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Uttarakhand

अजय का किला ढहाने की चुनौती

उत्तराखण्ड की अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर परचम लहराना राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न रहा है। आजादी के बाद कांग्रेस लंबे समय तक इस वीआईपी सीट पर विजय पताका फहराती रही। लेकिन बाद में राजनीतिक हालात बदले तो भाजपा मजबूत होती गई। आज की स्थिति यह है कि भाजपा के अजय टम्टा को यहां टक्कर देने के लिए कांग्रेस के पास ले-देकर सिर्फ प्रदीप टम्टा ही दमदार प्रत्याशी हैं। लेकिन उनके राज्यसभा में होने के कारण कांग्रेस शायद ही उन पर दांव लगाए। ऐसे में पार्टी के लिए प्रत्याशी का चयन काफी चुनौतीपूर्ण है

आगामी लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। उत्तराखण्ड के परिदृश्य को देखें तो यहां देश की दो बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ही चुनाव जीतती आई हैं। फिलहाल लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इन दोनों राष्ट्रीय दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। राज्य की सबसे अहम अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर अपना परचम लहराना दोनों पार्टियों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। भाजपा के पास यहां से केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा से लेकर कई अन्य संभावित प्रत्याशी हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए प्रत्याशी चयन करना टेढ़ी खीर है। हालांकि लंबे समय तक इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भाजपा जहां वर्तमान सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा पर एक बार फिर दांव लगाने के मूड़ में है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी की खोज जारी है। सौम्य और व्यवहार कुशल अजय टम्टा के मुकाबले कांग्रेस को कोई ऐसा कंडीडेट नजर नहीं आ रहा है जो उन्हें कड़ी टक्कर दे सके।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके पास इस लोकसभा सीट पर नेता तो बहुत हैं, लेकिन इनमें मास लीडर नहीं है। घूम- फिर कर प्रदीप टम्टा पर ही नजर जाती है। लेकिन वे राज्यसभा में हैं, ऐसे में आलाकमान शायद ही उन पर दांव लगाए। वर्ष 2009 से पहले कांग्रेस में कई बड़े नेता इस सीट पर अपनी दावेदारी करते आए हैं। खुद प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत यहां से लगातार तीन बार जीते हैं। लेकिन 2009 में इस सीट के अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित हो जाने पर रावत ने हरिद्वार से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। हालांकि देखा जाए तो अभी भी इस सीट पर पार्टी को जिताने का जिम्मा रावत के पास ही है। जब से वह राष्ट्रीय महासचिव बने उनसे उम्मीदें भी ज्यादा बढ़ गई हैं।

