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टिहरी लोकसभा क्षेत्र में दो ऐसे बड़े सियासी घरानों के बीच मुकाबला है जिनका वर्षों से यहां दबदबा रहा है। भाजपा ने इस बार भी माला राजलक्ष्मी शाह पर भरोसा जताया है, तो कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष प्रतीम सिंह पर दांव खेला है। प्रीतम सिंह के सामने पार्टी के तमाम धड़ों को साथ लेकर चलने की अहम चुनौती है। इसके अलावा उन्हें यह भी साबित करना है कि चकराता के अलावा अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी उनका वर्चस्व है। भाजपा प्रत्याशी माला राजलक्ष्मी के सामने राजघराने की प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती है। राजघराने के लोग ग्यारह बार टिहरी से सांसद चुने गए हैं
टिहरी संसदीय सीट का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है। एक तरफ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा ने तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए मौजूदा सांसद महारानी माला राजलक्ष्मी शाह पर ही दांव लगाया है। एक तरह से देखा जाए तो टिहरी लोकसभा क्षेत्र का यह चुनाव दो बड़े राजनीतिक घरानों के बीच लड़ा जा रहा है।  टिहरी राजपरिवार वर्ष 1951 से ही इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए हुए है, तो स्वर्गीय गुलाब सिंह अविभाजित उत्तर प्रदेश में वर्षों तक अपना राजनीतिक वजूद बनाए रहे। जिसका फायदा उनकी भावी पीढ़ी को मिला।
तकरीबन 19 लाख 23 हजार की आबादी और 14 लाख 49 हजार 414 मतदाताओं वाले टिहरी संसदीय क्षेत्र में तीन जिलों के 14 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। उत्तरकाशी जिले की गंगोत्री, यमनोत्री, पुरोला और टिहरी जिले की टिहरी, प्रतापनगर, घनसाली व धनौल्टी विधानसभाए सीटें इस क्षेत्र में आती हैं। देहरादून जिले की सबसे अधिक विधानसभा सीटें टिहरी संसदीय क्षेत्र में हैं। इनमें चकराता, विकासनगर, सहसपुर, रायपुर, राजपुर रोड, देहरादून केंट तथा मसूरी विधानसभा सीटें शामिल हैं। इसके चलते देहरादून जिला टिहरी संसदीय क्षेत्र के लिए राजनीतिक तौर पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण बना हुआ है। इसमें राजुपर रोड़, रायपुर, कैंट तथा मसूरी विधानसभा क्षेत्र देहरादून नगर से सटे हुए हैं जिसमें लाखों की संख्या में मतदाता किसी उम्मीदवार की जीत और हार का समीकरण बना सकते हैं।
 टिहरी संसदीय सीट पर भाजपा का एक लंबे समय तक कब्जा बरकरार रहा है। दिलचस्प यह है कि इस सीट पर टिहरी राजघराने का ही सबसे ज्यादा समय तक वर्चस्व रहा है। देश के पहले आम चुनाव में टिहरी राजघराने ने अपना जो दखल बनाया वह आज तक बरकरार है। वर्ष 1951 में टिहरी के पूर्व महाराजा स्वर्गीय नरेंद्र शाह की धर्मपत्नी महारानी कमलेंदुमति शाह पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तोर पर सांसद बनीं। वर्ष 1957 में पहली बार टिहरी राजपरिवार कांग्रेस पार्टी से जुड़ा और महाराजा मानवेंद्र शाह कांग्रेस टिकट पर सांसद निर्वाचित हुए। इसके बाद 1962 और 1967 के आम चुनाव में भी मानवेंद्र शाह कांग्रेस टिकट पर जीतते रहे।
वर्ष 1971 में कांग्रेस ओैर टिहरी राजपरिवार के संबंधों में गर्माहट नहीं रह पाई तो कांग्रेस ने स्वतंत्रा संग्राम सेनानी परिपूर्णानंद पैन्यूली को टिकट दिया, जबकि टिहरी राजपरिवार ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। पैन्यूली पहले ऐसे सांसद के तौर पर निर्वाचित हुए जो कि टिहरी राजघराने से नहीं थे। इसके बाद 1977 में स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने जनता पार्टी के टिकट पर त्रेपन सिंह नेगी को चुनाव लड़वाया और वे संसद पहुंचे। जनता पार्टी में बिखराब के बाद 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस ने त्रेपन सिंह नेगी को अपना उम्मीदवार बनाया और इस सीट पर फिर से अपना कब्जा किया। इसके बाद 1984, 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के ब्रह्मदत्त लगातार दो बार सांसद निर्वाचित हुए।
