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राज्य में लाखों लोगों का जीवन बचाने वाली 108 एम्बुलेंस सेवा संकट से घिर गई है। अब इस सेवा का संचालन मध्य प्रदेश की जिस कंपनी को सौंपा गया है उस पर त्रिवेंद्र रावत सरकार कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिखाई दे रही है। नतीजा यह है कि अब तक इस सेवा के संचालन में तत्परता से योगदान दे रहे अनुभवी स्टाफ के बजाय लोगों का जीवन अप्रशिक्षित कर्मचारियों के हवाले होगा। ऊधमसिंह नगर में तो एक एबुलेंस दुर्घटनाग्रस्त भी हो चुकी है

राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार जहां एक ओर युवाओं को रोजगार देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण सेवाओं में जुटे युवकों को बेरोजगार कर रही है। सरकार ने पहले संविदाकर्मियों को एक-एक कर बाहर का रास्ता दिखाया और अब आपातकालीन सेवा 108 से जुड़े सैकड़ां अनुभवी युवाओं को भी बाहर करने का तरीका निकाला गया है। इसके चलते आने वाले समय में तकरीबन 850 कर्मचारियों का रोजगार उनसे छीन लिया जाएगा। ये लेग सरकार की नीति और नीयत के चलते सड़कों पर आ जाएंगे। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल को रचने में सरकार और शासन में बैठे उच्च पदस्थ लोगों और भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की भी बड़ी भूमिका बताई जा रही है। चर्चा है कि 108 सेवा का संचालन जिस नई कंपनी को सौंपा गया है वह भाजपा एक बड़े दिग्गज नेता की है। इसलिए सरकार पूरी तरह से कंपनी के हितां को तरजीह दे रही है और प्रदेश के युवाओं को बेरोजगार करने का षड्यंत्र रच रही है।

जानकारी के अनुसार राज्य में दस वर्ष तक 108 सेवा को संचालित करने वाली जीवीके ईएमआरआई कंपनी से 108 सेवा का संचालन समाप्त करके मध्य प्रदेश की सीसीएएमपी यानी कैम्प कम्युनिटिव एक्शन थ्रू मोटिवेशन प्रोग्राम कंपनी के हाथों में देने का निर्णय ले लिया गया है। 1मई 2019 से अब नई कंपनी 108 आपातकालीन सेवा का प्रदेश में संचालन करेगी। कंपनी को नया स्टाफ रखने और अपने हिसाब से वेतन निर्धारण करने की स्वतंत्रता के साथ-साथ केवल मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने का काम दिया गया है। भले ही मरीज की स्थिति कितनी भी गंभीर हो, लेकिन नई कंपनी अपातकालीन सेवा में उसको किसी प्रकार का प्राथमिक उपचार नहीं देगी।

वर्ष 2008 से आरंभ हुई 108 आपातकालीन सेवा का करार मार्च 2019 में जीवीके ईएमईआर से खत्म हो गया। सरकार और शासन के अलावा स्वास्थ्य विभाग के ढीले रवेैये के चलते जहां करार खत्म होने से पहले ही इसके लिए नई प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी वहीं पूरा सिस्टम सोया रहा और जब करार खत्म होने का समय आया तो जीवीके ईएमईआर को ही एक माह का अतिरिक्त समय बढ़ाया गया। फिर प्रक्रिया शुरू की गई जिसमें नये सिरे से टेंडर निकाले गए।

