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Uttarakhand

पंजे-फूल के साथ झाडू भी मैदान में

सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में इस बार के चुनावी रण में ‘पंजे’ और ‘कमल’ के साथ ही ‘झाड़ू’ भी मैदान में उतरने जा रहा है। वर्तमान विधायक चंद्रा पंत की छवि बेदाग तो है लेकिन विकास के नाम पर कोई उल्लेखनीय प्रगति का न होना उनके लिए विधानसभा चुनाव में संकट का कारण बन सकता है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस सीट पर खासी सक्रिय है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक मूयख महर के साथ-साथ सेवानिवृत्त ले. कर्नल एस.पी. गुलेरिया और अंजू लुंठी भी टिकट के दावेदारों में शामिल हैं। भाजपा के युवा नेता मोहन सिंह लुंठी भी दावेदारी कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता सुशील खत्री का कहना है कि पार्टी किसी ईमानदार छवि वाले रिटायर्ड नौकरशाह को यहां से मैदान में उतार सकती है

पिथौरागढ़ विधानसभा में मुद्दे वही हैं जो वर्ष 2002 में पहले विधाानसभा चुनाव के दौरान फिजाओं में तैर रहे थे। पिछले बीस सालों में यही मुद्दे भाजपा-कांग्रेस बारी-बारी से लपकते रहे हैं। एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करना हो या फिर आधे-अधूरे ढांचों का श्रेय लेना हो, इस राजनीतिक कार्य शैली में अब तक कोई बदलाव नहीं आया है। हां बगावत, भीतरघात एवं दल-बदल से फिलहाल यह विधानसभा सीट सुरक्षित दिख रही है। अंदरखाने भले ही दावेदारी या फिर एक दल से दूसरे दल में आने-जाने की बातें हो रही हों, लेकिन बाहरी परिदृश्य बिल्कुल साफ-सुथरा है। वर्ष 2017 का राजनीतिक परिदृश्य अवश्य अलग था। भाजपा कांग्रेस में सेंध लगाने में सफल रही थी। तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रवीन्द्र सिंह बिष्ट ‘मालदार’ एवं युवा नेता महेन्द्र सिंह लुंठी कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। इसका लाभ भाजपा को मिला भी। लेकिन उसके बाद इन दोनों नेताओं की सक्रियता को देखें तो महेन्द्र सिंह लुंठी सक्रिय रहे, लेकिन जो भूमिका वह भाजपा में चाह रहे थे, वह अब तक उन्हें नहीं मिल पाई है। लुंठी छात्र राजनीति से ही क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। राज्य आंदोलनों के साथ ही कई तरह के जन आंदोलनों में भी उनकी भूमिका रही है। बसपा-कांग्रेस से होते हुए वह भाजपा तक पहुंचे लेकिन भाजपा में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो पाई। अब इस युवा नेता की स्थिति फिलहाल बाहरी तौर पर सक्रिय है, लेकिन अंदरखाने मायूसी भरी दिखती है। यही हाल वरिष्ठ नेता रवीन्द्र सिंह बिष्ट ‘मालदार’ का भी है। वह भाजपा में आ तो गए लेकिन यहां उनको कोई खास जिम्मेदारी या तवज्जो नहीं मिल पाई।
भाजपा में आने के बाद वह पूरी तरह निष्क्रिय दिखे। उन्होंने न तो कोई खुशी जाहिर की और न ही नाखुशी। इसके अलावा पार्टी के अंदरखाने जो वर्चस्व की लड़ाई है। वह पार्टी के लिए खतरा है तो चुनौती भी बनी हुई है। अब 2022 में पार्टी इन तमाम स्थितियों को किस तरह से प्रबंधन करती है यह महत्वपूर्ण होगा। भाजपा के पक्ष में जो बात जाती है वह यह है कि इसका अपना पार्टी संगठन काफी मजबूत है। पार्टी के सहयोगी संगठन भी सक्रिय नजर आते हैं। बूथ लेवल तक पार्टी की सक्रियता दिखती है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पार्टी के पास यहां पर मयूख महर के रूप में एक मजबूत प्रत्याशी भी हैं और बाहरी तौर पर किसी की दावेदारी भी नहीं दिखती। लेकिन देश ही नहीं प्रदेश में जो उथल-पुथल कांग्रेस में मची है उसके प्रभाव से यह सीट बच पाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। पिछले कुछ सालों से कांग्रेस का पार्टी संगठन कमजोर दिखता रहा है। विद्यार्थी एवं सैनिक प्रकोष्ठ को छोड़कर अन्य संगठन उतने सक्रिय नहीं दिखते, जितने दिखने चाहिए। हाल-फिलहाल मयूख महर ही कांग्रेस के सबसे मजबूत दावेदार हैं। कांग्रेस संगठन पर उनकी अच्छी पकड़ भी है। कांग्रेस उनकी छवि विकास पुरुष के तौर पर पेश करती है लेकिन कई पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि वह खुलकर पार्टी कार्यकर्ताओं से बात नहीं करते। जनता के बीच भी सहज तौर पर घुल-मिल नहीं पाते जिससे संवादहीनता की स्थिति बनी रहती है। लेकिन वह विकास के कई कार्य व्यक्तिगत तौर पर भी करवा देते हैं जिससे जनता के बीच वह मजबूत पैठ बनाने में सफल रहे हैं।

