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Uttarakhand

आसान नहीं है भाजपा की राह

गणेश गोदियाल के नामांकन में उमड़ी भारी भीड़ ने भाजपा के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। जहां भाजपा के अनिल बलूनी के नामांकन के दौरान प्रदेश सरकार के दिग्जजों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मौजूद थीं, वहीं गोदियाल के साथ कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं को तो छोड़िये प्रदेश स्तर का कोई बड़ा नेता तक मौजूद नहीं था। बावजूद इसके गोदियाल की जनसभा में हजारों की भीड़ का उमड़ना साफ करता है कि उन्होंने भाजपा के समक्ष कांटे की टक्कर का माहौल तो बना ही दिया है

उत्तराखण्ड की सबसे चर्चित और वीआईपी सीट होने का तमगा अगर किसी संसदीय क्षेत्र को मिला है तो वह है गढ़वाल संसदीय सीट। देश के पहले आम चुनाव से लेकर पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने बाद भी इस सीट का वीआईपी टैग बरकरार रहता आया है। इस सीट से अनेक ऐसे राजनेता सांसद बने हैं जिन्होंने प्रदेश के साथ-साथ केंद्र की राजनीति में अपना दखल रखा। कांग्रेस के भक्त दर्शन, हेमवती नंदन बहुगुणा, धर्मगुरु सतपाल महाराज और बीसी खंडूड़ी ऐसे नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने यहीं से संसद की राह पकड़ी। गढ़वाल सीट का पौड़ी जिला जिसके नाम से इस सीट को पौड़ी संसदीय सीट भी कहा जाता है, ब्रिटिश राज से ही महत्वपूर्ण रहा है। देश की सेना में अग्रणी सहयोग देने वाली भारतीय सेना की गढ़वाल रेजिमेंट का मुख्यायल पौड़ी जिले के लैंसडाउन में होने से पौड़ी का नाम देश में अग्रणी रहा है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार, खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपनी सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था में पौड़ी को खासा महत्व दिया है। पूर्व थल सेना अध्यक्ष व देश के प्रथम सीडीएस स्वर्गीय जनरल विपिन रावत, वर्तमान सीडीएस अनिल चौहान पौड़ी जिले के ही हैं। साथ ही खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के पूर्व चीफ धस्माना तथा वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी पौड़ी जिले से ही आते हैं। पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से 24 वर्षों में प्रदेश के पांच मुख्यमंत्री भी गढ़वाल संसदीय क्षेत्र से ही बने हैं।

प्र्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के चार जिलों में फैली हुई गढ़वाल लोकसभा सीट का विशाल भू-भाग है जिसमें गढ़वाल मंडल के पौड़ी, चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी और कुमाऊं मंडल के नैनीताल जिले की एक सीट सहित कुल 14 सीटें शामिल हैं। इनमें पौड़ी जिले की पौड़ी, कोटद्वार, यमकेश्वर, श्रीनगर, चौबट्टाखाल, लैंसडाउन छह विधानसभा सीटें हैं तो रूद्रप्रयाग जिले की केदारनाथ और रूद्रप्रयाग विधानसभा सीटंे हैं। इसी तरह से चमोली जिले की बदरीनाथ, थराली, कर्णप्रयाग, तीन विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। टिहरी जिले की देवप्रयाग और नरेंद्र नगर विधानसभा क्षेत्र तथा नैनीताल जिले का रामनगर विधानसभा क्षेत्र गढ़वाल लोकसभा सीट में शामिल है। इन 14 विधानसभा क्षेत्रों के 13 लाख 66 हजार 993 मतदाता आने वाले 19 अप्रैल को अपने सांसद के लिए ईवीएम का बटन दबाकर भाजपा-कांग्रेस के साथ-साथ अन्य उम्मीदवारों के भविष्य का फैसला करेंगे।

