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अपनी संगठन क्षमता और व्यवहारकुशलता के कारण अजय भट्ट निरंतर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहे। राजनीतिक पंडितों ने कल्पना भी नहीं की थी कि नैनीताल में वे कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत पर भारी पड़ेंगे

दो साल पहले ही रानीखेत से विधानसभा का चुनाव हारे उत्तराखण्ड भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट के लिए नैनीताल का लोकसभा चुनाव जीवन-मरण का सवाल बन गया था। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी द्वारा लोकसभा चुनाव लड़ने की अनिच्छा जाहिर करने के बाद नैनीताल लोकसभा सीट पर भाजपा टिकट के कई दावेदार थे। जिनमें पूर्व सांसद बलराज पासी और भगत सिंह कोश्यारी के खास खटीमा के विधायक पुष्कर धामी के नाम प्रमुख थे। लेकिन भाजपा हाईकमान ने सबको दरकिनार कर अजय भट्ट को प्राथमिकता देते हुए यह जता दिया कि विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद भट्ट ही पार्टी की नजरों में ‘मास लीडर’ हैं। पार्टी आलाकमान ने भट्ट पर भरोसा करके उनके कद को और बढा दिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक विजय मिलने का श्रेय भी भट्ट के खाते में ही गया था। तब भी भट्ट प्रदेश अध्यक्ष थे और आज भी हैं। अजय भट्ट के कार्यकाल में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तराखण्ड में प्रचंड जीत मिलना अति महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।

जगजाहिर है कि लोकसभा चुनाव में भट्ट का मुकाबला कांग्रेस महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे दिग्गज प्रतिद्वंदी से था। ऐसे में अजय भट्ट के लिए नैनीताल सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रख पाना एक मुश्किल चुनौती थी। इस सीट से भट्ट ने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा। राजनीतिक पंड़ितों का मानना था कि हरीश रावत के राजनीतिक कद और अनुभव के हिसाब से भट्ट अपेक्षाकृत नए थे। फिर भी भट्ट इतने भारी पड़े कि जिसकी किसी को कल्पना नहीं थी। हालांकि नैनीताल के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने उनके लिए धुआंधार प्रचार किया और नरेंद्र मोदी फैक्टर भी भट्ट के पक्ष में था, फिर भी किसी बड़े नेता को टक्कर देना वाकई चुनौतीपूर्ण था।
वर्ष 2014 की प्रचंड मोदी लहर में कोश्यारी ने कांग्रेस से यह सीट छीनी थी। लेकिन इस बार उनके चुनाव लड़ने की अनिच्छा जाहिर करने के बाद बीजेपी ने इस सीट से अजय भट्ट को उम्मीदवार बनाया। हालांकि चुनाव लड़ने से पीछे हटने के बावजूद कोश्यारी भट्ट के लिए चुनाव प्रचार करने में जुटे रहे। नैनीताल सीट का चुनाव कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए ही एक बड़ी चुनौती था। यह चुनाव दोनों प्रत्याशियों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न भी था। अजय भट्ट और हरीश रावत दोनों को ही 2017 के विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था और अब चुनाव जीतकर उन्हें अपनी खोई हुई राजनीतिक ताकत वापस लानी थी।

वर्ष 2017 में अजय भट्ट जहां अल्मोड़ा जिले की रानीखेत विधानसभा सीट से हार गए थे, वहीं मुख्यमंत्री के रूप में चुनाव लड़ने वाले हरीश रावत भी किच्छा और हरिद्वार (ग्रामीण) दोनों सीटों से पराजित हो गए थे। इस बार जीत के लिए कांग्रेस के खांटी नेता हरीश रावत अपने पक्ष में मतदाताओं को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे थे। क्षेत्र में घूम-घूमकर रोजाना आधा दर्जन सभाएं और रैलियां करने के अलावा लोगों से सीधा संपर्क भी साध रहे थे। बावजूद इसके अजय भट्ट का तीन लाख 39 हजार वोटों से जीतना रावत के राजनीतिक जीवन पर एक प्रश्नचिन्ह लगा गया है।

गौरतलब है कि अजय भट्ट 31 दिसंबर 2015 को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने थे। इसके साथ ही वे 19 मई 2012 से लेकर 15 मार्च 2017 तक नेता प्रतिपक्ष भी रहे। 2001 में राज्य की अंतरिम सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दायित्व भी मिला था। भट्ट ने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में कांग्रेस सरकार के दौरान हुए नैनीसार भूमि अधिग्रहण , एफएलटू नीति, छात्रवृत्ति घोटाला, खाद्यान्न घोटाले और एनएच घोटाले को सदन में पुरजोर तरीके से उठाया था। वर्ष 2017 के उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में भट्ट पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में भी रहे। तब अगर वह रानीखेत से चुनाव नहीं हारते तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हो सकते थे। अजय भट्ट उत्तर प्रदेश में 1996 से 2000 तक रानीखेत से विधायक रहे। इसके बाद उत्तराखण्ड का सृजन हुआ तो वर्ष 2002 से 2007 तक वह दोबारा रानीखेत से विधायक बने। साल 2002 से 2007 तक विधानमंडल दल में मंत्री पद पर भी विराजमान रहे। उन्होंने इससे पहले स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्य किया, जबकि 2009 से 2011 तक वह उत्तराखण्ड सरकार में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य सलाहकार एवं अनुश्रवण परिषद् के अध्यक्ष भी रहे।

