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  • गुंजन कुमार

 

वर्ष 2017 में उत्तराखण्ड की जनता पूरी तरह मोदी मैजिक के असर में डूबी थी। नतीजा राज्य विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। 70 विधानसभा सीटों वाले इस प्रदेश में भाजपा को 57 सीटें देकर जनता ने ‘डबल इंजन की सरकार’ के जुमले पर अपनी आस्था जताई। यह आस्था 2022 आते-आते दरकने लगी है। जनता को न तो ‘विकास’ के दर्शन हुए, न ही पलायन रुका। बेरोजगारी बढ़ी तो साथ में महंगाई भी। ‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के नतीजों में भाजपा से जनता की नाराजगी साफ झलक रही है। इस सर्वेक्षण में कांग्रेस अगली सरकार बनाती नजर आ रही है लेकिन सीटों का खास अंतर नहीं है। उक्रांद का प्रभाव थोड़ा बढ़ा जरूर है हालांकि उसके खाते में मात्र एक सीट आ रही है। ‘आप’ इन चुनाव में वोट कटुआ की भूमिका में दिखती है, अन्य क्षेत्रीय दल जनता के फोकस में हैं ही नहीं। कुल मिलाकर एक बार फिर से उत्तराखण्ड की जनता हर पांच साल में सरकार बदलने की प्रथा को इस बार भी चरितार्थ करती दिखाई दे रही है

प्रदेश में डबल इंजन वाली सरकार है। डबल इंजन यानी ज्यादा पावर (शक्ति)। ज्यादा पावर मतलब तेज गति और कम समय में गंतव्य तक पहुंचने की गारंटी। लोकशाही में नेतागण ऐसी गारंटी खूब देते हैं। जैसे 2014 में अच्छे दिन की मिली थी। सात साल से लोग उसे ढूंढ़ रहे हैं। पर मिला अभी तक किसी को नहीं है। अब समर्थक बोल रहे हैं, वह तो इतिहास के पन्नों में मिलेगा। उसमें ढूंढ़ो, जरूर मिल जाएगा। खैर, उसी अच्छे दिन की गारंटी देने वालों ने 2017 में डबल इंजन की सरकार की संकल्पना उत्तराखण्ड में गढ़ी थी। एक सपना दिखाया था, जिसमें डबल इंजन की सरकार बनते ही प्रदेश में विकास की गंगा बहने लगेगी। देवभूमि में रामराज स्थापित हो जाएगा। उत्तराखण्डवासियों को सपना अच्छा लगा। उन्होंने दो-तिहाई बहुमत की सरकार बना दी। फिर हर कोई मंत्र जपने लगा कि ‘अब विकास पहाड़ चढ़ेगा, पलायन रूकेगा, हर हाथ को रोजगार मिलेगा।’


