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Uttarakhand

‘भू-कानून और मूल निवास का हल निकलना चाहिए’

धर्मपुर विधायक विनोद चमोली से उत्तराखण्ड के अहम मुद्दों पर ‘दि संडे पोस्ट’ के विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार की बातचीत

उत्तराखण्ड राज्य बने हुए 23 वर्ष पूरे हो चुके हैं और 24 वें वर्ष में उत्तराखण्ड प्रवेश कर चुका है। इस कालखंड में आप उत्तराखण्ड को कैसे देखते हैं?
मैं इसे विकास यात्रा मानता हूं। इन वर्षों में हमारे राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम हुआ है। एजुकेशन के दृष्टिकोण से देखें तो राज्य बनने से पहले देहरादून केवल इंटर तक की बेहतर शिक्षा के लिए जाना जाता था लेकिन आज हायर एजुकेशन का हब बनकर उभरा है। यही नहीं राज्य के अन्य शहरां यहां तक कि कस्बां में भी एजुकेशन का सेक्टर बहुत तेजी से बढ़ा है। इसी तरह से हेल्थ के फील्ड में भी काफी बेहतर काम हुआ है। उत्तराखण्ड में बड़े-बड़े आधुनिक अस्पताल, कई मेडिकल कॉलेज जो राज्य बनने से पहले नहीं थे, आज हैं। एम्स जैसा संस्थान भी प्रदेश में है। पहाड़ों में भी इंफ्रास्ट्रक्चर के सेक्टर में बहुत काम हुआ है, चाहे वह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से हुआ हो, हाईवे के निर्माण से, ऑल वेदर रोड के निर्माण से हुआ हो या फिर रेलवे लाईन के निर्माण और विस्तार से हो रहा हो, लेकिन काम बहुत हुआ है। जबकि राज्य बनने से पूर्व ऐसा नहीं था। आज सड़कां का जाल फैला हुआ है। रोजगार की दृष्टि से भी कई सारे विकल्प सामने हैं। अगर सरकारी रोजगार को छोड़ दें तो लगेगा कि प्राइवेट सेक्टर से रोजगार मिले हैं, साथ ही स्वरोजगार से भी लोग जुड़े हैं। कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक और सुवधिएं मिल रही हैं जिससे लोग परम्परागत खेती की बजाय आधुनिक और नकदी खेती के प्रति जागरूक हो रहे हैं। पर्यटन के क्षेत्र में तेजी आने से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। सभी दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो राज्य बनने के बाद काफी हद तक प्रदेश का विकास हुआ है और होता रहेगा। यह निरंतर प्रक्रिया है जो चलती रहेगी।

इन 23 वर्षों में आपको कभी भी ऐसा लगा है कि अगर ऐसा होता तो ज्यादा बेहतर होता?
हां, इसमें सबसे ज्यादा मुझे लगता है कि मूल निवास और स्थाई निवास का जो मुद्दा है राज्य बनने के साथ ही इस पर काम होना चाहिए था, क्योंकि तब नया-नया राज्य बना था और सबको यह अच्छी तरह से मालूम था कि अलग पहाड़ी राज्य की मांग पर ही राज्य बना है तो यहां के निवासियों के हक उनको ही मिलने चाहिए। इसको लेकर सबका माइंडसेट बना हुआ था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया और अब 23 वर्ष के बाद इस मुद्दे का हल निकालना बहुत कठिन है। आज एक्शन के साथ रिएक्शन भी आ रहा है। यह ऐसा मुद्दा है जिसको हल करने की बजाय उसे समझा ही नहीं गया। इसके साथ हमको यह भी देखना पड़ेगा कि यह बड़ा निर्णय है। देखना यह भी होगा कि इस निर्णय का प्रभाव वहां के जनजीवन पर क्या पड़ने वाला है। अब बहुत सोच समझकर कदम रखने की जरूरत है। रोजगार के क्षेत्र में भी हमको ज्यादा काम करने की जरूरत है। सभी लोगों को सरकारी नौकरियां नहीं मिल सकती। इसके लिए तो रोजगार के अन्य साधनां को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। पर्यटन के क्षेत्र में जितना काम हो रहा है वह कम ही है। इसमें बहुत ज्यादा व्यापकता आई है। इससे ही हम लाखों लोगों को रोगजार से जोड़ सकते हैं। एक पलायन का भी मामला है जिस पर काम करना बहुत जरूरी है। हालांकि मेरा मानना है कि पलायन एक सामान्य प्रक्रिया है। हर आदमी अपनी बेहतरी के लिए पलायन करता है। जहां सुविधा नहीं होगी वहां के लोग सुविधाओं के लिए पलायन करते ही हैं। लेकिन उत्तराखण्ड में आज भी पलायन सबसे कम है। हमारे प्रदेश में इस समय सिर्फ 37 प्रतिशत की आबादी शहरों में है जबकि शेष आबादी गांव में ही है। इसलिए हम गांव में क्या सुविधाएं और रोगजार दे सकते हैं जिससे पलायन न हो पाए, इस पर काम करना होगा।

