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सत्ता मेहरबान तो  बाबा पहलवान

योग गुरु बाबा रामदेव और भाजपा की मित्रता जगजाहिर है। राजनीतिक गलियारों में दोनों की दोस्ती की दुहाई देते हुए अक्सर ‘जब सैय्या भये कोतवाल तो डर काहे का’ की कहावत कही जाती है। योग गुरु की भाजपा से नजदीकियों का ही नतीजा है कि वे अपने संस्थान पतंजलि के खिलाफ उठी हर आवाज को दबाने का दम रखते हैं। बाबा की दिल्ली से लेकर देहरादून तक तूती बोलती है। अपने रुतबे से उन्होंने डेढ़ साल पहले उत्तराखण्ड सरकार के आयुर्वेद और यूनानी लाइसेंसिंग अथॉरिटी को भी दंडवत होने को मजबूर कर दिया था। अथॉरिटी का कसूर सिर्फ यह था कि उसने केरल के एक डॉक्टर की शिकायत पर नियमों का उल्लंघन कर बाजार में बिक रही रामदेव की दवाइयों पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन बाबा के सत्ता प्रतिष्ठान में दबदबे का असर ये हुआ कि राज्य का स्वास्थ्य प्राधिकरण तीसरे दिन ही यूटर्न लेने को मजबूर हुआ और उसे पतंजलि की दवाइयों से प्रतिबंध हटाना पड़ा, जिन पर वह रोक लगा चुका था। डेढ़ साल बाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की फटकार चलते उत्तराखण्ड की लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने उन्हीं दवाइयों पर रोक लगाई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से अपनी दवाइयों के भ्रामक प्रचार को लेकर बाबा रामदेव घिर गए हैं उससे एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं। योग गुरु रामदेव की कम्पनी पतंजलि के कई उत्पादों की गुणवत्ता पर उत्तराखण्ड ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया में गंभीर सवाल उठे हैं। पतंजलि के प्रोडक्ट ने जिस तरह से उपभोक्ताओं के बीच अपना विश्वास बनाया था वह भरोसा टूटता हुआ नजर आने लगा है। कई उत्पाद गुणवत्ता परीक्षण पास नहीं कर सके हैं। यहां तक कि भूटान और नेपाल सरकार भी पतंजलि के उत्पादों की बिक्री पर यह कहते हुए रोक लगा चुकी हैं कि वे इंसानी स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं हैं

डेढ़ साल बाद फिर प्रतिबंधित हुई पतंजलि की दवाइयां

11 अक्टूबर 2022

केरल के एक डॉक्टर केवी बाबू ने जुलाई में एक शिकायत की थी। जिसमें उन्होंने पतंजलि के दिव्य फार्मेसी की ओर से ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) एक्ट 1954, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स 1945 के बार-बार उल्लंघन का आरोप लगाया था। जुलाई में जब कुछ नहीं हुआ तो बाबू ने राज्य के स्वास्थ्य प्राधिकरण को 11 अक्टूबर 2022 को एक बार फिर ईमेल के जरिए शिकायत भेजी थी।

9 नवंबर 2022

उत्तराखण्ड का राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण हरकत में आया। प्राधिकरण के दवा नियंत्रक डॉ. जीसीएन जंगपांगी ने आदेश जारी करते हुए  पतंजलि के दिव्य फार्मेसी की पांच दवाइयों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने पतंजलि पर भ्रामक विज्ञापनों का आरोप लगाते हुए ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, गाइटर (घेंघा), ग्लूकोमा और हाई कोलेस्ट्रॉल के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं पर प्रतिबंध लगाया था। जिन दवाइयों पर प्रतिबंध लगाया उनमें बीपी ग्रिट, मधुग्रिट, थाइरोग्रिट, लिपिडोम और आईग्रिट गोल्ड आदि का नाम शामिल था। साथ ही भविष्य में अनुमति मिलने के बाद ही कोई विज्ञापन चलाने की सलाह दी गई। ऐसा न करने पर प्रोडक्शन लाइसेंस वापस लेने की चेतावनी उत्तराखण्ड आयुर्वेदिक और यूनानी सेवा विभाग द्वारा भी दी गई थी।

