[gtranslate]

दायित्वों के बंटवारे में देरी से भाजपा संगठन के भीतर जबर्दस्त आक्रोश पनप रहा है। बड़े नेता खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर भी नियुक्ति नहीं कर पा रहे हैं। इन हालात में भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं का असंतोष किसी बड़े विस्फोट का रूप धारण कर सकता है। थराली उपचुनाव में सरकार की पूरी ताकत झोंकने के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र बड़ी मुश्किल से अपनी लाज तो बचा गए, लेकिन कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी उन्हें आगामी निकाय चुनावों और २०१९ के लोकसभा चुनाव में भारी पड़ सकती है

राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार के खिलाफ भाजपा संगठन में जिस कदर रोष पनप रहा है उसको देखते हुए एक बड़े विस्फोट की आशंकाएं जताई जा रही हैं। सरकार गठन के सवा साल बाद भी सरकार में पार्टी नेताओं को एडजेस्ट न करने की नीति से भाजपा संगठन में भारी बेचैनी है। मुख्यमंत्री इस रोष को नजरंदाज कर ‘देखो और इंतजार करो’ की ही नीति का पालन कर रहे हैं। उस पर तुर्रा यह कि पार्टी नेताओं को दरकिनार कर कांग्रेस पृष्ठभूमि की महिला नेत्री ऊषा नेगी को राज्य बाल विकास संरक्षण के उपाध्यक्ष पद पर बिठा दिया गया। इससे संगठन में बवाल मच चुका है। सवा साल का कार्यकाल पूरा करने के बावजूद सरकार अभी तक दायित्वों का बंटवारा नहीं कर पा रही है। कई अति महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्वों को भरने में सरकार की रुचि नहीं है। कई ऐसे संवैधानिक आयोग हैं जो कि बगैर अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के ही चल रहे हैं। साथ ही कई ऐसे आयोग और दायित्व हैं जो जल्द ही पदविहीन होने वाले हैं। इसके बावजूद सरकार इन पर तैनाती करने के लिए अपनी राजनीतिक सुविधा का आंकलन करने में ही लगी हुई है।

अगर खाली पड़े आयोगों की बात करें तो आधा दर्जन आयोगों के पद रिक्त चल रहे हैं। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पद के बगैर चलने वाले आयोगों में उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग, उत्तराखण्ड महिला आयोग, उत्तराखण्ड अनुसूचित आयोग, राज्य योजना आयोग, उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा आयोग और सफाई कर्मचारी आयोग जैसे अति महत्वपूर्ण और संवैधानिक आयोग हैं। हालांकि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की की त्रिवेंद्र रावत सरकार दोनों ही समाज के हर वर्ग के विकास के दावे करती नहीं थकती। प्रदेश सरकार अल्पसंख्यकों, समाज के गरीब और दलित वर्ग के अलावा पिछड़ी जातियों के विकास के लिए तमाम तरह के दावे करने से पीछे नहीं है। लेकिन सरकार की नीयत पर सवाल तब उठता है जब उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग, उत्तराखण्ड अनुसूचित आयोग और उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा आयोग तथा सफाई कर्मचारी आयोग जैसे निम्न वर्ग के हितों के लिए गठित आयोगों में भी पदों पर तेैनाती से सरकार परहेज कर रही है।

सरकार के ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, महिला सुरक्षा ओैर सशक्तिकरण के दावों की पोल राज्य महिला आयोग में खाली अध्यक्ष का पद खोल देता है। इससे साफ पता चल जाता है कि सरकार अपनी ही योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए किस कदर जागरूक है। पूर्व राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सरोजनी कैंतुरा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अभी तक आयोग में अध्यक्ष की तैनाती नहीं कर पाई है। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव सामने आया है गौरादेवी कन्या धन योजना के लिए बजट नहीं होने ओैर इस योजना से किसी बालिका को कोई लाभ नहीं मिलने की खबरों से। शायद इसी को देखते हुए कांगे्रस सत्तारूढ़ भाजपा पर संवैधानिक संस्थाओं की अनदेखी का आरोप लगा रही है जो कि एक तरह से सही भी दिखाई दे रहा है।

