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  •        संतोष सिंह

 

­­­‘चिपको आंदोलन’ की ट्टारती पर 20 सालों में 50 हजार वृक्षारोपण कर चर्चा में आईं लक्ष्मी रावत उत्तराखण्ड की महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई हैं। 500 स्वयं सहायता समूह बनाकर वह 150 ग्राम संगठनों के जरिए 50 हजार महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। 2017 में पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘गौरा देवी सम्मान’ प्राप्त लक्ष्मी को उत्तराखण्ड सरकार द्वारा हरियाणा में भी भेजा गया। जहां उन्होंने राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सैकड़ों महिलाओं को प्रशिक्षित किया। देवभूमि में महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन चुकीं लक्ष्मी का लक्ष्य अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना है

पर्यावरण संरक्षण में चमोली जिले की महिलाओं का हमेशा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पर्यावरण संरक्षण के लिए देश और दुनिया में चिपको आंदोलन की जननी भी चमोली जिला ही रहा है। इसी जिले के रैणी गांव की गौरा देवी के नेतृत्व में ही 26 मार्च 1974 को वृक्ष काटने आए लोगों को यहां की महिलाओं ने यह कहकर भगा दिया कि जंगल हमारा मायका है, हम इसे कटने नहीं देंगे। पेड़ों को बचाने के लिए महिलाएं पेड़ से चिपक गई थीं। यहां से देश और दुनिया में ‘चिपको आंदोलन’ की मुहिम शुरू हुई थी। चिपको की भूमि में एक ऐसी भी महिला हैं जो 20 सालों से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रही हैं। उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में 50 हजार से अधिक पौधों का रोपध के साथ संरक्षण के लिए महिलाओं को जागरूक किया है। इतना ही नहीं इनके द्वारा उत्तराखण्ड के विभिन्न जिलों में अब तक पांच सौ से अधिक महिला समूह बनाकर लगभग पांच हजार से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से प्रशिक्षण दिया गया है। इनके द्वारा जैविक खेती के माध्यम से भी विभिन्न प्रकार की सब्जी उत्पादन का प्रशिक्षण और दुग्ध उत्पादन के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया गया है। जिससे सैकड़ों महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ रही हैं। जागरूक अभियान के साथ ही स्वच्छता अभियान भी चलाया जा रहा है। ऐसा ही चमोली जिले के थिरपाक गांव की लक्ष्मी रावत का लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण के साथ ही महिला समूह के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का है। जिसमें वह निरंतर आगे बढ़ रही है।