पिथौरागढ़ विधानसभा सीट में अब तक हुई हार-जीत को देखें तो जो पांच विधानसभा चुनाव यहां हुए हैं उनमें से चार बार यह सीट प्रकाश पंत परिवार के पास गई है। इस सीट पर शुरू से ही पंत परिवार का दबदबा रहा है। वर्ष 2002, 2007 एवं 2017 में दिवंगत भाजपा नेता प्रकाश पंत ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया तो उनकी मौत के बाद वर्ष 2019 में हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी चंद्रा पंत इस सीट को बचाने में सफल रही हैं। जहां तक कांग्रेस के सशक्त नेता माने जाने वाले मयूख महर की बात है तो वह 2002 एवं 2017 में यह सीट हार चुके हैं। हां, 2012 में वह इस सीट को 13 हजार से भी अधिक मतों से जीतने में सफल रहे थे। वर्ष 2007 का चुनाव उन्होंने इस सीट से न लड़कर कनालीछीना विधानसभा सीट से लड़ा और जीते थे। बाद में कनालीछीना सीट के समाप्त होने के बाद वह लगातार इस सीट से दावेदारी करते रहे हैं। 2019 में हुए उपचुनाव में उन्होंने खुद दावेदारी न कर कांग्रेस की अंजू लुंठी को चुनाव लड़ाया था। अंजू लुंठी चुनाव हार गईं। लेकिन यह चर्चा जरूर रही कि यदि इस सीट पर मयूख चुनाव लड़े होते तो शायद यह सीट निकाल ले जाते। वर्ष 2022 में अगर भाजपा से चंद्रा पंत और कांग्रेस मयूख महर को लड़ाती है तो इस सीट पर एक बार फिर दिलचस्प मुकाबला होगा। जहां तक अन्य पार्टियों का सवाल है तो आम आदमी पार्टी अवश्य जनता से जुड़े सवालों को लेकर सक्रिय दिख रही है। वह किसी ईमानदार नौकरशाह वाले चेहरे की तलाश में है। असंतुष्ट कर्मचारियों से लेकर नाराज मतदाताओं के बीच जाकर वह अपना पक्ष मजबूत कर तो रही है लेकिन भाजपा- कांग्रेस की विचारधारा वाली इस सीट पर वह फिलहाल ऐसी स्थिति में नहीं दिखती कि सीट निकाल ले जाए। लेकिन इतना तय है कि वह भाजपा-कांग्रेस के समीकरण को बिगाड़ने में सफल हो सकती है। जहां तक जनता जनार्दन की बात है तो उसका मिजाज भांप पाना बेहद कठिन है। राजनेता कुछ भी कहते फिरें। राजनीतिक जानकार कुछ भी आकलन करते रहे लेकिन यहां के आम मतदाता का वोटिंग बिहेवियर भांप पाना आसान नहीं है। हालांकि कांग्रेस विरोध का अनोखा तरीका अपना कर मुद्दों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। कभी वह नियमित हवाई सेवा बंद होने की वर्षगांठ मनाते हुए केक काटती है तो कभी नैनी-सैनी हवाई पट्टी में दूरबीन से विमान खोजती है तो कभी बढ़ती महंगाई के विरोध में लकड़ी पर चाय बना जनता का ध्यान आकर्षित कर रही है। कांग्रेस ने हवाई सेवा को बड़ा मुद्दा बनाया है। पूर्व विधायक मयूख महर कहते हैं कि कांग्रेस के शासन में करोड़ों रुपयों से एयरपोर्ट का विस्तारीकरण किया गया। दो माह तक निःशुल्क हवाई सेवा भी शुरू की लेकिन भाजपा ने उसे सत्ता में आते ही बंद कर दिया। आम आदमी पार्टी भी इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेर रही है। फिलहाल इस सीट पर मामला भाजपा बनाम कांग्रेस का बना हुआ है। यह कांग्रेस- भाजपा दोनों के लिए हमेशा से प्रतिष्ठा की सीट रही है। इस सीट पर पिछले 20 साल में सिर्फ इतना बदलाव आया कि पुरुष आधिपत्य वाली इस सीट से 2019 में पहली बार महिला विधायक चुनी गई। तब से यहां महिलाओं का सियासत पर रूझान बढ़ा है। इस सीट पर पुरुषों की अपेक्षा महिला मतदाता अधिक हैं। ऐसे में महिलाओं से जुड़े मुद्दे भी चुनावों को प्रभावित करेंगे।