गढ़वाल लोकसभा सीट के राजनीतिक इतिहास को देखें तो इस सीट पर मुख्यतः कांग्रेस-भाजपा का दबदबा रहा है और राज्य गठन के बाद भी यहां की राजनीति इन्हीं दो दलों के मध्य घूमती है। 1951 के चुनाव से लेकर 2019 तक के 20 लोकसभा चुनाव और एक उपचुनाव में जहां भाजपा ने 6 बार तो वहीं कांग्रेस ने 9 बार जीत हासिल की है। एक बार जनता दल व जनता पार्टी के साथ-साथ निर्दलीय ने भी जीत हासिल की है। देश के पहले आम चुनाव 1951 से लेकर 1971 तक कांग्रेस के भक्त दर्शन लगातार चार बार चुनाव जीतते रहे और 1971 में कांग्रेस के प्रताप सिंह नेगी सांसद बने। वर्ष 1977 में कांग्रेस के जीत का रथ पहली बार रूका और जनता पार्टी के जगन्नाथ शर्मा ने कांग्रेस के हाथों से इस सीट को छीनते हुए पहले गैर कांग्रेसी सांसद बने। इस संसदीय सीट पर पहली बार भाजपा का कब्जा वर्ष 1991 के चुनाव में हुआ। तब भाजपा के सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवनचंद्र खण्डूड़ी इस सीट से जीत कर संासद बने थे।

2004 में राज्य बनने के बाद हुए पहले लोकसभा चुनाव में बीसी खंडूड़ी चुनाव जीते और 2009 के चुनाव में कांग्रेस के सतपाल महाराज यहां से सांसद बने थे। 2014 में फिर से भाजपा के बीसी खण्डूड़ी ने जीत दर्ज की थी। 2019 में कांग्रेस ने बीसी ख्ंाडूड़ी के पुत्र मनीष खंडूड़ी को अपना उम्मीदवार बनाया था। तब भाजपा ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत को चुनावी मैदान में उतार मतदाताओं के समक्ष धर्म संकट की स्थिति पैदा कर दी थी। खण्डूड़ी के प्रति अगाध निष्ठा रखने वाले मतदाताओं ने लेकिन उनके पुत्र को नकार तीरथ सिंह रावत को संसद भेज यह स्पष्ट संकेत दे डाला कि भाजपा अब यहां मजबूत जनाधार तैयार कर चुकी है। यह सीट राजपूत बाहुल्य मानी जाती है जिसमें 61 फीसदी मतदाता ठाकुर वर्ग के हैं, ब्राह्माण मतदाता 21 फीसदी हैं और एससीएसटी का मत प्रतिशत 12 तथा अन्य वर्ग महज 6 फीसदी ही हैं। मौजूदा समय में गढ़वाल सीट पर सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। जानकारों की मानें तो ब्राह्माण मतदाताओं की संख्या में एक फीसदी की गिरावट देखी जा रही है। जबकि एससी एसटी वर्ग में पलायन बहुत ही कम देखा गया है।

भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने ब्राह्माण चेहरे को ही इस बार चुनावी मैदान में उतारा है। गढ़वाल सीट पर शुरू से ही राजपूत मतदाताओं का बोलबाला रहा है और वे चुनाव में हार जीत के समीकरणों को बदलने में बड़ी भूमिका रखते हैं उसको देखते हुए भाजपा और कांग्रेस ने ब्राह्माण जाति से ही अपने प्रत्याशी बनाए हैं। इससे कम से कम राजपूत वर्ग के मतदताओं की नाराजगी की आशंका खत्म हो चली है। जबकि उक्रांद पत्रकार और अंकिता भंडारी हत्याकांड में आंदोलन कर रहे ठाकुर चेहरे आशुतोष नेगी को चुनावी मैदान में उतार राजपूत मतदाताओं को साधने का प्रयास कर रही है।

कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार गणेश गोदियाल इस क्षेत्र के लोकप्रिय नेता हैं। 2002 में राज्य में हुए पहले विधानसभा चुनाव में गोदियाल थलीसैंण विधानसभा क्षेत्र से जीतकर विधायक निर्वाचित हुए थे। तब गोदियाल ने सबको चौंकाते हुए अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से ही प्रदेश की राजनीति में बड़ा कद रखने वाले रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ को हराया था। 2012 में वे श्रीनगर विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर विधायक बने। गोदियाल पौड़ी जिले के राठ क्षेत्र के साथ-साथ श्रीनगर, पौड़ी और देव प्रयाग, रूद्र प्रयाग तथा चमोली जिले के कई क्षेत्रों में खासी पकड़ रखते हैं।

