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नारायण दत्त तिवारी, गुलाब सिंह, ब्रह्मादत्त, के.सी. पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा सरीखे नेताओं की जीत के उनके व्यक्तिगत प्रभाव का भी बड़ा हाथ रहता था और उनका स्वयं का भी एक बड़ा समर्थक वर्ग हुआ करता था। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं का कद छोटा होता गया भले ही वो राजनीतिक रूप से ऊंचे पदों पर पहुंच गए हों। उत्तराखण्ड की राजनीति में अब ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की कमी नजर आने लगी है जिसने अपने बूते पर खुद को उत्तराखण्ड की राजनीति में स्थापित किया हो। एक चेहरे के नाम पर वोट पाने और जीत जाने की परम्परा ने नेताओं में खुद की जमीन तैयार करने की अनिच्छा पैदा हो चली है

संजय स्वार

उन्नीस अप्रैल को पहले चरण का मतदान सम्पन्न होने के साथ ही उत्तराखण्ड में राजनीतिक गहमागहमी पर विराम लग गया। अब चुनाव परिणाम के आने तक राजनीतिक दलों में आंतरिक आकलन का दौर जारी रहेगा। 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का रहा। जहां भारतीय जनता पार्टी के सामने उत्तराखण्ड की पांचों सीटें जीतने का लक्ष्य है, वहीं कांग्रेस के सामने अपने खिसकते जनाधार और ऐन चुनाव के वक्त दलबदल करते बड़े नेताओं द्वारा दिए गए झटके से उबरने की चुनौती है। मतदाताओं में उदासीनता का माहौल देखा गया। इस चुनाव में राजनीतिक दलों के नेताओं और उसके कार्यकर्ताओं की सक्रियता शहरी क्षेत्रों में सक्रिय तौर पर जरूर देखी गई। लेकिन वो ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता के साथ खुद को वैसे ‘कनेक्ट’ नहीं कर पाए जैसा पूर्व के चुनावों में होता रहा है। क्षेत्र के सांसदों के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों के प्रत्याशी खुद के लिए जनता के मध्य वैसा जुनून पैदा कर पाने में नाकाम रहे जो कभी प्रत्याशी विशेष की खासियत हुआ करती थी। शायद ये बड़े नेतृत्व पर निर्भरता का ही परिणाम है कि राजनीतिक दलों के प्रत्याशी पाश्र्व में जाते जा रहे है। नारायण दत्त तिवारी, गुलाब सिंह, ब्रह्मादत्त, के.सी. पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा सरीखे नेताओं की जीत के उनके व्यक्तिगत प्रभाव का भी बड़ा हाथ रहता था और उनका स्वयं का भी एक बड़ा समर्थक वर्ग हुआ करता था। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में लेकिन बदलती राजनीति में नेताओं का कद छोटा होता गया भले ही वो राजनीतिक रूप से ऊंचे पदों पर पहुंच गए हों। उत्तराखण्ड की राजनीति में अब ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की कमी नजर आने लगी है जिसने अपने बूते पर खुद को राजनीतिक कद उत्तराखण्ड की राजनीति में स्थापित किया हो। एक चेहरे के नाम पर वोट पाने और जीत जाने की परम्परा ने नेताओं में खुद की जमीन तैयार करने की अनिच्छा पैदा हो चली है।

उत्तराखण्ड की पांचों लोकसभा सीटों में भाजपा की बात करें तो नैनीताल, अल्मोड़ा, टिहरी में पुराने चेहरे, हरिद्वार और पौड़ी में नए चेहरों के साथ चुनावी रण में उतरी स्टार प्रचारकों की फौज और मजबूत संगठन के साथ लोकसभा चुनाव में भाजपा भले ही आक्रामक तरीके से उतरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘चार सौ पार’ का नारा लगातार दोहराया गया हो, मतदाताओं की नाराजगी से पार्टी नेतृत्व भयभीत स्पष्ट नजर आया। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सहित करीब 23 नेताओं की रैलियां कराई और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हर लोकसभा सीट का कोना-कोना छान मारा, उससे साफ झलकता है कि पार्टी का मनोबल कमजोर है। खास बात ये है कि उत्तराखण्ड भाजपा और उसके प्रत्याशी मोदी-धामी के नाम पर वोट मांगते नजर आए। भाजपा में भले ही नेताओं के अंतर्विरोध होंगे लेकिन इस सच्चाई को स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि उत्तराखण्ड में पूरी भाजपा इस वक्त मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पीछे लामबंद है। लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री धामी भले ही सहज नजर आ रहे हों लेकिन लोकसभा चुनाव के परिणामों से उनकी चुनौतियां बढ़ती हैं या फिर उनका राजनीतिक कद बढ़ता है यह देखना बाकि होगा। इस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सक्रियता ने सांसदों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ को एक हद तक नियंत्रित जरूर किया। प्रदेश में लोकसभा चुनाव के परिणाम भाजपा के आंतरिक समीकरणों को प्रभावित करेगा। पौड़ी से प्रत्याशी अनिल बलूनी और हरिद्वार से प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत की हार-जीत भी भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण साबित होंगे, क्योंकि ये दोनों ही नेता भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की पसंद माने जाते हैं। पौड़ी और हरिद्वार दोंनों ही सीटों पर ये नेता कड़े संघर्ष में फंसे हैं। अगर उत्तराखण्ड की पांचों सीटों पर भाजपा का परचम लहराता है तो मुख्यमंत्री का कद बढ़ेगा और भाजपा के अंदर उनके खिलाफ दबे स्वर भी शांत ही रहेंगे लेकिन अगर किन्हीं सीटों पर भाजपा को झटका लगता है तो पुष्कर सिंह धामी के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हंै। राजनीति में निष्ठाओं के बदलने में देर नहीं लगती। भले ही आज उत्तराखण्ड की राजनीति में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मजबूत नजर आते हों लेकिन नेताओं का एक बड़ा वर्ग है जिनकी राजनीति का दायरा मुख्यमंत्री धामी की सक्रियता चलते सीमित हो गया है। लोकसभा का ये चुनाव अजय भट्ट, अजय टम्टा, टिहरी की वर्तमान सांसद का भी राजनीतिक भविष्य तय करेगा। त्रिवेंद्र सिंह रावत और अनिल बलूनी के लिए तो ये चुनाव चुनौती ही है।