11  नवंबर 2022

उत्तराखण्ड आयुर्वेद और यूनानी लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने आश्चयज़्जनक तौर पर अपना फैसला पलटते हुए महज दो दिन बाद ही दिव्य फार्मेसी के पांच उत्पादों पर लगा प्रतिबंध हटा लिया। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के दवा नियंत्रक जीसीएस जंगपांगी ने कहा कि 9 नवंबर के पिछले आदेश में एक गलती थी और यह जल्दबाजी में जारी किया गया था। प्राधिकरण ने पहले के आदेश में संशोधन करते हुए अब दिव्य फार्मेसी को इन दवाओं का उत्पादन जारी रखने की अनुमति दे दी है।

प्रतिबंध हटने के डेढ़ साल बाद

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद गत् 29 अप्रैल को उत्तराखण्ड के आयुर्वेद और यूनानी लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने 14 दवाइयों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनमें स्वसारी गोल्ड, श्वासारि वटी, ब्रोन्कोम, स्वसारी प्रवाही, श्वासारि अवलेह मुक्त वटी एक्स्ट्रा पावर, लिपिडोम. बीपी ग्रिट, मधु ग्रिट, मधुनाशिनी वटी एक्स्ट्रा पावर, लिव अमृत एडवांस, लीवॉरिट, पतंजलि दृष्टि आई ड्राप, आइग्रिट गोल्ड शामिल हैं। पतंजलि द्वारा विज्ञापन में अपनी उक्त दवाइयों में दावा किया गया कि उनकी दवाओं से लोगों का शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, थायराइड, लीवर सिरोसिस, गठिया और अस्थमा ठीक हो गया है। लेकिन, डॉक्टरों ने कहा कि पतंजलि ने अपने उत्पादों से कुछ बीमारियों के इलाज के बारे में लगातार झूठे दावे किए हैं। ध्यान दीजिए उक्त प्रतिबंधित की गई 14 दवाइयों में से इन पांच दवाइयों पर, जिनके नाम हैं बीपी ग्रिट, मधुग्रिट, थाइरोग्रिट, लिपिडोम और आईग्रिट गोल्ड। चौंकाने वाली बात कि ये वही दवाएं हैं जिनको उत्तराखण्ड की आयुवेर्द और यूनानी लाइसेंसिंग अथॉरिटी डेढ़ साल पहले ही प्रतिबंधित कर चुका था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या डेढ़ साल पहले उत्तराखण्ड का शासन-प्रशासन बाबा के किसी दबाव या प्रभाव में था जिसके चलते दवाइयों से प्रतिबंध हटाना पड़ा?

कहा भी जाता है कि बाबा का सत्ता-प्रतिष्ठानों में एक छत्र राज चलता है। इसलिए वह जैसा चाहते हैं वैसा ही हो जाता है। 2011 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार में जिस तरह दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव को दिल्ली पुलिस के लाठीचाजज़् के बाद सूट-सलवार पहनकर भागना पड़ा था तभी से वे भाजपा के करीबियों में गिने जाने लगे थे। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2014 में नरेंद्र मोदी को सत्ता तक पहुंचाने में बाबा रामदेव ने दिल खोलकर मदद की। मोदी की सरकार बनते ही उनकी ताकत में इजाफा हो गया था। इसके बाद 2017 में उत्तराखण्ड में भी भाजपा नीत त्रिवेंद्र सिंह की सरकार बनी तो उनकी हरिद्वार स्थित पतंजलि को जैसे पर लग गए। उनकी आज्ञा के बिना पतंजलि में अधिकारी तो दूर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। सत्ता में पैठ का ही नतीजा था कि जिन पांच दवाइयों को आयुर्वेद और यूनानी लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने प्रतिबंधित किया तो तीसरे दिन ही उसे यूटर्न लेने को मजबूर होना पड़ा था। तब से कहा भी जा रहा है कि ‘सत्ता मेहरबान तो बाबा पहलवान।’

‘स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी, डॉक्टरों को बताया हत्यारा’