अपने विनम्र स्वभाव और सर्व सुलभ होने के चलते गोदियाल क्षेत्र के मतदाताओं में लोकप्रिय हैं। राठ क्षेत्र में उच्च शिक्षा के साधनों की भारी कमी को देखते हुए स्वयं के संसाधनों से राठ महाविद्यालय की स्थापना करने वाले गोदियाल को युवा मतदाताओं का भारी समर्थन मिलता रहा है। उन्होंने बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष रहते हुए जोशीमठ के नरसिंग मंदिर व बिनसर मंदिर का जीर्णोद्धार करवा के भव्य स्वरूप प्रदान किया। मंदिर समिति में प्रशासनिक व्यवस्था में आमलचूल परिवर्तन करके परदर्शी व्यवस्था को लागू करवाया। मंदिर समिति की सम्पत्तियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए व्यवस्था आरंभ करने के साथ ही कांग्रेस सरकार के समय 2015 में राठ क्षेत्र को ओबीसी क्षेत्र घोषित करवाने में गोदियाल कामयाब रहे। इसके चलते गणेश गोदियाल के कामकाज को मतदाता याद करते हैं।

गोदियाल के नामांकन में उमड़ी भारी भीड़ ने भाजपा के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। जहां भाजपा के अनिल बलूनी के नामांकन के दौरान प्रदेश सरकार के दिग्जजों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री

चुनाव-प्रचार के दौरान यूकेडी उम्मीदवार आशुतोष नेगी

स्मृति ईरानी मौजूद थीं, वहीं गोदियाल के साथ कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं को तो छोड़िए प्रदेश स्तर का कोई बड़ा नेता तक मौजूद नहीं था। बावजूद इसके गोदियाल की जनसभा में हजारों की भीड़ का उमड़ना साफ करता है कि उन्होंने भाजपा के समक्ष कांटे की टक्कर का माहौल तो बना ही दिया है।

हालांकि राजनीतिक जानकार गढ़वाल सीट पर मुकाबला भाजपा- कांग्रेस की बजाय गोदियाल और भाजपा के बीच मान रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि गढ़वाल की 14 विधानसभा सीटांे में से मौजूदा समय में कांग्रेस के पास एक भी सीट नहीं है। एक मात्र बदरीनाथ सीट कांग्रेस के खाते में थी लेकिन वह भी अब राजेंद्र भंडारी के भाजपा में शामिल होने चलते कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है। इतना ही नहीं एक माह के भीतर कांग्रेस के पंचायत से लेकर विधानसभा स्तर के नेता भी बड़ी तादात में पार्टी छोड़ चुके हैं। इनमें 2022 के विधानसभा उम्मीदवार चौबटाखाल से केसर नेगी, लैंसडाउन से अनुकृति गुसाईं, पौड़ी से नवल किशोर, यमकेश्वर से शैलेंद्र रावत प्रमुख हैं। साथ ही कई ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत नेता भी कांगेस पार्टी का दामन छोड़ चुके हैं। इसका बड़ा प्रभाव गोदियाल के चुनावी हार-जीत पर पड़ना तय माना जा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 69.25 फीसदी वोट मिले थे तो कांग्रेस को महज साढ़े 27 प्रतिशत ही मत मिल पाए थे। इन पांच वर्षों में कांग्रेस का जनाधार बुरी तरह से घटा है।

अब भाजपा के अनिल बलूनी के चुनावी राजनीति पर नजर डालें तो बलूनी पलायन को लेकर अपने कार्यक्रम ‘मेरा गांव, मेरा वोट’ के जरिए सबसे पहले चर्चाओं में आए थे। सोशल मीडिया में बलूनी के इस आह्वान को सबने हाथों -हाथ लिया था। अपने गांव और अपनी संस्कृति को अपनाए जाने को लेकर ‘ईगास बग्वाल’ त्यौहार अपने गांव में मनाने का भी बलूनी ने आह्वान किया। आज ‘ईगास बग्वाल’ पूरे उत्तराखण्ड का पर्व बन चुका है तो इसका श्रेय अनिल बलूनी को ही जाता है।