 टिहरी राजपरिवार तकरीबन 20 वर्ष तक राजनीति से दूर रहा, लेकिन बाद में भाजपा के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए टिहरी राजघराना भाजपा से जुड़ गया। 1991 के आम चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के तोर पर महाराजा मानवेंद्र शाह ने इस सीट पर फिर से अपना कब्जा किया। 1996, 1998, 1999, और 2004 में भी मानवेंद्र लगातार पांच बार टिहरी से सांसद निर्वाचित होते रहे। वर्ष 2007 में महाराजा मानवेंद्र शाह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने उनके पुत्र मनुजेंद्र शाह को उम्मीदवार बनाया, लेकिन कांग्रेस के विजय बहुगुणा ने जीत हासिल करके टिहरी राजपरिवार से यह सीट छीन डाली। जो विजय बहुगुणा वर्षों से एक जीत के लिए तरस रहे थे वे पहली बार सांसद बने। 2009 के आम चुनाव में भी बहुगुणा भाजपा उम्मीदवार ओैर निशानेबाज जसपाल राणा को भारी मतां से हराकर दोबारा सांसद बने।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रदेश की सत्ता से बाहर हुई ओैर विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने तो टिहरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। इस बार कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सुपुत्र साकेत बहुगुणा को अपना उम्मीदवार बनाया तो भाजपा ने फिर से टिहरी राजघराने पर अपना विश्वास जताया और महाराजा मनुजेंद्र शाह की धर्मपत्नी महारानी माला राजलक्ष्मी शाह को उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस से यह सीट छीन ली। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा की महारानी माला राजलक्ष्मी ने कांग्रेस के साकेत बहुगुणा को करारी मात देकर इस सीट पर टिहरी राजपरिवार का कब्जा बरकरा रखा। इस तरह से कहें तो टिहरी लोकसभा सीट पर 11 बार टिहरी राजपरिवार का कब्जा रहा है। जो कि वर्तमान में भी बना हुआ है। इसके अलावा 14 विधानसभा सीटों में से 12 पर भाजपा के विधायक हैं जिससे भाजपा को एक बड़ी मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल है।  कांग्रेस ने भी 7 बार इस सीट पर कब्जा किया। जिसमें 3 बार टिहरी राजपरिवार को टिकट देकर कांग्रेस जीती ओैर चार बार उसने राजपरिवार के बगैर चुनाव जीता। इससे इतना तो कहा ही जा सकता है कि टिहरी राजपरिवार के बगैर भी कांग्रेस का इस क्षेत्र में खासा दखल रहा है। जहां भाजपा ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए टिहरी राजपरिवार का ही सहारा लिया तो वहीं कांग्रेस ने टिहरी राजपरिवार को हराने में भी कामयाबी हासिल की। इसके अलावा 4 बार अन्य दलां के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की है। इसलिए कांग्रेस को टिहरी सीट पर कम नहीं समझा जा सकता।
पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे प्रीतम सिंह
कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और टिहरी लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी प्रीतम सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि देखें तो वे स्वर्गीय गुलाब सिंह के ज्येष्ठ पुत्र हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1957 से लेकर 1985 तक गुलाब सिंह जौनसार बाबर क्षेत्र से कई बार विधायक का चुनाव जीतते रहे। उत्तर प्रदेश में मंत्री के तौर पर उन्होंने महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व भी संभाला था। उनके निधन के बाद प्रीतम सिंह भी लगातार पांच बार विधानसभा का चुनाव जीते। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद प्रीतम सिंह कोई भी चुनाव नहीं हारे हैं। यहां तक कि देहरादून की जिला पंचायत और उसके नीचे की ईकाई तक स्वर्गीय गुलाब सिंह के परिवार का ही दबदबा रहा है।
