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Uttarakhand

अवैध खनन के हमाम में सभी नंगे

कैग ने सबसे ज्यादा सनसनीखेज खुलासा खनन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा तैयार की गई खनन निगरानी प्रणाली को उत्तराखण्ड में पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी लागू नहीं किए जाने को लेकर किया है। यह एक उपग्रह-आधारित निगरानी प्रणाली है जिसका उद्देश्य अवैध खनन गतिविधियों को रोकना है। यह अतिविकसित ऐसी प्रणाली है जिसके जरिए समूचे प्रदेश में खनन की अवैध गतिविधियों को तत्काल पकड़ा जा सकता है। खनन मंत्रालय ने अक्टूबर 2016 में उत्तराखण्ड सरकार को भेजे अपने पत्र में इस खनन निगरानी प्रणाली को लागू करने की बात कही थी। कैग ने पाया कि पांच वर्ष पूर्व दिए गए केंद्र सरकार के निर्देश को दरकिनार कर इस प्रणाली को राज्य में लागू ही नहीं किया गया है। कैग ने इस विषयक राज्य सरकार से पूछा तो उसे बताया गया कि मार्च 2022 में इस विषयक ‘माइनिंग डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन एंड सर्विलांस सिस्टम’ विकसित किए जाने के लिए ई-टेंडर प्रक्रिया शुरू की जा रही है। राज्य की सत्ता व्यवस्था इस कदर बदहाल है कि एक बरस से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ‘निगरानी प्रक्रिया’ को लागू नहीं किया गया है। प्रदेश के खनन सचिव के अनुसार अभी तक यह प्रणाली लागू नहीं की गई है। अवैध खनन पर कार्रवाई की बाबत पूछे जाने पर वह टिप्पणी करने से इंकार कर देते हैं

भारत सरकार की ऑडिट एजेंसी ‘कैग’ ने उत्तराखण्ड शासन व्यवस्था का सच अपनी ताजातरीन रिपोर्ट में उजागर कर समूचे तंत्र को नकारा और भ्रष्ट साबित करने का काम किया है। इस रिपोर्ट में प्रदेश भर में अवैध खनन की बाबत जो तथ्य दिए गए हैं उससे स्पष्ट होता है कि इस प्रकार की अवैध गतिविधियों को संरक्षण देने का काम सत्ता व्यवस्था के शीर्ष से शुरू होता है और सरकारी तंत्र का हर कल-पुर्जा इसमें शामिल है। कैग की ऑडिट रिपोर्ट अकेले देहरादून जिले में वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020-21 के मध्य तीन ऐसी नदियों में अवैध खनन के जरिए 57.11 लाख मैट्रिक टन उपखनिज की लूट को सामने लाई है। लगभग दो सौ करोड़ मूल्य का उपखनिज यदि देहरादून जिले की तीन नदियों से लूटा गया है तो प्रदेश के 12 अन्य जिलों में इसी समयकाल में कितना अवैध खनन किया गया होगा इसका आकलन कई खरब के काले कारोबार की तरफ इशारा करता है। कैग की रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि हुई है कि इस अवैध खनन की खरीददार भी राज्य सरकार की निर्माण एजेंसियां ही रही हैं। अकेले देहरादून जनपद में सरकारी निर्माण कर रही एजेंसियों, जिनमें प्रमुख रूप से गढ़वाल मंडल विकास निगम का नाम सामने आया है, ने लगभग 37.17 लाख मैट्रिक टन अवैध खनन सामग्री का उपयोग किया है। कैग ने इस अवैध खनन में सरकारी तंत्र की मिलीभगत को चिन्हित करते हुए टिप्पणी की है कि ‘भूतत्व एवं खनिजकर्म इकाई, जिला कलेक्टर, पुलिस विभाग, वन विभाग एवं परियोजना प्रस्तावक और गढ़वाल मंडल विकास निगम लिमिटेड जैसी सभी सरकारी एजेंसियां सामूहिक रूप से अवैध खनन को रोकने और उसका पता लगाने में विफल रहीं। भूतत्व एवं खनिजकर्म इकाई, भारत सरकार की खनन निगरानी प्रणाली नामक पहल को विगत पांच वर्षों से अधिक समय से लागू करने में विफल रही।’