नैनीताल से अजय भट्ट की जीत के साथ ही प्रदेश में प्रचलित वह मिथक भी टूट गया, जिसके अनुसार माना जाता था कि अगर भट्ट जीते तो केंद्र या राज्य में पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ता है। इस बार अजय भट्ट अजेय रहे साथ ही भाजपा भी विजयी रही। इस मिथक की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई थी। उस वक्त राज्य में हुए पहले विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट ने रानीखेत विधानसभा सीट से जीत दर्ज कराई, लेकिन भाजपा सत्ता में नहीं आ सकी। उस दौरान सत्ता कांग्रेस को मिली। फिर साल 2007 में एक बार फिर अजय भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, पर इस बार वह हार गए, लेकिन भाजपा को बहुमत मिला और वह प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट से फिर चुनाव जीत गए। लेकिन भाजपा प्रदेश में सरकार नहीं बना पाई। उस दौरान भी सरकार कांग्रेस की बनी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट चुनाव हार गए थे, लेकिन उनकी पार्टी ने प्रदेश में प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी। प्रदेश की 70 सीटां में से 57 पर भाजपा की जीत ने उत्तराखण्ड राज्य में अब तक सबसे ज्यादा सीटों पर जीतने का रिकार्ड बना दिया। इस बार अजय भट्ट का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा था, उनके सामने कांग्रेस के प्रत्याशी हरीश रावत थे, लेकिन भाग्य ने अजय भट्ट का साथ दिया और वह बड़े अंतर से हरीश रावत को हराने में कामयाब रहे। हरीश रावत के लिए यह हार बहुत बड़ा झटका मानी जा रही है। इस हार से रावत का 2022 का सपना भी डगमगा गया है।

मजबूत नेता

उत्तराखण्ड की राजनीति में अजय भट्ट का कद मुख्यमंत्री के मुकाबले कम नहीं आंका जाता है। संगठन को मजबूती देने के कारण वे सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत पर भारी पड़ते रहे हैं। कई बार ऐसे मौके आए। उल्लेखनीय है कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र को लेकर अजय भट्ट ने यह कहकर मामले को तूल दे दिया था कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र का आयोजन तभी किया जाए जब वहां व्यवस्था दुरुस्त हो जाए। बिना सशक्त व्यवस्था के गैरसैंण में विधानसभा सत्र का आयोजन करना ठीक नहीं है। भट्ट के इस बयान के बाद मुख्यमंत्री ने यह कहा था कि गैरसैंण में सत्र कराना है या नहीं, यह काम संगठन का नहीं है। सरकार तय करेगी कि क्या करना है। इसके बाद से भट्ट और मुख्यमंत्री के बीच बयानबाजी शुरू हो गयी थी। मामला भाजपा हाईकमान के पास तक पहुंचा था।

पायलट बाबा से मुलाकात के मायने

भट्ट की खासियत है कि वे संकट के समय अपनों के साथ खड़े रहते हैं। अपने आध्यात्मिक गुरु पायलट बाबा के साथ वे संकट में भी दिखाई दिए। चुनाव प्रचार के व्यस्त समय में से कुछ पल निकालकर वह उनसे मिले। उनकी इस मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कुछ दिन पहले नैनीताल हाईकोर्ट ने पायलट बाबा को धोखाधड़ी के मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज कर जेल भेज दिया था। जेल में उनकी तबीयत खराब हो जाने के कारण उन्हें तत्काल हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ऐसा कहा जाता है कि अजय भट्ट पायलट बाबा के खास माने जाते हैं। 4 अप्रैल 2019 को कोर्ट ने पायलट बाबा को जेल भेज दिया था। उसके बाद उनकी तबीयत खराब हो जाने के कारण उन्हें सुशीला तिवारी अस्पताल ले जाया गया। जहां उनका इलाज चल रहा था। 11 अप्रैल को मतदान वाले दिन अजय भट्ट सुशीला तिवारी अस्पताल में पायलट बाबा से मिलने गए और उनकी कुशलक्षेम पूछी। इसके साथ ही हर संभव मदद करने की बात कही। पायलट बाबा से अजय भट्ट की मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं।

अधिवक्ता से सांसद तक का सफर

राजनीति में आने से पहले अजय भट्ट अधिवक्ता हुआ करते थे। वकालत करते- करते उन्हांने राजनीति में कदम रखा। सबसे पहले उन्होंने 1980 में विद्यार्थी परिषद की सदस्यता ली। 1985 में अजय भट्ट अल्मोड़ा जिला कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए। भारतीय जनता युवा मोर्चा रानीखेत और भिकियासैंण तहसील के संयोजक बन जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद वह भारतीय जनता पार्टी अल्मोड़ा के जिला उपाध्यक्ष और जिला मंत्री बनाए गए। अजय भट्ट उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के सक्रिय नेताओं में भी शुमार रहे हैं। इसके चलते वह उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के सदस्य बनाए गए। एकता यात्रा के दौरान वह अल्मोड़ा जिला की केसरिया वाहिनी के प्रमुख रहे। 1990 के बाद अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से वह दो बार पार्टी के संयोजक रह चुके हैं। पार्टी ने संगठन में उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए 1996 में रानीखेत से टिकट दिया। 1996 में वह चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। इसके बाद वर्ष 2002 में वह चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। इसी तरह 2012 के चुनाव में भी वह रानीखेत से चुनाव जीत गए। इस कार्यकाल के दौरान वह नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी रहे। 2017 के चुनाव में वह कांग्रेस के करण माहरा से महज 4981 वोटों से चुनाव हार गए। यह इत्तेफाक ही कहा जाएगा कि 2017 में वह हरीश रावत के साले करण माहरा से हारे तो 2019 में करण के जीजा हरीश रावत को लोकसभा का चुनाव हरा दिया।

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