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Uttarakhand

चुनाव मैनेजमेंट में पिछड़ी कांग्रेस

नैनीताल में भाजपा कार्यकर्ता जनता को मतदान केंद्रों तक लाने में जुटे रहे। पार्टी प्रत्याशी अजय भट्ट अब इन कार्यकर्ताओं को सम्मानित करने की बात कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के हरीश रावत अकेले ही मोर्चे पर जूझते दिखाई दिए। हल्द्वानी में तो चुनाव के एक दिन पहले पार्टी कार्यकर्ता बस्ता लेने तक को तैयार नहीं थे
प्रदेश में 58 प्रतिशत मतदान बताता है कि चुनाव में मतदाताओं की दिलचस्पी बहुत कम रही। मतदाता के मन में जो सवाल, जो मुद्दे थे वह न किसी प्रत्याशी ने उठाए और न ही जनहित की बात कही गई। ले -देकर एक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया। भाजपा ने सर्जिकल स्ट्राइक और कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को मुद्दा बनाना बेहतर समझा। लेकिन स्थानीय मुद्दे गायब रहे। जो लोग वर्षों  से सड़कों पर चलने को तरस रहे हैं, जिन्हें पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है जो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं से वंचित रहे हैं, उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं रहा। हालांकि कांग्रेस ने इस तरफ जरूर हाथ-पैर मारे। लेकिन मोदी मैजिक के सामने वह फेल होते नजर आए। अगर नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट की बात करें तो यहां पर सभी मुद्दे एक तरफ थे और राष्ट्रवाद का मुद्दा एक तरफ। लोग वोट डालने तक कहते रहे कि हम भाजपा के प्रत्याशी को नहीं जानते, हम सिर्फ मोदी को वोट कर रहे हैं। हालांकि मतदाताओं में 2014 जैसा उत्साह नहीं था। 2014 में जो मोदी लहर थी वह इस बार थोड़ा कम ही थी। मत प्रतिशत की ही बात करें तो 2014 में नैनीताल का मत प्रतिशत 68 . 38 प्रतिशत था तो इस बार 2 प्रतिशत कम यानी 66 . 61 प्रतिशत रहा। 11 अप्रैल की शाम 5.00 बजे मतदाताओं की किस्मत ईवीएम में कैद हुई तो वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता के मुद्दे और  पिछले 1 सप्ताह से जो चुनावी माहौल चला आ रहा था, वह समाप्त हो गया।
इस बार के लोकसभा चुनाव को लेकर जनता में कोई खास उत्साह नहीं दिखाई दिया। लग ही नहीं रहा था कि लोकसभा चुनाव हो रहा है। न कहीं बैनर, न कहीं पोस्टर और न ही कहीं चर्चा। लोगों में जैसे मतदान के प्रति निराशा के भाव थे। इसके पीछे कहीं न कहीं भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशियों की भी उदासीनता कही जा रही है। मतदाता कहते देखे गए कि पूर्व में जब हरीश रावत प्रदेश के मुख्यमंत्रा बने थे तो उन्होंने वादे और घोषणाएं तो बहुत की, लेकिन उन पर अमल बहुत कम हुआ। फिलहाल प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुत निष्क्रिय हैं। न वह घोषणा कर रहे हैं और न कहीं आ-जा रहे हैं। मजे की बात यह है कि लोग यह कहते सुने गए कि लगता ही नहीं कि प्रदेश में कोई मुख्यमंत्री भी है। चुनावी माहौल को देखें तो भाजपा का माहौल खुद-ब-खुद बनता चला गया। लोग मोदी मैजिक के प्रभाव में इस कदर आ गए कि हरीश रावत उनका मिजाज समझ नहीं पाए और इस मामले में वह थोड़ा पिछड़ते हुए नजर आए। हालांकि हरीश रावत जनता की नब्ज बखूबी समझने वाले नेता हैं वह पहले ही समझ चुके थे कि उनका मुकाबला अजय भट्ट से नहीं, बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हो रहा है। इसके चलते ही हरीश रावत ने सेना और पुलवामा हमले का जिक्र कहीं नहीं किया। हालांकि वह राफेल की बात करते दिखे। लेकिन राफेल में स्थानीय लोगों की दिलचस्पी बहुत कम थी।
हरीश रावत का चुनावी मैनेजमेंट मजबूती के साथ नहीं दिखा। रावत आज के युवाओं के बजाए पुराने लोगों पर ही ज्यादा विश्वास करते दिखे। हालांकि इस चुनाव में वह एकला चलने की राह पर भी लगे रहे। पूर्व मुख्यमंत्री और नैनीताल के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने जब यह कहा कि वह ‘एकुला बानर’ है, तो लोगों ने उनको गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन चुनाव आते-आते उनकी यह बातें कहीं न कहीं हरीश रावत पर सटीक बैठती दिखीं, वह कांग्रेसियों का समर्थन नहीं जुटा पाए। हल्द्वानी की ही बात करें तो इंदिरा हृदयेश ने उनका मन से साथ नहीं दिया। हालांकि वह हरीश रावत के साथ जनसभाओं में तो दिखीं, लेकिन 11 अप्रैल को मतदान के दिन हल्द्वानी की उनकी टीम नदारद दिखी। चुनाव से 1 दिन पूर्व तक हालत यह थी कि ज्यादातर कार्यकर्ता कांग्रेस का बस्ता तक लेने को तैयार नहीं थे। इसे क्या कहा जाएगा कि इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी में घूमने के बजाय प्रीतम सिंह के चुनाव में चली गईं। इससे पहले उनका पत्रकारों के सामने दिया गया यह बयान कि हम टिहरी सीट को जीत रहे हैं। बाकी की कह नहीं सकते गलत मैसेज देता हुआ प्रतीत हुआ। उनके पुत्र सुमित भी चुनाव के अंत में आते-आते थोड़ा निष्क्रिय दिखे। शुरुआत में जो उनकी सक्रियता थी, यह बाद में शिथिल होती चली गई।
हरीश रावत के सामने सबसे बड़ी समस्या आर्थिक रूप से कमजोर होना भी देखी गई। कार्यकर्ता चुनाव में खर्च न मिलने की चर्चा करते देखे गए, जबकि दूसरी तरफ भाजपा ने अपने विधायकों के ऊपर यह जिम्मेवारी छोड़ी हुई थी। तराई की ही बात करें तो कई विधायक ऐसे थे जो अपने खर्चे पर चुनाव प्रचार कर रहे थे, जबकि कांग्रेस का कोई भी नेता ऐसा करता नहीं दिखा। कांग्रेस के दो पूर्व सांसद महेंद्र पाल और केसी सिंह बाबा इस चुनाव में दिखाई नहीं दिए। हरीश रावत को पूरा भरोसा था कि ठाकुर बाहुल्य सीट जातिवाद के लहर के चलते उनको जिता सकती है। लेकिन मोदी मैजिक के सामने जातिवाद अपने मजबूत पैर नहीं जमा पाया। पूर्व सैनिक ज्यादातर रिटायरमेंट होने के बाद प्लेंस में ही मकान लेते हैं और यहीं बस जाते हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ ने ऐसे कई पूर्व सैनिकों से बात की। उन्होंने अपने मन की बात कहते हुए बताया कि जो कांग्रेस का घोषणा पत्र था वह उन्हे बहुत ही अटपटा लगा। खासकर आफ्सपा और देशद्रोह जैसे कानून को हटाने की बात घोषणा पत्र में करना उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि यह  कहीं न कहीं देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ होगा। तराई में तिलक राज बेहड़ ने काफी मेहनत की। किच्छा के भाजपा विधायक राजेश शुक्ला ने हरीश रावत के प्रति बदजुबानी कर कहा कि हरीश रावत मरे हुए आए हैं और उनका केवल दाह संस्कार बाकी है। उसके बाद हरीश रावत ने भी मार्मिक अपील जारी की। जिसका पहाड़ी मतदाताओं पर असर भी हुआ। नैनीताल और ऊधमसिंह नगर के अल्पसंख्यक मतदाताओं का रुझान भी पूरी तरह हरीश रावत की ओर दिखा।


