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निकाय चुनाव में कांग्रेस और बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। लेकिन पार्टी रणनीतिक मोर्चे पर असफल रही और बाकी कसर अंदरूनी मतभेदों-मनभेदों ने पूरी कर डाली

निकाय चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन एक तरह से संतोषजनक कहा जा सकता है। दो नगर निगमों के साथ 25 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस ने अपनी साख बचाने का भरपूर प्रयास किया है। भाजपा के शहरी वोट बैंक पर कांग्रेस सेंध लगाने में सफल दिखाई दे रही है। हालांकि जिस तरह से कांग्रेस अपनी जीत के बड़े-बड़े दावे कर रही थी उतना प्रदर्शन वह नहीं कर पाई। फिर भी भाजपा के अजेय रथ को काफी हद तक रोकने में कामयाब जरूर रही है।

भाजपा और कांग्रेस की तुलना करें तो कांग्रेस देश भर में लगातार हार के चलते टूटे हुए मनोबल और कार्यकर्ताओं में हताशा के माहौल से गुजर रही है। बावजूद इसके प्रदेश के निकाय चुनाव में राजनीतिक तौर पर कांग्रेस का प्रदर्शन भाजपा से बेहतर कहा जा सकता है। जहां भाजपा के पास 57 विधायकों का प्रचंड बहुमत होने से सत्ता की ताकत हासिल है तो वहीं कांग्रेस के पास महज 11 ही विधायकों का कुनबा है। जिसके आसरे पर अगर कांग्रेस निकाय चुनाव में अध्यक्ष की 23 सीटें और दो मेयर की सीटों पर कब्जा करती है तो यह कांग्रेस के लिए बेहतर अवसर है जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव में दिखाई दे सकता है।

हालांकि जिस तरह से निर्दलियां ने कांग्रेस की जीत का रास्ता रोका एवं सभासदों और पार्षद पदों पर 551 निर्दलियां ने जीत हासिल की है उससे कांग्रेस को आने वाले समय में कई चुनौतियां का सामना जरूर करना पड़ सकता है। इस बार के चुनाव में 23 निकायों के अध्यक्ष पद निर्दलियों के खाते में आए हैं। यह बड़ां आंकड़ा कांग्रेस के रणनीतिकारां के लिए आत्म मंथन के लिए एक बड़े अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए।

जानकारों की मानें तो कांग्रेस अपनी आपसी गुटबाजी और मतभेद के साथ-साथ मनभेदों को निकाय चुनाव में भी दूर नहीं कर पाई। देहरादून में जिस तरह पहले दिनेश अग्रवाल के पक्ष में माहौल दिखाई देने लगा था वह माहौल धीरे- धीरे भाजपा के पक्ष में इस कदर चला गया कि अग्रवाल को रिकॉर्ड मतां से हार का समाना करना पड़ा। यह साफ तौर से कांग्रेस की कमजोर रणनीति का ही असर रहा कि देहरादून में ही जहां कांग्रेस का हर बड़ा नेता मौजूद रहा है और अपनी राजनीति को चमकाता रहा है, वहां प्रचार में कांग्रेस पिछड़ गई। हालांकि पार्षदों के पदों में बड़ी जीत हासिल कर कांग्रेस को संतोष हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस चुनाव में भाजपा के रणनीतिकारों के समाने कमतर ही रही है।

सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ जनता में पनप रहे रोष को अपने पक्ष में करने की कामयाबी कांग्रेस हासिल नहीं कर पाई है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की बहुगुणा सरकार के समय विपक्षी भाजपा ने निकाय चुनाव में अपना परचम इस तरह लहराया था कि कांग्रेस को एक भी मेयर की सीट हासिल नहीं हो पाई थी। राजनीतिक जानकारां का मानना है कि कांग्रेस के टूटे हुए मनोबल और संसाधनों की कमी के चलते वह प्रचार में भाजपा की बराबरी नहीं कर पाई। लेकिन नीति और रणनीति में कमजोरी साफ तौर पर कांग्रेस पर सवाल खड़े करती है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और दिग्गज हीरा सिंह बिष्ट जैसे नेताओं का प्रचार में कांग्रेस सहयोग तक नहीं ले पाई। कांग्रेस में बड़े नेताओं का प्रचार से दूर रहना भी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते सामने आया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव के कुछ ही दिन पूर्व प्रदेश में प्रचार के लिए आए, जबकि सूत्रां की मानें तो कांग्रेस द्वारा हरीश रावत की चुनाव प्रचार में भूमिका तक तय नहीं की गई। हालांकि स्टार प्रचारकों की तकरीबन 50 से भी अधिक की लिस्ट कांग्रेस ने सार्वजनिक की है लेकिन पार्टी द्वारा कोई जिम्मेदारियां तय नहीं करने से स्टार प्रचारक उहापोह में ही रहे।