नहीं लागू की गई खनन निगरानी प्रणाली
केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बालू खनन प्रबंधन पर नजर रखने और अवैध खनन को रोकने के लिए व्यापक दिशा-निर्दश वर्ष 2016 में जारी किए जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ विशेष रूप से खनन की अवैध गतिविधियों की रोकथाम के लिए विशेष ‘अभिवहन पास’ के जरिए खनन सामग्री का परिवहन किए जाने की व्यवस्था है। यह ‘अभिवहन पास’ मैग्नेटिक इंक कैरेक्टर रिकग्निशन पेपर पर छपे होने चाहिए और इनमें यूनिक बार कोड, क्यू आर कोड, अदृश्य इंक मार्क (ताकि नकली पास न छापे जा सकें) और वॉटरमार्क होने चाहिए। साथ ही खनन स्थल से खनन भंडारण स्थल तक वाहन के मार्ग पर नजर रखने के लिए रेडिया-फ्रीक्वेंसी, आइडेन्टीफिकेशन टैग्स् और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) प्रणाली को प्रयोग में लाए जाने की व्यवस्था बनाई गई है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि इन नियमों का पालन उत्तराखण्ड में नहीं किया जा रहा है जिसके चलते सरकारी तंत्र की मिलीभगत से खरबों के अवैध खनन का ‘खेला’ बेरोक-टोक चल रहा है।

कैग ने इस खनन निगरानी प्रणाली को लागू न किए जाने की बाबत अपनी ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से लिखा है कि-‘पर्यावरण स्वीकृति की शर्तों तथा लागू नियमों और नीतियों के अनुपालन की जांच करने के लिए विभिन्न स्थानों (खनन स्थलों, पारगमन/सड़क पर, भंडारण, निर्माण स्थलों) पर निरीक्षण और प्रवर्तन तंत्र अप्रभावी था। तदनुसार, परियोजना प्रस्तावक के वाहन बिना टै्रकिंग, निर्धारित स्थानों पर सीसीटीवी आधारित निगरानी के बिना काम कर रहे थे।’
कैग ने इसके लिए सीधे खनन विभाग को दोषी माना है।

गैर पंजीकृत स्टाकिस्ट
कैग ने अकेले देहरादून जिले में बालू, पत्थर, गिट, बजरी आदि का व्यापार करने के लिए 219 व्यापारियों के सेल्स टैक्स विभाग में पंजीकृत होना पाया लेकिन इनमें से मात्र 34 व्यापारी ही जिला खनन अधिकारी कार्यालय में रजिस्टर्ड थे। इसे कैग ने खनन विभाग की बड़ी नाकामी करार दिया है।

असत्यापित तोले मशीनें
अवैध खनन को सहायता पहुंचाने के लिए देहरादून जनपद में आठ धर्मकांटों की जांच की। इन आठ में से दो धर्मकांटे खनन विभाग द्वारा सत्यापित नहीं थे तथा एक धर्मकांटे में तोलने की मशीन में गड़बड़ी पाई गई। सौंग नदी के समीप स्थित मैसर्स प्रदीप अग्रवाल धर्म कांटा और टौंस नदी के समीप मैसर्स रमेश रौतेला धर्मकांटा अवैध निकला। कुल्हाल नदी के निकट स्थित एनएस धर्मकांटा में तौल की गड़बड़ी पकड़ी गई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में इस बाबत लिया है कि ‘संदिग्ध धर्मकांटों के आलोक में, अभिवहन पास में उल्लेखित मात्रा/वजन संदेहास्पद था।’

पांच वर्ष बाद भी उपग्रह आधारित प्रणाली राज्य में नहीं है लागू
सबसे सनसनीखेज खुलासा कैग ने खनन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा तैयार की गई खनन निगरानी प्रणाली को उत्तराखण्ड में पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी लागू नहीं किए जाने को लेकर किया है। यह एक उपग्रह-आधारित निगरानी प्रणाली है जिसका उद्देश्य अवैध खनन गतिविधियों को रोकना है। यह अतिविकसित ऐसी प्रणाली है जिसके जरिए समूचे प्रदेश में खनन की अवैध गतिविधियों को तत्काल पकड़ा जा सकता है। खनन मंत्रालय ने अक्टूबर, 2016 में उत्तराखण्ड सरकार को भेजे अपने पत्र में इस खनन निगरानी प्रणाली को लागू करने की बात कही थी। कैग ने पाया कि पांच वर्ष पूर्व दिए गए केंद्र सरकार के निर्देश को दरकिनार कर इस प्रणाली को राज्य में लागू ही नहीं किया गया है। कैग ने इस विषयक राज्य सरकार से पूछा तो उसे बताया गया कि मार्च, 2022 में इस विषयक ‘माइनिंग डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन एंड सविलांस सिस्टम’ विकसित किए जाने के लिए ई-टेंडर प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

