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Uttarakhand

पीढ़ीगत बदलाव की ओर भाजपा

हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सत्ता से बेदखली का एक बड़ा कारण निवर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की कार्यशैली को बताया जा रहा है। शायद ऐसे ही नतीजे भाजपा को उत्तराखण्ड में भी मिलते यदि त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव कराए जाते। पार्टी आलाकमान ने लेकिन समय रहते राज्य को नया और ऊर्जावान नेतृत्व देकर बाजी अपने पक्ष में करने में सफलता पा ली। पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी बाद अब प्रदेश भाजपा पीढ़ीगत बदलाव की तरफ बढ़ रही है। धामी जनता के साथ सीधे संवाद स्थापित कर न केवल पार्टी का जनाधार बढ़ाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं बल्कि हेमवती नंदन बहुगुणा, एनडी तिवारी, भगत सिंह कोश्यारी और हरीश रावत की तर्ज पर जननेता बन उभरने लगे हैं

बारिश में छाता लेकर खड़े सहज भाव से एक दुकानदार से उसके परिवार की कुशलक्षेम पूछते, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, खटीमा में प्रातःकालीन सैर करते लोगों के बीच अचानक स्थानीय युवाओं और छात्रों से सहज संवाद करते युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उत्तराखण्ड में नेतृत्व की एक नयी छवि गढ़ने के साथ ही उन राजनेताओं की कतार में खड़े नजर आते हैं जो जनता के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने में माहिर थे। शायद उन राजनेताओं की राजनीतिक सफलता का राज भी यही था। राज्य बनने से पूर्व और राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड की जनता ने कई राजनेताओं का उत्थान एवं पतन देखा है। कई नेताओं को सत्ता व पद पर पहुंचने के बाद जमीनी स्तर से कटते हुए भी देखा है। ऐसे अधिकतर नेता सत्ता या पद से हटने के बाद अपनी आभा को कायम नहीं रख पाए और राजनीतिक क्षेत्रों या फिर जनता के बीच उनका नाम गाहेबगाहे ही याद किया जाता है। उत्तराखण्ड ने गोविंद बल्लभ पंत, नारायण दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा सहित कई बड़ी राजनीतिक हस्तियां देश को दी है लेकिन उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद राजनेताओं की जो नई जमात आई उसमें से कोई नेता पूरे उत्तराखण्ड में अपनी स्वीकार्यता नहीं बना पाया, भगत सिंह कोश्यारी, हरीश रावत इसके अपवाद है। उत्तराखण्ड की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी का कद इतना ऊंचा था कि उनकी पहचान को सिर्फ उत्तराखण्ड के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। भगत सिंह कोश्यारी और हरीश रावत जरूर ऐसे नेता हैं जिनकी संपूर्ण उत्तराखण्ड में स्वीकार्यता से कोई इनकार नहीं कर सकता। कांग्रेस और भाजपा में नेताओं की लंबी लाइन है लेकिन कोई नेता उत्तराखण्ड में सर्वमान्य होने का दावा नहीं कर सकता। उत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद नजर डालें तो कांग्रेस में प्रीतम सिंह, इंदिरा हृदयेश, मयूख महर, यशपाल आर्य, हीरा सिंह बिष्ट, दिनेश अग्रवाल, महेंद्र पाल, रणजीत रावत, केसी सिंह बाबा, तिलकराज बेहड़ सहित कई नेताओं को देखें तो भाजपा में पूरन चन्द्र शर्मा, बची सिंह रावत, अजय भट्ट, प्रकाश पंत, बंशीधर भगत, बिशन सिंह चुफाल, मनोहर कांत ध्यानी, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भुवनचंद खण्डूड़ी, त्रिवेंद्र सिंह रावत, धन सिंह रावत, मदन कौशिक सहित कई राजनेता नजर आते हैं। भाजपा और कांग्रेस के इन राजनेताओं में भले ही कोई राज्य या केंद्र में मंत्री, मुख्यमंत्री बन गया हो लेकिन पूरे राज्य में कोई अपनी स्वीकार्यता नहीं बना पाया फिर चाहे वह उनकी अपनी पार्टियों के आंतरिक कारण रहे हां या फिर कोई अन्य वजह।