अब विकास की बात करें तो इस विधानसभा सीट का एक रोचक तथ्य यह है कि यहां विकास के जो भी ढांचे खड़े हैं या स्वीकृत हैं उसे भाजपा अपना तो कांग्रेस अपना बताती है। श्रेय लेने की इस होड़ में पब्लिक कंफ्यूज है। जहां तक विकास की बात है तो यह भी चुनाव जीतने का अब पैमाना नहीं रहा। पूर्व में जिन विधायकों ने अच्छा काम किया था वह चुनाव हार गए। अब जनादेश की चरित्र नित बदल रहा है। एक बार पूर्व में स्व. इंदिरा हृदयेश ने भी यह टिप्प्णी की थी कि विकास अब जीत का पैमाना नहीं रहा। अगर ऐसा है तो फिर यह बात सच साबित होती है कि संगठन एवं बूथ लेवल तक पकड़ जीतने का एक अहम शस्त्र है। इसमें कांग्रेस के मुकाबले भाजपा बेहतर स्थिति में दिखती है। कोरोनाकाल में संकल्प प्रकाश टीम के तहत विधायक एवं उनकी टीम सक्रिय रही। ग्रामीण क्षेत्रों का लगातार भ्रमण होता रहा। पिछले दो साल के कार्यकाल में डेढ़ साल कोरोना की भेंट चढ़ गया। इस तरह 6 महीने की सक्रियता को आधार मानें तो विधायक के पास विकास के नाम पर कहने को बहुत कुछ है। लेकिन जिन कामों पर विधायक अपना दावा कर रही हैं उन्हें पूर्व विधायक अपना बताते हैं। अब राजनीति का यह सिद्धान्त इस सीट पर कितना लागू होता है जिसमें कहा जाता है कि राजनीति में आगे निकलने के दो ही रास्ते हैं या तो आप तेज भागिये, अगर तेज नहीं भाग सकते तो तेज भागने वाले को
प्रतियोगिता से बाहर कर दीजिए।

