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Uttarakhand

उत्तराखंड में AAP की आहट, भाजपा – कांग्रेस में घबराहट

2 दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी द्वारा 2022 का चुनाव उत्तराखंड से लड़ने की घोषणा कर दी। केजरीवाल की घोषणा करने के साथ ही उत्तराखंड की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और भाजपा में खलबली मच गई। हालांकि उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी का अभी कोई वजूद नहीं है । लेकिन जिस तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहाड़ के महत्वपूर्ण मुद्दों को छुआ है उससे नेताओं की धड़कनें बढ़ना लाजमी है । पिछले 20 साल से इन्हीं मुद्दों पर प्रदेश में सरकारें बनती और बिगड़ती रही है । 2022 के आम चुनाव में महज डेढ़ साल का वक्त बचा है । इस दौरान आम आदमी पार्टी के लिए उत्तराखंड के दूरदराज के इलाकों में गांव गांव शहर शहर अपने संगठन की स्थापना करना दूर की कौड़ी साबित होगा । लेकिन जिस तरह से उत्तराखंड की जनता आज कांग्रेस और भाजपा से आजिज आ चुकी है वह तीसरे विकल्प की तलाश में है।

देखा जाए तो साफ तौर पर आम आदमी पार्टी 2022 के चुनावी समीकरण में उत्तराखंड में खुद को फिट बैठाने में जुटी है। इसके लिए विधानसभा वार ब्यौरा तैयार किया जा रहा है। उसकी प्राथमिकता ऐसी सीटों पर मजबूत उम्मीदवारों की तलाश है, जहां दूसरे स्थान पर भाजपा कांग्रेस के अलावा कोई अन्य रहा हो। साथ ही भाजपा और कांग्रेस में ऐसे दमदार नेताओं पर भी उसकी नजर है, जिनकी छवि साफ हो और निजी वोट बैंक भी हो।

आम आदमी पार्टी की मानें तो वह राज्य में ऐसे सभी नेताओं से संपर्क का रोडमैप तैयार कर रही है, जो अपनी पार्टी में उपेक्षित हैं। जिन्हें उनकी पार्टी से ही टिकट मिल पाना सिर्फ इसलिए संभव नहीं है कि उनके विधानसभा क्षेत्र से अभी कोई और विधायक या मंत्री है, जो कि भाजपा कांग्रेस से 2022 में टिकट का स्वाभाविक दावेदार होगा। फिलहाल की स्थितियों को देखें तो भाजपा और कांग्रेस में बहुत से ऐसे नेता है जो जमीनी होने के बावजूद भी सक्रिय रहते हैं । लेकिन उन्हें कभी भी उनके कद के अनुसार पद नहीं मिला है। ऐसे में वह पार्टियों में रहकर अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। हो सकता है वह 2022 का चुनाव आम आदमी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लड़े। फिलहाल कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे किशोर उपाध्याय की भी चर्चा जोरों से है कि वह भी आम आदमी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। ऐसे बहुत से नेता है जो भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर आम आदमी पार्टी में जा सकते हैं।

गौरतलब है कि अब तक तीसरे विकल्प के रूप में कभी यूकेडी तो कभी बसपा तो कभी सपा के साथ ही उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और उत्तराखंड विकास पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहे हैं। लेकिन इन सभी को कभी भी कांग्रेस और भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया । यह भी सर्व विदित है कि उत्तराखंड राज्य की स्थापना में यूकेडी का ही महत्वपूर्ण योगदान था । लेकिन राज्य बनते ही यह पार्टी हाशिए पर चली गई और राज्य की मुख्य धारा में दो राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस महत्वपूर्ण बन गए। साल 2017 से पूर्व हुए तीन विधानसभा चुनाव में तीसरी ताकत के तौर पर यूकेडी और बसपा ने जरूर उपस्थिति दर्ज की लेकिन पिछले चुनाव में कुल पड़े वोटों में से भाजपा को 46.51 व कांग्रेस को 33.49 प्रतिशत वोट मिले। यानी बाकी करीब 34 दलों के हिस्से में 20 फीसदी वोट आए। इसमें से भी 10 फीसदी निर्दलीय के हिस्से में आए।

अब तक प्रदेश में 20 साल के दौरान नौ मुख्यमंत्री बन चुके हैं । प्रदेश नेतृत्व ज्यादातर अस्थिरता का शिकार रहा है। दो मुख्यमंत्रियों को छोड़कर आज तक किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। ऐसे में दिल्ली में तीन बार सरकार बना चुकी आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में चुनाव का आगाज किया है।

आम आदमी पार्टी 2022 में उत्तराखंड की 70 विधानसभाओं पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। इस घोषणा के बाद से ही प्रदेश में टोपी पहने आम आदमी पार्टी के नेताओं की बाढ़ सी आ गई है। जिस पार्टी ने पिछले कई सालों से कोई धरना प्रदर्शन नहीं किया एकाएक उसमें जान आ गई और वह द्वाराहाट के भाजपा विधायक महेश नेगी के सेक्स स्कैंडल मामले पर विधानसभा घेराव कर देती है। हालांकि आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ चुकी है । जिसमें उसके सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो चुकी है। पार्टी को हरिद्वार के अलावा कई संसदीय क्षेत्रों में तीसरे स्थान पर रही। तब उसे काफी वोट मिली थी । लेकिन उस दौरान आम आदमी पार्टी के साथ उत्तराखंड की पूर्व पुलिस महानिदेशक रही कंचन चौधरी भट्टाचार्य के साथ ही लोक कवि बल्ली सिंह चीमा और जीवनदायिनी 108 के संस्थापक अनूप नौटियाल जैसे मजबूत नेता चुनाव लड़े थे।