पांच साल होने वाले हैं। गारंटी और वादों की एक बार फिर से बाढ़ आनी तय है। पर न विकास पहाड़ चढ़ पाया, न पलायन रुका और न ही युवाओं को रोजगार मिला। इन पांच सालों में उत्तराखण्ड के लोगों को एक चीज जरूर मिला। वह है, नए-नए मुख्यमंत्री। दो- तिहाई सीटों के साथ सरकार बनने पर हर कोई उम्मीद कर रहा था कि इस दफा तो प्रदेश का श्राप (एनडी तिवारी को छोड़, किसी मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा न होना) भागीरथी-
अलकनंदा के संगम में बह जाएगा। हुआ इसके ठीक उलट। इस बार प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने के नए रिकॉर्ड बनाए गए। विधानसभा के इस कार्यकाल में मोदी-शाह वाली भाजपा ने तीन नए मुख्यमंत्री दिए। इसका सीधा-सा अर्थ है कि कागजों पर मजबूत दिखने वाली उत्तराखण्ड भाजपा में नेतृत्व क्षमता का घोर अभाव है। अब प्रयोग का समय खत्म हो गया है। फाइनल परीक्षा की घड़ी आ गई है। परीक्षा वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी से ज्यादा मोदी-शाह वाली भाजपा की है। प्रदेश सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है। इसलिए जनता का मूड भांपने का समय भी आ गया है। मुख्यमंत्री बदलने का भाजपा को कितना लाभ होगा और कितना नुकसान, आगामी चुनाव के बारे में मतदाता क्या सोच रहा है, इन सब पर जनता के बीच जाकर ‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ ने प्रदेश का मिजाज जानने की कोशिश की। यह सर्वेक्षण 5 सितंबर 2021 से 30 सिंतबर 2021 तक की अवधि में प्रदेश की 68 सीटों पर कराया गया। दो विधानसभा सीटों लोहाघाट और कपकोट में समय सीमा के भीतर यह सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका इसलिए इन दो सीटों को इस सर्वे में नहीं लिया जा सका है।
‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ के इस ताजा सर्वे में आगामी चुनाव को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, उससे लगता है कि प्रदेश की दोनों मुख्य पार्टियों के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। अभी तक के मुताबिक भाजपा-कांग्रेस के बीच टक्कर कांटे की है। जनता के इस मिजाज को जानने से पहले बात भाजपा के नए प्रयोग की करते हैं। देहरादून में बैठे राजनीतिक विश्लेषकों को पता हो या न हो, दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सरगोशियां करने वाले बखूबी जानते हैं कि मोदी और शाह प्रयोग में ही विश्वास करते हैं। उनका प्रयोग गुजरात से शुरू हुआ और 2014 के बाद से दो के अलग-अलग राज्यों में भी किया जाने लगा। गुजरात से बाहर पहला प्रयोग 2017 के दिल्ली नगर निगम चुनाव में हुआ। तब के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्तमान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सभी पार्षदों का टिकट काट दिया। जबकि तब भाजपा दिल्ली के तीनों निगमों की सत्ता पर काबिज थी। हालिया प्रयोग गुजरात के सभी मंत्रियों का इस्तीफा है। उत्तराखण्ड में वे मुख्यमंत्री बदल-बदलकर प्रयोग कर रहे हैं। उनके इस प्रयोग पर उत्तराखण्ड की जनता क्या सोचती है? इसे देखें तो उनकी राय फिफ्टी-फिफ्टी जैसा है। 45 फीसदी जनता मानती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो बार मुख्यमंत्री बदलने का लाभ नहीं मिलेगा। यानी सरकार और मुख्यमंत्रियों की नाराजगी खत्म करने का मोदी-शाह का दांव नहीं चलने वाला। वहीं 30 फीसदी जनता ऐसी है, जो मानती है कि इसका लाभ पार्टी को विधानसभा चुनाव में अवश्य मिलेगा। 14 फीसदी लोग कंफर्म नहीं हैं लेकिन उन्हें लगता है कि शायद पार्टी को मुख्यमंत्री बदलने का लाभ आगामी चुनाव में मिल जाए। इस तरह कंफर्म और शायद वालों की संख्या मिला दें तो 44 फीसदी जनता मानती है कि मोदी-शाह का प्रयोग शायद यहां भी चल जाए। हालांकि 11 फीसदी ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने इस पर अपनी कोई राय नहीं दी है। भाजपा को नफा होगा या नुकसान इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।

उत्तराखण्ड की 45 फीसदी जनता मानती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो बार मुख्यमंत्री बदलने का लाभ नहीं मिलेगा। यानी सरकार और मुख्यमंत्रियों की नाराजगी खत्म करने का मोदी-शाह का दांव नहीं चलने वाला। वहीं 30 फीसदी जनता ऐसी है, जो मानती है कि इसका लाभ पार्टी को विधानसभा चुनाव में अवश्य मिलेगा। 14 फीसदी लोग कंफर्म नहीं हैं लेकिन उन्हें लगता है कि शायद पार्टी को मुख्यमंत्री बदलने का लाभ आगामी चुनाव में मिल जाए। इस तरह कंफर्म और शायद वालों की संख्या मिला दें तो 44 फीसदी जनता मानती है कि मोदी-शाह का प्रयोग शायद यहां भी चल जाए। हालांकि 11 फीसदी ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने इस पर अपनी कोई राय नहीं दी है। भाजपा को नफा होगा या नुकसान इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।

