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Uttarakhand

घात-प्रतिघात और भितरघात का चक्रव्यूह

भारतीय जनता पार्टी के निजाम ने जब पचहत्तर पार के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डम्प करने की कवायद शुरू की तो नैनीताल लोकसभा क्षेत्र के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने समय की नजाकत को भांपते हुए अर्सा पहले ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर डाला। हालांकि बदले राजनीतिक परिदृश्य ने भाजपा आलाकमान को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया और पचहत्तर पार के नेताओं को चुनावी समर में न उतारने की रणनीति पर बैकफुट में जाना पड़ा, लेकिन कोश्यारी अपने कहे से पीछे नहीं हटे। यहां पर किंतु एक बड़ा पेंच उन्होंने अपने करीबी खटीमा के विधायक पुष्कर धामी को प्रत्याशी बनाए जाने का फंसा दिया। धामी को प्रदेश की राजनीति में कोश्यारी की छाया कहा जाता है। युवा नेतृत्व को मौका दिए जाने की जोरदार वकालत करते समय कोश्यारी का प्रयास अपने इस चेले को टिकट दिलाए जाने का रहा। भाजपा में घात-प्रतिघात और भितरघात का खेल इसी के चलते शुरू हुआ है जिसका खामियाजा विगत विधानसभा चुनाव में पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाने वाले प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को भुगतना पड़ सकता है
उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों में से दो पर दोनों मुख्य दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लग चुकी है। कुमाऊं की नैनीताल सीट से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का सीधा मुकाबला भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट से है। पौड़ी लोकसभा सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी मनीष खण्डूड़ी अपने पिता भुवन चंद्र खण्डूड़ी के राजनीतिक शिष्य और भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत से दो-हाथ करने जा रहे हैं। हालांकि प्रतिष्ठा तो अन्य तीन सीटों पर भी दिग्गज नेताओं की दांव पर है, लेकिन घात-प्रतिघात, भितरघात की बिसात नैनीताल और पौड़ी में बिछने की संभावना सबसे ज्यादा होने के चलते इन दोनों सीटों पर सबकी निगाहें हैं। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के निजाम ने जब पचहत्तर पार के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डम्प करने की कवायद शुरू की तो नैनीताल लोकसभा क्षेत्र के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने समय की नजाकत को भांपते हुए अर्सा पहले ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर डाला। हालांकि बदले राजनीतिक परिदृश्य ने भाजपा आलाकमान को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया और पचहत्तर पार के नेताओं को चुनावी समर में  न उतारने की रणनीति पर बैकफुट में जाना पड़ा लेकिन कोश्यारी अपने कहे से पीछे नहीं हटे। यहां पर किंतु एक बड़ा पेंच उन्होंने अपने करीबी भाजपा नेता पुष्कर धामी को प्रत्याशी बनाए जाने का फंसा दिया। खटीमा विधानसभा क्षेत्र से विधायक पुष्कर धामी को प्रदेश की राजनीति में कोश्यारी की छाया कहा जाता है। युवा नेतृत्व को मौका दिए जाने की जोरदार वकालत करते समय कोश्यारी का प्रयास अपने इस चेले को टिकट दिलाए जाने का रहा। भाजपा में घात- प्रतिघात और भितरघात का खेल इसी के चलते शुरू हुआ है जिसका खामियाजा विगत् विधानसभा चुनाव में पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाने वाले प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को भुगतना पड़ सकता है। भट्ट यूं तो प्रदेश की राजनीति में भगत सिंह कोश्यारी गुट के कहे- समझे जाते हैं, लेकिन हकीकत में इस गुरू- शिष्य के मध्य अविश्वास की खाई विधानसभा चुनाव में रानीखेत विधानसभा सीट से भट्ट की हार के बाद खासी गहरा चुकी है। भट्ट अघोषित तौर पर सीएम पद का चेहरा बना पार्टी द्वारा चुनावी मैदान में उतारे गए थे। उनका बढ़ता कद कई दिग्गजों को इतना खला कि उन्हें उनके ही गृहक्षेत्र में घेरने का चक्रव्यूह रच डाला गया। जिस कार्यकर्ता को पार्टी में आगे बढ़ाने का श्रेय भट्ट को जाता है, उसी को बागी कर रानीखेत से निर्दलीय प्रत्याशी बनाने का काम इन दिग्गजों ने कर डाला। नतीजा प्रमोद नैनवाल भट्ट के वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगा उनकी नाव मझधार में डुबाने में सफल रहा। हालात इस चुनाव में भी कुछ खास बदले नहीं हैं। चूंकि नैनीताल लोकसभा सीट में ठाकुर मतदाताओं की बाहुल्यता है इसलिए अजय भट्ट की राह में कोश्यारी गुट के नेताओं की भूमिका को संदिग्ध माना जा रहा है। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इस लोकसभा सीट में आने वाली पंद्रह विधानसभा सीटों में से बारह पर पार्टी विधायक होने के बावजूद भट्ट की राह भितरघात के चलते खासी कठिन है। दूसरी तरह कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत के सामने भी भितरघात की आशंका उनका टिकट घोषित होने से पहले ही विकराल रूप ले चुकी थी। इस सीट पर लंबे अर्सा से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और वर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश की आंखें गड़ी थी। इंदिरा की इच्छा स्वयं लोकसभा पहुंचने के साथ-साथ हल्द्वानी विधानसभा सीट से पुत्र सुमित हृदयेश को राज्य विधानसभा भेजने की थी। हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी को विगत विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार और स्वयं रावत का दो विधानसभा सीटों से हार जाना हृदयेश को स्वर्णिम अवसर समान लगा। पिछले चार दशकों से एक-दूसरे के घनघोर प्रतिद्वंद्वी रहे दोनां नेताओं ने अवसर मिलने पर एक-दूसरे को पटखनी देने में कभी चूक नहीं की है। हृदयेश ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और केंद्रीय प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह संग जुगलबंदी कर हरीश रावत को प्रदेश की राजनीति से बेदखल करने की ठोस रणनीति तो तैयार की लेकिन दिल्ली दरबार में अपनी मजबूत पकड़ के चलते रावत उन पर भारी पड़ गए। रावत को हारा और चूका हुआ योद्धा मानने वालों को जबरदस्त सदमा तब लगा जब उन्हें पार्टी का महासचिव, असम का प्रभारी और शीर्ष कमेटी कांग्रेस कार्य समिति का स्थाई सदस्य राहुल गांधी ने बना डाला। इसके बाद से ही प्रीतम सिंह-इंदिरा हृदयेश गुट और रावत के मध्य जोर आजमाईश का दौर शुरू हो गया।
कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत के सामने भी भितरघात की आशंका उनका टिकट घोषित होने से पहले ही विकराल रूप ले चुकी थी। इस सीट पर लंबे अर्से से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता डॉ इंदिरा हृदयेश की आंखें गड़ी थी। इंदिरा की इच्छा स्वयं लोकसभा पहुंचने के साथ-साथ हल्द्वानी विधानसभा सीट से अपने पुत्र सुमित हृदयेश को विधानसभा भेजने की थी। हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी को विगत विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार और स्वयं रावत का दो विधानसभा सीटों से हार जाना हृदयेश को स्वर्णिम अवसर समान लगा। पिछले चार दशकों से एक-दूसरे के घनघोर प्रतिद्वंद्वी रहे इन दोनें नेताओं ने अवसर मिलने पर एक-दूसरे को पटखनी देने में कभी चूक नहीं की है। हृदयेश ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और केंद्रीय प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह संग जुगलबंदी कर हरीश रावत को प्रदेश की राजनीति से बेदखल करने की ठोस रणनीति तो तैयार की, लेकिन दिल्ली दरबार में अपनी मजबूत पकड़ के चलते रावत उन पर भारी पड़ गए। रावत को हारा और चूका हुआ योद्धा मानने वालों को जबरदस्त सदमा तब लगा जब उन्हें पार्टी का महासचिव, असम का प्रभारी और शीर्ष कमेटी कांग्रेस कार्य समिति का स्थायी सदस्य बना दिया गया
प्रदेश संगठन से रावत समर्थकों को ठिकाने लगा प्रीतम सिंह और हृदयेश ने रावत को तिलमिलाने का काम किया तो रावत ने पार्टी के महत्वपूर्ण संगठनों में सीधे केंद्र से अपने समर्थकों की नियुक्ति करा प्रीतम सिंह को चुनौती दे डाली। इस बीच रावत के नैनीताल सीट से चुनाव लड़ने की खबर चली तो इंदिरा हृदयेश फ्रंट फुट पर आकर रावत के खिलाफ मोर्चे खोल बैठी। कांग्रेस के इन दिग्गजों की रार मीडिया तक जा पहुंची। हालात इतने बिगड़े कि प्रदेश की पांचों सीटों पर उम्मीदवारी का ऐलान आलाकमान को दो बार स्थगित करना पड़ा। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो प्रीतम सिंह, हृदयेश और अनुग्रह नारायण सिंह ने रावत का नैनीताल से टिकट होने की अवस्था में सभी पदों से त्याग पत्र देने की बात पार्टी आलाकमान तक पहुंचा डाली। हरीश रावत का पलड़ा लेकिन कई कारणों से भारी रहा। असम में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का फायदा रावत को उत्तराखण्ड की राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने में मिला। एक अन्य कारण भाजपा के वरिष्ठ नेता भुवन चंद्र खण्डूड़ी के घर सेंधमारी करने में हरीश रावत की भूमिका का होना है। खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी को पार्टी में लाने वाले रावत ही हैं। स्वयं मनीष खण्डूड़ी ने राहुल गांधी की देहरादून में हुई जनसभा में मंच पर हरीश रावत के पैर छू कर इसका एलान कर डाला था। हरीश रावत न केवल अपना टिकट पाने में सफल रहे हैं बल्कि अल्मोड़ा, पौड़ी और हरिद्वार में भी उनके ही समर्थकों को टिकट दिया गया है। ऐसे में रावत के समक्ष अजय भट्ट से ज्यादा अपने साथियों के भितरघात का संकट है। ठाकुर बाहुल्य सीट होना रावत के पक्ष में जाता दिख रहा है लेकिन कई गुटों में बंटी कांग्रेस इस फैक्टर का कितना लाभ उठा पाएगी इसको लेकर भारी संशय है।
कुल मिलाकर नैनीताल में रावत बनाम भट्ट का चुनावी समर कई मायनों में इसे हॉट सीट में बदल चुका है। यदि कोश्यारी गुट मन से भट्ट के साथ नहीं खड़ा होता है तो उनकी राह बेहद कठिन है। दूसरी तरफ हरीश रावत के समक्ष पार्टी संगठन का विरोध बड़ी समस्या है। कुछ ऐसे ही समीकरण पौड़ी में भी हैं जहां तीरथ रावत से चुनावी लड़ाई लड़ रहे मनीष खण्डूड़ी का भविष्य पिता भुवन चंद्र खण्डूड़ी के उनके पक्ष में खुलकर प्रचार करने पर निर्भर करता है। यदि सीनियर खण्डूड़ी पुत्र मोह में ऐसा करते हैं तो तीरथ सिंह रावत की चुनावी वैतरणी का पार लगना कठिन है। यदि खण्डूड़ी बढ़ती उम्र का वास्ता दे दिल्ली में ही जमे रहे तो जूनियर खण्डूड़ी की हार निश्चित है।

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