विकास जो मुद्दा भर बनकर रह गया…
कहने को तो विकास के नाम पर जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ में मेडिकल कॉलेज, बेस अस्पताल, नर्सिंग कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, स्पोटर्स कॉलेज हैं लेकिन यह भरपूर लाभ दे पाने में सफल नहीं हो पाए हैं। विमान सेवा जिसे कांग्रेस ने अपना मुद्दा बनाया है। 28 सालों में सिर्फ 14 माह ही सेवा दे पाई। नैनी-सैनी हवाई पट्टी 1991 में बनकर तैयार हो गई। बाद में रनवे को छोटा बताकर 65 करोड़ की लागत से इसका विस्तार किया गया। 2015 में 9 सीटर विमान की ट्रायल लैंडिग हुई। कुछ समय विमान उड़ा फिर 8 अक्टूबर को फिर ट्रायल हुआ। कुछ समय फिर हवाई जहाज हवा में लेकिन पिछले डेढ़ साल से यह हवाई पट्टी शो पीस बनी हुई है। यही हाल स्पोर्टस कॉलेज का भी रहा। 2014 में लेलू में 19 करोड़ 50 लाख की लागत से स्पोटर्स कॉलेज का निर्माण शुरू हुआ। सात साल गुजर गए लेकिन इसका निर्माण पूर्ण नहीं हो पाया है। 15 साल से बनने वाली जेल आधी-अधूरी है। वर्ष 2006 में इसे स्वीकृति मिली थी। 22 करोड़ रुपए की धनराशि जारी होने के बाद भी यह जेल अधूरी है। डेढ़ वर्ष पूर्व पिथौरागढ़ में मेडिकल कॉलेज को स्वीकृति मिली थी, अब जाकर 74 करोड़ रुपए आवंटित हुए हैं लेकिन अभी इसका शिलान्यास नहीं हुआ। विधायक चंद्रा पंत बजट स्वीकृत करने का श्रेय अवश्य ले सकती हैं। हालांकि इसकी मेडिकल कॉलेज की डीपीआर 570 करोड़ रुपए की है। पूर्व योजनाओं के बनने की गति को देखें तो यह कब बनकर तैयार होगा और इसका लाभ जनता को कब तक मिल सकेगा कहा नहीं जा सकता। बेस अस्पताल 2015 में 64 करोड़ की लागत से बनना शुरू हुआ, अब पूर्णता की ओर है लेकिन संचालन नहीं हो पाया है। हां, कोरोनाकाल में कोविड केयर सेंटर के रूप में लोगों को राहत अवश्य मिली। थरकोट झील जो दिवंगत भाजपा नेता प्रकाश पंत का ड्रीम प्रोजेक्ट था, 2007 में इसका शिलान्यास हुआ। अब जाकर 14 साल बाद चंद्रा पंत के प्रयासों से यह लगभग पूर्णता की ओर है। पूर्व विधायक मयूख महर भी इस कार्य के लिए उनकी प्रशंसा कर चुके हैं। इस विधानसभा में राजनीति भले ही तेजी से होती हो लेकिन विकास कार्य कितनी धीमी गति से होते हैं इसका एक उदाहरण आकाशवाणी केंद्र है। 24 साल बाद भी यह रिले केंद्र के रूप में काम कर रहा है। देख-रेख न होने से इसके भवन जीर्ण-शीर्ण होने के कगार पर हैं। 21 करोड़ की बहुमंजिला पार्किंग को बनते 5 साल हो गए लेकिन इसका लाभ भी लोगों को नहीं मिल पाया। जिला मुख्यालय में लोक संस्कृति के संवर्धन के लिए राजकीय प्रेक्षागृह के लिए ऑडिटेरियम का वर्षों पूर्व निर्माण हुआ लेकिन इसका संचालन नहीं हो पाया। अब निजी हाथों में दिए जाने की सूचनाओं के चलते इसका विरोध होने लगा है। पिथौरागढ़ महिला जिला अस्पताल 125 बेड का बनाया जाना था। इसके लिए वर्ष 2016 में 3 करोड़ 56 लाख का प्रस्ताव बनाकर निदेशालय को भेजा गया था। लेकिन आज तक भवन नहीं बन पाया। अस्पताल के कई भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। स्थापना के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसके लिए काम नहीं हो पाया, जबकि धारचूला, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेरीनाग, गणाई तहसील की महिलाएं प्रसव के लिए यहां पर निर्भर हैं। इस सीट की महिलाओं का अपना दर्द है। यहां अल्ट्रा साउंड जांच हमेशा बाधित होती रहती है। महिलाएं हर विधानसभा चुनावों में यह सवाल पूछती हैं कि आखिर हालत कब बदलेंगे। कब तक उन्हें यूं ही समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। पिथौरागढ़ महिला अस्पताल में डेढ़ साल से अल्ट्रा साउंड सेवा ठप पड़ी है। 24 अप्रैल 2018 को ‘हंस फाउंडेशन’ के सहयोग से ढाई करोड़ की लागत से आईसीयू यूनिट तैयार हुई। इसमें अत्याधुनिक मशीनें लगी हैं। लेकिन सरकार इसमें तीन साल बाद भी स्टाफ की नियुक्ति नहीं कर पाई है। जबकि इसके संचालन के लिए करीब 24 पदों पर तैनाती होनी है। यहां के लोगों को लंबी यात्रा कर मैदानी क्षेत्रों में स्थित अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है। आपदा के चलते दुर्घटनाओं को देखते हुए ट्रामा सेंटर अहम था लेकिन आज तक यह स्वीकृत नहीं हो पाया। जिला एवं महिला अस्पताल का एकीकरण तो कर दिया लेकिन इसका कितना फायदा मिल पाएगा, कहा नहीं जा सकता। कई योजनाएं घोषणाओं में उलझी हुई हैं। पिथौरागढ़ में सीवर, फेज टू का निर्माण, पेयजल वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण, रई झील का निर्माण, औद्योगिक संस्थानों का विकास, ट्रामा सेंटर निर्माण, डेढ़ करोड़ से 50 बिस्तरों का वार्ड जैसी कई विकास योजनाएं आज भी अधर में हैं। 30 किमी. की ऑल वेदर रोड लोगों के लिए मुसीबत बनी हुई है।