भाजपा के मोदी युग में पार्टी प्रवक्ता जोर देकर कहते फिरते हैं कि एक मात्र उनकी पार्टी में ही लोकतांत्रिक प्रणाली है। पार्टी के अंदर सामूहिक निर्णय लिया जाता है लेकिन कथनी और करनी में फर्क सभी को साफ दिखता है। निर्णय प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के स्तर पर ही लिया जाता है। निर्णय के बाद सिर्फ फैसला सुनाया जाता है। इसीलिए कथित रूप से पार्टी स्तर पर लिए गए निर्णय की किसी को भनक तक नहीं लगती है। उत्तराखण्ड में भी मुख्यमंत्री बदलने और नए मुख्यमंत्री आने की भनक किसी को नहीं लगी। त्रिवेंद्र सिंह रावत को लेकर विधायकों और मंत्रियों में गुस्सा जरूर था। इन लोगों ने कई बार अपनी बात दिल्ली दरबार में पहुंचाई भी थी। लेकिन कभी, किसी को स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला था। अचानक त्रिवेंद्र सिंह रावत की दिल्ली में पेशी होती है और उन्हें इस्तीफा देने को कहा जाता है। इसीलिए मीडिया के सवाल पर तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खीझकर कहते हैं, ‘इस्तीफा क्यों दिया? इसका जवाब आपको दिल्ली में मिलेगा।’ उसके बाद छह महीने से भी कम समय में तीरथ सिंह रावत को हटाकर दो बार के विधायक रहे पुष्कर धामी पर मोदी-शाह ने भरोसा जताया। इस सर्वे के अनुसार धामी अभी तक उनके भरोसे पर कायम दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को लेकर जनता का भरोसा धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। आगामी चुनाव में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के रूप में पुष्कर धामी जनता की पहली पसंद हैं। पार्टी के सभी दिग्गज नेता उनसे बहुत पीछे हैं।

कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हरीश रावत पार्टी के अन्य दावेदारों से बहुत आगे हैं। 55 फीसदी लोग 2022 में कांग्रेस की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री का फेस मानते हैं। यानी आधे से अधिक जनता। कांग्रेस की ओर से तीन नामों के विकल्प इस सर्वेक्षण में दिए गए थे जिसमें हरीश रावत के अलावा नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और नए नवेले प्रदेश अध्यक्ष बने गणेश गोदियाल थे। चौथा विकल्प था अन्य का। मुख्यमंत्री फेस के रूप में हरीश रावत के सामने कोई कांग्रेसी नेता नहीं टिक पाए। 12 फीसदी जनता ने प्रीतम सिंह को मुख्यमंत्री का चेहरा माना है। गणेश गोदियाल को मात्र 8 फीसदी जनता ने पसंद किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की अपने दलों में स्थिति एक सी है। हरीश रावत की लोकप्रियता लंबे समय से प्रदेश में है। वे मुख्यमंत्री रहें या न रहें, चुनाव जीतें या हारें, उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई है। वे सदाबहार हीरो की तरह प्रदेश के सदाबहार नेता हैं। लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की लोकप्रियता काफी तेजी से बढ़ी है। वे अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को टक्कर देने की स्थिति में आ गए हैं। दोनों ही नेता सिर्फ लोकप्रिय ही नहीं हैं, बल्कि जनता की नजरों में ये अपनी-अपनी पार्टी में बाकी सभी मुख्यमंत्री के दावेदारों से काफी आगे हैं। पहले भाजपा के दावेदारों की बात करते हैं। कांग्रेस की तुलना में अभी भाजपा में मुख्यमंत्री के ज्यादा दावेदार हैं। इसके दो बड़े कारण माने जाते हैं। एक तो पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस के 11 बड़े नेता पार्टी को छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। उनमें कुछ मुख्यमंत्री के दावेदार भी थे। दूसरा,
भाजपा दो-तिहाई विधायक के साथ सत्ता में है, राज्य की सभी पांचों लोकसभा सीट पार्टी के पास है। इसके अलावा राज्यसभा सांसद भी इनके हैं। इस कारण भी इनके पास मुख्यमंत्री के कई दावेदार हैं। उन सभी में से सर्वेक्षण में हमने भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के सात विकल्प दिए थे। वे थे- पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी, राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’,
कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत, केंद्रीय राज्यमंत्री एवं लोकसभा सांसद अजय भट्ट और पूर्व कांग्रेसी नेता एवं कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज। इनके अलावा आठवां विकल्प अन्य या इनमें से कोई नहीं का भी था।