इसमें तीन कंपनियों ने हिस्सा लिया ओैर जीवीके ईएमईआर ने प्रति एम्बुलेंस 1 लाख 61 हजार का टेंडर दिया जबकि भारत विकास ग्रुप ने 1 लाख 44 हजार तथा कैम्प कम्युनिटिव एक्शन थ्रू मोटिवेशन प्रोग्राम कंपनी ने 1 लाख 18 हजार का टेंडर डाला। इनमें से सीसीएएमपी का सबसे कम टेंडर होने के चलते उसे प्रदेश में 108 सेवा को संचालित करने का अधिकार मिला। 1 मई 2019 से कंपनी सेवा का संचालन आरम्भ कर देगी। जिस तरह से नई कंपनी को 108 सेवा का संचालन दिया गया है वह अपने आप में ही बड़ा दिलचस्प है। पहले तो कंपनी ने सबसे कम धनराशि का टेंडर निकाला और जब टेंडर कंपनी के नाम खुल गया तो कंपनी की असल हकीकत समाने आई। कंपनी नए सिरे से कर्मचारियां की भर्ती कर रही है जिसमें पूर्व कर्मचारियों को रणनीति के तहत बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।


सरकार ने नई कंपनी के लिए रेड कॉरपेट बिछाकर उसे जिस तरह मनमाफिक छूट दी है उससे पूरे प्रकरण में कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए राज्य के युवाओं के हितां तक को दरकिनार करते हुए कंपनी को अपना स्टाफ रखने की खुली छूट दी गई है। जिसके चलते कंपनी पुराने और अनुभवी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा रही है। यही नहीं सरकार द्वारा नई कंपनी को इस कदर फायदा पुहंचा जा रहा है कि जो 108 सेवा पहले मरीजां को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा देती रही है वह सुविधा अब नई कंपनी नहीं देने वाली।

अगर कोई गंभीर मरीज इस सेवा का लाभ लेता है तो अस्पताल पहुंचने के बीच उसका जीवन ईश्वर के भरोसे ही रह जाएगा। 108 आपातकालीन एम्बुलेंस में पैरा मडिकल स्टाफ की तैनाती रहती थी। इससे मरीज को अस्पताल तक पहुंचने तक उसका प्राथमिक उपचार मिल जाता था जिससे उसका जीवन बचाया जा सकता था। सबसे ज्यादा गर्भवती महिलाओं को इसका फायदा हुआ है। हजारां बच्चों का जन्म इसी 108 आपातकालीन सेवा की एम्बुलेंस में हो चुका है। जच्चा-बच्चा का जीवन अस्पताल पहुंचने से पूर्व बचाया जा सका है।

सरकार और शासन में बैठे लोगों ने कंपनी के हित में समर्पण सा कर दिया है। इसका प्रमाण यह है कि जिन अनुभवी कर्मियों को 15 हजार से 18 हजार का वेतन जीवीके कंपनी देती थी उन्हें अब नई कंपनी महज 10 हजार ही देने की बात कर रही है। जो कर्मचारी इसका विरोध कर रहा है उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। कंपनी ने टेक्निशियन, ड्राईवर, जिला कॉर्डिनेटर, एचआर पदों पर सीधी भर्ती आरंभ कर दी है। सूत्रों की मानें तो कंपनी सरकार औेर शासन से कम दरों पर सेवा का संचालन करने की बात कह रही है और इससे कंपनी को जो घाटा हो रहा है उसकी पूर्ति कंपनी पूर्व कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती करके वसूलना चाहती है। हैरानी इस बात की है कि सरकार और जनप्रतिनिधि भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं।

सीएएमपी कंपनी के बारे में चर्चा है कि यह कंपनी भाजपा के एक बड़े नेता की कंपनी है। जिसके कारण सरकार द्वारा स्थानीय लोगों का गला घोंटकर कंपनी पर मेहरबानी की जा रही है। इस सेवा के संचालन में राज्य सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जाएंगे जो कि राज्य के निवासियों के करां से हासिल किए गए हैं। चर्चा है कि कंपनी मध्य प्रदेश के युवाओं को इसमें जमकर भर्ती करने का काम आरंभ कर चुकी है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मध्य प्रदेश के भाजपा नेताओं की सिफारिशों पर यह नियुक्तियां की जा रही हैं।