भाजपा व कांग्रेस में सिमटा रहा मुकाबला
विधानसभा पिथौरागढ़ अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र है। प्रदेश में पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 2002 में हुआ। जनपद पिथौरागढ़ में उस समय धारचूला, कनालीछीना, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ एवं डीडीहाट सहित पांच विधानसभा सीटें थी। वर्ष 2007 के चुनाव में पिथौरागढ़ सीट से भाजपा के प्रकाश पंत दोबारा विधायक बनने में सफल रहे। वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद जनपद में पांच के बजाय चार सीटें रह गई। कनालीछीना सीट, डीडीहाट एवं धारचूला सीट में मर्ज हो गई। तब कांग्रेस के मयूख सिंह महर विधायक बने तो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पिथौरागढ़ सीट से दिवंगत भाजपा नेता प्रकाश पंत ने मयूख महर को पराजित किया। यह काफी नजदीकी मुकाबला था। पंत को 32941 तो मयूख महर को 30257 मत प्राप्त हुए। वर्ष 2019 में प्रकाश पंत की मौत के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने चंद्रा पंत को उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस ने अंजू लुंठी को उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट के इतिहास में दो महिला उम्मीदवार पहली बार आमने-सामने थी। भाजपा की चंद्रा पंत ने अंजू लुंठी को 3267 मतों से पराजित किया। अगर जीत के अंतर व मतदान प्रतिशत को आधार बनाकर देखें तो वर्ष 2002 के चुनावों में 54.90 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें भाजपा के प्रकाश पंत 6126 मतों से जीते। वर्ष 2007 में 62 .70 प्रतिशत मतदान हुआ। प्रकाश पंत 5990 मतों से जीते। 2012 में हुए चुनावों में 65 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें कांग्रेस के मयूख महर 13197 वोटों से जीते। 2017 के विधानसभा चुनाव में 64 .88 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें भाजपा के प्रकाश पंत ने कांग्रेस के मयूख महर को 2684 मतों से पराजित किया। वर्ष 2019 के उपचुनाव में 47 .48 प्रतिशत मतदान हुआ जो 2017 के मुकाबले 17 .40 प्रतिशत कम था। इसमें भाजपा के चंद्रा पंत ने कांग्रेस की अंजू लुंठी को 3267 मतों से पराजित किया।