सर्वे के नतीजे आश्चर्यचकित करने वाले आए हैं। आश्चर्यचकित इसलिए करते हैं, क्योंकि पार्टी में मुख्यमंत्री के दावेदारों की सूची तो बहुत लंबी है लेकिन उनकी लोकप्रियता जनता के बीच बहुत कम है। सर्वे के नतीजे तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को सबसे ज्यादा लोगों ने 2022 के लिए भाजपा का सीएम फेस माना है। उन्हें 41 फीसदी मत मिले हैं। पुष्कर धामी के बाद राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को लोग मुख्यमंत्री का फेस 2022 के लिए मानते हैं। लेकिन लोकप्रियता के पैमाने पर धामी के मुकाबले बलूनी समेत सभी नेता खासे पीछे हैं। बलूनी को 10 फीसदी मत मिले हैं। इनके बाद सतपाल महाराज को 9 फीसदी, डॉ ़ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को 6 फीसदी, अजय भट्ट को 5 फीसदी, त्रिवेंद्र सिंह रावत को 4 फीसदी तो धन सिंह रावत को मात्र तीन फीसदी लोग ही मुख्यमंत्री का फेस मानते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को छोड़ अन्य नेताओं से कहीं ज्यादा वोट ‘अन्य’ या ‘इनमें से कोई नहीं’ को मिला है। 22 फीसदी लोग दिए गए सात विकल्पों में किसी को मुख्यमंत्री का फेस नहीं मानते हैं।

आम आदमी पार्टी को प्रदेश में तीसरी शक्ति बनने के लिए अभी काफी मेहनत करने की जरूरत है। भाजपा-कांग्रेस की तमाम खामियों के बावजूद प्रदेश में तीसरी शक्ति का उभार नहीं दिख रहा है। अभी आम आदमी पार्टी को लेकर जनता में ज्यादा उत्साह नहीं है। मैदानी इलाकों में कुछ स्थानों पर थोड़े-बहुत लोग ‘आप’ को विकल्प के तौर पर मानते हैं लेकिन पहाड़ की जनता ने इसे साफ नकार दिया है। 57 फीसदी इस सर्वेक्षण में भाजपा-कांग्रेस के विकल्प के तौर पर अस्वीकारा है। वहीं 23 फीसदी लोग इसे विकल्प के रूप में स्वीकार भी रहे हैं। कांग्रेस के लिए यही चिंता का विषय है। 20 फीसदी ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें अभी नहीं पता कि आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस का विकल्प होनी चाहिए या नहीं। यानी अरविंद केजरीवाल के मुफ्त बिजली- पानी जैसे वादों पर उत्तराखण्डवासियों का भरोसा जमा नहीं है। उन्हें भरोसा जमाने के लिए अभी कुछ और करना होगा। इस सर्वेक्षण में केजरीवाल के लिए भी एक चिंता के संकेत मिले हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, उनकी पार्टी का ग्राफ नीचे गिर रहा है। छह महीने पहले के सर्वेक्षण की तुलना में इस बार 23 फीसदी जनता उनकी पार्टी को विकल्प के तौर पर मान रही है। मार्च 2021 के सर्वेक्षण में करीब 30 फीसदी लोग आम आदमी पार्टी को भाजपा-कांग्रेस का विकल्प मान रहे थे।

