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Uttarakhand

‘हरि’ के ‘द्वार’ में बीस करोड़ का जमीन घोटाला

देवभूमि उत्तराखण्ड के विश्व ख्याति प्राप्त शहर हरिद्वार में जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने सरकार की पौने तीन एकड़ जमीन एक व्यक्ति के नाम कर डाली है। इस जमीन की कीमत बीस करोड़ बताई गई है। हैरानी की बात यह कि जमीन का फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद राज्य की राजस्व परिषद् ने पूरे मामले की जांच तो करा ली लेकिन जांच रिपोर्ट में फर्जीवाड़ा सही पाए जाने के बाद भी कोई कार्यवाही अभी तक नहीं की गई है। इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने वाले एक एसडीएम स्तर के अफसर को सजा देने के बजाय उल्टा रुद्रपुर जैसे महत्वपूर्ण शहर का एसडीएम बना दिया गया है

धर्मनगरी हरिद्वार में जमीनों के दाम हमेशा से ही आसमान छूते रहे हैं। हरिद्वार जिला अपने धार्मिक वजूद के साथ-साथ गंगा नदी में अवैध खनन और यहां की बेशकीमती जमीनों पर भू-माफियाओं के अवैध कब्जों को लेकर भी सदा खबरों में बना रहता आया है। यहां स्थापित मठों और मंदिरों की संपत्ति को भी लेकर अक्सर विवाद, यहां तक कि हत्याएं हो जाना आम बात है। ज्यादातर अवैध कब्जों के मामले या तो प्रकाश में नहीं आ पाते हैं या फिर उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप चलते दबा दिया जाता है। एक ऐसा ही मामला ज्वालापुर तहसील का सामने आया है जिसमें लगभग पौने तीन एकड़ के एक सरकारी बाग को हरिद्वार में वर्ष 2016 में तैनात रहे एक उपजिलाधिकारी ने बतौर राजस्व अधिकारी अपनी न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए एक व्यक्ति के नाम कर डाला। इस करोड़ों के भू घोटाले की शिकायत एक पूर्व लेखपाल चरण सिंह सैनी ने 12 नवंबर, 2021 को राजस्व परिषद् के अध्यक्ष ओमप्रकाश के समक्ष दर्ज कराई। इस शिकायती पत्र में सैनी ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2016 में हरिद्वार में एसडीएम रहे प्रत्यूष सिंह ने अपने न्यायालय में दायर की गई याचिका संख्या 06/2016 मदन पाल बनाम सरकार पर फैसला सुनाते हुए 18 बीघा जमीन मदन पाल के नाम खसरा-खतौनी में दर्ज करा दी। सैनी ने अपने शिकायती पत्र में लिखा कि इस मामले में एसडीएम ने न तो पंचायत राज अधिनियम के अंतर्गत 106 का कोई नोटिस जारी किया, न ही सही न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया। मदन पाल नामक व्यक्ति मूल रूप से रुड़की का रहने वाला है और बीएचईएल कंपनी में नौकरी करता है। सैनी ने राजस्व परिषद् को यह भी सूचित किया कि इस व्यक्ति के पास रुड़की तहसील के गांव हादीपुर और गांव गढ़ में पहले से ही लगभग तीन एकड़ जमीन है जिसके चलते जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 के अंतर्गत इसे सरकारी भूमि खेती इत्यादि के लिए नहीं दी जा सकती है। इस शिकायती पत्र पर कार्यवाही करते हुए राजस्व परिषद् ने जांच के आदेश जारी किए। जांच की जिम्मेदारी उपराजस्व आयुक्त मोहम्मद नासिर को सौंपी गई। जांच के दौरान उपराजस्व आयुक्त के समक्ष क्षेत्रीय लेखपाल तेलूराम से पूछताछ की तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि क्षेत्रीय लेखपाल से तत्कालीन एसडीएम प्रत्यूष सिंह ने न तो इस जमीन की बाबत कोई रिपोर्ट मांगी, जो कि नियमानुसार जरूरी है, न ही तत्कालीन एसडीएम ने इस बात की जांच करवाई कि इस जमीन पर क्या मदन पाल खेती करता रहा है या नहीं।