नई कंपनी सेवा के संचालन के लिए जो स्टाफ रखेगी वह भी ज्यादा प्रशिक्षित नहीं होगा। पहले जीवीके कंपनी अपने फील्ड कर्मचरियों को 30 दिनों का थ्योरिटिकल और 15 दिनां का अस्पताल में व्यवहारिक प्रशिक्षण देती थी। लेकिन अब नई कंपनी महज 3 दिन का ही प्रशिक्षण देकर 108 सेवा का संचालन कर रही है। कंपनी के अनुसार कंपनी के पास इतना धन नहीं है कि वह अपने फील्ड कर्मचारियों को प्रशिक्षण दे सके और न ही कंपनी ने सरकार से इस तरह के प्रशिक्षण के लिए धनराशि की मांग की है। सरकार ने भी इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं की है।

यह वाकई हैरानी की बात है कि जिस 108 आपातकालीन सेवा के दस वर्ष में प्रशिक्षित कर्मियों की मदद से 10 हजार 853 शिशुओं को एम्बुलेंस में ही सुरक्षित प्रसव करवा कर जन्म दिलवाया गया है, वहीं अब नई कंपनी बगैर प्रशिक्षण के एम्बुलेंस में कर्मचारी रख रही है। इससे गर्भवती महिलाओं की क्या हालत हो सकती है, इसे आसनी से समझा जा सकता है।

वर्ष 2008 में 108 आपताकालीन सेवा का संचालन जीवीके ईएमईआर कंपनी द्वारा संचालित किया गया था। इस सेवा में आगजनी की घटना और दंगा फसाद के घायल और बीमार मरीजों को प्राथमिक चिकित्सा देते हुए नजदीकी चिकित्सालयों तक ले जाए जाने का प्रावधान रखा गया था। श्ुरुआती दौर से ही 108 सेवा तेजी से काम करने लगी और एम्बुलेंसां की संख्या धीरे-धीरे 60 तक पहुंच गई। 2009 में प्रदेश में भाजपा सरकार का नेतृत्व परिवर्तन हुआ और निशंक मुख्यमंत्री बने। निश्ांक के पास स्वास्थ्य मंत्रालय होने के चलते 108 सेवा को राज्य में और बेहतर बनाया गया। जल्द ही पूरे प्रदेश में 108 आपातकालीन सेवा की एम्बुलेंस संख्या 108 तक पहुंच गई। निश्ांक सरकार के समय में ही 1 लाख मरीजों और घायलों का इस सेवा से जीवन बचाए जाने का रिकॉर्ड बना था। सरकार ने इसे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं का उत्कøष्ट प्रमाण बताते हुए जमकर प्रचार भी किया। इसका नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय 108 आपातकालीन सेवा कर दिया गया।

वर्ष 2012 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ ओैर कांग्रेस की बहुगुणा सरकार वजूद में आई। केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित इस योजना से भाजपा नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम हटाकर इसे राष्ट्रीय 108 आपतकालीन एम्बुलेंस सेवा कर दिया गया। माना जाता है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में 108 सेवा में गिरावट देखने को मिली। पुरानी और जर्जर एम्बुलेंसों के सहारे ही 108 सेवा संचालित होने लगी। मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए जरूरी उपकरणों का अभाव, कभी समय पर न पहुंचने और कभी ईंधन पेट्रोल की कमी के विवाद भी इस दौरान खूब चर्चाओं में रहे। बावजूद इसके प्रदेश के निवासियों को इस सेवा से मोहभंग नहीं हुआ ओैर मरीजों का जीवन बड़ी हद तक बचाने में यह परियोजना सफल रही।

