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Uttarakhand

उत्तराखंड में ‘आप’ के आने पर कांग्रेस से ज्यादा बेचैन भाजपा 

आम आदमी पार्टी की उत्तराखंड में दस्तक ने राज्य की राजनीति में छाई खामोशी को तोड़ते हुए हलचल पैदा करने की कोशिश की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद आई विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि ये हलचल यूं ही नहीं है। सामान्य तौर पर और सोशियल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं को देखने पर ये अपने आप में आश्चर्यजनक है कि सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भारतीय जनता पार्टी समर्थकों की हैं। कांग्रेसी खेमे से बहुत त्वरित और तीखी प्रतिक्रियाएं उतनी देखने को नहीं मिली, जबकि सामान्य तौर पर ये धारणा है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस समर्थित मतदाता को अपनी ओर खींच कर खुद को भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले खड़ा कर पाई है। हालांकि आप भी उत्तराखंड में अपना मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से बता रही है, जबकि उसे अपनी ज़मीन बनाने के लिए कांग्रेस नेताओं का साथ लेना पड़ रहा है। खास बात ये है कि 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ आप पार्टी ने सबसे पहले सेंध कांग्रेस में ही लगाई उसमें नैनीताल जिले से लेकर अल्मोड़ा पिथौरागढ़ के कांग्रेसी शामिल हैं जिनमें अल्मोड़ा से अमित जोशी, रामनगर से शिशुपाल रावत मुख्य हैं। सुरेश चंद्र आर्य जो पूर्व में मंत्री भी रहे हैं ज़रूर एक महत्वपूर्ण नाम है जो भाजपा छोड़ कर आप में शामिल हुए हैं। इसके अलावा फिलहाल कोई ऐसा बड़ा नाम नहीं है जो भाजपा छोड़कर आप पार्टी में जा रहा हो। लेकिन सोशियल मीडिया पर उत्तराखंड में भाजपा समर्थकों की ट्रोल आर्मी जिस तरह आप के खिलाफ सक्रिय हुई है उससे भाजपा की बेचैनी समझी जा सकती है। भारी भरकम बहुमत वाली भाजपा अपने कथित वैचारिक आदर्शों को ताक पर रखकर जिस प्रकार दागियों और बागियों को समेटने में लगी है उससे भाजपा की घबराहट समझी जा सकती है। कुंवर प्रणव चैम्पियन की पार्टी में वापसी, द्वाराहाट विधायक महेश नेगी प्रकरण में सरकार व संगठन की ढुलमुल प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक है, जबकि जेनी प्रकरण में भाजपा नारायण दत्त तिवारी सरकार में मंत्री हरक सिंह रावत का इस्तीफा लेकर ही मानी थी आज जांच की दुहाई देकर महेश नेगी का बचाव कर रही है। वो बात अलग है कि आज हरक सिंह रावत भाजपा में ही हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार ने भाजपा के कान खड़े किए हैं जहां न तो अमित शाह का “शाहीनबाग” चला न ही प्रधानमंत्री मोदी का “संयोग या प्रयोग” वाला बयान।

भाजपा, कांग्रेस की प्रतिक्रियाओं के इतर देखें तो सवाल उठता है कि आम आदमी पार्टी के लिए क्या उत्तराखंड की धरती राजनीतिक लिहाज़ से इतनी मुफ़ीद है कि पार्टी यहां पर भी दिल्ली की तर्ज पर वोटों की फसल काट ले जाएगी? क्योंकि दिल्ली जैसे महानगर की स्थिति और उत्तराखंड की स्थिति में फर्क है। कॉस्मोपॉलिटन सोसाइटी का प्रतिनिधित्व करने वाली दिल्ली के मुकाबले उत्तराखंड के मतदाता की मानसिकता काफी अलग है।उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां और ग्रामीण क्षेत्र की बहुलता दिल्ली के मुकाबले बिल्कुल अलग है। उत्तराखंड की राजनीति में कई कारक हैं जो चुनाव के समय निर्णायक साबित होते हैं और जो अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले भुवन चन्द्र खण्डूड़ी और हरीश रावत जैसे कद्दावर नेताओं को उनके मुख्यमंत्री रहते हुए भी चुनावों में धराशायी कर देते हैं। रिश्तों, जातियों, स्वाभिमान और अपनी रोटी अपनी झोपड़ी जैसे कारक तथा ग्रामीण क्षेत्र का मतदाता आज भी यहां निर्णायक स्थिति में है। जैसा कि “दि सन्डे पोस्ट” की टीम ने लोगों से बातचीत में पाया कि उत्तराखंड के मतदाता के लिए मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी कोई मुद्दा नहीं है। बिजली पानी के बढ़ते दामों पर उत्तराखंड में कभी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ हो हाल के सालों में ऐसा कहीं नजर नहीं आता। हां, बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी और विकास उत्तराखंड के लोगों की प्राथमिकता में रहे हैं। उत्तराखंड में आप को मुद्दे उत्तराखंड की ज़रूरतों के अनुरूप ही चुनने पड़ेंगे।