हमने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। हम संगठन का निर्माण कर रहे हैं। सदस्यता अभियान चला रहे हैं। जन मुद्दों पर जनमत यात्रा निकालने की तैयारी हो रही है। हम लोगों से सुझाव मांग रहे हैं। इसका डाटा तैयार कर हाईकमान को भेजा जाएगा। हम लगातार कर्मचारियों के संपर्क में हैं। विकास की बात तो छोड़िए भाजपा विधायक विधानसभा में अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों की सही ढंग से पैरवी भी नहीं कर पाईं। जनता ने जिस आशा एवं उम्मीद से इन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था वह पूरे नहीं हुए। पेयजल, स्वास्थ्य, सीवर लाइन, इंजीनियरिंग कॉलेज जैसे तमाम ऐसे कार्य हैं जो धरातल पर नहीं उतर पाए। विधायक ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए लेकिन वह इसे पूरा नहीं कर पाईंेे। जहां तक इस सीट से दावेदारी की बात है तो हमारे राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल हैं जो नौकरशाह रहे हैं। हमारी प्राथमिकता है कि इस सीट से कोई रिटायर्ड नौकरशाह या फिर ईमानदार छवि वाले व्यक्ति को टिकट मिले। अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
सुशील खत्री, प्रदेश प्रवक्ता आप

 

हमारी विधानसभा में 47 बूथ हैं। मैं इन सब में अपने आवेदन दे आया हूं। मेरी दावेदारी रहेगी। पार्टी ने जो वादा किया था वह पूरा नहीं कर पाई। अब पार्टी को मुझे विधायक का टिकट तो देना ही चाहिए। देखिए, जहां तक आधार की बात है तो राज्य आंदोलन के साथ ही जितने भी जन आंदोलन हुए हैं मैं उनसे जुड़ा रहा हूं। हवाई पट्टी, आईटीआई, मेडिकल कॉलेज सहित जनहित में जितने भी आंदोलन क्षेत्र में हुए, मैंने निरन्तर उनमें भागीदारी की। जनता से संवाद बनाए रखा। उनकी समस्याओं को न सिर्फ उठाया, बल्कि उसके निदान की तरफ भी मैं बढ़ा हूं। पार्टी कार्यकर्ता भी चाहते हैं कि मैं चुनाव लडूं। मैं उन नेताओं की श्रेणी में शामिल नहीं हूं जो चुनाव लड़ने के बाद अपने व्यापार एवं ठेकेदारी पर ध्यान देते हैं। चुनाव जीतने के बाद जनता के मुद्दों को भूल जाते हैं। हमारा ऐसा कोई काम नहीं है। जनता के मुद्दों की पैरवी के साथ ही विकास कार्य कराना मेरा पहला मकसद है। मैं पिछले पांच साल से लगातार जनता के बीच हूं। जनता की तरफ से भी मांग है। कार्यकर्ताओं की मांग है। यही दावेदारी का आधार है। इसका मतलब यह नहीं कि विधायक ने काम नहीं किया है।
महेन्द्र सिंह लुंठी, युवा नेता भाजपा

 