2002 में उत्तराखण्ड भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश महामंत्री से शुरू हुआ बलूनी का राजनीतिक सफर राज्यसभा सांसद तक पुहंचा है। 2002 में कोटद्वार विधानसभा सीट से मैदान में उतरे बलूनी का नामांकन तकनीकी कारणों से निरस्त कर दिया गया था जिसको लेकर वे हाईकोर्ट तक भी गए। आखिरकार हाईकोर्ट से बलूनी जीते और तत्कालीन विधायक और कांग्रेस सरकार में पेयजल मंत्री रहे सुरेंद्र सिंह नेगी को विधानसभा सदस्यता से त्याग पत्र देना पड़ा। इसके चलते कोटद्वार में 2005 में उपचुनाव हुआ लेकिन बलूनी यह चुनाव जीत नहीं पाए। 2009 में तत्कालीन निशंक सरकार के समय उन्हें वन एवं पर्यावरण बोर्ड में अध्यक्ष का दायित्व दिया गया। 2012 में प्रदेश भाजपा प्रवक्ता बने और 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा के मीडिया प्रबंधन का दायित्व के साथ-साथ भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रवक्ता बनाए गए। 2015 से भाजपा के राष्ट्रीय प्रमुख और मुख्य वक्ता के पद पर अनिल बलूनी कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा 2018 में भाजपा ने अनिल बलूनी को उत्तराखण्ड से राज्यसभा सांसद बनाया और अब गढ़वाल लोकसभा सीट से भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाकर बलूनी को चुनावी मैदान में उतारा है।

अनिल बलूनी का प्रभाव उत्तराखण्ड की राजनीति में सीधे तौर पर तो नहीं नजर आता है लेकिन जिस तरह से बलूनी ने राज्य के अनेक मामलों में केंद्रीय मंत्रियों से समन्वय बनाकर प्रदेश में कई योजनाएं लागू करवाई हैं उससे उनकी छवि बेहतर और प्रभावशाली नेता के तौर पर उभरी है, साथ ही राज्य में पहली बार किसी राज्य सभा सांसद के काम करने वाला नेता के तौर पर स्थापित हुई है। राज्यसभा सांसद के तौर पर बलूनी ने देहरादून से काठगोदाम तक ‘नैनी दून जन शताब्दी’, ‘टनकपुर से दिल्ली तक पूर्णागिरी जनशताब्दी’, को आरंभ करवाया तो कोटद्वार से दिल्ली तक श्री ‘सिद्धबली जनशताब्दी’ तथा कोटद्वार से आनंद विहार नई दिल्ली तक नई रात्री रेल सेवा को भी शुरू करवाया। गौर करने वाली बात यह है कि यह सभी काम बलूनी द्वारा 2018 से लेकर 2023 तक करवाए गए हैं यानी एक वर्ष में एक रेल सेवा की सुविधा प्रदेश के निवासियों को बलूनी के प्रयासों चलते मिली है।

इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्र के नागरिकों के स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए सेना और अर्धसैन्य बलों के अस्पतालों में ओपीडी की सुविधा दिलवाने और कुमाऊं मंडल के लिए एम्स ऋषिकेश में सैटेलाईट सेंटर की अनुमति प्रदान करवाने में बलूनी का योगदान रहा है। फरीदाबाद से प्रदेश के रामनगर के लिए रोडवेज बस संचालन की सुविधा भी उनके द्वारा आरंभ करवाई गई। साथ ही देहरादून के डाट काली मंदिर क्षेत्र में दूर संचार की सुविधा के लिए मोबाइल टावर की सुविधा, केंद्र सरकार के सहयोग से मुक्तेश्वर, लैंसडाउन और सुरकंडा में डाप्लर रडार स्थापित करवाने में बलूनी ने खास सहयोग दिया। रामनगर में धनगढ़ी नाले पर पुल का निर्माण, विख्यात पर्यटन नगरी मसूरी के लिए 187 करोड़ लागर की पेयजल योजना की स्वीकृति के साथ-साथ अपनी सासंद निधि से कोटद्वार, उत्तरकाशी और रामनगर में आईसीयू वेंटिलेटर और पौड़ी में 15 करोड़ की लगात से तारामंडल और माउंटेन म्यूजियम के निर्माण के लिए सांसद निधि जारी कर बलूनी ने अपने जनाधार को मजबूत किया है।