यही स्थिति कांग्रेस में भी है। कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री एवं चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हरीश रावत पार्टी के अन्य दावेदारों से बहुत आगे हैं। 55 फीसदी लोग 2022 में कांग्रेस की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री का फेस मानते हैं। यानी आधे से अधिक जनता। कांग्रेस की ओर से तीन नामों के विकल्प इस सर्वेक्षण में दिए गए थे जिसमें हरीश रावत के अलावा प्रतिपक्ष के नेता प्रीतम सिंह और नए नवेले प्रदेश अध्यक्ष बने गणेश गोदियाल थे। चौथा विकल्प था अन्य का। मुख्यमंत्री फेस के रूप में हरीश रावत के सामने कोई कांग्रेसी नहीं टिक पाया। 12 फीसदी लोगों ने प्रीतम सिंह को मुख्यमंत्री का फेस माना है। गणेश गोदियाल को मात्र 8 फीसदी लोग ही मुख्यमंत्री का फेस मानते हैं। भाजपा की तरह ही कांग्रेस में भी दिए विकल्प (अपवाद हरीश रावत) को छोड़ लोग अन्य कांग्रेसी को मुख्यमंत्री का फेस नहीं के बराबर मानते हैं। अन्य में कोई भी हो सकते हैं। मसलन, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल हो सकते हैं, दलित नेता प्रदीप टम्टा, करण माहरा या फिर किशोर उपाध्याय हो सकते हैं। वैसे जनता मुख्यमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव नहीं करती है, लेकिन उसके मन-मस्तिष्क में किसी न किसी नेता का चेहरा रहता है, जिसे वे मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। हरीश रावत निश्चित तौर पर ऐसे नेता के रूप में इस सर्वे में उभरे हैं।

अब बात सर्वे के महत्वपूर्ण सवाल पर। जिसे जानने की जिज्ञासा हर राजनीतिक प्राणी में रहती है। विधानसभा या लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही यह सवाल कॉमन होता है। वह सवाल है-क्या चुनाव में सत्ता परिवर्तन होगा? हमने भी जनता से सवाल पूछा कि क्या 2022 में राज्य में सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं? इसका जवाब भाजपा के लिए निराशा लिए है। निराशा के बीच एक अत्यंत मद्धिम सी आशा की भी किरण दिखाई पड़ती है। इसके जवाब में 51 फीसदी लोगों ने कहा है कि वे आगामी चुनाव में सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं। यानी अभी आधे से अधिक लोग राज्य में सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं। वहीं सत्ताधारी भाजपा के लिए इस रूप में आशा की एक किरण दिखाई पड़ रही है कि 40 फीसदी लोग अगले चुनाव में सत्ता परिवर्तन नहीं चाह रहे हैं। इसके अलावा 9 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जिसने अभी तक इस पर कोई राय नहीं बनाई है। यहीं पर भाजपा और उसके मुख्यमंत्री को सत्ता में बने रहने के लिए एक मद्धिम रोशनी दिख रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को बचे हुए कार्यकाल में अपने फैसले से कुछ चमत्कार करना होगा। ताकि अभी तक राय नहीं बनाने वाले 9 फीसदी लोगों को अपने पक्ष में कर सकें। ऐसे यह बहुत चुनौती भरा कार्य है, लेकिन असंभव भी नहीं है। चुनाव से करीब छह महीने पहले उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी ने एक चुनौतीपूर्ण कार्य ही सौंपा है। इसके अलावा भाजपा का आक्रामक चुनाव प्रचार भी इस पर कुछ असर डाल सकता है। ऐसे में कांग्रेस के लिए भी सब कुछ सुखदायी नहीं है। कांग्रेस को अपनी गुटबाजी से बाहर निकलना होगा। एकजुट होना होगा। अनुशासित होना पड़ेगा। तभी वे सत्ता परिवर्तन चाह रहे 51 फीसदी लोगों के आंकडे़ को चुनाव आते-आते बढ़ा सकेंगे।

