[gtranslate]
Uttarakhand

एयर एबुलेंस पर धोखा

एअर एम्बुलेंस सेवा को त्रिवेंद्र रावत सरकार ने अपनी बड़ी उपलब्धि बताकर प्रचारित किया, लेकिन हकीकत यह है कि केंद्र के भरोसे टिकी यह सेवा धरातल पर नहीं उतर सकी। केंद्र ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत एअर एम्बुलेंस का प्रस्ताव ठुकरा दिया

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने कार्यकाल में प्रदेश में एयर एम्बुलेंस शुरू करने को अपनी सरकार की उपलब्धि बताकर प्रचार किया था। यहां तक कि एम्स ऋषिकेश में भी एयर एम्बुलेंस का डोमो करवाकर वाहवाही लूटी थी। लेकिन केंद्र सरकार ने ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत एयर एम्बुलेंस के प्रस्ताव को ठुकराकर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के नागरिकों को एक बार फिर से निराश करने का काम किया है। हैरत की बात यह है कि राज्य सरकार अपने खर्च पर एयर एम्बुलेंस सेवा शुरू को करने की बजाय केंद्र सरकार को ही इसका प्रस्ताव भेजती रही, जबकि प्रदेश में 51 स्थाई हैलीपैड आपदा में राहत और बचाव के लिए 162 हैलीपेड़ों की सूची एसडीआरएफ द्वारा सरकार को दी जा चुकी है। इसके अलावा दो एयरपोर्ट और तीन हवाई पट्टियां भी मौजूद हैं। बावजूद इसके केंद्र सरकार ने एयर एम्बुलेंस के प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया। उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत किसी से छुपी नहीं है। सरकार के तमाम दावों और घोषणाओं के बावजूद दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों  में स्थापित स्वास्थ्य केंद्र और अस्पताल रेफर सेंटर बने हुए है। गंभीर मरीजों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर अस्पतालों में लाया जाता है, लेकिन वहां व्यवस्थाएं न होने के कारण उनको देहरादून आदि शहरों में रेफर कर दिया जाता है। जिसके चलते इलाज में देरी से मरीज की रास्ते में ही मौत हो जाती है।

प्रदेश में यह स्थिति किस कदर भयावह हो चुकी है इसका प्रमाण इस बात से ही चल जाता है कि कुमाऊं मंडल के मुन्सयारी में एक मरीज को जिला अस्पताल तक ईलाज के लिए गांव से पैदल लाया गया जिसमें तीन दिन का समय लग गया। इसी तरह से एक मामले में भी मरीज को अस्पताल तक लाने के लिए 40 घंटों का पैदल रास्ता तय करना पड़ा है। सबसे बुरे हालात तो गर्भवती महिलाओं और बुजुर्ग मरीजों के सामने आ चुके हैं। कई मामले ऐसे सामने आए हैं जिसमें गर्भवती महिलाओं को किसी तरह से कुर्सी पालकी आदि पर ढोकर मीलों दूर पैदल चल कर अस्पताल तक लाया गया। इसमें मौतें तक हो चुकी हैं। साथ ही रास्ते में ही प्रसव होने के मामले भी सामने आ चुके हैं। इसके लिए प्रदेश में एयर एम्बुलेंस सुविधा की मांग होती रही। हर बार सरकार और स्वास्थ्य विभाग इसके लिए तमाम दावे और घोषणा करता रहा है। लेकिन हकीकत में यह सुविधा केवल एक छलावा ही साबित हुई है।

निजी और प्राइवेट हैलीकाॅप्टर से भी मरीजों को अस्पताल में लाए जाने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन इसके लिए खर्चा भी मरीजों को ही देना पड़ा। पिछले वर्ष पिथौरागढ़ से एक मरीज को एम्स ऋषिकेश में इसी तरह से निजी हैलीकाॅप्टर से उपचार के लिए लाया गया था, लेकिन इसका पूरा खर्च भी मरीज से ही लिया गया, जबकि मरीज को हैलीपैड से स्वयं जिलाधिकारी ने बड़े तामझाम के साथ रवाना किया था। तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत सरकार ने इस बात को अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताकर जमकर प्रचार किया था। इसी तरह से एम्स ऋषिकेश में नए हैलीपैड निर्माण के समय भी प्रचार किया गया था और इसे उत्तराखण्ड के नागरिकों के स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया गया। हैरानी तो इस बात की है कि इस कार्यक्रम में एम्स प्रशासन के साथ-साथ केंद्रीय नागरिक उड्डयन सचिव और तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी मौजूद थे और मरीज को हैलीकाॅप्टर से एम्स में उतारे जाने के लिए सभी हरी झंडी दिखते हुए बड़े-बड़े दावे कर रहे थे। हालांकि किए कुछ अपवाद जरूर रहे हैं जिसमें सरकार द्वारा गणमान्य व्यक्तियों को हैलीकाॅप्टर द्वारा एम्स ऋषिकेश या देहरादून में इलाज के लिए लाया गया।

