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Uttarakhand

गैरसैंण में जमीन लेने से पहले वहां की हकीकत नहीं देख पाए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गैरसैंण में जमीन खरीदने की बात पर भाजपा और उसके नेता इसे उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में विकास की नई इबारत लिखने का प्रचार करते नहीं थक रहे हैं। मानो मुख्यमंत्री के गैरसैंण में जमीन खरीदने से अब पर्वतीय क्षेत्रों में जबर्दस्त विकास की नई बयार बहने वाली हो, जबकि राज्य बनने के 20 वर्ष बाद भी गैरसैंण के हालात बद से बदतर ही हैं। जिस गैरसैंण को लेकर मुख्यमंत्री उत्साहित दिखाई दे रहे हैं उसी गैरसैंण के एक मात्र स्वास्थ्य केंद्र में 20 वर्षीय गर्भवती महिला केवल इस कारण मौत के मुंह में चली जाती है कि उस अस्पताल में कोई सुविधा नहीं थी। यहां तक कि 12 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन दो ही काम कर रहे हैं। यह उसी गैरसैंण की हालत है जिसको बदलने के लिए मुख्यमंत्री ने आसान तरीका यह निकाला है कि वहां एक अदद जमीन का टुकड़ा खरीद लिया जाए तो सब कुछ बेहतर हो जाएगा।

दरअसल, विगत 17 अगस्त को गैरसैंण ब्लॉक के बछुआबांण क्षेत्र के कंडारीखेड़ गांव की एक 20 वर्षीय गर्भवती युवती हीरा देवी को उनके परिजन गैरसैंण के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाए थे। बताया जा रहा है कि जब युवती को अस्पताल में लाया गया तो वह स्वस्थ थी और शायद आने वाली संतान को लेकर भी उत्साहित थी। लेकिन 18 अगस्त को हीरा देवी की अचानक मौत हो गई और उसके साथ ही उसके अजन्मे बच्चे की भी मौत हो गई। चिकित्सकों द्वारा कहा गया कि हीरा देवी को हार्ट अटैक आया है जिसके चलते उसकी मौत हुई है। हालांकि परिजनों का कहना है कि हीरा की मौत डॉक्टरां की लापरवाही से ही हुई है।

हीरा देवी की मौत कैसे हुई यह तो जांच का विषय है। शायद जांच से ही कुछ निकलकर आएगा कि किस तरह से एक दिन पूर्व स्वस्थ गर्भवती महिला अस्पताल में भर्ती होती है और दूसरे ही दिन जच्चा-बच्चा दोनों की अचानक मौत हो जाती है। लेकिन इस तरह से हीरा देवी की मौत का एक मात्र कारण है कि आज भी पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवा की भारी कमी। हो सकता है प्रसव जैसे गंभीर मामलों में कुछ चिकित्सीय जटिलता हो सकती है, लेकिन हैरानी इस बात की है कि गैरसैंण के एक मात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव से संबंधित कोई सुविधा नहीं थी। यहां तक कि गायनोलॉजिस्ट और सर्जन तक अस्पताल में मौजूद नहीं थे।

सबसे ज्यादा दुर्भागय यह है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सकों के 12 पद स्वीकृत किए गए हैं, लेकिन केवल दो ही डॉक्टर काम कर रहे हैं। सर्जन, फिजिशियन, पैथोलॉजिस्ट, ऐनेस्थिटिक और ऑर्थोपेडिक्स का एक भी डॉक्टर इस अस्पताल में कार्यरत नहीं है।

गैरसैंण में 18 अगस्त को इलाज के दौरान मौत मामले में सरकार का पुतला फूंका

 

चमोली जो कि चारधाम यात्रा का अति महत्वपूर्ण जिला है और उत्तराखण्ड के अराध्य देव भगवान बदरीनाथ इसी जिले के बदरीपुरी में स्थापित हैं। लेकिन जिले में संसारिक भगवानों यानी चिकित्सकों की कमी हमेशा से ही बनी रही है। राज्य बनने के बाद तो हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते ही गए हैं। एक तरह से कहा जाए तो चमोली जिला ईश्वर से तो भरपूर है, लेकिन डॉक्टरों से महरूम है, यह कहना गलत नहीं होगा।

यहां के हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे जिले में एक भी नेत्र चिकित्सक और नेत्र सर्जन कार्यरत नहीं है। राष्ट्रीय अंधता निवारण कार्यक्रम को नाम मात्र के लिए चलाए जाने के लिए देहरादून से डॉक्टर को बुलाया जाता है। जब राष्ट्रीय कार्यक्रम के संचालन के लिए इस कदर हालात बना दिए गए हैं तो अन्य सुविधाओं या रोगों से लड़ने के लिए क्या हालात होंगे, इससे समझा जा सकता है।