उत्तराखंड में किसी भी दल के लिए मुद्दों की कमी नहीं है बशर्ते उन मुद्दों को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कितना भुना पाते हैं। भाजपा और कोंग्रेस की सरकारों को चुनने वाले उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की जगह होते हुए भी उत्तराखंड की जनता के सामने तीसरा मजबूत विकल्प भाजपा कोंग्रेस के इतर अन्य राजनीतिक ताकतें जनता के समक्ष पेश कर ही नहीं पाईं। जिसका परिणाम ये हुआ कि राज्य आंदोलन का नेतृत्व करने वाली ताकतें और दल पार्श्व में चले गए। ऐसा नहीं कि उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प के लिए स्पेस नहीं है। तीसरे विकल्प के लिए जो खालीपन था उसे किसी ने भरने का प्रयास नहीं किया। उत्तराखंड क्रांति दल ने विधानसभा में उपस्थिति दर्ज ज़रूर करवाई, लेकिन कभी कोंग्रेस कभी भाजपा का पिछलग्गू बन दोनों बार इसने जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो दी जिसकी परिणति आज दिख रही है, जब उत्तराखंड क्रांति दल अपने पहचान के संकट से जूझ रहा है। क्षेत्रीय अस्मिता के लिए अपने प्रदेशों में लड़ने वाले शिबु शोरेन का दल झारखंड में सरकार की अगुवाई कर रहा है, वहीं शिवसेना महाराष्ट्र में सरकार की अगुवा है। फिर ऐसा क्या था कि उत्तराखंड में राज्य निर्माण के लिये लड़ने वाली ताकतों को उत्तराखंड की जनता ने राज करने योग्य नहीं पाया? राज्य निर्माण के बाद इन क्षेत्रीय ताकतों ने राज्य निर्माण हो जाने के बाद अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। जब राज्य को एक सही आकार और दिशा के लिए इनके संघर्ष की ज़रूरत थी इन्हें सत्ता की गोद में बैठना ज्यादा उचित लगा। फिर जब इन्हें कांग्रेस और भाजपा की ही गोद में ही बैठना था तो जनता ने इन्हें फिर क्यों चुनना था। उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए लड़ाई लड़ने वाली ताकतों की धार उत्तराखंड राज्य बनने के बाद ही कुंद पड़ गई और जो एक लड़ाई राज्य बनने के बाद राज्य के अंदर लड़ी जानी चाहिए थी वो कभी लड़ी ही नहीं गई और ये ताकतें ये लड़ाई लड़ना तो दूर लड़ने का प्रयास करते हुए भी नज़र नहीं आई और तीसरी ताकत का स्थान खाली ही रह गया। आज जब उत्तराखंड क्रांति दल उस खाली जगह को भरने को आतुर है आम आदमी पार्टी का यूं चुनाव लड़ने की घोषणा किसको फायदा या नुकसान पहुंचाएगा ये भविष्य के गर्भ में है, लेकिन उत्तराखंड में आप की राह आसान होगी कहना मुश्किल है। हालांकि आप ने उत्तराखंड में लोकसभा का चुनाव लड़ा है, लेकिन उसका ज़मीनी संगठन भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले काफी कमज़ोर है। आप पार्टी की संस्कृति में विकसित हुआ ऐसा मजबूत नेतृत्व अभी आप के पास नहीं है जो जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता जमा सके। भाजपा कोंग्रेस की संस्कृति में पढ़े, पले नेताओं के सहारे चुनावी ज़मीन तलाशना आप के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। भाजपा, कांग्रेस के उपेक्षित नेता आप में शामिल होकर नेताओं की भीड़ तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन आप की विचारधारा के लिए वो कितना समर्पित रहेंगे ये सोचने वाली बात होगी, क्योंकि कांग्रेस से भाजपा में गए नेताओं के लिए भाजपा की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता आज भी नहीं है जो वो स्वयं निजी बातचीत में स्वीकार करते है, हां सत्ता के प्रति मोह उन्हें भाजपा से जोड़े हुए हैं। इसलिए सिर्फ भाजपा व कांग्रेस छोड़ कर आने वाले नेताओं के सहारे आप का उत्तराखंड में उत्थान बहुत उम्मीदें नहीं जगाता। आने वाले डेढ़ साल उत्तराखंड की राजनीति और आप के लिये बहुत महत्वपूर्ण होंगे। आप पार्टी का ज़मीनी और सांगठनिक विस्तार ही तीसरी ताकत की भूमिका उत्तराखंड की राजनीति में तय करेगा। दिल्ली में संगम विहार से आप पार्टी के विधायक दिनेश मोहनिया को उत्तराखंड राज्य का प्रभारी बनाया है जो दिन-रात मेहनत कर आप के संगठन को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। अब ये किसकी ज़मीन छीनकर और किसकी कीमत पर होगा ये आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन उत्तराखंड के राजनीतिक मैदान में भाजपा और कांग्रेस को चुनौती देने का दावा करने वाली आप पार्टी के लिए स्वयं ही कई चुनौतियां हैं जिसमें राह काटों भरी न सही पर इतनी आसान भी नहीं है।

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