कैग ने अपने ऑडिट में यह भी पाया कि राज्य सरकार का खनन विभाग ऐसे वाहनों के नाम पर ई-रवन्ना (परमिट) जारी करता है जिन पर खनन सामग्री नहीं ढोई जा सकती है। ऐसे वाहनों में एम्बुलेंस, पेट्रोल टैंकर, ई-रिक्शा, दोपहिया वाहन शिमल हैं। जाहिर है नकली वाहन पास जारी करने के पीछे अवैध खनन का खेला है। खनन सचिव ने कैग द्वारा पूछे जाने पर बताया कि खनन विभाग और परिवहन विभाग के मध्य तालमेल (वेब एप्लिकेशन) प्रणाली नहीं होने के चलते ऐसा हुआ है। भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए व्यवस्था की जाएगी। कैग ने परिवहन विभाग की इस ‘खेला’ में मिलीभगत को चिÐत करते हुए लिखा है-

परिवहन प्राधिकारी वाणिज्यिक और निजी वाहनों द्वारा लागू नियमों के अनुपालन का पता लगाने के लिए भौतिक निरीक्षण करने के लिए बाध्य हैं। यथापि, विभाग उचित पंजीकरण के बिना वाहनों का संचालन, निजी वाहनों से खनन सामग्री का ढुलान और क्षमता से अधिक वजन की सामग्री ले जाने वाले वाहनां को रोकने और उनका पता लगाने में विफल रहे।’ लोक निर्माण विभाग को भी अपने दायित्यों का निर्वहन करने में कैग ने विफल बताते हुए कहा है-‘निर्माण एजेंसियों ने ठेकेदारों को अवैध रूप से खनन किए गए खनिजों का उपयोग करने की अनुमति दी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ठेकेदारों द्वारा की जा रही अवैधता के बारे में अधिकारियों (जिला कलेक्टर, जिला खनन अधिकारी, पुलिस, परिवहन विभाग) को सूचित नहीं किया।’

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बाबत कैग ने टिप्पणी की है-
‘उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूईपीपीसीबी) खनन से पूर्व, खनन पट्टा धारक को स्थापित करने की सहमति और संचालन की सहमति देता है। उपखनिज के अवैध खनन/परिवहन, उस स्थल के वातावरण को प्रदूषित करता है, जहां कहीं भी यह गतिविधि की गई, यूईपीपीसीबी उन खनन स्थलों की निगरानी करने में विफल रहा, जहां अवैध खनन किया गया है।’
पुलिस विभाग ने भी लूट के इस ‘खेला’ में अपना किरदार बखूबी निभाया है। कैग की रिपोर्ट इस विषय पर कहती है-
‘उत्तराखण्ड पुलिस अधिनियम के अनुसार, पुलिस विभाग को भूतत्व और खनिजकर्म इकाई के नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की जांच करनी चाहिए, लेकिन पुलिस विभाग अवैध खनिजों के परिवहन में सम्मिलित वाहनें की जांच करने में विफल रहा।’
जिला अधिकारी भला कैसे पीछे रहते। उनकी बाबत कैग ने टिप्पणी की है

‘खनन प्रक्रिया के सभी चरणों (खनन पट्टों की प्रक्रिया, खुदरा विक्रेताओं को लाइसेंस देना, अवैध खनन, परिवहन और भंडारण की जांच, जुर्मान लगाना, मासिक विवरण की समीक्षा, सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा, डीएमओ के कार्य की निगरानी) को विनियमित करने की शक्ति प्रदत्त होने और जिले के सभी विभागों के संबंध में समन्वय और निरीक्षण की जिम्मेदारी रखते हुए, वह खनन संबंधी नियमों और विनियमों और एनजीटी के निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने में विफल रहे। इसका तात्पर्य यह भी है कि एनजीटी के निर्देश कि, अवैध खनन के लिए जिला प्रशासन पूरी तरह से जवाबदेह होगा, को जिला कलेक्टर द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।’