गैरसैेंण के वरिष्ठ पत्रकार और राज्य आंदोलनकारी पुरुषोत्तम असनोड़ा को राज्य सरकार द्वारा सरकारी सहायता से एम्स ऋषिकेश में इलाज के लिए लाया गया। हालांकि असनोड़ा को बचाया नहीं जा सका लेकिन इस तरह मामले कुछ ही अपवाद रहे हैं। पहाड़ी जिलों के आम नागरिक तो आज भी भगवान भरोसे ही हैं। राज्य में एयर एम्बुलेंस के लिए बुनियादी सुविधाएं जैेसे हैलीपैड की कोई कमी नहीं है। जानकारी के अनुसार सभी 13 पहाड़ी और मैदानी जिलों में हैलीपैड की सुविधाएं मौजूद हैं। इनमें देहरादून जिले में स्थाई और अस्थाई दोनों ही श्रेणी के 35 हैलीपैड है। बेहतर बात यह हेै कि जिले में देहरादून शहर में तीन तथा एम्स ऋषिकेश में एक और आपातकालीन स्थिति में आईडीपीएल में हैलीपैड है। देहरादून जिला पूरे प्रदेश में सरकारी और प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे अव्वल माना जाता है। ऊधमसिंह नगर में 16 स्थाई और 30 अस्थाई हैलीपैड हैं, तो हरिद्वार में प्रशासन के पास कोई अपना स्थाई हैलीपैड नहीं है लेकिन अस्थाई हैलीपैड की कोई कमी नहीं है। साथ ही बीएचएल और रुड़की आदि में भी हैलीपैड है जिनका प्रयोग जरूरत पड़ने पर किया जाता है।

पहाड़ी जिलों में पिथोैरागढ़ जिले में सबसे अधिक हैलीपैड हैं। जिनमें 7 स्थाई हैलीपैड और 75 अस्थाई हैलीपैड है साथ ही हवाई पट्टी भी पिथौरागढ़ जिले में है। इसी तरह से टिहरी जिले में स्थाई और अस्थाई श्रेणी के 69 हैलीपैड है, तो रुद्रप्रयाग जिले में 17 स्थाई हैलीपैड हैं और 4 अस्थाई हैलीपैड की भी सुविधा है। यहां तक कि केदारनाथ में एमआई 26 एवं एमआई 17 हैलीकाॅप्टरों के लिए हैलीपैड भी बनाए गए हैं। पौड़ी जिले में भी 3 स्थाई और 48 अस्थाई हैलीपैड की सुविधाए मौजूद हैं। चमोली जिले में केवल दो हैलीपैड हैं, लेकिन 6 स्थानों को जरूरत पड़ने पर हैलीपैड के तौर पर उपयोग किया जाता रहा है। इस तरह से चमोली जिले में भी हैलीपैड की सुविधा मानी जा सकती है। उत्तरकाशी जिले में 6 स्थाई और दो निर्माणाधीन हैलीपैड हैं तो 49 अस्थाई हैलीपैड की सुविधाएं मौजूद हैं। अल्मोड़ा जिले में 5 स्थाई श्रेणी के हैलीपैड है, तो वहीं 31 स्थानों और मैदानों को अस्थाई हैलीपैड के तौर पर उपयोग किया जाता रहा है। नैनीताल जिले में 4 स्थाई और 47 अस्थाई तथा बागेश्वर जिले में 1 स्थाई एवं 3 अस्थाई हैलीपैड और चंपावत जिले में 7 अस्थाई हैलीपैड की सुविधाएं मौजूद हैं।

इस तरह से देखा जाए तो तकरीबन पूरा उत्तराखण्ड प्रदेश हवाई सुविधाओं से परिपूर्ण दिखाई देता है। आपदा के चलते प्रदेश के कई दुर्गम क्षेत्रों में अस्थाई और आपातकालीन समय में उपयोग के लिए कई ऐसे स्थान हैं जिनका हैलीपैड के तौर पर उपयोग किया जा सकता है। अगर उत्तराखण्ड को खास तौर पर दुर्गम और पहाड़ी जिलों में एयर एम्बुलेंस की सुविधा मयस्सर हो जाए तो हजारों जीवन को बचाया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से प्रदेश सरकार और सरकारी सिस्टम इस पर गंभीरता से काम करता दिखाई नहीं दे रहा है। जानकारों की मानें तो स्वयं उत्तराखण्ड सरकार कम से कम पहाड़ी जिलों में एयर एम्बुलेंस की सुविधा प्रदेश स्तर पर आरंभ कर सकती है।

 

कुंभ, कोरोना और टेस्टिंग घोटाला

You may also like

MERA DDDD DDD DD