जेठुली देवी व भवान सिंह के

हरेला पर्व पर वृक्षारोपण अभियान

घर में लक्ष्मी रावत का जन्म 1984 में हुआ। जन्म के कुछ साल बाद ही उनकी मां का साया सर से उठ गया। मां का साया सिर से उठ जाने के बाद उनका पालन-पोषण उनकी दूसरी मां गुड्डी देवी द्वारा किया गया। गरीब किसान परिवार में पैदा हुईं लक्ष्मी का जीवन बचपन से ही संघर्षमय रहा। बचपन में उनका ज्यादा समय जंगल और घर के बीच ही व्यतीत हुआ। जिससे उन्हें बचपन से ही पेड़-पौधों से गहरा लगाव हो गया था। आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद घर वालों ने 15 वर्ष की आयु में वर्ष 1998 में इनकी शादी थिरपाक गांव में कर दी। उनके पति बलबीर सिंह बहुत ही सरल स्वभाव के मिलनसार व्यक्ति हैं। बचपन से ही ठोकर खाकर पली-बढ़ी लक्ष्मी की छोटी उम्र में शादी होने के बाद भी उसने अपने को ससुराल में जल्द ही सामंजस्य स्थापित कर अपने कार्य और मेहनत से परिवार का दिल जीत लिया। आर्थिक रूप से कमजोर लक्ष्मी रावत ने खेती-किसानी कर अपनी आजीविका शुरू की। इसी बीच उन्होंने 2003 में गांव की पांच महिलाओं के साथ मिलकर ‘नंदाकिनी स्वयं सहायता समूह’ बनाया। इसमें गुड्डी देवी अध्यक्ष, लक्ष्मण रावत कोषाध्यक्ष, गोदाम्बरी देवी, रामेश्वरी देवी व कलावती देवी भी शामिल थीं। जिसमें पांचों ने मिलकर हर महीने 100 रुपए जमा कर आगे बढ़े। समूह के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 2008 में दुग्ध डेरी खोली गई। जहां से गांव में दूध इकठ्ठा कर इस मिशन को पांच किमी दूर नंदप्रयाग बाजार तक पहुंचाया और वहां दुकानों में विक्रय किया गया। इससे गांव की महिलाओं की आमदनी बढ़ने लगी तो आस-पास के गांवों में भी इसकी खबर पहुंच गई। इसके चलते अन्य गांव के लोगों ने भी दुग्ध उत्पादन शुरू कर दिया। इसके लिए लक्ष्मी रावत ने धीरे-धीरे आस-पास के गांवों की महिलाओं को जागरूक कर उन्हें दुग्ध उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। थिरपाक गांव की पांच महिलाओं से शुरू हुआ कारवां बढ़ता गया और कुछ ही सालों में थिरपाक सहित कमेडा, खडगओलई, तेफना, मंगरोली, चटिग्याला, कंडारा, सुनाली, बांतोली, सेंज व सिलंगी सहित नंदप्रयाग न्याय पंचायत के 23 गांवों में लक्ष्मी रावत ने महिलाओं को दुग्ध उत्पादन शुरू करवा दिया। जिससे महिलाओं की आर्थिकी भी मजबूत होती गई। देखते ही देखते 23 गांवों से 600-700 लीटर दूध इकट्ठा होकर बाजार पहुंचने लगा और महिलाएं अधिक मेहनत कर आत्मनिर्भर बनने लगीं। अधिक दुग्ध उत्पादन होने पर महिलाओं द्वारा नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग तक इसकी मार्केटिंग की जाने लगी।

महिलाओं को इसमें ‘हीमोत्थान संस्था’ द्वारा भी सहयोग किया गया। इसके बाद इन्होंने 23 समूहों के लिए ‘एकता स्वायत्त सहकारिता समिति’ का गठन किया। जिसके माध्यम से महिलाओं द्वारा दुग्ध उत्पादन के साथ ही अब जैविक खेती भी की जा रही है जिससे विभिन्न सब्जियों और दालों का उत्पादन किया जा रहा है। लक्ष्मी रावत ने सभी समूहों की महिलाओं को आथि्र्ाकी बढ़ाने के लिए जैविक खेती का प्रशिक्षण देकर उन्हें सब्जी में टमाटर, गोभी, मशरूम, लहसून, भिंडी, राई, मूली उत्पादन का प्रशिक्षण दिया। साथ ही ग्रामीण महिलाओं को जैविक खेती में विभिन्न फसलों मंडुवा, कहथ की दाल, रैंस, काले एवं सफेद भट्ट, तौर जैसे अन्य दालों के उत्पादन के लिए जागरूक किया। अधिक उत्पादन होने पर इसके लिए सोनला में प्रोसेसिंग मशीन लगाकर इनका नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, गोपेश्वर में मार्केटिंग किया गया। धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ने लगा तो एकता स्वायत्त सहकारिता से 720 महिलाएं जुड़ गईं हैं। सोनला में महिलाओं द्वारा आटा, मशाल, धान पिसाई चक्की के साथ तेल निकालने और जूस निकालने की मशीन लगा दी गई है। लक्ष्मी देवी ने महिलाओं को स्थानीय उत्पादन के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महिलाओं को जागरूक किया और हर वर्ष हजारों पेड़ भी रोपण कराए। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को कर्ज देकर स्वरोजगार से भी जोड़ा गया है। जिससे गाय, भैंस, दुकान और वाहन तक के लोन दिया जा रहा है। लक्ष्मी देवी के अनुसार ‘एकता स्वायत्त सहकारिता’ के अध्यक्ष पद पर रहते उन्होंने विगत दो वर्ष में 35 लाख से अधिक का लोन महिलाओं को दिया है। अब महिलाओं द्वारा तिमला, आंवला, लेंगुडा, आम का अचार भी बनाया जा रहा है। इसके मार्केटिंग के लिए स्थानीय बाजारों के साथ ही कर्णप्रयाग में हाट बाजार में अपना उत्पाद बेचा जाता है।