पूर्व सैनिक कई तरह की समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं। सीएसडी कैंटीन की सुविट्टाा न होने से ग्रामीण क्षेत्र के पूर्व सैनिकों को 70 से 80 किमी. दूर जाना पड़ता है। जिससे वह इस सेवा का लाभ नहीं उठा पाते हैं। समय पर  सामान न मिलने से उनको रहने एवं खाने की दिक्कत भी आती है। ऐसी स्थिति में जो लाभ पूर्व सैनिकों को मिलना चाहिए वह नहीं ले पाते। हमारा प्रयास रहेगा कि सीएसडी कैंटीन तहसील स्तर पर खोली जाएं ताकि पूर्व सैनिक इसका लाभ उठा सकें। वैसे भी यह सैनिक बाहुल्य क्षेत्र है। ऐसे में पूर्व सैनिकों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। हम जिला मुख्यालय में शहीद सैनिक स्मारक बना रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसके लिए 1 करोड़ रुपया स्वीकृत कराया था लेकिन वर्तमान सरकार ने इसके निर्माण के लिए एक पैसा भी नहीं दिया। पहले जिला मुख्यालय में रेगुलर तौर पर सेना की भर्ती होती थी लेकिन पिछले 12 साल से यह नहीं हो पा रही है। जिले में 65 हजार से अधिक बेरोजगार हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि यहां पर नियमित तौर पर सेना की भर्ती आयोजित की जाए। इसके अलावा पूर्व सैनिकों की पैंशन से जुड़े मामले हैं। सेना में लाल स्याही जैसे कानून के चलते कई लोग बेरोजगार हो रहे हैं। उनको उनका हक नहीं मिल रहा है। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ एवं रक्षा मंत्रालय ऐसे नियमों को बना रहा है जो अंग्र्रजों के जमाने से भी बदतर हैं। इसमें संविधान के मूल नियमों का भी उल्लंघन हो रहा है। ये नियम जवानों के पेट में चोट मार रहे हैं। सेना का तेजी से राजनीतीकरण हो रहा है। चुनावों में यह मुद्दे भी अहम रहेंगे। सोल्जर बोर्ड की स्थापना इसीलिए की गई थी कि यह पूर्व सैनिकों के वेलफेयर को देखेगी लेकिन इसमें 50 प्रतिशत भी काम नहीं हो रहा है। इसे सुधारना भी हमारी प्राथमिकता में होगा। यही हाल रिकॉर्ड ऑफिस का भी है। वह सैनिकों के कई मामलों को दबाकर रखता है। वर्ष 2014 में हरीश रावत ने अर्ट्टाबलों के लिए जो ढांचा बनाने का प्रयास किया वह आज भी वहीं पड़ा हुआ है। हमारा प्रयास रहेगा कि एक अल्मोड़ा एवं दूसरा कोटद्वार में सेंटर बनाया जाए।
ले.कर्नल एस.पी. गुलेरिया, पूर्व उपाध्यक्ष, उत्तराखण्ड सैनिक कल्याण परिषद् एवं कांग्रेस से दावेदार

 