याद रहे कि आप के प्रदेशाध्यक्ष रहे अनूप नौटियाल 2014 में पार्टी के टिकट पर टिहरी सीट से चुनाव भी लड़े थे। उन्हें हार मिली थी और 2016 में उन्हीं के नेतृत्व में बहुत से पार्टी कार्यकर्ताओं ने आम आदमी पार्टी छोड़ दी थी। अब अनूप नौटियाल एक एनजीओ एसडीसी चलाते हैं, जो शहरी विकास और प्लास्टिक उन्मूलन के क्षेत्र में काम करता है। अनूप नौटियाल की मानें तो अभी भी परिस्थितियां ज्यादा बदली नहीं है । वह कहते हैं कि अगर आम आदमी पार्टी डेढ़ साल में जमीनी स्तर पर मेहनत करें तो वह काफी हद तक परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। फिलहाल आम आदमी के पास अनुप नौटियाल जैसे जमीनी नेताओं की कमी तो है लेकिन साथ ही वह यह भी दावा करती है कि उनकी पार्टी में भाजपा और कांग्रेस के उपेक्षित नेताओं का आगमन होगा ।

देखा जाए तो आम आदमी पार्टी का उत्तराखंड में अभी कोई चर्चित चेहरा उनके संगठन में नहीं है। दिल्ली के संगम विहार के विधायक दिनेश मोहनिया अभी उत्तराखंड के प्रभारी हैं। जिनको प्रदेश की जनता बहुत कम जानती है। मोहनिया पिछले 12 मार्च को प्रदेश प्रभारी बने थे। तब लेकर वह लगातार प्रदेश में मीटिंग कर रहे हैं । मोहनिया का दावा है कि वह पहले सत्र में उत्तराखंड में पार्टी के 10 लाख सदस्य बनाएंगे। 2 दिन पहले जब दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उत्तराखंड चुनाव लड़ने की घोषणा की तो उन्होंने प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने रखा। जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मुख्य तौर पर है।

केजरीवाल ने कहा कि वह उत्तराखंड को ” दिल्ली मॉडल ” के आधार पर विकास के रास्ते पर ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि आज उत्तराखंड में शिक्षा के मामले पर शून्यता है। सरकारी शिक्षा केंद्र सिर्फ औपचारिकता केंद्र बनकर रह गए हैं । जबकि स्वास्थ्य केंद्रों पर ना डॉक्टर होते हैं ना दवाइयां। इसके साथ ही प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या पलायन की है। केजरीवाल प्रदेश में रोजगार देने के साथ ही पलायन को रोकने का दावा करते हैं ।

अगर दिल्ली की तुलना की जाए तो भौगोलिक स्थिति से उत्तराखंड दिल्ली से काफी अलग है । लेकिन मुद्दों के मामले में दोनों में एक जैसी समानता है। दिल्ली में सभी जानते हैं कि केजरीवाल सरकार के आने से पहले सरकारी स्कूलों की कथा बेहद ही दयनीय थी । ऐसी ही दशा आज उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की है। इसमें दो राय नहीं कि केजरीवाल सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली में सरकारी शिक्षा का ढांचा आधुनिक बना दिया। आज स्थिति यह है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने के लिए सिफारिशें की जाती है । जबकि स्वास्थ्य के मामले में प्रदेश सरकार ने आमूलचूल परिवर्तन किया है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक खोलकर गांव-गांव तक स्वास्थ के मामले में उपलब्धि हासिल की है। जबकि अगर उत्तराखंड में देखा जाए तो स्वास्थ केंद्रों की स्थिति बद से बदतर है । शायद कोई दिन ऐसा जाता होगा जब यह सुनने को नहीं मिलता कि प्रदेश के स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज ना होने के कारण मरीज की मौत हो गई। स्वास्थ्य की दृष्टि से दिल्ली की तर्ज पर अगर उत्तराखंड में हॉस्पिटल खोले गए तो बीमारी पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

आम आदमी पार्टी आज भले ही राज्य में तीसरे विकल्प के तौर पर अपना दावा ठोक रही हो, लेकिन उत्तराखंड में पिछले 20 सालों से भाजपा और कांग्रेस का दबदबा है। इन दोनों पार्टियों ने कभी किसी तीसरी पार्टी को उत्तराखंड का विकल्प नहीं बनने दिया है। इसका बड़ा कारण ये है कि दोनों पार्टियों का राज्य में अपना काडर है। सच तो यह है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी चेहरा देखकर नहीं बल्कि कमल और हाथ का निशान देखकर वोट दिया जाता है। जिन्हें इन पार्टियों के पुश्तैनी मतदाता कहा जा सकता है। इन दो निशानों के अलावा पहाड़ी इलाकों के ज्यादातर लोग किसी तीसरी निशान का बटन नहीं दबाते हैं। यही वजह है कि पिछले 20 सालों में कई कोशिशों के बावजूद तीसरी पार्टी उत्तराखंड में अपनी जमीन तैयार नहीं कर पाई। ऐसे में झाडू को प्रदेश में तीसरे चुनाव चिन्ह की पहचान बनाने और मतदाताओं को झाडू का बटन दबाकर वोट डलवाने में आम आदमी पार्टी को काफी जद्दोजहद करनी पड सकती है।

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