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की अपने-अपने दलों में स्थिति एक सी है। हरीश रावत की लोकप्रियता लंबे समय से प्रदेश में है। वे मुख्यमंत्री रहें या न रहें, चुनाव जीतें या हारें, उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई है। वे हमेशा से प्रदेश के सदाबहार नेता रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की लोकप्रियता काफी तेजी से बढ़ी है। वे अब हरीश रावत को टक्कर देने की स्थिति में आ गए हैं। दोनों ही नेता सिर्फ लोकप्रिय ही नहीं हैं बल्कि जनता की नजरों में ये अपनी-अपनी पार्टी में बाकी सभी मुख्यमंत्री के दावेदारों से काफी आगे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को सबसे ज्यादा लोगों ने 2022 के लिए भाजपा का सीएम फेस माना है। उन्हें 41 फीसदी मत मिले हैं। पुष्कर धामी के बाद राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को लोग मुख्यमंत्री का चेहरा 2022 के लिए मानते हैं। लोकप्रियता के पैमाने पर धामी के मुकाबले बलूनी समेत सभी नेता खासे पीछे हैं। बलूनी को 10 फीसदी मत मिले हैं। इनके बाद सतपाल महाराज को 9 फीसदी, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को 6 फीसदी, अजय भट्ट को 5 फीसदी, त्रिवेंद्र सिंह रावत को 4 फीसदी तो धन सिंह रावत को मात्र तीन फीसदी लोग ही मुख्यमंत्री का चेहरा मानते हैं

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने कोई कमाल नहीं किया। प्रदेश कांग्रेस के नेता इस दौरान सरकार की कमियों को उजागर करने से ज्यादा पार्टी में वर्चस्व के लिए शीतयुद्ध लड़ते रहे। एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए तीसरे से दिल मिले या न मिले वे आपस में हाथ जरूर मिला रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के अधिकतर बड़े नेता अपने सबसे लोकप्रिय नेता हरीश रावत को नीचे करने के लिए वक्ती तौर पर एक-दूजे के होते पिछले पौने पांच बरस में सबने देखे हैं। प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला होता है। ऐसे में सरकार से नाराज लोग स्वतः ही मुख्य विपक्षी दल (अभी कांग्रेस) के खेमे में चले आते हैं। इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त मेहनत अभी तक करने की जरूरत नहीं पड़ी है। पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत फिर तीरथ सिंह रावत खुद अपनी कार्य-प्रणाली और बयानों से कांग्रेस का राह आसान बना चुके हैं। जिसे पाटने में अब वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी जुटे हैं। वे कितना कामयाब होते हैं, वह चुनाव के नतीजे से पता चलेगा।