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के साथ मंच साझा करते बाबा रामदेव
योग गुरु रामदेव की भाजपा से नजदीकियां जगजाहिर रही है। साल 2021 के फरवरी महीने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी उनके साथ मंच साझा कर रहे थे उसी समय बाबा रामदेव ने दावा किया था कि उनके संस्थान पतंजलि ने जो ‘दिव्य कोरोनिल’ दवा बनाई है उसेन  कोविड-19 की सहायक उपाय दवा और इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में आयुष मंत्रालय से मान्यता मिल गई है। भारत में डॉक्टरों की शीषज़् संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने तो यहां तक दावा किया है कि रामदेव स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में डॉक्टरों को ‘हत्यारा’ बता चुके हैं। आईएमए ने यह भी कहा है कि यह सबको मालूम है कि योग गुरु और उनके सहयोगी बालकृष्ण बीमारी के समय आधुनिक चिकित्सा और एलोपैथी का उपचार लेते रहे हैं और अब बड़े पैमाने पर जनता को गुमराह करने के लिए वह झूठे और निराधार आरोप लगाते रहे हैं ताकि वह अपनी अवैध और अस्वीकृत दवाओं को बेच सकें। शायद अपनी इन्हीं कारस्तानियों के चलते बाबा रामदेव और उनके सहयोगी अब सुप्रीम कोर्ट में बार-बार माफी मांग रहे हैं। लेकिन न्यायालय उनकी माफी स्वीकार ना कर देश के सामने उस सच को लाने पर आमादा है जिसमें अवैध प्रचार और इस्तिहार के सहारे लोगों को भ्रमित कर वह अपनी दवाइयों को बेचते रहे हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में आईएमए का पक्ष मजबूत दिखाई दे रहा है और बाबा रामदेव तथा आचार्य बालकृष्ण असहाय नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया का एक सच यह भी

योग गुरु रामदेव ने भ्रामक प्रचार मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपनी सफाई भले ही दे दी हो लेकिन उनके और पतंजलि आयुर्वेद के विचारों को समझने के लिए सिर्फ पतंजलि आयुर्वेद के ट्विटर टाइमलाइन पर एक नजर डाली जाए तो पता चलेगा कि अभी भी लोगों को अंधेरे में रखा जा रहा है। ट्विटर टाइमलाइन पर एक के बाद एक ऐसी पोस्ट भरी पड़ी हैं जिसमें योग के चमत्कार का बखान दिखाई देता है। ऐसी कई पोस्टों में ज्यादातर में लिखा गया है कि मरीज को डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था यानी डॉक्टरों ने बीमारी से हार मान ली थी। लेकिन बाबा की दवाइयों ने उन्हें ठीक कर दिया। योग की डॉक्टरों से तुलना करने के लिए जो उदाहरण दिए गए हैं उनमें से एक में बताया गया है कि एक मरीज ने दो साल पुराने गठिया को 10 दिन में योग से ठीक कर दिया और वह अब दौड़ने भी लग गया है। इसी तरह सोशल मीडिया पर एक अन्य मरीज का हवाला देते हुए बताया गया है कि उन्हें डॉक्टरों ने कह दिया था कि महीने-दो महीने ही जिंदा रह पाएंगे और उन्होंने योग से लंग्स की समस्या ठीक कर ली।