पहाड़ के जन मुद्दों पर आप पार्टी लाइन से हटकर भी बात करते रहे हैं। 23 वर्षों में पहाड़ कहां तक पहुंचा है इस पर आपका क्या नजरिया है?
उत्तराखण्ड को तीन भागों में माना जाता है जिसमें पहला टॉप हिल्स, दूसरा शिवालिक और तीसरा मैदानी क्षेत्र। इन तीनों क्षेत्रों के डेवलपमेंट के लिए अलग-अलग मानक होने बहुत जरूरी हैं। बजट का भी अलग- अलग प्रावधान होना बहुत जरूरी है। इस बार एक अच्छी बात यह हुई कि केंद्र सरकार ने भी इस पर ध्यान दिया है। इस समय ‘पर्वतमाला योजना’ जो चल रही है वह हमारे सीमांत गांवों पर आधारित है, इसमें सीमांत के गांवों के डेवलपमेंट पर सबसे ज्यादा फोकस किया जा रहा है। इसको प्रदेश में भी करने की आवश्यकता है। शिवालिक हिल्स की परिस्थितियां भी कुछ अलग हैं उसको भी इसी तरह की योजना से जोड़ने की जरूरत है। मैदानी क्षेत्र भी हमारा ही है तो स्वभाविक तौर पर हमारी जिम्मेदारी है उसका रख-रखाव भी हमको ही करना है। मैदानी क्षेत्र के लिए भी उसके अनुरूप योजना बनाने की जरूरत है। यह नहीं है कि एक ही योजना को तीनों क्षेत्रों के लिए कर दिया जाए। जब हर क्षेत्र की स्थितियां अलग हैं तो उनको अलग योजना से ही काम करना होगा।

आप विधानसभा सदन में समय-समय पर पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रश्न उठाते रहते हो। जिला मुख्यालयों तक में भी हालात बदतर हैं इस पर आपके क्या विचार हैं?
पहाड़ के लिए दो विषय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, एक शिक्षा और दूसरा चिकित्सा। पहाड़ का व्यक्ति शिक्षा के लिए सबसे ज्यादा सजग रहता है। लेकिन शिक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर नहीं है। इसी तरह से हेल्थ के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर तो है लेकिन मेन पावर नहीं है। इसको हमें बढ़ाने की जरूरत है। कोई व्यक्ति नौकरी लगता है तो वह अपनी सुविधाओं और बेहतरी के लिए मैदान की ओर जाने लगता है। इससे जनसंख्या का संतुलन भी बिगड़ता है। एक बात बड़े आश्चर्य करने वाली है कि जब किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी चाहिए तो वह नौकरी लगने से पूर्व हर बात पर सहमत हो जाता है उसे कहीं भी भेज दो चाहे कितने भी दुर्गम स्थान पर तैनाती दे दी जाए वह तुंरत तैयार हो जाता है लेकिन जैसे ही नौकरी लग जाती है उसके हाव-भाव बदल जाते हैं वह अपने माता-पिता के स्वास्थ्य, बीमारी या अन्य बहाने बनाकर अपना ट्रांसफर मैदानी ईलाके में करवाने का जतन करने लगता है। नौकरी तो चाहिए लेकिन देहरादून में ही। यह माइंडसेट बन चुका है। इसके लिए लोगों को ही अपने माइंडसेट को बदलना होगा।