राजनीतिक तौर पर माना जाता है कि देहरादून जिले की चकराता, विकासनगर, सहसपुर मसूरी, राजपुर रोड तथा कैंट, उत्तरकाशी की पुरोला, टिहरी की धनौल्टी विधानसभा सीट पर कांग्रेस और खास तौर पर स्वर्गीय गुलाब सिंह के परिवार का बड़ा दखल है। इन क्षेत्रों में कांग्रेस ओैर प्रीतम सिंह को खासा लाभ मिलने की पूरी संभावनाएं जताई जा रही हैं। लेकिन अभी 14 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के खाते में महज दो सीटें चकराता और पुरोला ही हैं। इसके चलते कांग्रेस को मतदाताओं से वोट पाने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ सकती है।
भाजपा की महारानी माला राजलक्ष्मी शाह लोकसभा चुनाव में भले ही एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर दिखाई दे रही हों, अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में एक सांसद के तौर पर वे कोई खास असर नहीं छोड़ पाई हैं। पूर्व महाराजा मानवेंद्र शाह के व्यवहार और ईमानदार छवि से आम जनता और भाजपा कार्यकर्ता अपने को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करते थे, लेकिन वह गुण महारानी माला राजलक्ष्मी शाह में उतना प्रभावी नहीं देखा जा रहा है। यहां तक कि अपने क्षेत्र खास तोैर पर टिहरी और उत्तरकाशी जिले में जनता से दूरी महारानी माला राजलक्ष्मी शाह के लिए चुनाव में एक बड़ी चुनौती बन सकती है। टिहरी बांध के चलते आज भी कई इलाके हर तरह की समस्याओें से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य, पेयजल और रोजगार जैसे मुद्दों के लिए जनता सड़कां पर आंदोलन करती रही है, लेकिन  सांसद होने के नाते जनता को महारानी माला राजलक्ष्मी शाह कोई राहत नहीं दे पाई हैं। हालांकि सांसद निधि खर्च करने में महारानी प्रदेश के सभी सांसदों से आगे रही हैं। 2014 के चुनाव में मोदी लहर के चलते महारानी माला राजलक्ष्मी शाह कांग्रेस को तकरीबन दो लाख मतों से हराने में कामयाब रही हैं। वर्तमान में भी भाजपा मोदी लहर की आस में टिहरी सीट पर जीत की उम्मीद देख रही है। देखना दिलचस्प होगा कि इस चुनाव में मोदी लहर कितना असर करती है।
कांग्रेस प्रत्याशी प्रीतम सिंह भी पार्टी की अंदरूनी राजनीति से जूझ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर अपने दो वर्ष के कार्यकाल के बावजूद वे अपनी कार्यकारिणी का गठन तक नहीं कर पाए हैं। इसके अलावा कांग्रेस नेताओं के मतभेद भी चुनाव में  खासा असर डाल सकते हैं जिनका खामियाजा प्रीतम सिंह को भुगतना पड़ सकता है। निकाय चुनाव के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा के चलते पार्टी को हार मिल चुकी है। देहरादून नगर निगम में कांग्रेस की करारी हार से यह साफ हो गया था कि कांग्रेस के भीतर एक-दूसरे को हरवाने की रणनीति पर ही ज्यादा काम होता है। प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद प्रीतम सिंह देहरादून नगर निगम में कांग्रेस का मेयर नहीं बैठा पाए, जबकि कांग्रेस ने तीन बार के विधायक और कैबिनेट मंत्री रहे दिनेश अग्रवाल जैसे दिग्गज को टिकट दिया था। इसके बावजूद अग्रवाल सवा लाख से भी ज्यादा मतों से चुनाव हार गए।
प्रीतम सिंह पर अपने क्षेत्र जौनसार तक ही सिमटे रहने के आरोप भी लगते रहे हैं। बावजूद इसके वे अपने क्षेत्र में कांग्रेस को बढ़त नहीं दिलवा पाए। इसके अलावा कांग्रेस संगठन में जिस तरह पर्वतीय मूल के नेताओं की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं, उसका एक बड़ा असर इन चुनावों में भी देखने को मिल सकता है। पूर्व कांग्रेस महानगर अध्यक्ष पृथ्वीराज चौहान ने प्रीतम सिंह पर पहाड़ी मूल के नेताओं की भारी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए ही भाजपा का दामन थामा था।

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