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दून विश्वविद्यालय ने अपर सचिव उच्च शिक्षा के आदेश को दरकिनार करते हुए जिस तरह अपनी मर्जी से शैक्षिक योग्यता के मानक बदले उससे बेरोजगारों में आक्रोश है

एक ओर प्रदेश सरकार राज्य के बेरोजगारों के लिए सरकारी भर्तियां खोल रही है, तो दूसरी तरफ बेरोजगारों के साथ छल किया जा रहा है। ताजा मामला दून विद्यविद्यालय का सामने आया है जिसमें शासन द्वारा तय की गईं शैक्षिक योग्यता के मानकों को विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा बदल दिया गया है। हैरत की बात यह हैे कि अपर सचिव उच्च शिक्षा के आदेश को दरकिनार कर विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी मनमर्जी चलाते हुए इस काम को अंजाम दिया है। जिससे स्थानीय बेरोजगारों के लिए रास्ते बंद कर दिए गए हैं। वर्ष 2016 के अगस्त माह में रंजीत कुमार सिन्हा तत्कालीन अपर सचिव उच्च शिक्षा द्वारा दून विश्वविद्यालय में शिक्षणेत्तर संवर्ग में 11 पदों की भर्ती के लिए शासनादेश संख्या 867XXIV (6) 2016-01(27) 2015 जारी किया गया जिसमें टेक्निकल आफिसर, स्कूल आफ इंवायरमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज का एक पद सृजित कर उसके लिए 15600-39100 वेतन एवं ग्रेड पे 5400 तय किया गया था।

इस पद के लिए शासन द्वारा विश्वविद्यालय को भेजी गई योग्यता मानकों के अनुसार आवेदक को रसायन विज्ञान में पीएचडी और उपकरणों का प्रयोग आदि का अनुभव जरूरी बताया गया था। साथ ही इस पद के लिए साक्षात्कार की प्रक्रिया अपनाए जाने के आदेश भी किए गए थे। जबकि शासनादेश के विपरीत विश्वविद्यालय के द्वारा तय योग्यता मानकों और चयन प्रक्रिया को ही बदल दिया गया। विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन में इस पद के लिए योग्यता किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय से 55 प्रतिशत के साथ विज्ञान में स्नातकोत्तर यानी एमएससी कर दी गई, जबकि शासन स्तर से इस पद के लिए रसायन विज्ञान में एमएससी की योग्यता को अनिवार्य बताया गया था। यही नहीं 15 से ज्यादा आवेदक होने पर ही इस पद के लिए लिखित परीक्षा कराए जाने का फैसला विश्वविद्यालय प्रशासन ने ले लिया। यानी 15 से कम होने पर ही विश्वविद्यालय साक्षात्कार द्वारा चयन प्रणाली अपनाएगा। 15 से ज्यादा हो जाने पर लिखित परीक्षा के तहत चयन किया जाएगा।

विश्वविद्यालय के इस निर्णय से रसायन विज्ञान के आवेदकों में रोष फैल गया है और वे अपना विरोध विश्वविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा सचिव तक शिकायत कर चुके हैं। 15 जुलाई 2021 को उच्च शिक्षा विभाग द्वारा विश्वविद्यालय के कुल सचिव को इस बाबत मिले शिकायत पत्र का उल्लेख करते हुए प्रकरण की नियमानुसार कार्यवाही करने को पत्र भी लिखा है, लेकिन अभी तक विश्वविद्यालय ने विज्ञापन में कोई संशोधन नहीं किया है। गौरतलब है कि 2016 के शासनादेश के तहत विश्वविद्यालय के द्वारा नियुक्तियां पांच वर्ष पूर्व ही दी जानी थी, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन शासन के आदेश के बाद भी इन पदों पर कुंडली मारे बैठा रहा है।

हालांकि नई कुलपति डाॅ सुरेखा डंगवाल के पदभार संभालने के बाद पांच वर्षों से दबे हुए पदों पर नियुक्तियां की जा रही हैं। लगभग 53 पदों पर भर्तियों के विज्ञापन जारी किए गए हैं। लेकिन इसमें भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे हैं। सबसे ज्यादा नुकसान उन आवेदकों को हो रहा है जिन्होंने पांच साल पहले आवेदन किया था। उनकी अब आयु सीमा ही निकल चुकी है। अब वे किसी भी सरकारी पद के लिए आवेदन नहीं कर सकते। 42 वर्ष इन पदों की अधिकतम आयु सीमा रखी गई है। जो आवेदक पांच वर्ष से इन पदांे के लिए तैयारी कर रहे थे। उनकी आयु अब 47 वर्ष हो चुकी है इसके चलते अब वे सभी इन पदों के लिए काबिल नहीं रहे हैं।

बात अपनी-अपनी

सभी अधिकारियों और राज्यपाल तक शिकायत भेजी है। एक पद का मामला ही अभी सामने आया है जिसमें विश्वविद्यालय के द्वारा शैक्षिक योग्यता को अपने स्तर से ही बदला गया है। अभी अन्य पदों पर भर्ती प्रक्रिया अपनाई जा रही है। उनकी क्या योग्यता मानक थी यह शासनादेश से हमें प्राप्त नहीं हुआ है, तो यह नहीं कह सकते कि इन अन्य पदों पर भी विश्वविद्यालय ने योग्यताएं बदली हैं या नहीं।
शिवराज सिंह, शिकायतकर्ता
नोटः- इस मामले में कुलपति डाॅ सुरेखा डंगवाल और कुल सचिव एमएस मंद्रवाल से उनके फोन नंबर पर बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनके द्वारा फोन नहीं उठाया गया।

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