उत्तराखण्ड की राजनीति में यहां की जनता ने किसी एक नेता विशेष के नाम पर मतदान किया हो, ऐसा नजर आता नहीं। 2002 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की उम्मीदों के विपरीत कांग्रेस सत्ता में आई। जहां हरीश रावत की दावेदारी को दरकिनार कर नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बना दिए गए। 2002 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की तरफ से कमान भगत सिंह कोश्यारी ने संभाली थी। अगर 2002 में भाजपा जीतती तो निश्चित ही कोश्यारी मुख्यमंत्री होते। भाजपा की उस हार ने कोश्यारी के लिए मुख्यमंत्री पद के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद भुवन चन्द्र खण्डूड़ी कोश्यारी पर भारी पड़े। 2007 से 2012 के बीच खण्डूड़ी और निशंक के बीच ही सत्ता डोलती रही। 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद विजय बहुगुणा कांग्रेस आलाकमान की पसंद बने। लेकिन 2013 की केदारनाथ आपदा से निपटने में कुप्रबंधन के चलते उन्हें पद से रुखसत होना पड़ा और हरीश रावत की मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पूर्ण हुई। 2017 का चुनाव कांग्रेस के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं था जहां हरीश रावत खुद किच्छा और हरिद्वार (ग्रामीण) विधानसभा सीट से हार गये और कांग्रेस ग्यारह सीटों पर सिमट गई। 2022 के विधानसभा चुनावों ने सभी मिथकों को तोड़ते हुए जहां भाजपा की सत्ता में वापसी कराई लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए गए पुष्कर सिंह धामी अपनी खटीमा सीट से चुनाव हार गये। भाजपा आलाकमान ने हालांकि फिर से धामी पर भरोसा जताते हुए उन्हें पुनः मुख्यमंत्री बनाया फिर वह कैलाश गहतोड़ी द्वारा खाली की गई सीट चम्पावत से निर्वाचित हुए। भाजपा की राजनीति में शायद यह पहला अवसर था जब किसी हारे हुए व्यक्ति को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया वर्ना 2017 में हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल और उत्तराखण्ड में अजय भट्ट के हारने के बाद उनके नामों पर भाजपा ने विचार तक नहीं किया था।

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बात करें तो वह भाजपा आलाकमान द्वारा उन पर जताए गए भरोसे को जाया नहीं होने देना चाहते और वह अपने कार्यकलापों और निर्णयों से स्वयं की और भाजपा की पुख्ता राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं। खास बात यह है कि केंद्र में हमेशा वह ही दिखाई देते हैं। भाजपा की केंद्रीय राजनीति में तो फिर भी प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमित शाह दिखाई देते हैं लेकिन उत्तराखण्ड में भाजपा की राजनीति के केंद्र में फिलहाल इस वक्त पुष्कर सिंह धामी अगुवा हैं। सब उनके पीछे कदमताल करते नजर आते हैं। शायद उत्तराखण्ड में भाजपा की राजनीति में पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत भी है जो पूरे उत्तराखण्ड में सर्वमान्य होने की हैसियत रखता है। अगर प्रदेश में भाजपा के नेताओं पर नजर डाले तो शायद ही कोई चेहरा है जो अपने बूते चुनाव जीत कर आने की कुव्वत रखता हो। 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने ‘अबकी बार, मोदी धामी की सरकार’ के नारे को आगे रखकर चुनाव लड़ा था। 2012 के विधानसभा चुनावों में ‘खण्डूड़ी है जरूरी’ का नारा काम नहीं आया। 2017 के ुचनावों में अजय भट्ट भले ही नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष थे लेकिन वे इस अवसर को अपना व्यक्तिगत जनाधार बनाने में असफल रहे थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने मुख्यमंत्री पद की दूसरी पारी पर खुलकर खेलते नजर आ रहे हैं। इसके साथ भाजपा अपनी केंद्र की राजनीति का अनुसरण करती नजर आ रही है जहां मोदी का चेहरा ही भाजपा का चेहरा है। वैसे ही उत्तराखण्ड में पुष्कर सिंह धामी ही भाजपा का चेहरा बनते जा रहे हैं। हालांकि एक चेहरे की
राजनीति के खतरे भी कम नहीं हैं। एक चेहरे का आभामंडल फीका पड़ने पर पार्टी में निचले स्तर तक जड़ता आ जाती है। वह धीरे-धीरे उस खाली जमीन पर अपने पैर जमाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं जिसकी कमी लंबे अर्से से प्रदेश भाजपा भीतर महसूस की जा रही थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल की जड़ता उत्तराखण्ड में अब उतनी नजर नहीं आती। अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और विधानसभा भर्ती विवाद में मुख्यमंत्री ने जिस प्रकार कार्रवाई की पहल की तथा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं सचिव की गिरफ्तारी हुई, उससे संदेश गया कि सरकार दोषियों को छोड़ेगी नहीं।