अनिल बलूनी प्रदेश के सभी आठ सांसदों में सबसे ज्यादा सांसद निधि खर्च करने वाले सांसद हैं, साथ ही निधि से पूर्ण होने वाले कार्यों में भी वे नंबर वन पर हैं। अब उक्रांद के उम्मीदवार पत्रकार आशुतोष नेगी की बात करें तो राज्य के सबसे चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड से उपजे जनाक्रोश के आंदोलनकारी के तौर पर उनकी छवि प्रगाढ़ हुई है। अंकिता भंडारी पौड़ी की ही बलिका थी जिसके कारण इस हत्याकांड का सीधा प्रभाव पौड़ी पर देखा जा सकता है। पौड़ी जिले से ही ‘अंकिता भंडारी को न्याय दो’ का आंदोलन शुरू हुआ जिसमें अशुतोष नेगी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विगत डेढ़ वर्ष से यह आंदोलन चल रहा है और सोशल मीडिया में इसकी आंच साफ तौर पर देखी जा रही है। आशुतोष नेगी के खिलाफ दलित कानून के तहत मुकदमा भी दर्ज किया गया और जेल भेजा गया। इसको अंकिता भंडारी आंदोलन को कम करने के षड्यंत्र के तौर पर देखा गया। न्यायालय से आशुतोष नेगी को जमानत मिल चुकी है जिसके चलते अब अंकिता भंडारी को न्याय दिलवाने का आंदोलन सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ जनमानस को तैयार करने का सशक्त माध्यम बन चुका है।

आशुतोष नेगी को अनेक सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का पूरा समर्थन मिल रहा है, साथ ही युवाओं का भी उन्हें भरपूर सहयोग बताया जा रहा है। मूल निवास और भू-कानून को लेकर चल रहे आंदोलन का लाभ भी आशुतोष नेगी को सहायता पहुंचा रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि गढ़वाल संसदीय सीट पर आशुतोष नेगी को उक्रांद ने चुनाव में उतारा है तो टिहरी संसदीय सीट पर बेरोजगार महासंघ और भर्ती घोटाले पर बड़ा आंदोलन करने वाले बॉबी पंवार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे हैं जिनकोे उक्रांद ने अपना समर्थन दे दिया है। एक तरह से दोनों सीटों पर जनआंदोलन से जुड़े उम्मीदवार हैं जो भाजपा-कांग्रेस दोनों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला बनाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं।

अनिल बलूनी का प्रभाव उत्तराखण्ड की राजनीति में सीधे तौर पर तो नहीं नजर आता है लेकिन जिस तरह से बलूनी ने राज्य के अनेक मामलों में केंद्रीय मंत्रियों से समन्वय बनाकर प्रदेश में कई योजनाएं लागू करवाई हैं उससे उनकी छवि बेहतर और प्रभावशाली नेता के तौर पर उभरी है। बलूनी पलायन को लेकर अपने कार्यक्रम ‘मेरा गांव, मेरा वोट’ के जरिए सबसे पहले चर्चाओं में आए थे। सोशल मीडिया में बलूनी के इस आह्वान का सबने हाथों -हाथ लिया था। अपने गांव और अपनी संस्कृति को अपनाए जाने को लेकर ‘ईगास बग्वाल’ त्यौहार अपने गांव में मनाने का भी बलूनी ने आह्वान किया। आज ‘ईगास बग्वाल’ पूरे उत्तराखण्ड का पर्व बन चुका है तो इसका श्रेय अनिल बलूनी को ही जाता है

 

 

 

आशुतोष नेगी को अनेक सामाजिक संगठनों और क्षेत्रिय राजनीतिक दलों का पूरा समर्थन मिल रहा है, साथ ही युवाओं का भी उन्हें भरपूर सहयोग बताया जा रहा है। मूल निवास और भू-कानून को लेकर चल रहे आंदोलन का लाभ भी आशुतोष नेगी को सहायता पहुंचा रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि गढ़वाल संसदीय सीट पर आशुतोष नेगी को उक्रांद ने चुनाव में उतारा है तो टिहरी संसदीय सीट पर बेरोजगार महासंघ और भर्ती घोटाले पर बड़ा आंदोलन करने वाले बॉबी पंवार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे हैं जिनकोे उक्रांद ने अपना समर्थन दे दिया है। एक तरह से दोनों सीटों पर जनआंदोलन से जुड़े उम्मीदवार हैं जो भाजपा-कांग्रेस दोनों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला बनाने का प्रयास करते
नजर आ रहे हैं