पन्ना प्रमुखों ने दी मजबूती

भाजपा का चुनाव में सबसे मजबूत पक्ष यह रहा कि चुनावी मैनेजमेंट में संगठन सक्रिय दिखा। हर बूथ पर उसके कार्यकर्ता लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करने में जुटे रहे। भाजपा की ‘पन्ना प्रमुख’ टीम बूथ तक मतदाताओं को लाने में सफल रही। इस चुनाव में पहली बार भाजपा ने ‘पन्ना प्रमुख’ का चुनावी हथियार चलाया। पन्ना प्रमुख के तहत एक कार्यकर्ता को एक पन्ना दिया गया। जिसमें 30 वोटर के नाम थे। 30 वोटरों की पूरी लिस्ट होती है और वह कार्यकर्ता इस लिस्ट को लेकर पूरे 30 वोटरों तक पहुंचता है। उनको पर्ची देता है। चुनावी एजेंडा बताता है। यही नहीं, बल्कि उन्हें बूथ तक लाने तक की पूरी जिम्मेदारी निभाता है। इस बार हर पन्ना प्रमुख अपना काम मजबूती से करता दिखा। भाजपा का एक-एक कार्यकर्ता 30-30 वोटरों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाता रहा। इनकी भूमिका को देखते हुए खुद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और नैनीताल लोकसभा सीट के प्रत्याशी अजय भट्ट पन्ना प्रमुखों को सम्मानित करने की बात कह रहे हैं।

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