आजादी से लेकर अब तक कुल 19 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं। जिनमें इस सीट पर अकेले कांग्रेस ने ऐतिहासिक 12 बार जीत दर्ज कराई है। जबकि भाजपा ने छह बार यह सीट जीती है। एक बार यह सीट जनता पार्टी के खाते में भी जा चुकी है। आजादी के बाद 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के देवी दत्त पंत विजयी रहे। 1957 के लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के हरगोविंद पंत विजयी रहे। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस के बदरी दत्त पांडे विजयी रहे। 1962 में कांग्रेस के जंगबहादुर बिष्ट ने जीत हासिल की। 1967 में बिष्ट फिर चुने गए। 1971 में कांग्रेस के नरेंद्र सिंह बिष्ट ने यह सीट जीती। इस तरह देश की आजादी के बाद इस सीट पर लगातार कांग्रेस जीतती रही है।1977 में जनता पार्टी के टिकट पर मुरली मनोहर जोशी चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। 1980 में मुरली मनोहर जोशी से यह सीट कांग्रेस के हरीश रावत ने छीन ली। रावत ने 1980 के बाद लगातार तीन बार अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर कांग्रेस का परचम लहराया। हरीश रावत 1980 के बाद 1984 और 1989 में भी यहीं से विजयी रहे। 1991 में यह सीट भाजपा के खाते में गई। तब यहां से भाजपा के जीवन शर्मा ने हरीश रावत को हराया। जीवन शर्मा के बाद 1996 में भाजपा ने इस सीट पर बच्ची सिंह रावत पर दांव लगाया। भाजपा का यह दांव सीधा पड़ा और हरीश रावत के लिए राजनीतिक जीवन का यह सबसे दुखद घटनाक्रम बनकर सामने आया। पहले ही भजपा के जीवन शर्मा से हार चुके हरीश रावत को बच्ची सिंह रावत ने संभलने का मौका नहीं दिया और लगातार तीन बार उन्हें हराया। 1991 के बाद 1996, 1998, 1999 में लगातार हार के बाद रावत ने 2004 में अपनी पत्नी रेणुका रावत की दावेदारी की जिसको कांग्रेस ने कबूल कर लिया। लेकिन चौथी बार भी भाजपा के बच्ची सिंह रावत रेणुका रावत को हराकर बाजी मार गए। इसके बाद 2009 में यह सीट अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई। तब यहां से कांग्रेस ने हरीश रावत के खासमखास प्रदीप टम्टा को टिकट दिया। रावत के हनुमान कहे जाने वाले प्रदीप टम्टा ने यह सीट भाजपा से छीनकर कांग्रेस के खाते में डाल दी। तब प्रदीप टम्टा ने भाजपा के अजय टम्टा को चुनाव हराया। 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रदीप टम्टा ने भाजपा प्रत्याशी अजय टम्टा को पराजित किया। प्रदीप टम्टा तब सोमेश्वर के विधायक थे। उनके सांसद बन जाने के बाद सोमेश्वर सीट खाली हुई तो भाजपा ने अजय टम्टा को टिकट दे दिया।

अजय टम्टा सोमेश्वर से विधायक बन गए। लेकिन उनकी किस्मत में लोकसभा पहुंचना भी था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन पर भरोसा जताते हुए कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा के सामने उतारा। इस तरह फिर लोकसभा चुनाव टम्टा बनाम टम्टा हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के सांसद प्रदीप टम्टा को भाजपा के विधायक अजय टम्टा ने शिकस्त दे दी। इस तरह विधायक के हाथों सांसद ने मात खाई।

2014 का लोकसभा चुनाव एक तरह से हरीश रावत के नेतृत्व में ही लड़ा गया। कांग्रेस तब प्रदेश में पांचों लोकसभा सीटें हार गई थी। हरीश रावत के लिए यह बड़ा झटका था। कांग्रेस को उत्तराखण्ड में संभालने की उम्मीद से ही हाईकमान ने प्रदेश नेतृत्व में बड़ा फेरबदल किया था। पूर्व में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा थे। जो 2013 में आई भयानक केदारनाथ आपदा में फेल साबित हो चुके थे। ऐसे में कांग्रेस ने हरीश रावत के हाथों में सत्ता सौंपकर एक तीर से दो निशाने लगाने की रणनीति पर काम किया। पहला प्राकृतिक आपदा में जख्मी प्रदेश के घाव भरना और दूसरा आने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को सभी सीटों पर जीत सुनिश्चित कराना। हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद केदारनाथ आपदा में खोई प्रतिष्ठा तो वापस आ गई, लेकिन पांचों लोकसभा सीटें कांग्रेस के हाथों से निकल गई। मोदी लहर के आगे हरीश रावत की एक ना चली। गौरतलब है कि 2009 में कांग्रेस को उत्तराखण्ड में लोकसभा की पांचों सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पर आलाकमान को भारी भरोसा है। यही वजह है कि उन्हें कांग्रेस संगठन में राष्ट्रीय महासचिव जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। रावत खुद नैनीताल लोकसभा सीट से पार्टी के प्रबल उम्मीदवार हैं। पांचों सीटों को जिताकर पार्टी की झोली में डालना उनकी जिम्मेदारी है। ऐसे में मजबूत प्रत्याशी को चुनाव में उतारना उनके लिए कड़ी चुनौती का काम है। खासकर अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर उनके लिए यह मुश्किल भरा काम है। कारण यह कि हरीश रावत ने इस सीट पर मजबूत नेता के रूप में प्रदीप टम्टा को आगे बढ़ाया था। जिसमें वह एक बार सफल भी हो गए थे। लेकिन अब प्रदीप टम्टा के राज्यसभा सांसद होने पर ऐसा उम्मीदवार खोजना जो भाजपा प्रत्याशी अजय टम्टा को टक्कर दे सके, वास्तव में ही चांद से तारे तोड़ लाने जैसा है।

