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उत्तराखण्ड में ‘त्रिवेंद्र तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ का नारा जनता की जुबान पर आज भी चढ़ा हुआ है। ऐसे में मुख्यमंत्री के सहारे 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ना बेहद खतरनाक साबित होगा। यही वजह है कि भाजपा आलाकमान नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने में फूंक-फूंककर कदम उठा रहा है। कोई जोखिम मोल लेने के बजाए आलाकमान एक बार फिर से अजय भट्ट को ही उत्तराखण्ड की बागडोर सौंपने के मूड में है। भट्ट के नेतृत्व में पार्टी हर चुनाव जीतती आ रही है
उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी के सांगठनिक चुनाव अब अपने अंतिम चरण में हैं। जिला अध्यक्षों की घोषणा के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव का अंतिम चरण पूरा हो गया है। दस जिलों के अध्यक्ष निुयक्त कर दिए गए हैं। देहरादून महानगर, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और उत्तरकाशी में आम सहमति न होने के कारण यहां की घोषणा फिलहाल रोक दी गई है। इसी तरह दिसंबर में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से सांसद अजय भट्ट का कार्यकाल खत्म हो रहा है। नया अध्यक्ष चुनने की कवायद शुरू होने के साथ दावेदारों ने अपनी गोटियां बिठानी शुरू कर दी हंै। रोज कोई न कोई नया नाम इन दावेदारों की सूची में जुड़ता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चैहान और अर्जुन राम मेधावाल को पर्यवेक्षक के तौर पर कार्यकर्ताओं व नेताओं की प्रदेश अध्यक्ष के लिए राय जानने के उद्देश्य से नियुक्त किया था। लेकिन अब खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलने आएंगे।
माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान निशंक के स्थान पर भट्ट को मंत्री बनाया जा सकता है। इन कयासबाजियों के चलते एक संभावना निशंक को उत्तराखण्ड भाजपा की कमान सौंपे जाने की भी है। इस बीच अल्मोड़ा से सांसद अजय टम्टा के लिए भी संघ की तरफ से दबाव आने की खबर है। सूत्रों की मानें तो मोदी मंत्रिमंडल से टम्टा को हटाए जाने का बड़ा कारण उन्हें 2022 में पार्टी का नेतृत्व सौंपे जाने का रहा है। टम्टा का बतौर मंत्री प्रदर्शन बढ़िया बताया जाता है। ऐसे में यदि संघ की चली तो टम्टा भी पार्टी के अगले प्रदेश अट्टयक्ष हो सकते हैं।
उत्तराखण्ड भाजपा अध्यक्ष का चुनाव पार्टी के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बहुत महत्वपूर्ण होगा। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद से ही राज्य की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां अघोषित रूप से नेतृत्व चुनने में जातीय संतुलन व क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान रखती हैं। हालांकि कभी- कभी इस परिपाटी को दरकिनार भी किया गया है। लगभग हर दल का प्रयास रहता है कि मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष के चयन में कुमाऊं-गढ़वाल, ब्राह्मण-ठाकुर, नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष जैसे तमाम समीकरणों को ध्यान में रखकर संतुलन बनाया जाए। मसलन नारायण दत्त तिवारी के मुख्यामंत्रित्वकाल में क्षेत्रीय संतुलन तो नहीं था, लेकिन जातीय संतुलन का ख्याल रखा गया था। तब ठाकुर हरीश रावत प्रदेश अध्यक्ष थे। उस वक्त भाजपा विपक्ष में थी। तब कुमाऊं- गढ़वाल का ध्यान रखा गया था। प्रदेश अध्यक्ष भगत सिंह कोश्यारी कुमाऊं के ठाकुर थे तो नेता प्रतिपक्ष मातवर सिंह कंडारी नेता प्रतिपक्ष गढ़वाल के ठाकर थे। 2007 में भुवन चंद्र खण्डूड़ी के मुख्यमंत्रित्वकाल में बची सिंह रावत प्रदेश अध्यक्ष थे। तब जातीय व क्षेत्रीय संतुलन का पूरा ख्याल रखा गया था। अजय भट्ट के नेता प्रतिपक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह परिपाटी टूटी। इस तरह प्रदेश अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष दोनों पद कुमाऊं और ब्राह्मण के हिस्से में आए। 2017 के विधानसभा चुनाव में
ऐतिहासिक जीत के बाद त्रिवेन्द्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने ठाकुर- ब्राह्मण एवं कुमाऊं- गढ़वाल का संतुलन साधने की
कोशिश की। हालांकि भाजपा नेता दावा करते हैं कि उनकी पार्टी में योग्यता मायने रखती है। जातीय और क्षेत्रीय समीकरण योजना के आगे गौण हैं। लेकिन ये संतुलन हमेशा ही देखने  में ही आया है। अगर जातीय व क्षेत्रीय नजरिये से देखें तो इस बार अध्यक्ष पद पर दावा ब्राह्मण और कुमाऊं का बनता है, लेकिन जैसा कहा जाता है अमित शाह व भाजपा अलग निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं, तो भाजपा का नया सूबेदार कौन होगा, इस पर कयास ही लगाए जा सकते हैं।