इन दस वर्षों में 108 आपातकालीन सेवा से फायदा लेने वाले मरीजों के आंकड़ों को देखें को कहा जा सकता है कि वास्तव में राज्य के निवासियों के लिए यह सेवा महत्वपूर्ण रही है। जीवीके ईएमईआर के राज्य कॉर्डिनेटर मनीष टिंकू के अनुसार 12 मई 2008 से लेकर अभी तक कुल 12 लाख 80 हजार 29 मरीजों को इस सेवा के जरिए अस्पतालों में भर्ती करवाया गया है। इनमें से 5 लाख 24 हजार 346 गर्भवती महिलाओं को नजदीकी अस्पतालां में प्रसव के लिए भर्ती करवाया गया है। यही नहीं 108 आपातकालीन सेवा की एम्बुलेंस में ही सुरक्षित प्रसव करवा करके अभी तक 10 हजार 853 शिशुओं ने दुनिया में अपना कदम रखा है। इसके अलावा प्रदेश में अभी तक वाहन दुर्घटनाओं के 1 लाख 34 हजार 847 घायलों को एम्बुलेंस के जरिए प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में उपचार के लिए भर्ती करवा कर उनका जीवन बचाया जा सका है। साथ ही पुलिस और आगजनी के 62 हजार 816 मामलों में जीवन बचाए जाने के लिए 108 सेवा ने अपना बड़ा योगदान दिया है। लेकिन अब सरकार के एक लचर रवैये के चलते 108 आपातकालीन सेवा का संचालन सवालों के घेरे में आ चुका है।

बात अपनी-अपनी

आपातकालीन 108 सेवा पहले की तरह काम करेगी। सभी मरीजों को प्राथमिक उपचार मिलता रहेगा। पुलिस, फायर और मेडिकल तीनों में ही जो इमरजेंसी सेवाएं हैं वह सब सेवाएं रहेंगी। यह हमारे खिलाफ दुष्प्रचार किया जा रहा है। आप एकपक्षीय बात कह रहे हैं। हम अपने कर्मचारियों को मानकों के हिसाब से पूरी ट्रेनिंग दे रहे हैं। हमने जीवीके के कर्मचारियों को समायोजित किया है। जो मानकों पर सही और प्रशिक्षित होंगे उनको ही लिया जाएगा। रही वेतन की बात तो हर कंपनी अपने हिसाब से कर्मचारियों को वेतन देती है। हम भी वैसे ही दे रहे हैं। जो सही काम करेगा उसे इंक्रिमेंट मिलेगा।
अनिल शर्मा, प्रदेश प्रभारी 108 आपातकालीन सेवा

हमने कैम्प कंपनी को 850 कर्मचारियों के आवेदन दे दिए हैं। हम सभी कर्मचारी पूरी तरह से प्रशिक्षित हैं और अपना काम बेहतर तरीके से करना जानते हैं। लेकिन कंपनी नए कर्मचारियों को भर्ती कर रही है। उनको केवल तीन दिन का ही प्रशिक्षण देकर नियुक्त कर रही है। यह सरासर मरीजां के लिए घातक है। 108 सेवा में गंभीर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में प्राथमिक उपचार मिलता है जिससे उनका जीवन बचाया जा सकता है। लेकिन अब बगैर प्रशिक्षण के कर्मचारी प्राथमिक उपचार नहीं दे पाएंगे क्योंकि वे प्रशिक्षित नहीं हैं। हमने 10 हजार से अधिक बच्चां का जन्म एम्बुलेंस में ही करवाया है। यह बहुत बड़ी बात है। सरकार ने नई कंपनी के हित में प्रदेश के युवाओं के हितों को नजरअंदाज किया है। जबकि सरकार शर्त रख सकती थी कि पुराने प्रशिक्षित कर्मचारियों को नई कंपनी समायोजित करेगी। कंपनी समायोजित करने का ढोंग कर रही है। 10 वर्षों में जिन कर्मचारियों को 15 से 20 हजार रुपए वेतन मिलता रहा है नई कंपनी उनको 8 से 12 हजार प्रति माह दे रही है। जो कम वेतन दिए जाने की बात कर रहा है उसे हटाया जा रहा है। कंपनी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के युवाओं की भर्ती कर रही है। यहां तक कि ड्राइवर तक मैदानी प्रदेशों से लाए जा रहे हैं जिनका पहाड़ों में वाहन चलाने का अनुभव नहीं है। इसके कारण ऊधमसिंह नगर में एक एम्बुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गई क्योंकि उसके वाहन चालक को अनुभव तक नहीं है।
रमेश डंगवाल, प्रदेश मीडिया प्रभारी 108 आपातकालीन सेवा

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