दरअसल, सरकार आयोगों की उपयोगिता को नकारने का काम कर रही है। इसका प्रमाण यह है कि राज्य बाल सरंक्षण आयोग के अध्यक्ष पद पर तेैनात रहे योगेंद्र खण्डूड़ी ने जब अपना कार्यकाल पूरा होने की सूचना सरकार को पत्र द्वारा दी तब जाकर सरकार को इस आयोग के अध्यक्ष पद की उपयोगिता का अहसास हुआ। सरकार ने पूर्व में तिवारी सरकार के समय राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त ऊषा नेगी को बाल सरंक्षण आयोग के अध्यक्ष पद पर तैनात किया। हैरानी इस बात की है कि जहां भाजपा के कई बड़े- बड़े नेता अपनी ही सरकार में दायित्व पाने की आशा में हैं, वहीं सरकार ने कांग्रेसी पृष्ठभूमि की महिला को महत्वपूर्ण दायित्व दिया। इससे पार्टी नेता नाराज हैं।

सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष का पद भी रिक्त चल रहा है। यह पद कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा हाल में ११ दिनों तक देहरादून नगर निगम में चली कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान लग गया था। सफाई कर्मचारियों की समस्या समाधान और उनके हितों के लिए बनाए गए आयोग में जब काम ही नहीं हो पाएगा तो किस तरह सरकार राज्य के सफाई कर्मचारियों का भला कर पाएगी। हड़ताल का मुख्य कारण वेतन आदि के मामले का था। जिसे सरकार ११ दिनों तक टालती रही और देहरादून जो कि राज्य की राजधानी और केंद्र की स्मार्ट सिटी के तोैर पर चयनित किया गया है, पूरी तरह से कूड़े का ढेर बन चुका था।

उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति आयोग और अन्य पिछड़ा आयोग में भी अध्यक्ष के पद रिक्त चल रही हैं। केंद्र सरकार २०१९ के चुनाव में की दृष्टि से अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों को लुभाने के तमाम वादे और दावे कर रही है, लेकिन राज्य सरकार इन वर्गों के हित में काम करने वाले आयोगों की उपयोगिता को नकार रही है।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो मुख्यमंत्री पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की ही राह पर चलना पंसद कर रहे हैं। वे अपने राजनीतिक हितों को साधने और अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए जान-बूझकर दायित्वों के बंटवारे में देरी कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा रहे हों या हरीश रावत दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों और समय के अनुकूल महौल को देखते हुए दायित्वों का बंटवारा किया था। विजय बहुगुणा ने तो मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के ठीक एक दिन पूर्व तकरीबन २०० लोगों को दायित्वों से नवाजा था। इसी तरह हरीश रावत ने पूरे तीन वर्ष तक दायित्वों के बंटवारे के लिए अपनी सरकार और अपने लिए गणेश परिक्रमा का चलन आरंभ कर दिया था। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भाजपा संगठन के भीतर अपनी सरकार के खिलाफ पनप रहे असंतोष को साधने के लिए उचित समय पर दायित्वों को एक बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार में दायित्वों के बंटवारे के लिए भाजपाा संगठन द्वारा कोई दबाब नहीं बनाया गया। लेकिन हर दबाब को चुनाव तक टाले जाने की बात कहकर शांत किया गया। पहले नगर निकाय चुनाव तो फिर थराली उपचुनाव के बाद दायित्व दिए जाने की खबरें आईं। अब फिर से नगर निकाय चुनावों और पंचायत उपचुनावों के बाद ही दायित्व बांटे जाने की खबरें आ रही हैं, जबकि नगर निकाय चुनाव कब होंगे इसका कोई तय समय नहीं है। संभवतः इसको देखते हुए पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री रह चुके बिशन सिंह चुफाल ने दायित्व के बांटवारे में देरी पर अपनी नाराजगी सार्वजनिक तोैर पर जताई। उन्होंने साफ किया कि अगर दायित्वों में देरी है तो इससे बेहतर है कि दायित्व दिए ही न जाएं।