अभी जो लेटेस्ट आंकड़ा आया है वह 2 लाख 12 हजार 118 मतदाता धर्मपुर सीट पर हैं। आबादी तो निश्चित बढ़ी है लेकिन किसी खास वर्ग या समुदाय की ही आबादी बढ़ी है यह भी गलत है। सभी की बढ़ी है। पर्वतीय मूल के लोगों की भी आबादी बढ़ी है तो अन्य समुदाय के लोग भी बढ़े हैं। इसका एक कारण यह है कि जिस समुदाय वर्ग या कम्युनिटी की जनसंख्या क्षेत्र विशेष में ज्यादा होती है तो वहां उस समुदाय वर्ग या कम्युनिटी के लोग ज्यादा बसते हैं। ऐसे क्षेत्र उनको ज्यादा आकर्षित करते हैं। मेरा क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र रहा है तो स्वभाविक तौर पर मेरे क्षेत्र में मुस्लिमों की बसावट होती रही है।

आप नगर पालिका से लेकर नगर निगम के दो बार महापौर रहे लेकिन आपको सरकार में मंत्री पद नहीं मिला है। इसका क्या कारण है?
मेरे लिए यह बड़ा पेंचीदा सवाल है। दो बार चेयरमैन रहा, दो बार नगर निगम अध्यक्ष रहा। लगातार दो बार विधायक रहा। छह चुनाव लड़े और कभी चुनाव नहीं हारा। अनुभव और कार्यशैली ठीक-ठाक है। लगभग जो सारी चीजें राजनीति में होनी चाहिए वह प्रभु की कृपा से मुझे मिली है। जनता का हमेशा साथ रहा है, छह चुनाव जनता ने ही जिताए हैं। मंत्री क्यों नहीं बन पा रहा हूं यह मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं।

एक बार आप नगर निगम में ही धरने पर बैठ गए थे जबकि निगम में आप अध्यक्ष थे और प्रदेश में भी भाजपा की सरकार थी?

ऐसे तो बहुत से उदाहरण मेरे सामने हैं जिनमें क्या से क्या पार्टी के खिलाफ नहीं बोला गया। बहुत बयानबाजी हुई है। तब भी वह लोग पार्टी में बने हुए हैं, पद पाते रहे हैं। मैंने तो आज तक पार्टी के खिलाफ एक भी शब्द गलत नहीं कहा, हमेशा से ही अनुशासित सिपाही की तरह पार्टी के आदेशों का पालन किया है। मैं वह कार्यकर्ता हूं जो अपनी पार्टी भाजपा के झंडे के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता हूं, अपना राजनीतिक करियर भी दांव पर लगा सकता हूं। मेरे लिए पार्टी का सम्मान मेरा सम्मान है। लेकिन आज भी राजनीति की रिक्वायरमेंट क्या है यह मैं समझ नहीं पा रहा हूं।

क्या इस अनेदखी की पीड़ा होती है?
पीड़ा तो नहीं है लेकिन अगर उपयोग होता तो मैं और अच्छा कर सकता था। मेरी परफॉरमेंस और बेहतर होती। मैं पार्टी और जनता के लिए बेहतर कर सकता था।

