो गया। आरोप लगा कि पुल के निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग कर बड़ा घोटाला किया गया था। मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट के मामले में घोर लापरवाही और घोटाले से मुख्यमंत्री की नाराजगी की खबरें भी खूब आई और मामले में कार्यवाही भी की गई।

अब एक और ड्रीम प्रोजेक्ट सोर ऊर्जा को लेकर विवाद ओैर भ्रष्टाचार के मामले सामने आ चुके हैं। वैसे तो यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के चलते उत्तराखण्ड को नसीब हुआ है लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी व्यक्तिगत तौर पर इस प्रोजेक्ट को लेकर खासे उत्साहित रहे हैं। मुख्यमंत्री इस योजना को पर्वतीय क्षेत्रों के बेरोजगार युवाओं को राजगार से जोड़ने के लिए एक बहुत बड़ा माध्यम मानकर इसमें छूट आदी देने का प्रावधान भी कर चुके हैं।

वर्तमान में सरकार ने दस जिलों में 25 से 50 किलोवाट के सौर ऊर्जा प्लांट लगाए जाने की छूट दे दी गई है, जबकि पहले राज्य में अधिकतर रूफ टॉप सोलर योजना पर ही सरकार का फोकस बना हुआ था। साथ ही सौ किलो वाट योजना को बड़े प्रोजेक्ट पर सरकार का अमला लगा हुआ था। पंरतु पर्वतीय क्षेत्रों में 100 किलोवाट का प्रोजेक्ट लगाना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए भूमि की अधिक आवश्यकता के साथ-साथ खर्च भी बहुत आता है।

उत्तरकाशी के अमोद पंवार को 100 किलोवाट के लिए 80 लाख का खर्च था जबकि पूरे प्रोजेक्ट के आरंभ होने तक लागत में और भी इजाफा होना तय माना जा रहा था। इसी के चलते अब कम भूमि और कम खर्च पर लगाए जा सकने वाले 25 से 50 किलोवाट के प्रोजेक्टों पर सरकार का फोकस बना हुआ है। सरकार इन प्रोजेक्टों के निर्माण के लिए विकासकर्ताओं को सहकारी बैंक से ऋण दिए जाने की व्यवस्था भी कर रखी है।

अब इस ड्रीम प्रोजेक्ट की हकीकत को देखें तो 100 किलोवाट के तकरीबन 208 विकासकर्ता के 203 प्रोजेक्ट दस जिलों में आंवटित हुए हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाए हैं। इसका एक ही कारण बताया जा रहा हे, प्रदेश के सिस्टम की सुस्त चाल और ऋण देने में बैंकों की आनाकानी के चलते यह प्रोजेक्ट आरंभ ही नहीं हो पाए हैं। जानकारी के अनुसार अभी तक 100 विकासकर्ता बैंक ऋण पाने के लिए ही चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उनका ऋण पास ही नहीं हो पाया है। जानकारी के अनुसार इसी तरह से तकरीबन 75 फीसदी विकासकर्ता अपना पावर पर्चेज एग्रीमेंट तक भी तक भी नहीं पहुंच पाए हैं।

वैसे इस योजना पर कोविड-19 की मार भी पड़ी है। अब अनलॉक के दूसरे चरण के बाद इसमें तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन इस पूरे मामले में एक बात तो साफ हो गई है कि केवल मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर किसी परिजोजना का सफल होना कोई एक पैमाना नहीं हो सकता। जबकि इसके लिए जो धरातलीय कार्यवाही सरकार को करना चाहिए वह नहीं हो पा रही है। आज भी जमीनों के लैंड यूज चेंज के अलावा जमीनों की उपलब्धता और करार सरकारी सिस्टम की धीमी चाल को सरकार द्वारा हस्तक्षेप कर आसानी से दूर किया जा सकता है। लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। हालांकि अब इस योजना में अधिकारियों के भ्रष्टाचार के मामले तक खुल गए हैं और मुख्यमंत्री द्वारा इस पर कार्यवाही तक की गई है। लेकिन क्या आने वाले समय में किसी अन्य अमोद पांवार को भी सरकारी सिस्टम और अधिकारियों से परेशान नहीं होना पड़ेगा। यह सवाल भविष्य के गर्भ में है।

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