सरकार में दो कैबिनेट मंत्रियों के पद भी रिक्त चल रहे हैं। सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री अभी किसी सूरत में दोनों पदों पर किसी की तैनाती करने से परहेज कर रहे हैं। माना जा रहा है कि २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पूर्व या चुनाव के उपरांत ही दोनों कैबिनेट मंत्रियों के पदों पर तैनाती की जा सकती है। हालांकि मुख्यमंत्री की रणनीति चुनाव से ठीक पहले दायित्व बांटकर नेताओं को साधने की हो सकती है, लेकिन तब तक पार्टी में भूचाल आ सकता है। जिस तरह से थराली विधानसभा उपचुनाव में भाजपा संगठन और सरकार ने अपनी पूरी ताकत लगाई उसके बावजूद भाजपा की जीत का आंकड़ा दो हजार से भी कम रहा। यही आंकड़ा सरकार और खासतौर पर मुख्यमंत्री को खास परेशान करने वाला है, जबकि भाजपा ने बागी और निर्दलियों को अपने पाले में लाकर भीतरद्घात को कम करने में बड़ी सफलता पाई थी। इस सबके बावजूद कांग्रेस के मतों को भाजपा रोक नहीं पाई। जाहिर है कि भाजपा के नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चुनाव में दिलचस्पी नहीं ली।

अगर राजनीतिक तौर पर देखें तो प्रदेश भाजपा और सरकार तीन धु्रवों में बटीं हुई नजर आ रही है। एक भाजपा संगठन तो दूसरा आरएसएस। तीसरा खेमा कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं का है जिसके चलते मामला उलझता ही जा रहा है। इन तीनो धड़ों के कई ऐसे नेता हैं जो कि सरकार में अपनी भूमिका के लिए लाइन में हैं। भाजपा और संद्घ से कोई खास समस्या नहीं मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए नेताओं की एक बड़ी जमात भी दायित्व पाने की लाईन में खड़ी है। भाजपा और संद्घ नेताओं को इसका डर सता रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस से भाजपा में आए पांच नेताओं को मंत्री पद दिए गए कहीं दायित्वों में भी उनका हक कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं को न मिल जाए। हालांकि मुख्यमंत्री भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनका हक नहीं मारा जाएगा। मसलन अभी मुख्यमंत्री द्वारा जिलों के प्रभारी मंत्रियों के प्रभारों में बड़ा फेरबदल किया गया है। कांग्रेस से भाजपा में आए मंत्रियों के जिलों में कटौती कर उनको एक ही जिले का प्रभार दिया गया है, जबकि भाजपा के मंत्रियों को दो-दो जिलों का प्रभार दिया गया। यह स्थिति साफ करती है कि संगठन में गैर भाजपा पृष्ठभूमि के मंत्रियों के बजाय भाजपा मूल के मंत्रियों की नाराजगी दूर करने का प्रयास किया गया है। माना जा रहा है कि भाजपा के कार्यकर्ता इन मंत्रियों के साथ उतना सहज नहीं हो पा रहे थे जितना मूल भाजपा के मंत्रियों के साथ थे।

अब मामला चाहे जो भी हो इतना तो तय है कि भाजपा संगठन में दायित्व बंटवारे में देरी को लेकर भीतर ही भीतर रोष पनप चुका है। बिशन सिंह चुफाल द्वारा अपनी नाराजगी जाहिर करने से यह तो साफ हो ही गया कि मामला अब कार्यकर्ताओं की नाराजगी तक ही नहीं रह गया है। इसकी जद में बड़े नेता भी आ चुके हैं। जल्द ही इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया तो आने वाले समय में सरकार और भाजपा संगठन को खासी दिक्कतें हो सकती हैं। आने वाले समय में नगर निकाय चुनाव और पंचायत उपचुनाव में सरकार को पसीना बहाना पड़ेगा। २०१९ का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आ होगा।

You may also like

MERA DDDD DDD DD