आपके विधानसभा क्षेत्र धर्मपुर में बाहरी लोगों की सबसे ज्यादा बसावट और समुदाय विशेष की तादात बहुत तेजी से बढ़ी है। आज सबसे ज्यादा मतदाताओं वाली विधानसभा धर्मपुर बन चुकी है। इसके क्या कारण हैं?
अभी जो लेटेस्ट आंकड़ा आया है वह 2 लाख 12 हजार 118 मतदाता धर्मपुर सीट पर हैं। आबादी तो निश्चित बढ़ी है लेकिन किसी खास वर्ग या समुदाय की ही आबादी बढ़ी है यह भी गलत है। सभी की बढ़ी है। पर्वतीय मूल के लोगों की भी आबादी बढ़ी है तो अन्य समुदाय के लोग भी बढ़े हैं। इसका एक कारण यह है कि जिस समुदाय वर्ग या कम्युनिटी की जनसंख्या क्षेत्र विशेष में ज्यादा होती है तो वहां उस समुदाय वर्ग या कम्युनिटी के लोग ज्यादा बसते हैं। ऐसे क्षेत्र उनको ज्यादा आकर्षित करते हैं। मेरा क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र रहा है तो स्वभाविक तौर पर मेरे क्षेत्र में मुस्लिमों की बसावट होती रही है। मेरा क्षेत्र खुला है वहां जमीनें ज्यादा है और अन्य स्थानों की बजाय कुछ सस्ती भी है तो लोग ज्यादतार मेरे क्षेत्र में बसने के लिए आ रहे हैं।

धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में अवैध बस्तियां कब्जां के मामले सबसे ज्यादा आते हैं। नदी-नालों की जमीनों पर कब्जा कर बस्तियां बना दी गई हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिलता रहा है। आप इस पर कोई रोक क्यों नहीं लगा पाए?

अवैध कब्जे, अवैध बस्तियां तो पूरे देहरादून शहर में हैं। इनको रोकने के लिए बहुत बार कोशिशें भी की गई और आज भी हो रही है। लेकिन अब तानाबाना ऐसा बन गया है कि इसमें प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से लचर है। शुरुआती समय में ही कार्यवाही होनी चाहिए, लेकिन नहीं हो पाती है बाद में लकीर पीटने से क्या होगा।

गत् विधानसभा चुनाव में आप पर आरोप लगा था कि राजनीतिक संरक्षण के चलते धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में अवैध रोहिंग्या मुसलमानों को बसाया जा रहा है। उनके वोट भी बनाए गए हैं। आप पर इनको संरक्षण देने का आरोप भी लगाया गया था क्या यह सही है?

जो यह आरोप लगा रहे हैं उनको पता होगा कौन रोहिंग्या है, कौन नहीं। मेरी जानकारी में तो नहीं है कि मेरे क्षेत्र में रोहिंग्या मुसलमान बस रहे हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो यह तो राष्ट्र की सुरक्षा का मामला है उनको यह जानकारी पुलिस के साथ साझा करनी चाहिए। आरोप लगाना बहुत आसान है। आरोप लगाने वालों को यह पता नहीं हे कि मैं एक फौजी परिवार से हूं। अगर राष्ट्रीयता की बात है तो आरोप लगाने वालां को पहले आईने में अपने आप को देखना चाहिए तब मेरे बारे में बात करनी चाहिए। अगर कोई भी देश विरोधी गतिविधि शहर में या प्रदेश में होगी तो उसके खिलाफ सबसे पहले खड़ा होने वाला व्यक्ति विनोद चमोली ही होगा। यह केवल आरोप था जिससे मुझे डैमेज करने का प्रयास किया गया और वह सफल नहीं हो पाए। राजनीति में ऐसे आरोप विरोधी लगाते रहते हैं।

आपके क्षेत्र में वर्षों से ड्रेनेज की सबसे ज्यादा समस्या बनी हुई है, काम भी हो रहे हैं लेकिन बेहद धीमी गति से। आपका क्षेत्र समस्यओं से घिरा हुआ क्यों है?

