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वन अधिकार अधिनियम २००६ ने राज्य के लोगों में अपने हक-हकूक को लेकर नई उम्मीदें जगाई हैं। इस अधिनियम को लागू करने के लिए अब आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है

उत्तराखण्ड आदोलनों की भूमि रही है। सामंती युग से ही इस क्षेत्र के निवासियों ने अपने हक हकूकों के लिए बड़े-बड़े आंदोलन किए हैं। रवांई द्घाटी का ढंढकी आंदोलन भी कुछ ऐसा ही रहा है जिसको उत्तराखण्ड का जलियांवाला बाग के तौर पर पहचान मिली हुई है। इसी आंदोलन का गवाह वर्तमान उत्तरकाशी जिले की रवांई घाटी का तिलाड़ी मैदान आज भी है जहां अपने जंगलों पर हक के लिए लड़ने वाले दर्जनों आंदोलनकारियों को तत्कलीन टिहरी रियासत के महाराजा नरेंद्र शाह के दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर सेनापति नत्थुसिंह सजवाण द्वारा तीन ओर से घेर कर ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर मौत के घाट उतार दिया गया था। ३० मई का दिन रवांई घाटी में एक जनआंदोलन का दिन माना जाता है। इसी आंदोलन के गर्भ से जल जंगल और जमीन का मुद्दा उत्तराखण्ड में तेजी से आगे बढ़ा। स्वतंत्रता के बाद स्थानीय जनता के लिए वनों में हकूक दिए गए, लेकिन वन अधिनियम के लागू होने के बाद स्थानीय जनता के तकरीबन सभी हक उनसे छीन लिए गए। आज एक बार फिर से वनों पर स्थानीय हकों को लेकर विचार विमर्श का दौर आरंभ हुआ है।

पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय द्वारा तिलाड़ी कांड के शहीदों की याद में वनों और प्राकूतिक संशाधनों पर परंपरागत अधिकारों के लिए चिंतन, संद्घर्ष और भावी रणनीति के लिए प्रथम सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह आयोजन पूरी तरह से गैर राजनीतिक रहा। इसमें कमोबेश सभी ने एक स्वर से वनों पर अपने परंपरागत हकों को बहाल करने की मांग की। साथ ही पर्यावरण और विकास के संतुलन पर भी जोर दिया। जबकि पर्यावरण और वनों के सरंक्षण के नाम पर सदियों से वनों पर आश्रित रहने वाले स्थानीय निवासियों को हर जरूरी हक से वंचित किया जाता रहा है। यहां तक कि वनों के आसपास के क्षेत्रों में अपनी उपज तक को बगैर वन विभाग की अनुमति के न तो बेचा जा सकता है और न ही खरीदा जा सकता है। कई पेयजल योजनाएं वन क्षेत्र में होने के चलते उनका पुनर्निर्माण या मरम्मत तक नहीं हो पा रही है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने वनों पर परंपरागत हकों के लिए काम नहीं किया है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा वन अधिकार अधिनियम २००६ का गठन किया जा चुका है। देश भर में इसे २००८ में लागू भी किया गया है। लेकिन हैरत की बात यह है कि उत्तराखण्ड में यह कानून अभी तक लागू ही नहीं किया गया है जबकि उत्तराखण्ड का ६६ फीसदी क्षेत्र वनों से आच्छादित है। यही नहीं ६१४ वर्ग किमी संरक्षित वन क्षेत्र और ९१७ वर्ग किमी अवर्गीकूत वन क्षेत्र है। इसके अलावा २४६५ वर्ग किमी विशाल आरक्षित वन क्षेत्र का भूभाग भी है। इस तरह से उत्तराखण्ड में कुल ३७९९९ वर्ग किमी वन क्षेत्र है जो भारत के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है।

वन अधिकार अधिनियम २००६ उत्तराखण्ड राज्य के निवासियों के लिए एक बड़ा वरदान माना जा रहा है। जानकारों की मानें तो इस अधिनियम के लागू होने से उत्तराखण्ड के निवासियों को वनों पर अपने हक-हकूक आसानी से मिल सकते हैं। और सभी हक जो वन अधिनियम के चलते समाप्त कर दिए गए थे वे भी बहाल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि दिसंबर २००५ से पूर्व वनों के भू भाग में बसे हुए स्थानीय लोगों को उक्त भूमि का अधिकार तो मिलेगा ही साथ ही प्रति परिवार १० एकड़ तक भूमि का पट्टा भी मिल सकेगा जिससे वन क्षेत्र में खेती करने और अपनी उपज को बिक्री करने में कोई कानूनी पेचदगियां आड़े नहीं आ पाएंगी। साथ ही पालतू पशुओं के चारा, पानी आदि के लिए आसानी हो सकेगी और सिंचाई आदि के लिए भी जल के उपयोग का अधिकार मिल सकेगा।

वन अधिकार अधिनियम को सभी प्रकार के वन क्षेत्रों और अभ्यारण्यों में लागू किए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में तब्दील करने का भी प्रावधान किया गया है। वन क्षेत्र से हटाए जाने पर जमीन दिए जाने का भी प्रावधान रखा गया है। शायद इसी वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के चलते उत्तराखण्ड के स्थानीय निवासियों के वनों पर अपने मूलभूत और सदियों से चले आ रहे परंपरागत अधिकारों को फिर से बहाल करने के लिए एक आशा दिखाई दे रही है। इसीलिए हर कोई इसके लिए एकजुट होने का प्रयास कर रहा है।

वनों और प्राकूतिक संशाधनों पर परंपरागत अधिकारों के लिए चिंतन, संघर्ष और भावी रणनीति के लिए प्रथम सम्मेलन में भी यही देखने को मिला। हर वक्ता या चिंतक द्वारा सरकार पर दबाब बनाये जाने की बात समाने आई है। और जल्द ही इसका प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। माना जा रहा इस आंदोलन में उत्तराखण्ड के हर क्षेत्र में काम करने वाले संगठन एक मंच पर एक साथ एकत्र होकर रणनीति बनाए जाने के लिए काम कर चुके हैं। इसके लिए एक समन्वय समिति का गठन किया गया है और समिति उत्तराखण्ड के सभी सांसदों, विधायकों के अलावा राज्यपाल, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुंचाने के काम पर जुट चुकी है। इसी के तहत योग दिवस के अवसर पर देहरादून पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को ज्ञापन देने जा रहे कई नेताओं को पुलिस ने कुछ समय के लिए हिरासत में ले लिया।

जल्द ही उत्तराखण्ड में एक नया जनआंदोलन खड़ा होने वाला है। जनता को उसके परंपरागत हकों से अब वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य में वन अधिकार अधिनियम २००६ को लागू करना ही होगा। वनों पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहा है।
किशोर उपाध्याय, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष

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