कांग्रेस में फिलहाल लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों के लिए कई दावेदारों के नाम सामने आए हैं। जिनमें पहले नंबर पर सज्जन लाल टम्टा हैं। सज्जन लाल टम्टा कभी भाजपा में हुआ करते थे। भाजपा में वह राष्ट्रीय परिषद सदस्य और अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य थे। लेकिन उनकी दावेदारी को दरकिनार कर ऐन वक्त पर भाजपा ने अजय टम्टा को टिकट दे दिया। क्रेंदीय संगठन मंत्री शिव प्रकाश के आशीर्वाद से टिकट पाकर टम्टा चुनाव भी जीत गए। इससे नाराज होकर सज्जन टम्टा ने लोकसभा का चुनाव निर्दलीय लड़ा। तब सज्जन को साढ़े आठ हजार मत प्राप्त हुए थे। इसके बाद हरीश रावत ने सज्जन लाल टम्टा को कांग्रेस की सदस्यता दिला दी। तब से ही वह लोकसभा चुनाव में टिकट पाने की जुगत में लगे हैं। इसी के साथ सोमेश्वर से विधानसभा चुनाव हार चुके राजेंद्र बाराकोटी का नाम भी कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची में है। बाराकोटी सोमेश्वर की भाजपा विधायक और राज्यमंत्री रेखा आर्य से महज 500 मतों से चुनाव हारे हैं।

गंगोलीहाट के पूर्व विधायक नारायण राम आर्य की भी लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है। राजेंद्र बाराकोटी के सामने जहां आर्थिक समस्या है, वहीं नारायण राम आर्य के समक्ष पारिवारिक समस्याएं हैं। उनके दो पुत्र जब से स्वर्ग सिधारे हैं तब से वह राजनीतिक गतिविधियों से दूर रह रहे हैं। हालांकि गत विधानसभा चुनाव में वह भाजपा की मीना गंगोला से हार का स्वाद चख चुके हैं। इसी के साथ आम आदमी पार्टी से 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ चुके हरीश आर्य को भी पार्टी अपना प्रत्याशी बना सकती है। आम आदमी पार्टी से वह मजबूती से चुनाव लड़ चुके हैं। पूर्व विधायक और कुमाऊं केसरी खुशी राम आर्य उनके दादा थे। जिसका राजनीतिक फायदा भी आर्य को मिल सकता है।

इसके अलावा कांग्रेस में गीता ठाकुर को भी लोकसभा उम्मीदवार माना जा रहा है। गीता ठाकुर 1999 के लोकसभा चुनाव में हरीश रावत की पिथौरागढ़ प्रभारी भी रह चुकी हैं। 2002 में कांग्रेस ने जब गंगोलीहाट से नारायण राम आर्य को टिकट दे दिया था तो गीता ठाकुर निर्दलीय चुनाव लड़ी। इसके बाद वह भाजपा में चली गईं। 2008 में भाजपा ने उन्हें महिला आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। इसके बाद 2016 में वह फिर कांग्रेस में वापसी कर गईं। हरीश रावत सरकार में उन्हें अनुश्रवण समिति का उपाध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया। फिलहाल गीता ठाकुर लोकसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय हैं।

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