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सैन्य बाहुल्य उत्तराखण्ड में राष्ट्रवाद की लहर इस कदर चली कि किसी पार्टी ने लगातार दूसरी बार क्लीन स्वीप करने का रिकॉर्ड बनाया। भाजपा प्रत्याशी करीब ढाई से तीन लाख मतों के भारी अंतर से जीते। नैनीताल में अजय भट्ट ने कांग्रेस के हरीश रावत को तीन लाख 38 हजार वोटों से हराया। भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत में मोदी मैजिक के साथ ही कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी भी एक बड़ी वजह रही

 

उत्तराखण्ड में अक्सर देखा गया है कि यहां की जनता दिल्ली की तरह उसी पार्टी को वोट देती है जो केंद्र में सरकार बनाने जा रही हो। यही इस बार राज्य में भाजपा की ऐतिहासिक जीत की वजह भी है। ऐतिहासिक जीत इस मायने में कि पहली बार राज्य में कोई पार्टी लगातार दो लोकसभा चुनावों में क्लीन स्वीप की है। प्रत्याशियों के जीत का अंतर भी बढ़ा है। भाजपा के राष्ट्रवाद के नारे पर राज्य की जनता ने इस कदर भरोसा किया कि उसके प्रत्याशियों की जीत का अंतर 2 ़33 लाख से 3 ़39 लाख मतों के बीच रहा। नैनीताल में भाजपा प्रत्याशी अजय भट्ट सर्वाधिक तीन लाख 38 हजार मतों से विजयी रहे। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को मात दी। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 के मुकाबले इस बार राज्य में भाजपा का मत प्रतिशत भी बढ़ा। पिछली बार जहां 55 ़30 प्रतिशत मत मिले थे, वहीं इस बार 61 प्रतिशत मत हासिल हुए।

दरअसल, उत्तराखण्ड एक सैनिक बाहुल्य राज्य है, राज्य में लाखों की संख्या में पूर्व सैनिक हैं। पुलवामा हमले के बाद सेना ने बालाकोट में आतंकी ठिकानों के खिलाफ जो एयर स्ट्राइक की उससे जनता में यह संदेश गया कि केंद्र की मोदी सरकार के साहस और सूझबूझ के चलते ही सेना इतनी बड़ी कार्रवाई कर पाई है। दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद थी कि पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी को टिकट देकर वह प्रदेश के पूर्व सैनिक परिवारों के मत हासिल कर लेगी, लेकिन राष्ट्रवाद के नारे के आगे उसकी यह रणनीति बुरी तरह असफल साबित हुई। राज्य में कांग्रेस की बुरी हार की एक प्रमुख वजह पार्टी की कलह भी है। खेमेबाजी के चलते आम कार्यकर्ता हतोत्साहित हुआ और इसका असर चुनाव प्रचार पर पड़ा। तमाम कयासों और सर्वेक्षणों के उलट राज्य में भाजपा पांचों सीट जीतने में कामयाब हुई। भाजपा की यह ऐतिहासिक जीत फिलहाल मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी सुकून दे सकती है। उनके समर्थक दावा कर सकते हैं कि राज्य में सरकार को लेकर जनता में कहीं कोई आक्रोश नहीं है। लिहाजा नेतृत्व परिवर्तन की बात करने का कोई औचित्य नहीं है।

नैनीताल : सरोवर नगरी के नाम से विख्यात नैनीताल लोकसभा क्षेत्र 1957 में बजूद में आया था।यह वीआईपी सीट मानी जाती है। अतीत में कृष्ण चंद्र पंत, चंद्र दत्त पांडे, भारत भूषण, नारायण दत्त तिवारी, महेंद्र पाल, इला पंत, केसी बाबा, भगत सिंह कोश्यारी जैसे नेता इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर देशभर की निगाहें टिकी थी। कारण कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत मैदान में थे। उनके खिलाफ भाजपा ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को मैदान में उतारा। चूंकि रावत मुख्यमंत्री के तौर पर पहले इस क्षेत्र के दौरे कर चुके थे। लिहाजा वे जनता के लिए नए नहीं थे। जबकि अजय भट्ट का नाम लोग सिर्फ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के तौर पर ही जानते थे। भट्ट को भाजपा की राष्ट्रवाद की लहर का फायदा मिला। लेकिन इसके साथ ही एक बात लोगों में यह भी चर्चा का विषय रही कि वे क्षेत्र के लिए नए बेशक हैं, लेकिन हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता को अपने मधुर व्यवहार से उन्होंने गोलबंद किया और चुनाव के मोर्चे पर खड़ा कर दिया। इसी का नतीजा है कि प्रदेश की सबसे चुनौतीपूर्ण सीट पर वे सर्वाधिक तीन लाख 38 हजार मतों से विजयी रहे। इस जीत में उनकी शालीनता और विनम्रता भी काफी हद तक प्रभावी रही है।

अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ : कुमाऊं मंडल की अल्मोड़ा सीट का प्रतिनिधित्व अतीत में कई दिग्गज नेताओं ने किया। भाजपा प्रत्याशी अजय टम्टा यहां दूसरी बार जीतने में सफल रहे हैं। कांग्रेस ने उन्हें घेरने के लिए पूर्व लोकसभा सांसद और वर्तमान में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को दांव पर लगाया, लेकिन अजय अल्मोड़ा के ‘अजेय अस्त्र’ के रूप में कारगर साबित हुए। इस बार उनकी जीत का अंतर पहले से काफी अधिक रहा। उन्होंने प्रदीप टम्टा को दो लाख से ज्यादा मतों से हराकर जाहिर किया कि आज भी उनकी लेकप्रियता बरकरार है।

अतीत में अल्मोड़ा सीट का प्रतिनिधित्व जंग बहादुर सिंह बिष्ट, हरगोविंद पंत, नरेंद्र सिंह बिष्ट, डॉ मुरली मनोहर जोशी, हरीश रावत, जीवन शर्मा और प्रदीप टम्टा जैसे नेता कर चुके हैं। 2014 में भाजपा ने अजय टम्टा को मैदान में उतारा तो वे विजयी रहे। तब अजय टम्टा 348186 मत पाकर विजयी हुए तो कांग्रेस के प्रदीप टम्टा 252496 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे।

मौजूदा चुनाव 2019 में भाजपा और कांग्रेस में ही मुख्य मुकाबला दिखाई दिया। भाजपा के अजय टम्टा केंद्र टम्टा को पार्टी संगठन और मोदी लहर का फायदा मिला। इसके अलावा वे अपनी व्यवहार कुशलता के लिए भी जाने जाते हैं।

हरिद्वार : तीर्थ नगरी हरिद्वार का सांसद बनना अपने आप में गर्व की बात है। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक लगातार दूसरी बार इस सीट से चुने गए हैं। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस प्रत्याशी अम्बरीश को दो लाख से ज्यादा मतों से पछाड़ा है। यहां निशंक को बाहरी करार देने का दांव भी काम नहीं आ सका। कभी सहारनपुर का हिस्सा रही हरिद्वार सीट वर्ष 1977 में स्वतंत्र लोकसभा सीट के तौर पर सामने आई है। 77 से लेकर अब तक इस सीट पर 12 लोकसभा के आम चुनाव और एक बार लोकसभा का उपचुनाव हो चुका है। मुख्यतः हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में भाजपा-कांग्रेस के बीच ही चुनावी टक्कर रही है। जहां कांग्रेस ने इस सीट पर चार बार तो वहीं भाजपा ने पांच बार जीत हासिल की है। इसके अलावा चौधरी चरण सिंह की भारतीय लोकदल पार्टी ने एक बार हरिद्वार सीट से जीत हासिल करने में कामयाबी हासिल की है, तो जनता पार्टी सेक्युलर के कब्जे में हरिद्वार सीट रही है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद राज्य में 2004 में हुए लोकसभा के आम चुनाव में पहली बार समाजवादी पार्टी ने सभी राजनीतिक समीकरणों को चौंकाते हुए पहली बार इस सीट पर अपना कब्जा किया। जबकि उत्तराखण्ड में पृथक राज्य उत्तराखण्ड आंदोलन के चलते समाजवादी पार्टी के खिलाफ जनता में भारी नाराजगी बनी हुई थी। पार्टी के राजेंद्र कुमार बाड़ी ने जीत हासिल की थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरीश रावत ने हरिद्वार सीट पर जीत हासिल की। 2014 के चुनाव में भाजपा के रमेश पोखरियाल ‘निश्ांक’ ने कांग्रेस की रेणुका रावत को करारी मात देकर हरिद्वार सीट पर भाजपा का परचम लहराया। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि हरिद्वार सीट पर भाजपा-कांग्रेस का ही दखल रहा है। भाजपा और कांग्रेस को ही मतदाता अधिकतर स्वीकार करते रहे हैं। मौजूदा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार अंबरीश कुमार, बसपा के डॉ अंतरिक्ष सैनी और भाजपा के रमेश पोखरियाल निश्ांक के बीच मुकाबला रहा है। इस मुकाबले में कांग्रेस का ग्राफ बसपा से कम ही बताया जाता रहा। माना जाता रहा कि कांग्रेस तीसरे स्थान के लिए चुनावी रण में है। लेकिन अंततः कांग्रेस ही टक्कर में रही।