 

मसूरी चिंतन शिविर के माध्यम से नौकरशाही को कड़ा संदेश दिया गया। सरकारी फाइलों को अटकाने वाले अधिकारियों को वीआरएस ले लेने की सलाह यूं ही नहीं दी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कई निर्णय ऐसे हैं जिन्होंने उनका कद भाजपा आलाकमान की नजरों में ऊंचा किया है। कॉमन सिविल कोड, धर्मांतरण कानून भाजपा के पसंदीदा विषय रहे हैं। जिस पर पुष्कर धामी ने पहल की है। भ्रष्टाचार के कई मुद्दों पर अधिकारियों पर कार्रवाई से अफसरशाही में कड़ा संदेश गया है। अपने राज्य के दौरों में मुख्यमंत्री विकास की फिजा भी तैयार करते दिखते हैं। मार्निंग वॉक के दौरान जॉगिंग करते समय लोगों से मिलना, चाय की दुकान पर चाय पी लेना, उन्हीं कवायदों का हिस्सा है। उत्तराखण्ड के सभी विधायकों से उनके क्षेत्र के दस विकास कार्यों की सूची मांगना भी सकारात्मक संदेश दे गया है बशर्तें उनका यह प्रयास राजनीतिक संकीर्णता का शिकार न बने। सूत्र बताते हैं कि संगठन महामंत्री अजेय भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ इस वक्त मजबूती से खड़े हैं। पुष्कर सिंह धामी के साथ इस वक्त संगठन का समन्वय बेहतर है। सरकार के हर निर्णय पर जिस प्रकार संगठन की प्रतिक्रिया रहती है उससे भाजपा के कॉडर पर बेहतर संदेश जाता है। कभी भाजपा के महत्वपूर्ण पदों पर रहे एक नेता का कहना है कि शायद यह युवा नेतृत्व का ही परिणाम है कि सरकार चलती हुई नजर आ रही है। इससे शायद कुछ नेताओं को परेशानी भी है। खगाड़ नेता कभी पीढ़ीगत बदलाव या कहें युवा नेतृत्व को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। त्रिवेंद्र रावत, तीरथ सिंह रावत के कतिपय बयान इसका उदाहरण है।

स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड की राजनीति एक पीढ़ीगत बदलाव के दौर से गुजर रही है। भाजपा ने पीढ़ीगत बदलाव का जो जोखिम उठाया वह कांग्रेस नहीं उठा पाई और सत्ता से वंचित हो गई। हर प्रदेश एवं पार्टी की राजनीति में एक दौर ऐसा आता है नई पीढ़ी का नेतृत्व उभरता है और उसे अवसर देना पड़ता है। शायद पुष्कर सिंह धामी का नेतृत्व उस इतिहास का गवाह बने जब नए नेताओं के उदय की इबारत लिखी जा रही थी। बशर्तें धामी इस अवसर को उत्तराखण्ड के उत्थान में तब्दील कर लें क्योंकि इतिहास नायकों को ही शिद्दत से याद रखता है।

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