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Uttarakhand

हरिद्वार को चाहिए मजबूत खेवनहार

हरिद्वार के ट्टार्मिक महत्व से देश-विदेश के लोग परिचित हैं। लिहाजा हर राजनेता यहां का सांसद बनने में दिलचस्पी रखता है। अतीत में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती इस सीट से भाग्य आजमा चुकी हैं। हालांकि वे असफल रहीं। लेकिन पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद और उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। एक और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अभी यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। निशंक 2014 की मोदी लहर में रिकॉर्ड वोटों से जीते थे। लेकिन इस बार दिक्कत यह है कि   उ न्हें चुनौती पार्टी के बाहर से ही नहीं, बल्कि भीतर से भी मिल रही है। उनके विरोधी गुट से मदन कौशिक टिकट के दावेदार हैं। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के नैनीताल से चुनाव लड़ने की चर्चाओं के बीच कांग्रेस में दावेदारों की बाढ़ आ गई है। अब कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टियों के अलाकमान के लिए सोचने का विषय है कि वे किन उम्मीदवारों पर दांव लगाते हैं
आगामी लोकसभा चुनाव में अभी नौ माह का समय शेष है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर स्थित उत्तराखण्ड के हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में टिकटार्थियों ने अपने-अपने गणित लगाने शुरू कर दिए हैं। गंगा के खादर यानी हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में राजनीति के महारथी चुनावी अखाड़े में कूदने को तैयार हैं। लेकिन रेफरी यानी हाईकमान की हरी झंडी का सभी को इंतजार है। हरिद्वार में इस समय कांग्रेस और भाजपा से टिकट के बहुत से दावेदार सामने आ रहे हैं। फिलहाल सभी अपनी जोर-आजमाइश में लगे हैं। वर्ष 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव को भाजपा बेहद गंभीरता से ले रही है। संगठन ने उत्तराखण्ड को ए-कैटेगरी के राज्यों में शामिल किया हुआ है। इसका कारण भाजपा का पिछले चुनाव में राज्य की पांचों लोकसभा सीट पर काबिज होना है। पार्टी के सामने आगामी चुनावो ंमें इसी प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती होगी।
हरिद्वार के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो यहां से दो राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ही ज्यादातर चुनाव जीतती रही हैं। 1977 से लेकर अब तक हुए चुनावों में 5 बार भाजपा तो 5 बार कांग्रेस ने जीत दर्ज कराई है। 1977 में जनता पार्टी की लहर चली तो भगवानदास राठौड चुनाव जीते। 1980 में  इस सीट से लोकदल के जगपाल सिंह चुनाव जीते। 1984 में कांग्रेस के सुंदर लाल ने इस सीट पर कब्जा किया। इसके बाद 1987 में उन्हीं की पार्टी के राम सिंह सांसद चुने गए। 1989 में कांग्रेस टिकट पर जगपाल सिंह सांसद चुने गए। तीन बार लागतार कांग्रेस के प्रत्याशी विजयी होते रहे। इसके बाद लगातार चार बार भाजपा ने हरिद्वार लोकसभा सीट पर अपनी पताका फहराई। 1991 में भाजपा के राम सिंह और 1996 में हरपाल सिंह साथी सांसद बने। हरपाल सिंह साथी भाजपा के टिकट पर लगातार तीन बार  सांसद चुने गए। 1996 के अलावा 1998, 1999 में भी साथी चुनाव जीते। 2004 में समाजवादी पार्टी के राजेंद्र कुमार बाडी चुनाव जीते। 2009 में यहां के कांग्रेस के हरीश रावत सांसद चुने गए। 2014 में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक को भाजपा ने मैदान में उतारा। निशंक ने कांग्रेस के खांटी नेता हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को चुनाव हराकर भारी वोटों से जीत हासिल की।
 वर्ष 2014 में डॉ ़ रमेश पोखरियाल निशंक को मिले मत कांग्रेस प्रत्याशी रेणुका रावत के अलावा बसपा प्रत्याशी हाजी इस्लाम और आप प्रत्याशी कंचन चौधरी भट्टाचार्य समेत बाकी सभी 22 प्रत्याशियों को मिले कुल वोटों से ज्यादा थे। निशंक को 5 लाख 92 हजार 320 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी रेणुका रावत को 4 लाख 14 हजार 498 मत हासिल हुए। 2014 में भाजपा प्रत्याशी डॉ रमेश पोखरियाल निशंक की जीत का अंतर एक लाख 77 हजार 822 रहा।  खैर, तब प्रदेश की पांचों सीटों पर भाजपा रिकॉर्ड मतों से जीती थी। 2019 में भाजपा इस रिकॉर्ड जीत को बरकरार रख पाती है या नहीं, यह तो समय ही बताएगा। कारण हरिद्वार लोकसभा सीट पर भाजपा फिलहाल दो गुटों में बंटी हुई है। जिनमें एक गुट पूर्व मुख्यमंत्री और स्थानीय सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक का और दूसरा हरिद्वार के विधायक एवं प्रदेश के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दोनों गुटों के मुखिया अपनी-अपनी दावेदारी कर रहे हैं। निशंक चाहते हैं कि वह फिर से हरिद्वार से सांसद बनें। लेकिन दूसरी तरफ हरिद्वार के चार बार के विधायक मदन कौशिक उनकी इस मंशा को पूरा होने में पलीता लगाते नजर आ रहे हैं। मदन कौशिक पुरजोर तरीके हरिद्वार लोकसभा सीट की तैयारियां में लगे हुए हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि पार्टी उन्हें हरिद्वार से प्रत्याशी जरूर बनाएगी। कौशिक का यह दावा मजबूत होता इसलिए दिखाई दे रहा है कि वह आजकल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के काफी नजदीक हैं। हालांकि दूसरी ओर निशंक की  दावेदारी को भी कमजोर आंकने की भूल नहीं की जा सकती है। सब जानते हैं कि वह राजनीति के कितने चतुर खिलाड़ी हैं। माहौल को अपने पक्ष में करना वह बखूबी जानते हैं। यही वजह है कि उत्तराखण्ड की भाजपा राजनीति में निशंक को बाजीगर कहा जाता है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फिलहाल हरिद्वार के 11 विधायकों में से 7 विधायक उनके जबर्दस्त समर्थक बने हुए हैं जो किसी भी कीमत पर मदन कौशिक की दावेदारी को पचा नहीं पाएंगे।
हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में कुल मिलाकर 14 विधानसभा सीटें आती हैं। जिनमें 11 विधानसभा सीटें हरिद्वार और तीन सीटें देहरादून जिले की हैं। फिलहाल 14 में से महज दो पर ही कांग्रेस के विधायक हैं। जबकि अन्य पर भाजपा काबिज है। भाजपा में जहां दो उम्मीदवार आमने-सामने हैं, वहीं कांग्रेस मुख्यतः पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत दावेदार हैं। हरीश रावत 2009 में इस संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीते थे। तब वह हरिद्वार के सबसे लोकप्रिय नेता माने जाते थे। आज भी उनकी लोकप्रियता बरकरार है। हालांकि 2014 में हरिद्वार की जनता ने उनकी पत्नी रेणुका रावत को एक लाख से भी अधिक मतों से चुनाव हराया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में वह भी हरिद्वार ग्रामीण से भाजपा प्रत्याशी स्वामी यतीश्वरानंद से चुनाव हार चुके हैं। कांग्रेस के दूसरे प्रत्याशियों को देखा जाए तो हरीश रावत आज भी सबमें अव्वल हैं। 2017 के बाद जनता राज्य की सरकार को भी देख रही है और हरीश रावत के राजनीतिक दुश्मनों को भी। ऐसे में हरीश रावत का पलड़ा भारी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हरीश रावत के प्रति जनता की भावनाएं आज भी बरकरार हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से राहुल गांधी के लिए एक-एक सीट महत्वपूर्ण है। उन्हें हर हालत में जीत चाहिए। इसके चलते राहुल गांधी उसी पर दांव खेलेंगे जो उन्हें सीट निकालकर दे। हरिद्वार सीट पर हरीश रावत को टिकट देने का एक फायदा कांग्रेस को यह भी होगा कि अगर उसका सपा और बसपा से गठबंधन होता है तो इस स्थिति में इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता हरीश रावत को सहर्ष समर्थन के लिए तैयार हो सकते हैं, जबकि अन्य प्रत्याशियों के लिए दोनों पार्टियों का समर्थन टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
हरीश रावत अगर हरिद्वार से चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें एक और सियासी फायदा यह होगा कि यहां उनका नैनीताल की तरह कोई धुर विरोधी गुट नहीं है। नैनीताल में हरीश रावत के लिए नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश जैसी मुश्किल खड़ी कर रही हैं, हरिद्वार में उनके लिए ऐसा राजनीतिक अवरोधक दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता है। हालांकि अभी तक रावत का यह तय नहीं है कि वह लोकसभा चुनाव लड़ेंगे भी या नहीं। जबसे उनको पार्टी ने सीडब्ल्यूसी  सदस्य और राष्ट्रीय महासचिव के साथ ही असम का प्रभारी बनाया है तब से उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की बात करना काफी कठिन होगा।
हरीश रावत के हरिद्वार के साथ ही नैनीताल लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं। नैनीताल से उनके चुनाव लड़ने की संभावना के बीच हरिद्वार से कांग्रेस के कई दावेदारों के नाम सामने आ रहे हैं। जिनमें पहले नंबर पर संजय पालीवाल हैं। पालीवाल एनएसयूआई के हरिद्वार जिला अध्यक्ष, युवा इकाई के अध्यक्ष और कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष रहे हैं। 12 साल तक कांग्रेस के भी जिलाध्यक्ष रहकर पार्टी के सक्रिय नेताओं में गिनती करा चुके पालीवाल कांग्रेस की तिवारी सरकार और हरीश रावत सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं। पालीवाल को प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का करीबी माना जाता है। लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का नाम भी चर्चा में है। हालांकि वह 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के मदन कौशिक से 37000 वोटों से हार चुके हैं।
कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष राजेंद्र चौधरी का नाम भी चर्चा में है। चौधरी की भाभी सविता चौधरी वर्तमान में जिला पंचायत हरिद्वार की अध्यक्ष हैं। हरिद्वार में पिछड़ों खासकर गुर्जर राजनीति में चौधरी का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इसके अलावा पूर्व में सपा से हरिद्वार के विधायक रहे अंबरीश कुमार भी लोकसभा उम्मीदवारों में गिने जा रहे हैं। मंगलौर के विधायक काजी निजामुद्दीन को भी कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है। निजामुद्दीन तत्कालीन यूपी सरकार में मंत्री रह चुके काजी मोईउद्दीन के पुत्र हैं। अल्पसंख्यकों में काजी निजामुद्दीन की अच्छी पैठ है। हरिद्वार में करीब 14 लाख मतदाता हैं जिनमें करीब 5 लाख मतदाता अल्पसंख्यक हैं। इस नाते भी काजी निजामुद्दीन को पार्टी प्रत्याशी के लिए कांग्रेस महत्वपूर्ण मान रही है। बहरहाल अब देखना है कि गंगा की धरती पर उफनती चुनावी लहरों में अपनी नौका को पार लगाने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपने किन नेताआें को खेवनहार बनाकर उन पर भरोसा जताती हैं।

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