कांग्रेस की बात करें तो यहां चुनौतियों और जवाबदेहियों की गुंजाइश ज्यादा है। उत्तराखण्ड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के राजनीतिक कौशल का भी इम्तिहान इस चुनाव ने लिया है। उत्तराखण्ड कांगे्रस की राजनीति कभी जिनके ईर्द-गिर्द घूमा करती थी उनके राजनीतिक भविष्य का भी फैसला ये लोकसभा चुनाव करेगा। ऐन चुनाव के वक्त कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जिस तरह कांग्रेस छोड़ी उसने संगठन में पकड़ और बड़े नेताओं से संवादहीनता ने करन माहरा पर सवाल खड़े किए हैं। जिस प्रकार बड़े नेताओं ने ऐन वक्त पर कांग्रेस छोड़ी उससे आने वाले समय में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी होंगी। दिनेश अग्रवाल सरीखे नेताओं का कांग्रेस छोड़कर जाना पार्टी के अंदर संवादहीनता की स्थिति की ओर इशारा करता है। 2022 तक मोदी की नीतियों के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाले नेताओं का 2024 में मोदी के प्रति मोह जागना कई सवालों को जन्म देता है। विजय सजवाण सहित कई नेताओं के भाजपा में शामिल होने पर आरोप लगे थे कि करन माहरा को जो सफल होते नहीं देखना चाहते वो अपने लोगों को भाजपा में शामिल करवा रहे हैं लेकिन दिनेश अग्रवाल, एसपी सिंह, दान सिंह भंडारी, महेश शर्मा सरीखे नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना उत्तराखण्ड कांग्रेस नेतृत्व की संगठन पर कमजोर पकड़ को दर्शाता है। उत्तराखण्ड कांग्रेस की असली परीक्षा चुनाव परिणाम आने के बाद होगी।

एक-दो सीट पर कांग्रेस जीतती है तो परिदृश्य अलग होगा लेकिन अगर पांचों सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो कांग्रेस के अंदर एक बड़ी भगदड़ देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भले ही कई नेता कांग्रेस छोड़ गए हों लेकिन इस बार कांग्रेस एक होकर चुनाव लड़ती नजर आई। खासकर नैनीताल- ऊधमसिंह नगर सीट पर जिस प्रकार कांग्रेस ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा ऐसा कई सालों बाद देखने को मिला। नेता प्रतिपक्ष पांचों सीटों पर नजर आए लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने पुत्र वीरेंद्र रावत को चुनाव लड़वाने के चलते हरिद्वार संसदीय क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाए। हरीश रावत के लिए ये लोकसभा चुनाव उनकी राजनीतिक हैसियत और विरासत को तय करने वाला बन गया है। वीरेंद्र रावत की हार-जीत उनके राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। उत्तराखण्ड कांग्रेस के मुखिया करन माहरा के लिए इस चुनाव ने कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों जगह चुनौतियां पेश की हैं। अगर इस चुनाव में कांगे्रस अच्छा नहीं कर पाती है तो पार्टी के अंदर से ही उनके लिए चुनौतियां उठना लाजमी है। उनके नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे।

लोकसभा चुनाव का परिणाम 4 जून को आएगा। मतदान से चुनाव परिणाम आने तक का समय बहुत लंबा है। उत्तराखण्ड में राजनीतिक दलों में आत्ममंथन, विश्लेषण के दौर चलते रहेंगे। लोकसभा चुनाव का परिणाम राजनीतिक दलों व नेताओं का भविष्य तय जरूर करेगा लेकिन इस उत्साहविहीन चुनाव में जनता अपना मत किसके पक्ष में करती है ये मतगणना के दिन ही पता चलेगा।

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