लक्ष्मी देवी को कर्णप्रयाग ब्लॉक के माध्यम से विभिन्न प्रशिक्षण दिया गया है। जिसके बाद उन्हें मास्टर ट्रेनर के रूप में जिले के विभिन्न गांवों में स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए भेजा गया। लक्ष्मी देवी ने न्याय पंचायत से बाहर निकल कर

पौधा रोपण करने निकलीं लक्ष्मी रावत

मास्टर ट्रेनर के रूप में जोशीमठ ब्लॉक के उर्गमघाटी के देवग्राम, ल्यांरी, भर्की, भेठा, पिलखी, आरोसी एवं ग्वाड़ में महिला समूह बनाकर उन्हें प्रशिक्षण दिया। स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए भी जागरूक किया। ऐसे ही नौटी न्याय पंचायत में 30 समूह बनाया गया और नौली क्लस्टर में 40 समूह बनाकर प्रशिक्षण दिया गया। इस तरह चमोली जिले में 180 से अधिक स्वयं सहायता समूह बनाए गए। पर्यावरण में निरंतर काम करने पर लख्मी रावत को 2017 में गौरा देवी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। लक्ष्मी का महाअभियान यहीं नहीं रुका इसके अलावा उनके उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए उनका महिला समूह तैयार करने के लिए प्रदेश स्तर पर मास्टर ट्रेनर के रूप में चयन हुआ। इसी बीच लक्ष्मी रावत से गांवों में महिलाओं द्वारा यह पूछा जाता कि आपने कितने तक पढ़ाई की है तो मन मसोरकर रह जातीं। उनके मन में यह बात घर कर गई कि मैं तो कम पढ़ी- लिखी हूं इसके बाद उन्होंने पढ़ाई करने करने की ठानी और 2016 में हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा पास की। 2018 में जब लक्ष्मी रावत 12वीं परीक्षा दे रही थीं तो दूसरे कक्ष में उनकी बेटी 10वीं की परीक्षा दे रही थी। इस तरह मां-बेटी ने बोर्ड परीक्षा एक साथ दी। लक्ष्मी का जुनून ही है कि उसने घर-परिवार, सामाजिक कार्य और पढ़ाई एक साथ पूरी की।

जिसमें उनके पति एवं परिवार का उन्हें पूरा सहयोग मिला। लक्ष्मी अभी बीए फाइनल की भी पढ़ाई कर रही हैं। इस बीच उत्तराखण्ड स्तर पर मास्टर ट्रेनर बनने पर उन्होंने गढ़वाल-कुमाऊं के आठ से अधिक जिलों जिनमें चमोली, रूद्रप्रयाग, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, चंपावत सहित अन्य जिलों में 500 से अधिक समूह एवं 150 ग्राम संगठन और लगभग 5000 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है। इस दौरान 20 वर्षों में उन्होंने 50 हजार से अधिक विभिन्न प्रजातियां बांज, बुरांश, आंवला, काफल के पेड़ों का रोपण भी किया है। पर्यावरण संरक्षण के लिए उन्हें कर्णप्रयाग वन विभाग द्वारा सराहनीय कार्य के लिए प्रमाण पत्र दिया है। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए 2022 में उन्हें उत्तराखण्ड से हरियाणा के जिंद जिले में महिलाओं को प्रशिक्षण के लिए भेजा है। जहां उन्होंने 600 महिलाओं को महिला समूहों और महिला सशक्किरण के लिए जागरूक किया गया। लक्ष्मी रावत ने बताया कि कोरोना काल में भी उन्होंने स्वयं अपने घर में ही 1000 बोतल सेनेटाइजर बना कर लोगों में निःशुल्क तथा कई गांवों में मास्क भी वितरित किए गए। लक्ष्मी रावत ने कहा कि बचपन से ही जंगल और घर का नाता बना रहा जिससे उनमें पेड़-पौधों और जंगलों से बचपन से ही प्यार बना रहा। उनका लक्ष्य है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं समूहों के माध्यम से महिला को आत्मनिर्भर बनाने के लिए और अधिक कार्य करना है। इसके लिए मैं निरंतर कार्य कर रही हूं और सैकड़ों महिलाओं को इसका लाभ मिल भी रहा है।

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