New Delhi: Uttarakhand Chief Minister Harish Rawat talks to the media after meeting Congress President Sonia Gandhi at 10 Janpath in New Delhi on Thursday. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI5_12_2016_000189A)

कहा जा रहा है कि प्रदेश संगठन द्वारा प्रचार में अनदेखी के कारण कई उम्मीदवारों ने हरीश रावत से मांग की कि वे उनके लिए प्रचार करें। इसी के चलते हरीश रावत चुनाव प्रचार में आए। इसी तरह से किशोर उपाध्याय की भूमिका भी उम्मीदवारों के बुलावे तक सीमित रही। निकाय चुनाव में सबसे बड़ा आश्चर्यजनक नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश की भूमिका को लेकर है। नेता प्रतिपक्ष के पद पर होने के बावजूद वे अपने सुपत्र सुमित हृदेश के चुनाव प्रचार में इस कदर व्यस्त रहीं कि हल्द्वानी से बाहर निकलने का साहस नहीं कर पाईं। जबकि प्रचार में उनकी भूमिका सबसे अधिक होनी चाहिए थी। फिर भी इंदिरा हृदेश तमाम प्रयासों के बावजूद अपने पुत्र को हल्द्वानी का मेयर नहीं बनवा पाईं। यह कांग्रेस की एक बड़ी हार मानी जा रही है।

पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी अपनी पत्नी हेमलता नेगी के चुनाव के कारण कोटद्वार से बाहर निकलने का समय नहीं निकाल पाए। जिसका परिणाम रहा कि वे अपनी धर्मपत्नी को कोटद्वार नगर निगम का पहला मेयर बनवाने में सफल रहे। पूर्व मंत्री शूरबीर सिंह सजवाण नई टिहरी नगर पालिका में अपनी पत्नी को चुनाव जितवाने में नाकाम रहे हैं। साथ ही अपने और अपनी पत्नी के राजनीतिक करियर पर सवालिया निशान लगा चुके हैं। लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अपनी पत्नी अंबिका सजवाण जो कि पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं, को वह टिहरी नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव नहीं जितवा पाए। कांग्रेस के लिए कोटद्वार, हरिद्वार नगर निगम की सीट पर जीत राजनीतिक तौर पर बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। कोटद्वार में लैंसडाउन के विधायक दिलीप रावत की पत्नी मेयर पद के लिए भाजपा की उम्मीदवार थीं। उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने कोटद्वार से विधायक और सरकार में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत को जिम्मदारी दी थी। इसके वाबजूद कांग्रेस ने कोटद्वार में जीत हासिल की। इसी तरह हरिद्वार में मदन कौशिक की प्रतिष्ठा से जुड़ी सीट होने के बावजूद भाजपा से कांग्रेस ने यह सीट छीनकर भाजपा के सभी प्रयासों को आईना दिखाया है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी डोईवाला नगर पालिका अध्यक्ष पद पर जीत रही है। भाजपा की उम्मीदवार नगीना रानी को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की पसंद पर ही उम्मीदवार बनाया गया था जिसका भारी विरोध भी हुआ। कांग्रेस ने भाजपा से यह सीट छीनकर फिर से वापसी की। इसी तरह गैरसैंण में जहां कांग्रेस विधानसभा उपचुनाव में हार गई थी निकाय चुनाव में भाजपा पर भारी पड़ी है। उत्तरकाशी से कांग्रेस ने पहली बार नगर पालिका अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है। कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए यह निकाय चुनाव राहत लेकर तो आए हैं लेकिन पार्टी के भीतर गुटबाजी और खेमेबाजी को खत्म करना पहली चुनौती है।

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