मेरा क्षेत्र लो लाईन एरिया है। पूरे शहर का फलोक्चल मेरे क्षेत्र में है और शहर का पूरा ड्रेनेज मेरे क्षेत्र में आता है। इसलिए यह नजर आ रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही इस समस्या से घिरा रहा है। जब मैं मेयर था तो भारूवाला में नाव तक लगानी पड़ी थी। लेकिन अब वैसा नहीं है। अब कई काम हो रहे हैं। पेयजल लाइनें बन चुकी हैंं। नालियां और ड्रेनेज के लिए काम किया जा रहा है जिसमें कई काम पूरे भी हो चुके हैं। समस्या है तो इसको स्वीकार करना पड़ेगा। मेरे क्षेत्र में एक हजार करोड़ के काम चल रहे हैं। मेरे क्षेत्र के छह वार्ड ऐसे हैं जिसमें एडीबीडी के तहत पेयजल लाईनों, सीवर लाईन और सड़कों का काम हो रहा है। बड़ा काम है इसलिए कम दिख रहा है। मेरे क्षेत्र में इतने वर्षों से बाईपास का काम रूका हुआ था आज वह पूरा हो चुका है। रेलवे ओवर ब्रिज का काम रूका पड़ा था, लेकिन आज सभी रेलवे ओवर ब्रिज का काम हो रहा है। तमाम काम मेरे क्षेत्र में हो रहे हैं, आप धरातल पर जाकर तो देखिए।

आजकल प्रदेश में मूल निवास और भू कानून की मांग बड़े जोर-शोर से उठाई जा रही है। इसके लिए लगातार आंदोलन हो रहा है। आप भी मूल निवास और भू कानून का समर्थन कर चुके हैं। इस पर आपका क्या विचार है?

निश्चित तौर पर पहाड़ों पर भूमि बचाए जाने की बहुत आवश्यकता है। आज पहाड़ों में लोग बसने जा रहे हैं, कोई न कोई व्यक्ति जब किसी स्थान पर जाता है तो वह अपनी संस्कृति और कल्चर को लेकर जाता है। जब वह ज्यादा तादात में हो जाता है तो वह उस क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता को प्रभावित करता है। हम देवभूमि के लोग हैं हमारी संस्कृति, हमारा कल्चर उनसे अलग है। इसमें कोई संक्रमण न हो इसके लिए
भू-कानून की जरूरत है। लेकिन इससे हमें यह भी देखना होगा कि भू-कानन के बाद पहाड़ के क्षेत्र अगल-थलग न पड़ जाएं, उनकी सम्पत्ति का अवमूल्यन न हो जाए। लैंड वैल्यू डिवैल्युट न हो जाए यह भय मुझे है। अगर लैंड वैल्यू डिवैल्युट हो गई तो उनकी अचल सम्पत्ति की कीमत कम हो सकती है। उनका मनोबल भी कम हो सकता है। इसलिए इसके लिए कोई रास्ता निकालने की जरूरत है। जहां तक मूल निवास की बात है तो यह बहुत खतरनाक मुद्दा है। 1950 में जाने की बात हो रही है, अगर चले जाएं तो कोई समस्या भी नहीं है। लेकिन आपने स्थाई निवास की व्यवस्था भी कर दी है जो कि अब बहुत बड़ी आबादी में है। अब मूल निवासियों को कैसे संरक्षण देंगे और स्थाई निवासियों को कैसे बचाएंगे, साथ ही स्थाई निवासियों को संरक्षण देते हुए कैसे मूल निवासियों को अपर हैंड देंगे इस पर सबसे ज्याद एक्सरसाईज करने की जरूरत है।

उत्तराखण्ड के कौन से ऐसे पांच मुद्दे हैं जिन पर अगर काम किया जाए तो राज्य की बेहतरी के लिए हो सकते है?