उपराजस्व आयुक्त की जांच रिपोर्ट

गौरतलब है कि नियमानुसार उसी व्यक्ति को खाली पड़ी जमीन ही दी जा सकती है जिसके पास खुद की जमीन न हो और जो खाली पड़ी जमीन पर खेती करता रहा हो। इतना ही नहीं जांच अधिकारी के समक्ष इस इलाके के नायाब तहसीलदार सुरेश पाल ने अपना बयान दर्ज कराते हुए स्पष्ट कहा कि विवादित जमीन पर कभी भी मदन पाल नाम के किसी व्यक्ति का कब्जा नहीं रहा है। ‘दि संडे पोस्ट’ के छानबीन से यह बात सामने आई है कि नेशनल हाईवे 58 से सटी इस बेशकीमती जमीन को कब्जाने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र रच मदन पाल नामक व्यक्ति से एसडीएम कोर्ट में याचिका डलवाई गई जिसमें कहा गया कि उक्त जमीन का कोई सार्वजनिक उपयोग नहीं होता है और उक्त जमीन पर पिछले चालीस वर्षों से वादी खेती करता आया है। यह भी कहा गया कि क्योंकि वादी जाति से हरिजन है और भूमिहीन भी है इसलिए यह जमीन उसके नाम कर दी जाए। ‘दि संडे पोस्ट’ की पड़ताल से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन एसडीएम हरिद्वार प्रत्यूष सिंह ने इस प्रकरण में नियमों का सही पालन न करते हुए एक ऐसे व्यक्ति के नाम लगभग बीस करोड़ मूल्य की जमीन करने का आदेश दे डाला जो न तो भूमिहीन है, न ही ज्वालापुर इलाके का रहने वाला है। इतना ही नहीं यह व्यक्ति सरकारी कर्मचारी होने के नाते भी इस भूमि को पाने की श्रेणी में नहीं आता है। एसडीएम प्रत्यूष सिंह द्वारा क्षेत्रीय लेखपाल और तहसीलदार से रिपोर्ट मांगने के बजाय सीधे जमीन मदनपाल के नाम से दर्ज करा देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। उपराज्य आयुक्त ने अपनी जांच में तत्कालीन एसडीएम प्रत्यूष सिंह के साथ-साथ तत्कालीन तहसील प्रशासन पर कठोर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ‘तहसील प्रशासन द्वारा तथ्यों के संज्ञान में आने के उपरांत भी कोई साक्ष्य न जुटाना, जानबूझकर लापरवाही करना, तथ्यों के संज्ञान में आने के उपरांत भी अंजान बना रहना, ग्रामसभा की अन्य भूमि पर कब्जा होने के उपरांत भी कार्यवाही न करने के निमित्त अनुशासनिक कार्यवाही करने की अनुशंसा की जाती है। संलिप्त दोषी कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही किए जाने की संस्तुति की जाती है।

उक्त प्रकरण प्रतिरूपण द्वारा छल करने, झूठा शपथ पत्र देना, झूठी गवाही देने ब्वससनेपअम वाद होने, ब्वससनेपअम अपील होने, निर्णय के ।तइपजतंतलए इंक पद म्लम वि स्ूंए नदतमेंवदंइसम एवं ब्ंचतपबपवने प्रतीत होने के निमित्त प्रभावी अपील, प्रभावी पैरवी कर वर्णित बाग को वापस राज्य सरकार में लाना न्याय हित में परिहार्य है एवं उक्त प्रकरण की गंभीरता एवं उसका संभावित विस्तारण आपराधिक लापरवाही, छल करना, धोखा देना, कूट रचना करना, धोखे के लिए कूट रचना करना, किसी संपत्ति को सम्पहरण से बचाने के लिए लोक सेवक द्वारा अशुद्ध अभिलेख या लेख रचना एवं भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में वर्णित अपराध तक हो सकता है। अस्तु प्रकरण की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए लोक हित में फॉरेंसिक जांच एवं विधिक कार्यवाही भी किया जाना उचित होगा।’ इस दूध का दूध और पानी का पानी करने वाली जांच रिपोर्ट राजस्व परिषद् के अध्यक्ष ओमप्रकाश के कार्यालय में लंबे अर्से से लंबित है। राजस्व परिषद् द्वारा इस महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट पर कार्यवाही न करना राज्य सरकार की भ्रष्टाचार मुक्त, जीरो टॉलरेंस नीति को संदेह के घेरे में ला देता है। गौरतलब है कि पूर्व में हरिद्वार से जुड़े एक मामले में तत्कालीन एसडीएम प्रत्यूष सिंह की संदिग्ध भूमिका चलते तत्कालीन गढ़वाल आयुक्त वीआर पुरुषोत्तम ने उन्हें न्यायिक कार्य न दिए जाने की अनुशंसा राजस्व परिषद् से की थी। इसके बावजूद परिषद् द्वारा आरोपित एसडीएम पर कार्यवाही न करना और उन्हें रुद्रपुर का एसडीएम बनाया जाना पूरे प्रशासनिक ढांचे को संदेह के घेरे में ला देता है।

 

बात अपनी-अपनी
जैसे ही यह मामला मेरे संज्ञान में आया तो मेरे द्वारा मौके पर यथास्थिति बनाए रखने के साथ-साथ जिन लोगों ने उक्त सरकारी बाग की भूमि को खरीद कर मकान इत्यादि बना लिए हैं, उनको बेदखली की कार्रवाई के लिए तहसीलदार को निर्देशित कर दिया गया है।
पूरण सिंह राणा, उप जिलाधिकारी सदर हरिद्वार

यहां बहुत बड़ा खेल हुआ है तत्कालीन एसडीएम प्रत्यूष सिंह ने भू-माफिया और कुछ नेताओं के साथ मिलकर सरकारी बाग को प्राइवेट व्यक्ति के नाम दर्ज कर दिया वह भी उस व्यक्ति के नाम जिसके पास पूर्व से ही संक्रमणीय भूमिधर का पट्टा होने के साथ-साथ वह बीएचएल का कर्मचारी भी चला आता था। दोषी अधिकारियों और भू-माफिया के खिलाफ कार्यवाही होने तक यह संघर्ष मेरे द्वारा जारी रहेगा।
चरण सिंह सैनी, एडवोकेट (शिकायतकर्ता) हरिद्वार

यदि मेरे द्वारा दिए गए किसी निर्णय पर किसी को भी आपत्ति है तो वह ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए स्वतंत्र है।
प्रत्यूष सिंह, तत्कालीन एसडीएम हरिद्वार

 

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