गर्भवती युवती हीरा देवी की मौत पर प्रदर्शन करते लोग

 

पूरे चमोली जिले में मात्र दो ही सर्जन हैं। कर्णप्रयाग और गोपेश्वर स्थित एक-एक ट्रामा सेंटर स्थापित किया गया है, लेकिन दोनों ही जगह अभी तक किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। इसलिए ट्रामा सेंटर के नाम पर केवल भव्य भवनों से ही काम चलाया जा रहा है। यहां एक मात्र गायनोलॉजिस्ट कार्यरत है, लेकिन जिले में एक भी अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट पद पर कोई कार्यरत नहीं है। हैरानी इस बात की होगी कि कार्डियोलॉजिस्ट के पद पर श्रीनगर मेडिकल कॉलेज तक में कोई नहीं है, तो जिले के अस्पतालों में कैसे हो सकता है। यह भी आसानी से समझने वाला सवाल है।

इंद्रेश मैखुरी

वरिष्ठ पत्रकार और आईसा संगठन के गढ़वाल प्रभारी इंद्रेश मैखुरी ने चमोली जिले और गैरसेंण में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। साथ ही गैरसैंण के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में गर्भवती युवती हीरा देवी की संदिग्ध मौत पर जांच करवाने और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही करने का भी उल्लेख किया है। अब इस मामले को लेकर स्थानीय जनता में खासा रोष फैल चुका है। सरकार के खिलाफ जनता में खास तौर पर गैरसैंण में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी होने के बावजूद सरकार का इस ओर कोई ध्यान न देने पर भी नाराजगी बनी हुई है। सोशल मीडिया में मुख्यमंत्री को गैरसैंण में जमीन खरीदने से लेकर उन पर अस्पतलों की दुर्दशा को न देखने पर तंज कसा जाने लगा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री गैरसेंण में जमीन खरीदने के बाद कब तक यहां की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दे पाते हैं, क्योंकि स्वास्थ्य विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के ही पास है।

 

 

 

विगत 15 अगस्त को स्वतंत्रा दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन परिसर में ध्वजारोहण करने पहुंचे थे। तब जिले का पूरा सरकारी अमला उनके साथ मौजूद था। नियमानुसार मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में मुख्य जिला चिकित्साधिकारी और कई चिकित्सक भी मौजूद रहते हैं। लेकिन हैरानी इस बात की है कि मुख्यमंत्री ने गैरसेैंण के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में यह देखने की आवश्यकता नहीं समझी कि इस अस्पताल में 12 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं और केवल दो ही काम कर रहे हैं। अगर उसी समय इस मामले में कार्यवाही की जाती तो शायद गर्भवती हीरा देवी और उसके अजन्मे बच्चे को बचाया जा सकता था।

 

बात अपनी-अपनी

जमीन खरीदने के बजाय मुख्यमंत्री गैरसैंण की जमीनी हकीकत देख लेते तो ज्यादा अच्छा होता। स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के लिए मुख्यमंत्री गैरसैंण में गए, लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि गैरसैंण के अस्पतालों में डॉक्टर काम कर रहे हैं या नहीं। पूरे जिले के स्वास्थ्य सेवाओं के हाल बदहाल हो चुके हैं, लेकिन सरकार सिर्फ घोषणाएं ही कर रही है। युवती हीरा देवी और उसके अजन्मे बच्चे की मौत का जिम्मेदार अगर कोई है तो वह सरकार और शासन है। सरकार सबसे पहले दोषियों पर कार्यवाही करे और तुरंत ही पूरे के स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करे।
इंद्रेश मैखुरी, गढ़वाल प्रभारी आईसा

मुख्यमंत्री जी और भाजपा ने तो यह मान लिया है कि गैरसैंण में जमीन खरीदने से ही गैरसैंण के हालात बहुत अच्छे हो जाएंगे। लेकिन हालात किस तरह से हो रहे हैं, यह सब को पता चल रहा है। आज एक 20 साल की बच्ची की मौत इसलिए हो जाती है कि उसको कोई स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधाएं नहीं मिल पाई है। एक बच्ची की ही मौत नहीं हुई है उसके अजन्मे बच्चे की भी मौत भी हुई है। सरकार की नाकामी से ही दो-दो प्रणियों ने अपने जीवन से हाथ धोया है। इसके लिए केवल सरकार ही नहीं मुख्यमंत्री भी जिम्मेदार हैं। मुख्यमंत्री के पास स्वास्थ्य विभाग है और आज प्रदेश कोरोना से बदहाल हो चुका है तो वहीं पहाड़ां में डॉक्टर तक सरकार नहीं दे पाई है। सरकार पूरी तरह से फेल हो चुकी है।
आरपी रतूड़ी, पूर्व प्रवक्ता उत्तराखण्ड कांग्रेस

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