पहला है कि सबसे पहले उत्तराखण्ड की इकोनॉमी बढ़ाने की जरूरत है। जब तक हम राज्य की इकोनॉमी नहीं बढ़ाएंगे तब तक हम राज्य का विकास नहीं कर सकते। इसके लिए सबसे अहम क्षेत्र पर्यटन है। चाहे धार्मिक हो या पर्यटन। इनको ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देकर हम न सिर्फ राज्य की आर्थिक स्थिति को बढ़ा सकते हैं, साथ ही इससे लोगों को रोजगार से जोड़ सकते हैं।

दूसरा है स्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर
को बढ़ावा देना। अभी जो भी इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम हो रहा है वह हमारे प्रदेश की परिस्थिति के अनुकूल नहीं रह पाता। कहीं लैंडस्लाईड हो जाता है तो वह नष्ट हो जाता है। आपने जोशीमठ में देखा ही है कि किस तरह से तबाही आई थी। इसलिए हमें सबसे ज्यादा जरूरत स्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की जरूरत है। तीसरा है स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना। आज हमारे पास स्कूलों की व्यवस्था तो है, मेन पावर भी है लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इससे हम मैदानी क्षेत्र और पहाड़ी क्षेत्र में शिक्षा का समान स्तर बढ़ा सकते हैं। इसके लिए खास तौर पर यह देखने की जरूरत है कि अगर कहीं सरकारी स्कूल है और उसी के बगल में कोई प्राईवेट स्कूल है तो सरकारी स्कूलों से बच्चे प्राईवेट में चले जाते हैं जिससे सरकारी स्कूल खाली हो जाते हैं जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षक प्राईवेट स्कूलों से ज्यादा बेहतर हैं। इसलिए सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने और उनका इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की जरूरत है। चौथा हेल्थ सेक्टर। आज हमने आम आदमी को सस्ता ईलाज तो मुहैया करवा दिया है लेकिन हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर उतना बेहतर नहीं खड़ा कर पाए जितना होना चाहिए। मैंने पहले भी कहा है कि हेल्थ सेक्टर में इंफ्रास्ट्रक्चर तो है लेकिन मेन पावर उसके अनुरूप नहीं है। इसके लिए हेल्थ के क्षेत्र में बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। अभी हमने 108 स्वास्थय सेवा चलाई जिससे बहुत बढ़िया काम हुआ। अभी ड्रोन के माध्यम से दवाएं पहुंचाने का काम कर रहे हैं जो कि बहुत अच्छा है। लेकिन इसके लिए स्थाई व्यवस्था बनाने और उसे मजबूती से लागू करने की जरूरत है।
पांचवा मुद्दा पेयजल का है। आज पहाड़ों में सबसे ज्यादा समस्या पेयजल ही है। आज भी प्राकृतिक स्रोतों से पानी लाना पड़ रहा है। इसके लिए ‘हर घर नल – हर घर जल’ योजना चलाई जा रही है। लेकिन खास तौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी समस्या है जिसे दूर करना जरूरी है।

 

  1. उत्तराखण्ड में बड़े-बड़े आधुनिक अस्पताल, कई मेडिकल कॉलेज जो राज्य बनने से पहले नहीं थे, आज हैं। एम्स जैसा संस्थान भी प्रदेश में है। पहाड़ों में भी इंफ्रास्ट्रक्चर के सेक्टर में बहुत काम हुआ है, चाहे वह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से हुआ हो, हाईवे के निर्माण से, ऑल वेदर रोड के निर्माण से हुआ हो या फिर रेलवे लाईन के निर्माण और विस्तार से हो रहा हो, लेकिन काम बहुत हुआ है। जबकि राज्य बनने से पूर्व ऐसा नहीं था। आज सड़कां का जाल फैला हुआ है, पहले कहां था। रोजगार की दृष्टि से भी कई सारे विकल्प सामने हैं। अगर सरकारी रोजगार को छोड़ दें तो लगेगा कि प्राइवेट सेक्टर से रोजगार मिले हैं, साथ ही स्वरोजगार से भी लोग जुड़े हैं।


