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उत्तराखंड के 7 लाख नौनिहालों को मिलेगा मिड डे मील, हाईकोर्ट में होगा कल फैसला

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उत्तराखंड सरकार केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की गाइडलाइन का पालन नहीं कर रही है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उत्तराखंड सरकार लॉकडाउन के 3 माह के दौरान सरकारी स्कूल बंद रहने और उनमें पढ़ने वाले बच्चों को मिड डे मील दे। इसके साथ ही अगर मिड-डे-मील ना मिल सके तो उन्हें कच्चा राशन दिया जाए। यही नहीं बल्कि कच्चा राशन को पकाने की राशि भी प्रत्येक बच्चे को उपलब्ध कराई जाए। लेकिन उत्तराखंड सरकार ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेशों का पालन नहीं किया । फल स्वरुप प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे सात लाख नौनिहाल आज मिड डे मील से वंचित है।

ऐसे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे सात लाख बच्चों को मिड डे मील का हक दिलाने के लिए हल्द्वानी के वरिष्ठ पत्रकार संजय रावत और समाजवादी लोक मंच के मदन सिंह मेहता सामने आए हैं। उन्होंने हाई कोर्ट नैनीताल में एक याचिका दायर की है। जिसमें सरकार द्वारा सात लाख बच्चों को मिड डे मील न देने पर कार्रवाई करने की मांग की गई है। इसके तहत हाईकोर्ट में सरकार से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। साथ ही कल मामले की सुनवाई है। जिसमें सात लाख बच्चों को मिड डे मील मिलेगा या नहीं यह फैसला कल होगा।

उत्तराखंड के 17 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों के कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को लॉकडाउन व गर्मियों की छुट्टी के दौरान मिड डे मील का कच्चा राशन व खाना पकाने की लागत का भुगतान किए जाने के मामले को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर कल 22 जून को सुनवाई हुई। याद रहे कि ये जनहित याचिका समाजवादी लोक मंच के मदन सिंह मेहता व हल्द्वानी के पत्रकार संजय रावत द्वारा दायर की गई है। उच्च न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार को 2 दिन के भीतर न्यायालय में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। अब इस मामले पर 24 जून को पुनः सुनवाई होगी।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार के मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा 20 मार्च व 28 अप्रैल को देश के सभी राज्यों को शासनादेश जारी कर कहा गया था कि लॉकडाउन व ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान कक्षा एक से आठ तक के सभी बच्चों को मध्यान्ह भोजन अथवा कच्चा राशन तथा खाना पकाने की लागत का भुगतान किया जाय। परन्तु उत्तराखंड के ज्यादातर स्कूलों में इस शासनादेश को ठीक ढंग से लागू करने की जगह मनमाने तरीके से किया गया।

बच्चों को नियमानुसार राशन के मुकाबले कम राशन वितरित किए जाने के मामले सामने आए हैं। तथा खाना बनाने की लागत के मूल्य का भुगतान में भी मनमानी की गयी है। इस संबंध में कई दर्जन शिकायतें समाजवादी लोक मंच को बच्चों एवं उनके अभिभावकों द्वारा लिखित रूप में प्राप्त हुई है। खाना पकाने की लागत का मूल्य उत्तराखंड में कई स्थानों पर बैंक खातों में ट्रांसफर करने की जगह नकद भुगतान व कम भुगतान करने के मनमाने तरीके अपनाए गए हैं।

कई स्थानों पर तो बच्चों को न तो राशन मिला है, और न ही उन्हें खाना पकाने के लागत के मूल्य का भुगतान किया गया है। केंद्र सरकार ने सरकारी स्कूलों व सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से पांच तक के बच्चों के लिए 4.97 रुपये खाना पकाने की लागत का मूल्य तथा 100 ग्राम अनाज प्रतिदिन व कक्षा छह से आठ तक के बच्चों के लिए 7.45 रूपये प्रतिदिन तथा 150 ग्राम राशन देने का आदेश पारित किया है। उक्त आदेश 20 मार्च से 30 जून तक के लिए जारी किया गया है। उत्तराखंड में सात लाख से अधिक बच्चे मिड डे मील योजना के दायरे में आते हैं। हाईकोर्ट में मामले की पैरवी दिल्ली हाईकोर्ट के वकील कमलेश कुमार द्वारा की जा रही हैं।

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