स्व ़प्रकाश पंत जी ने इस विधानसभा के लिए अनेक काम स्वीकृत कराए थे। कुछ काम जो अधूरे रह गए थे, उन्हें मैंने पूरा किया। अपनी विधानसभा में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़कों की स्थिति को मजबूत किया। बेस, हॉस्पिटल का कार्य पूर्ण होने को है। कोविड काल में यहां पर आइसोलेशन सेंटर बना। थरकोट झील जो पंतजी एवं मेरी प्राथमिकता में थी। मैंने कार्यभार ग्रहण करने के 20 दिन के भीतर ही इसके लिए धनराशि स्वीकृत कराई। अब यह कार्य भी पूर्ण होने की स्थिति में है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज हमारी बड़ी उपलब्धि है। माननीय प्रधानमंत्री एवं राज्य सरकार के सहयोग से इसके निर्माण के लिए 76 करोड़ रुपया स्वीकृत हो चुका है। आंवलाघाट पेयजल योजना का तीसरा फेज पूरा करना भी हमारी बड़ी उपलब्धि रही। शिक्षा के क्षेत्र में मैंने ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा का लाभ मिले इसके लिए तीन अटल आदर्श स्कूलों को थरकोट, गौरंगचौड एवं बड़ावे जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में खोला। विधानसभा के आंतरिक मार्गों की सड़कों का डामरीकरण किया। जो क्षेत्र सड़क से नहीं जुड़े थे उन्हें विधायक निधि से जोड़ने का प्रयास किया। मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि जो भी वादा मैंने जनता से किया था, अपने कार्यकाल में पूरा किया। वैसे भी मेरा डेढ़ साल का कार्यकाल कोरोना की भेंट चढ़ गया। अगर देखा जाए तो मैंने अपने 6 महीने के कार्यकाल में सर्वाधिक काम करके दिखाया है। मुझे स्व ़पंत के सपनों को पूरा करना है। कुछ सपनों को हम पूरा कर पाए हैं। जो बचे हैं उन्हें भी पूरा करना है। उम्मीद है कि पार्टी का सहयोग मुझे मिलेगा। पार्टी मुझे एक बार फिर जनता की सेवा करने का मौका देगी। कुछ मैंने अपने सीमित कार्यकाल में किया है लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। अब यह पार्टी के ऊपर निर्भर है कि वह क्या निर्णय लेती है।
चंद्रा पंत, विधायक पिथौरागढ़

 

यहां स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से बदहाल हैं। हमने अपने कार्यकाल में मेडिकल कॉलेज स्वीकृत कराया लेकिन विधायक उसमें एक ईंट तक नहीं लगा पाई। बेस अस्पताल की स्वीकृति भी हमने कराई लेकिन विधायक उसका निर्माण भी नहीं करा पाईं। हां, एक बात की बधाई मैं विधायक चंद्रा पंत को देना चाहता हूं कि उन्होंने बहुत कम समय में थरकोट झील का निर्माण करा लिया, यह काबिले तारीफ है। लेकिन इसके अलावा वह कोई काम नहीं करा पाई। जब आंवलाघाट पेयजल योजना बनी थी तो उसमें 34 गांव शामिल थे, वह वंचित रह गए। इन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल पहुंचाना हमारी प्राथमिकता रहेगी। यहां से विमान सेवा शुरू कराने में भी विधायक नाकाम रही हैं। यह भी हमारा मुद्दा होगा। भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्र होने के चलते यहां पर विमान सेवा जरूरी है। शिक्षा पर हमारा फोकस रहेगा। हमारा प्रयास रहेगा कि हम जनपद में एक कृषि विद्यालय खोलेंगे। पीजी कॉलेज में बी फार्मा, एम फार्मा जैसे रोजगारपरक विषयों को खुलवाना हमारी प्राथमिकता रहेगी। हमारे यहां नर्सिग कॉलेज है लेकिन यह हल्द्वानी में पाल नर्सिग कॉलेज से संबद्ध है। हमारा प्रयास रहेगा कि यहीं से कक्षाएं शुरू हों। विद्यार्थी अनावश्यक दौड़-भाग एवं खर्च से बच सकें। यहां तीन आईटीआई बंद हो चुके हैं, उन्हें खुलवाना हमारी प्राथमिकता में रहेगा। तकनीकी शिक्षा पर हमारा फोकस रहेगा। इससे हुनर एवं रोजगार आएगा। बालिकाओं को घर पर ही शिक्षा मिलेगी तो एक सुरक्षित माहौल में वह पढ़ाई कर पाएंगी। मेरी व्यक्तिगत तौर पर दावेदारी रहेगी। मुझे उम्मीद है कि पार्टी 2022 में मुझे सेवा का अवसर देगी। अब यह पार्टी को तय करना है।
मयूख महर, पूर्व विधायक

 

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