विनोद का सफर

जीवन परिचय : जन्म 24 अक्टूब

शिक्षा : प्राथमिक शिक्षा देहरादून से की, इसके बाद सीतापुर से इंटर मीडिएट की शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा पूरी की।

राजनीतिक यात्रा : वर्ष 1985 में भाजपा की सदस्यता। भाजयु मोर्चा के जिला मंत्री और जिलाध्यक्ष रहे। प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य एवं गढ़वाल मण्डल प्रभारी भाजपा युवा मोर्चा (उ.प्र.)। जिलाध्यक्ष-उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति, देहरादून। प्रदेश मंत्री भाजपा समिति, उत्तराखण्ड- उ.प्र.। उपाध्यक्ष-महानगर, भाजपा, देहरादून। अध्यक्ष-महानगर, भाजपा, देहरादून। प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य- भाजपा, उत्तराखण्ड। वर्ष 1991 से लगातार तीन लोकसभा चुनावों में देहरादून के चुनाव संयोजक के रूप में कार्य किया।

जनप्रतिनिधि के रूप में : सदस्य-नगर पालिका परिषद, देहरादून। अध्यक्ष-नगर पालिका परिषद, देहरादून। दो बार महापौर-नगर निगम, देहरादून। राष्ट्रीय अध्यक्ष-अखिल भारतीय महापौर परिषद, दिल्ली। विधायक-धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र, देहरादून। इसी सीट से वर्ष 2022 में पुनः विधायक निर्वाचित।

उपलब्धियां : धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में अनेक रुके काम पूरे करवाये, जिनमें बायपास का चौड़ीकरण और निमार्ण, फ्लाईओवर और तीन रेलवे ओवर ब्रिज की स्वीकृति जिसमें अजबपुर ओवरब्रिज का निर्माण हो चुका है और भण्डारी बाग ओवर ब्रिज का निर्माण प्रगति पर है, जल्द ही धर्मपुर में एक और रेलवे ओवर ब्रिज पर काम होने वाला है। एक हजार करोड़ की लागत से सडकों का पुनर्निर्माण, सीवरेज लाइन और पेयजल योजनाओं पर काम चल रहा है। ड्रेनेज के लिए योजना का निर्माण अंतिम चरण में है।

विजन : सबसे पहले उत्तराखण्ड की इकोनॉमी बढ़ाने की जरूरत, स्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना, स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना, हेल्थ के क्षेत्र में काम करने की जरूरत, पेयजल की समस्या को दूर करना।

मूल निवास और स्थाई निवास का जो मुद्दा है राज्य बनने के साथ ही इस पर काम होना चाहिए था, क्योंकि तब नया-नया राज्य बना था और सबको यह अच्छी तरह से मालूम था कि अलग पहाड़ी राज्य की मांग पर ही राज्य बना है तो यहां के निवासियों के हक उनको ही मिलने चाहिए। इसको लेकर सबका माइंडसेट बना हुआ था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया और अब 23 वर्ष के बाद इस मुद्दे का हल निकालना बहुत कठिन है। आज एक्शन के साथ रिएक्शन भी आ रहा है। यह ऐसा मुद्दा है जिसको हल करने की बजाय उसे समझा ही नहीं गया। उत्तराखण्ड में आज भी पलायन सबसे कम है। हमारे प्रदेश में इस समय सिर्फ 37 प्रतिशत की आबादी शहरों में है जबकि शेष आबादी गांव में ही है। इसलिए हम गांव में क्या सुविधाएं और रोगजार दे सकते हैं जिससे पलायन न हो पाए, इस पर काम करना होगा। पहाड़ के लिए दो विषय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, एक शिक्षा और दूसरा चिकित्सा। पहाड़ का व्यक्ति शिक्षा के लिए सबसे ज्यादा सजग रहता है लेकिन शिक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर नहीं है। इसी तरह से हेल्थ के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर तो है लेकिन मेन पावर नहीं है। इसको हमें बढ़ाने की जरूरत है।

 

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