टिहरी : देश के पहले लोकसभा चुनाव में नम्बर एक के नाम से जानी-जाने वाली टिहरी लोकसभा सीट इस बार खासी चर्चाओं में रही है। इस सीट पर ज्यादातर टिहरी राजपरिवार का ही कब्जा रहा है। इस बार भी राजघराने की महारानी माला राजलक्ष्मी शाह ने लगातार तीसरी बार इस सीट पर कब्जा किया। उनके बारे में यहां तक अफवाह उड़ाई जा रही थी कि इस बार उनका जीतना असंभव है। कुछ चैनलों के सर्वेक्षण में उत्तराखण्ड की जो एक सीट कांग्रेस को दी गई उसके बारे में भी यही चर्चा रही कि यह महारानी की सीट है। लेकिन तमाम अफवाहों और कयासों को दरकिनार कर महारानी 2014 से भी ज्यादा मतों से विजयी हुई हैं। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह को तीन लाख से भी ज्यादा मतों से पराजित किया तो राज्य में स्वाभाविक तौर पर यह कांग्रेस के लिए बुरी खबर है। वर्ष 1991 से लेकर 2004 तक टिहरी सीट पर भाजपा का निर्वाध कब्जा बना रहा। टिहरी रियासत के पूर्व महाराजा स्व ़मानवेंद्र सिंह भाजपा के टिकट पर लगातार पांच बार टिहरी सीट से चुनाव जीतते रहे। 2007 में महाराजा मानवेंद्र शाह की असामयिक मौत के बाद लोकसभा का उपचुनाव हुआ जिसमें कांग्रेस के विजय बहुगुणा पहली बार भाजपा के मनुजेंद्र शाह को हराकर चुनाव जीते और 2009 में विजय बहुगुणा भाजपा के जसपाल राणा को चुनाव में पटखनी देकर फिर से सांसद निर्वाचित हुए।

2012 में विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सीट से त्यागपत्र दिया और लोकसभा का उपचुनाव हुआ जिसमें भाजपा की महारानी माला राजलक्ष्मी कांग्रेस के साकेत बहुगुणा को हराकर पहली बार सांसद बनी और टिहरी सीट पर भाजपा का फिर से कब्जा बरकरार किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में फिर से भाजपा की ही महारानी माला राजलक्ष्मी ने कांग्रेस के सकेत बहुगुणा को तकरीबन दो लाख मतों से हराया।तीसरी बार 2019 में जीतकर उनहोंने हैट्रिक लगाई।

टिहरी सीट पर केवल दो बार को छोड़ दें तो इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। 9 बार कांग्रेस तो 7 बार भाजपा का परचम टिहरी सीट पर लहरा चुका है। एक बार निर्दलीय और एक बार जनता पार्टी ने जरूर इस सीट पर जीत हासिल की है। लेकिन मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस का ही मतदाताआें पर भरोसा रहा है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और भाजपा की माला राजलक्ष्मी के बीच ही मुख्य मुकाबला रहा है। भाजपा अपने संगठन के बलूबते कांग्रेस से आगे रही है।

पौड़ी : पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट पर तीरथ सिंह रावत की जीत के बाद गढ़वाल मंडल में भाजपा को एक नया नेतृत्व मिला है। तीरथ सिंह रावत ने पूर्व सीएम भुवन चंद्र खण्डूड़ी के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी मनीष खण्डूड़ी को तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से हराया। अजय भट्ट के बाद वह सबसे ज्यादा मतों से जीतने वाले प्रत्याशी हैं। तीरथ का मधुर व्यवहार और पार्टी के लिए सतत प्रयास से उनकी जीत का रास्ता बना। अतीत पर नजर डालें तो भक्त दर्शन, एचएन बहुगुणा, प्रताप सिंह नेगी चंद्र मोहन सिंह नेगी जैसे दिग्गज इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

वर्ष 1991 में पहली बार भाजपा के बीसी खण्डूड़ी ने पौड़ी सीट पर चुनाव जीता। 1996 में ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस तिवारी के टिकट पर सतपाल महराज ने जीत हासिल की इसके बाद 1998 से लेकर 2007 तक भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा और बीसी खण्डूड़ी लगातार तीन बार चुनाव जीते। 2007 में बीसी खण्डूड़ी के उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के बाद उप चुनाव हुआ तो भाजपा के तेजपाल सिंह रावत चुनाव जीत कर सांसद बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सतपाल महाराज फिर से चुनाव जीत कर भाजपा से इस सीट को छीनने में कामयाब रहे। 2014 में भाजपा के बीसी खण्डूड़ी फिर से चुनाव जीत कर सांसद निर्वाचित हुए। मौजूदा चुनाव में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत और कांग्रेस के मनीष खण्डूड़ी के बीच ही मुख्य मुकाबला रहा है। तीरथ अपनी सांगठानिक ताकत, व्यवहारकुशलता व अनुभव के बूते भारी मतों से जीतने में कामयाब रहे।

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