दवाइयों पर झूठ का काला कारोबार

प्रतिबंधित दवाइयों का उत्पादन करने वाली दिव्य फार्मेसी
वर्ष 2006: सीपीएम नेता वृंदा करात ने बाबा रामदेव पर अपनी दवाओं में इंसानों की खोपड़ी और जानवरों की हड्डियों के साथ ही अंडकोष को मिलाने का आरोप लगाया था। वृंदा करात ने बकायदा सबूतों के साथ रामदेव पर गंभीर आरोप लगाए थे। यह मामला संसद के साथ ही मीडिया में बहुत उछला लेकिन पतंजलि ने आरोपों से इनकार कर दिया था। गौरतलब है कि इस प्रकरण को सबसे पहले ‘दि संडे पोस्ट’ ने प्रकाशित किया था।
वर्ष 2012: विदेशों में जमा काले धन के खिलाफ अभियान की शुरुआत करते हुए रामदेव ने उत्तराखण्ड में सत्ता में आई कांग्रेस को आड़े हाथों लिया था। कांग्रेस ने योग गुरु के खिलाफ टैक्स चोरी, जमीन हड़पने और भ्रष्टाचार के 81 मामले दर्ज करके जवाबी कार्रवाई की थी। तब रामदेव के कई केंद्रों पर छापेमारी करने के लिए तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार द्वारा पुलिस भेजी गई थी।
वर्ष 2015: इस वर्ष रामदेव उस समय सुर्ख़ियों में आ गए जब विपक्षी दलों ने संसद में सत्तारूढ़ भाजपा को इस बात पर घेरने की कोशिश की कि उनके समर्थक रामदेव की फार्मेसी में ‘पुत्रजीवक बीज’ के नाम से दवा बनाई जा रही है और यह दावा किया जा रहा है कि इसके इस्तेमाल से बेटे का ही जन्म होगा। तब जनता दल के सांसद के सी त्यागी ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी अपने भाषण में ‘बेटी बचाओ’ का नारा लगा रहे हैं, पर यह दुखद है कि हरियाणा सरकार के ब्रांड एम्बेसडर योग गुरु रामदेव की कंपनी दिव्य फार्मेसी पुत्र पैदा करने की दवा बेच रही है।
पुत्रजीवक दवा पर सवाल उठाने वाले सांसद केसी त्यागी
कुछ सांसद ‘पुत्रजीवक बीज’ के पैकेट संसद में भी लाए थे और उन्हें दिखाते हुए कहा कि ऐसी चीजों को बेचना अवैध और असंवैधानिक है। विपक्षी सांसदों ने यह भी कहा कि हरियाणा सरकार ने ऐसे व्यक्ति को ब्रांड एम्बेसडर बनाया है जिनकी फार्मेसी ऐसी तथाकथित दवाएं बेचती है। सर्वविदित है कि पतंजलि योगपीठ में पहले ‘पुत्रवती’ नामक दवा बेची जाती थी। जिस पर काफी विवाद हुआ था। बताया जा रहा है कि वर्ष 2007 में उत्तराखण्ड सरकार के आदेश पर मामले की जांच भी की गई थी, जिसके बाद इस दवा को बेचना बंद कर दिया था। उस समय हुए विवाद के बाद दिव्य फार्मेसी की इस दवा का नाम बदलकर ‘पुत्रवती’ की जगह ‘पुत्रजीवक बीज’ कर दिया गया और इसे फिर से धड़ल्ले से बाजार में बेचा जाने लगा था। वेबसाइट पर बेटे की चाहत रखने वालों के ऑनलाइन सवाल के जवाब में पुत्र प्राप्ति के लिए इस दवा का सुझाव दिया गया था।
बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी ‘पुत्रजीवक बीज’ के नाम से बेटा पैदा करने की दवा
वर्ष 2016: बाबा रामदेव उस समय चर्चाओं में आए जब दावा किया गया कि उनके चिकित्सालय में समलैंगिकता का भी इलाज होता है। इस पर भी काफी हंगामा हो चुका है। तब समलैंगिकता को रामदेव ने एक मानसिक विकार बताया था जिसका योग से इलाज किए जाने का दावा किया गया था। साथ ही पतंजलि के चिकित्सालयों में इस बीमारी को खत्म करने के मद्देनजर 1200 रुपए की दवाइयों की लिस्ट भी दिखाई गई जिनमें एनर्जी टॉनिक्स तक शामिल हैं लेकिन चिकित्सा प्रणाली में इसे सिद्ध नहीं किया जा सका।
वर्ष 2016: पतंजलि के सरसों तेल के विज्ञापन पर जमकर सवाल उठे थे। खाद्य तेल उद्योग संगठन साल्वेंट एक्सटैक्ट्रस एसोसिएशन ऑफ इंडिया का आरोप था कि पतंजलि के कच्ची घानी सरसों तेल का विज्ञापन झूठा और भ्रामक है। एसईए के बयान में कहा गया था कि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा प्रकाशित सरसों तेल का मौजूदा विज्ञापन उचित नहीं है। इस विज्ञापन में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टेड तेलों के बारे में भ्रामक और झूठे बयान दिए गए हैं। एसईए ने पतंजलि को साक्ष्य दस्तावेजों के साथ एक विस्तृत ज्ञापन-पत्र भेजा था। साथ ही ज्ञापन में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टेड तेलों के खिलाफ दिए गए भ्रामक बयानों को वापस लेने का निवेदन किया था। जबकि 2022 में राजस्थान में पतंजलि के सरसों का तेल का परीक्षण किया गया तो वह गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया गया था।
वर्ष 2017: योग गुरु बाबा रामदेव को तब बड़ा झटका लगा जब उनकी कंपनी पतंजलि के एक प्रोडक्ट आंवला जूस पर सेना की कैंटीन में बिक्री पर रोक लगा दी गई। बंगाल की पब्लिक हेल्थ लैब में आंवला जूस के फेल हो जाने के बाद आर्मी कैंटीन ने इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। रक्षा मंत्रालय ने आयुर्वेद पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और इस मामले में जल्द से जल्द जवाब भी मांगा। इस आंवला जूस की जांच कोलकाता की सेंट्रल फूड लेबोरेटरी में की गई थी। जांच में उसे उपयोग के लिए ठीक नहीं पाया गया। तब मजबूरन पतंजलि को आर्मी की सभी कैंटीनों से आंवला का जूस वापस मांगना पड़ा था।