नए अध्यक्ष के चुनाव की तिथि नजदीक आने के साथ दावेदारों के नए-नए नाम सामने आ रहे हैं। बलराज पासी, कुमाऊं मंडल विकास निगम के अध्यक्ष केदार जोशी, कलाढूंगी से विधायक बंशीधर भगत, खटीमा से विधायक पुष्कर सिंह धामी तथा सुरेश जोशी के नाम प्रमुख रूप से चर्चा में हैं। दूसरी तरफ गढ़वाल से मीडिया प्रभारी डाॅ देवेंद्र भसीन, ज्योति प्रसाद गैरोला तथा उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डाॅ धन सिंह रावत के नाम चर्चा में हैं। बलराज पासी पूर्व सांसद व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। केदार जोशी कुमाऊं व ब्राह्मण दोनों लिहाज से प्रमुख दावेदार हैं। पुष्कर धामी पूर्व में युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। बंशीधर भगत मंत्री पद के दावेदार हैं, परंतु उम्र व स्वास्थ्य के हिसाब से संगठन के लिए भागदौड़ कर पायेंगे इसमें संदेह है। इन सब चर्चाओं के बीच इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व इस पद पर वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष अजय भट्ट को पुनः अवसर दे सकता है। नेता प्रतिपक्ष रहने के दौरान उन्होंने बहुगुणा सरकार व हरीश रावत सरकार पर निरंतर हमला बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और मित्र विपक्ष का आरोप अपने ऊपर चस्पा होने नहीं दिया। विजय बहुगुणा शासन के दौरान केदारनाथ आपदा के समय सरकार की नाकामी हो या हरीश रावत के समय शराब नीति एफएल टू विवाद, हर वक्त अजय भट्ट ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर मुश्किलें खड़ी की थी। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी अजय भट्ट ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने के साथ-साथ अपनी पार्टी के संगठन को मजबूत किया जिसका प्रतिफल भाजपा को 2017 के चुनाव में एतिहासिक जीत के रूप में मिला। भले ही अजय भट्ट चुनाव हार गये हों, लेकिन उनके अध्यक्ष रहते प्रदेश में निरंतर पार्टी का परचम लहराया। नगर निकाय चुनावों व पंचायत चुनाव में भी भजपा का प्रदर्शन शानदार रहा। आप प्रदेश अध्यक्ष हों तो जरूरी नहीं कि पार्टी के अंदर आपके विरोधी न हों, अजय भट्ट के भी हैं। लेकिन उनकी सांगठनिक क्षमता का लोहा उनके विरोधी भी मानते हैं।
हालांकि भट्ट को लेकर इन दिनों दिल्ली के सत्ता गलियारों में नाना प्रकार की बातें सुनने को मिल रही हैं। माना जा रहा है कि मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के कामकाज से प्रधानमंत्री कार्यालय खासा असंतुष्ट है। पीएमओ द्वारा लगातार मोदी सरकार में शामिल मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा होती है। ऐसे में केंद्रीय विश्वविद्यालय में अलग-अलग कारणों के चले चल रहे छात्र आंदोलनों को ठीक से हैंडल न करने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर ढुलमुल रवैया रखने जैसे आरोप के चलते उत्तराखण्ड से एकमात्र केंद्र सरकार में मंत्री डाॅ निशंक का ग्राफ गिर रहा है। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान निशंक के स्थान पर भट्ट को मंत्री बनाया जा सकता है। इन कयासबाजियों के चलते एक संभावना निशंक को उत्तराखण्ड भाजपा की कमान सौंपे जाने की भी है। इस बीच अल्मोड़ा से सांसद अजय टम्टा के लिए भी संघ की तरफ से दबाव आने की खबर है। सूत्रों की मानें तो मोदी मंत्रिमंडल से टम्टा को हटाए जाने का बड़ा कारण उन्हें 2022 में पार्टी का नेतृत्व सौंपे जाने का रहा है। टम्टा का बतौर मंत्री प्रदर्शन बढ़िया बताया जाता है। ऐसे में यदि संघ की चली तो टम्टा भी अगले प्रदेश अध्यक्ष हो सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी को अपने प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में 2022 के विधानसभा चुनाव का भी ख्याल जरूर होगा। पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में पार्टी के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी। इस हालत में संगठन को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो आने वाले विधानसभा चुनाव में विपक्ष की चुनौतियांे के सामने संगठन को मजबूती के साथ नेतृत्व दे सके। नाम न छापने की शर्त पर भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी का कहना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ मुखौटा अध्यक्ष से काम नहीं चलेगा। उनका मानना है कि 2022 के चुनाव में त्रिवेंद्र सिंह रावतनीत भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी का फैक्टर निश्चित तौर पर होगा। सिर्फ मुख्यमंत्री के भरोसे चुनाव में हम नहीं जा सकते। कहीं अगला चुनाव राजस्थान की तर्ज पर न हो जाए ‘त्रिवेंद्र तेरी खैर नहीं, ‘मोदी तुझसे बैर नहीं’ का नारा अगर यहां बुलंद हो गया तो भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी। भारतीय जनता पार्टी को अति आत्मविश्वास का खामियाजा
राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा व महाराष्ट्र में भुगतना पड़ा जहां संगठन के ऊपर सरकार को महत्व दिया गया।

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