विधिक वाट माप विभाग पर कठोर टिप्पणी करते हुए कैग ने कहा है-

‘बाट-माप विभाग तौल मशीन की जांच में विफल रहा। लेखापरीक्षा दल द्वारा बाट-माप विभाग के अधिकारियों के साथ जिला देहरादून के खनन स्थलों के अतिरिक्त अन्य छह खनन स्थलों और स्थानों पर किए गए संयुक्त भौतिक सत्यापन (नवंबर-दिसंबर 2021) में पाया गया कि छह तौल मशीनों में से चार वजन मशीनें खनन स्थलों के बहिर्गमन क्षेत्र में स्थापित थीं, उनमें से दो मशीनों29 को बाट-माप विभाग द्वारा सत्यापित और मुद्रांकित नहीं पाया गया, और एक अन्य में साइट30 पर कोई सत्यापित कागज-पत्र नहीं पाए गए थे, खनन स्थलों के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर स्थापित अन्य दो तौल मशीनों में से एक मशीन31 मानक वजन परीक्षण में विफल पाई गई।’

उपसंहार
भारत सरकार की ऑडिट एजेंसी ने देवभूमि में चल रहे अवैध खनन का पर्दाफाश कर लगभग समस्त सरकारी तंत्र से कठघरे में खड़ा तो कर दिया है लेकिन इस रिपोर्ट के बाद क्या तंत्र में सुधार होगा? या फिर सारा ‘खेला’ पूर्व की भांति चलता रहेगा? ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनका जवाब वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर निर्भर करता है। यदि राज्य सरकार कैग द्वारा चिÐत बिंदुओं पर कार्रवाई करती है और राज्य में खनन निगरानी प्रणाली को स्थापित तरीके से लागू करती है तो निश्चित ही धामी एक ऐसे मुख्यमंत्री के बतौर अपनी छाप छोड़ने में सफल रहेंगे जिसकी कथनी और करनी में भेद नहीं मिलेगा। अन्यथा अपने कई पूर्ववर्तियों की तरह वे भी देवभूमि के साथ न्याय न कर पाने वाले शासक बतौर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएंगे।

 

‘एक-एक गाड़ी की निगरानी हम नहीं कर सकते’

खनन सचिव पंकज पाण्डेय से बातचीत

मंत्रालय द्वारा उपग्रह आधारित-निगरानी प्रणाली को वर्ष 2016 से ही लागू किया जाना था। कैग ने पाया कि राज्य में यह निगरानी प्रणाली लागू ही नहीं की गई है। वर्तमान में क्या स्थिति है? (खनन सचिव ने कैग को 2022 में आश्वस्त किया था कि राज्य में यह प्रणाली लागू की जा रही है।)

अभी कुछ दिन पहले ही मैं इस संबंध में दिल्ली गया था जहां मंत्रालय को बताया है कि निगरानी प्रणाली लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही निगरानी प्रणाली शुरू कर दी जाएगी।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि हजारों की संख्या में ऐसे वाहनों के नाम पर अभिवहन पत्र (ई-रवन्ना) जारी किए गए जो अनुपयुक्त वाहन (जैसे एम्बुलेंस, पेट्रोल टैंकर, ई-रिक्शा इत्यादि थे।) राज्य सरकार ने कैग को स्पष्टीकरण दिया कि परिवहन और खनन विभाग के मध्य इस बाबत तालमेल (वेब आधारित प्रणाली) न होने के चलते हुआ है। क्या अब ऐसी प्रणाली विकसित कर ली गई है?

एक-एक गाड़ी की निगरानी हम नहीं कर सकते हैं। इस बाबत संबंधित जिलाधिकारी से जांच कराने की जिम्मेदारी सौंपी है। जैसा आप कह रहे हैं ऐसी कोई प्रणाली अभी विकसित नहीं हुई है।

देहरादून की तीन नदियों सौंग, कुल्हाल और ठकरानी में लॉकडाउन के दौरा बड़े पैमाने पर अवैध खनन की बात कैग ने कही है। इस पर क्या कोई कार्यवाही अवैध खनन कारोबारियों पर एवं खनन विभाग के अट्टिकारियों पर प्रस्तावित है?
इस संबंध में कुछ नहीं कह पाऊंगा।

उत्तराखण्ड माफियाओं का अड्डा हो गया है : शिवानंद

हरिद्वार स्थित मातृसदन बीते कई वर्षों से गंगा नदी में हो रहे अवैध खनन को लेकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराता रहा है। वर्ष 2011 में सदन के एक साधक स्वामी निगमानंद ने अवैध खनन के खिलाफ 62 दिनों तक आमरण-अनशन किया था। उनकी इस अनशन के दौरान ही मृत्यु हो गई थी। तब यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल ने भी मातृसदन में रहकर ही लंबे अर्से तक पर्यावरणीय मुद्दों पर अनशन किया था। 112वें दिन में एक अनशन के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी।

मातृसदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद आज भी अवैध खनन को लेकर अदालतों औश्र अदालत से बाहर संघर्ष कर रहे हैं। प्रदेश में हो रहे अवैध खनन पर वे कहते हैं कि ‘उत्तराखण्ड माफियाओं का अड्डा हो गया है। खनन माफिया यहां पूर्ण रूप से सक्रिय हैं। मुख्यमंत्री धामी जी पूर्व से ही खनन के गलत धंधे में स्वामी यतीश्वरानंद के साथ लिप्त थे। अभी मुख्यमंत्री हैं तो खनन की नीति ही ऐसी बना दी गई है कि माफियाओं को खुलेआम लूटने की छूट है। इससे पहले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे, उनका भी यही एप्रोच था। वे केंद्र तक लड़ने के लिए चले जाते थे कि खनन खोलो।’ कैग की ऑडिट रिपोर्ट की बाबत शिवानंद महाराज का कहना है कि ‘कैग ने देहरादून के कुछ क्षेत्रों में ड्रोन से निरिक्षण किया और जांच के द्वारा पाया कि घोर अनियमितताएं थी और वे अनियमितताएं लॉकडाउन के समय में भी थीं। उस वक्त हरिद्वार में भी यही स्थिति थी। हरिद्वार को नहीं चुना गया क्योंकि यहां के माफिया बहुत प्रभावी हैं। कैग ने यदि यहां निरिक्षण किया होता तो और भी कई गुना घोटाला सामने आता।’

प्रदेश में अवैध खनन माफियाओं के वर्चस्व पर शिवानंद महाराज का मानना है कि उत्तराखण्ड वन विकास निगम ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के आदेश की अवहेलना करते हुए 2020-22 में गंगा जी में खनन किया। वे इसके लिए स्पष्ट तौर पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आर मिनाक्षी सुन्दरम और हरिद्वार के पूर्व जिलाधिकारी सी रविशंकर को दोषी करार देते हैं। मातृसदन के संस्थापक का कहना है कि ‘इन दोनों अधिकारियों ने खनन व्यवसायियों के साथ मिलकर बंद पड़े खनन को खुलवा दिया। इस खनन के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति भी नहीं थी। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का 9 अक्टूबर 2018 का आदेश भी लागू था जिससे खनन प्रतिबंधित था। इतना ही नहीं, पर्यावरण मंत्रालय ने जो पर्यावरणीय स्वीकृति दी थी उसमें स्पष्ट कह दिया था कि जिस क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का आदेश लागू है वहां पर खनन नहीं होगा। जब यह बात माननीय उच्च न्यायालय में सुनी जा रही थी तब राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय से भी पूछा जाए कि खनन किस आधार पर किया जा रहा है। इस पर तब पर्यावरण मंत्रालय ने यह स्पष्ट कह दिया कि हमने तो खनन के लिए कहा ही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि हमने अपने स्वीकृति में यह शर्त लगा दी थी कि प्रतिबंधित क्षेत्र में खनन नहीं होगा और यह जो भी खनन हो रहा है यह पर्यावरणीय स्वीकृति के विरुद्ध हो रहा है जिसके लिए उत्तराखण्ड सरकार उत्तरदायी है क्योंकि खनन का विनियमन करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। 4 खनन लॉट हैं जिसके बारे में पर्यावरण मंत्रालय ने लिखित में यह दिया है कि बिशनपुर में 49, चिड़ियापुर में 48, भोगपुर में 46 और श्यामपुर में 46 नियमों/शर्तों का उल्लंघन पाया गया। इसी के तहत पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तराखण्ड वन विकास निगम को 23 फरवरी 2023 को ‘कारण बताओ नोटिस’ नोटिस जारी किया है।’ शिवानंद महाराज का कहना है कि उत्तराखण्ड वन विकास निगम के निदेशक को निलंबित किया जाए, उनपर जांच बैठे। साथ ही आईएएस मीनाक्षी सुन्दरम और सी रविशंकर को भी तत्काल प्रभाव से निलंबित करके इन्होंने जो नियम का उल्लंघन किया है उस पर जांच बैठे।

शिवानंद महाराज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ‘इस बीच हमने अनेक बार उत्तराखण्ड वन विकास निगम को ब्लैकलिस्ट करने के लिए पत्र लिखा है। लेकिन धामी जी ने हमारे एक भी पत्र का संज्ञान नहीं लिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय से हमारे पत्रों का जवाब आता है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने हमसे फोन करके पूछा कि आपकी शिकायत का निवारण हुआ या नहीं। लेकिन धामी जी के यहां से एक भी पत्र का जवाब नहीं आता है।’

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