वर्ष 2018: 30 मई को पतंजलि की तरफ से वॉट्सऐप को टक्कर देने के लिए स्वदेशी मैसेजिंग ऐप किम्भो पेश किया था। हालांकि कुछ ही घंटों के बाद इस ऐप को वापस ले लिया गया था। एक्सपर्ट ने इस ऐप में प्राइवेट जानकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। पतंजलि ने इन दावों को खारिज किया था, वहीं इस ऐप के स्वदेशी होने पर भी सवाल खड़े हुए थे। फ्रांस के एक एथिकल हैकर एलियट एल्डरसन ने दावा किया था कि एक अमेरिकी कंपनी के बंद हो चुके मैसेजिंग ऐप ‘बोलो’ को ही पतंजलि द्वारा किम्भो के रूप में पेश किया गया है।

वर्ष 2019: बाबा रामदेव के एक समय करीबी साथी रहे आचार्य कर्मवीर ने पतंजलि घी की गुणवत्ता पर सवाल उठाया। उन्होंने एक ऑनलाइन पोर्टल को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर कोई देसी गाय से शुद्ध देसी घी बनाता है तो उसकी कीमत लगभग 1,200 रुपए होगी। जबकि पतंजलि का घी आज करीब 600 रुपए किलो बिक रहा है।

नेपाल सरकार ने भी लगाई थी दवाइयों पर रोक

नेपाल में पतंजलि की इन दवाइयों पर लगा प्रतिबंध

भारत में पतंजलि के प्रोडक्ट की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर कई सवाल खड़े हो चुके हैं। भारत के अलावा नेपाल से भी इस बाबत पतंजलि को झटका लग चुका है। 2017 में नेपाल के दवा नियामक ने पतंजलि आयुर्वेद के छह मेडिकल प्रोडक्ट को लैब टेस्ट में फेल कर दिया था। टेस्ट में इन प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता ठीक न होने के कारण उनकी बिक्री पर रोक लगा दी गई थी। जानकारी के अनुसार नेपाल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2017 में पतंजलि को उनकी छह आयुर्वेदिक दवाओं को उस समय  वापस लेने को कहा था जब वे परीक्षण में फेल हो गई थी। नेपाल के दवा प्रशासन विभाग ने तब एक सार्वजनिक नोटिस में कहा था कि उत्तराखण्ड स्थित दिव्य फार्मेसी में बनी छह दवाएं परीक्षण में घटिया पाई गईं। परीक्षण में जो पतंजलि की 6 दवाइयां  टेस्ट में फेल हुई उनमें आमला  चूर्ण, दिव्य गसार  चूर्ण, बहुची  चूर्ण, त्रिफला  चूर्ण , अश्वगंधा और अद्वेय चूर्ण हैं। खबरों के अनुसार पतंजलि की दवाओं के खेप का विभाग द्वारा परीक्षण किया गया और उनमें रोगजनक बैक्टीरिया मिले थे जिससे पतंजलि की नेपाल में काफी किरकिरी हुई थी।

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