 

जनता के चुनावी मुद्दे
अंकिता भंडारी हत्याकांड: यह मुद्दा खास तौर पर भाजपा के अनिल बलूनी को परेशान कर सकता है। गढ़वाल संसदीय सीट के 13 विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक होने के बावजूद पार्टी नेताओं पर पहाड़ की बेटी के साथ खड़े न होने का आरोप लगता रहा है। यहां तक कि सांसदों की भूमिका भी इस आंदोलन के पक्ष में नहीं होने की बात हर कोई कह रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में अभी तक अभियुक्तांे की जमानत तक नहीं हुई है, बावजूद इसके प्रदेश सरकार और भाजपा पर किसी वीआईपी का नाम छुपाए जाने के आरोप लग रहे हैं ओैर भाजपा नेता इस मुद्दे पर मतदाताओं के सामने अपनी बात रखने से असहज नजर आते हैं।

मूल निवास और भू-कानून: आज प्रदेश भर में यह सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। राज्य आंदोलन के बाद पहला ऐसा आंदोलन देखने को मिल रहा है। हालांकि इस मामले में राज्य सरकार द्वारा कमेटी बनाई गई है लेकिन सरकार पर भारी दबाव बना हुआ है और यह मुद्दा भी चुनाव में खासा असर डाल सकता है।

रोजगार से बेरोजगार: प्रदेश में राज्य तथा राष्ट्रीय राजमार्गों पर अतिक्रमण हटाने के लिए हाईकोर्ट के आदेश पर जिस तरह से तोड़-फोड़ की कार्यवाही की गई है उससे सबसे ज्यादा प्रभावित पहाड़ का वह व्यक्ति हुआ है जो वर्षों से इन सड़कांे के किनारे स्वरोजगार के जरिए अपना जीवन-यापन कर रहा था। अधिकांश स्थानों में तो सड़कों के बनने से पूर्व से छोटे-मोटे दुकानें, चाय की टपरियां आदी चलाए जा रहे थे जिनमें कई तो 50 साल से भी पुराने थे उनको भी बगैर किसी सुनवाई के तोड़ दिया गया। एक अनुमान के मुताबिक 2 हजार लोगों का रोजगार से बिमुख कर दिया गया। इसके चलते प्रदेश सरकार और सरकारी मशीनरी के खिलाफ यहां बेहद नाराजगी बनी हुई है।

जंगली जानवरों से सुरक्षा: वैसे तो यह मुद्दा पूरे प्रदेश का है लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव गढ़वाल सीट पर देखने को मिल रहा है। पहले सूअर, लंगूर ओैर बंदरों से पहाड़ का हर किसान बुरी तरह से त्रस्त था लेकिल अब आदमखोर, तेंदुओं और भालुओं के हमलों से कई लोगों की जान जा चुकी है। पोैड़ी जिले के विकास खंडों में आदमखोर तेंदुओं के हमले आम बात होने लगी है। रिखणीखाल विकास खंड में बाघिन और उसके शावकों के चलते आतंक इस कदर फैला कि प्राथमिक स्कूलों को भी बंद करना पड़ा। इसी तरह से टिहरी के देवप्रयाग के कीर्तिनगर क्षेत्र में भी तेंदुओं के हमले बढ़े हैं। राज्य बनने के बाद अभी तक 1115 लोगों की वन्यजीवों से संघर्ष के चलते मौत हो चुकी है। लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा भी उठ रहा है।

पलायन: राज्य में पलायन का मुद्दा भी गंूज रहा है। प्रदेश के 13 जिलों में सबसे ज्यादा पलायन पौड़ी जिले में ही हुआ है। आज सैकड़ों गांव पलायन के चलते वीरान होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। हास्यास्पद बात यह है कि प्रदेश सरकार द्वारा पलायन आयोग का कार्यालय पौड़ी शहर में स्थापित किया था जो कि एक वर्ष के बाद स्वयं पौड़ी से पलायन कर देहरादून स्थापित हो चुका है। इससे पलायन को लेकर सरकारों की नीति ओैर नीयत को बेहतर समझा जा सकता है।

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