लेकिन यह कतई नहीं है कि भाजपा या सरकार से नाराज लोग सीधे कांग्रेस के गोद में आकर बैठ जाएंगे। इसके लिए कांग्रेस को भी मेहनत करनी पड़ेगी। लड़ाई लड़नी पड़ेगी। आपस में नहीं बल्कि भाजपा से। वह भी अटल-आडवाणी के भाजपा से नहीं। बल्कि मोदी-शाह की भाजपा से। जो चुनाव आते ही अपने हर हथियार को खोल देती है। हर वह रणनीति अपनाती है, जिससे विपक्ष बिना लड़े ही धराशाही हो जाए। मोदी-शाह की भाजपा से लड़ने के लिए उसी की तरह सोचना होगा। उन्हीं के अंदाज में जवाब देने होंगे। जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने और बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने दिए। प्रदेश कांग्रेस के जो नेता यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा से नाराज लोग कांग्रेस के पास आएंगे तो तय मानिये वे मुगालते में हैं। क्योंकि हमारा सर्वेक्षण साफ संकेत दे रहा है कि सरकार के प्रति नाराजगी के बावजूद कांग्रेस के लिए सत्ता की कुर्सी पाना आसान नहीं है। जब हम जनता से पूछते हैं कि क्या वे 2022 में सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं तो 51 फीसदी लोग ‘हां’ में जवाब दे रहे हैं। वहीं जब उनसे अगला सवाल यह पूछते हैं कि क्या 2022 में कांग्रेस राज्य में सरकार बना सकती है तो यहां ‘हां’ में जवाब देने वालों की संख्या घट जाती है। 51 फीसदी की तुलना में केवल 43 फीसदी लोग मानते हैं कि 2022 में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। यहां करीब 8 फीसदी का अंतर है। चुनाव में आठ फीसदी कम नहीं होता है। कांग्रेस के लिए चिंता की बात सिर्फ यही नहीं है। 43 फीसदी की तुलना में 41 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं कि 2022 में कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकती। ‘बन सकती’ और ‘नहीं बन सकती’ में मात्र 2 फीसदी का अंतर है। 16 फीसदी ऐसे लोग भी हैं जिन्हें अभी नहीं पता कि 2022 में कांग्रेस की सरकार बना सकती है या नहीं। कांग्रेस के नेताओं को आपसी लड़ाई छोड़कर इस पर काम करने की जरूरत है, तभी वह सत्ता में पहुंचने का सपना साकार कर सकती है।

यहां अब सवाल यह उठता है कि सरकार के एंटी इनकंबेंसी का वोट कांग्रेस को नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा? इसका सीधा सा जवाब है, आम आदमी पार्टी। कांग्रेसी नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ सीधे आम आदमी पार्टी उठा रही हैं। ठीक पंजाब की तर्ज पर। पंजाब में जिस तरह कांग्रेसी आपस में लड़कर बिखर रहे हैं, उसका लाभ आम आदमी पार्टी को मिल रहा है। उत्तराखण्ड में भी यही होता नजर आ रहा है। कांग्रेस के कई नेता हरीश रावत को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने के 2027 तक का इंतजार करने को तैयार हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि यदि जनता ने भाजपा-कांग्रेस का विकल्प आम आदमी पार्टी में ढूंढ़ लिया तो उनका हाल दिल्ली जैसा हो जाएगा। तब वे दिल्ली की तरह एक सीट जीतने के लिए जी-तोड़ मेहनत करने को मजबूर हो जाएंगे। आम आदमी पार्टी प्रदेश में अपना पैर जमाने के लिए कई लोक-लुभावन वादे कर रही है। जिसमें 300 यूनिट बिजली मुफ्त और बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देना शामिल है।

हालांकि कांग्रेस के लिए संतोष की बात यही है कि आम आदमी पार्टी (आप) को प्रदेश में तीसरी शक्ति बनने के लिए अभी काफी मेहनत करने की जरूरत है। क्योंकि भाजपा-कांग्रेस की तमाम खामियों के बावजूद अभी प्रदेश में तीसरी शक्ति का उभार नहीं दिख रहा है। आम आदमी पार्टी को लेकर जनता में ज्यादा उत्साह नहीं है। मैदानी इलाकों में कुछ स्थानों पर थोड़े-बहुत लोग आम आदमी पार्टी को विकल्प के तौर पर मानते हैं लेकिन पहाड़ की जनता ने इसे साफ नाकार दिया है। 57 फीसदी लोगों ने इस सर्वेक्षण में आम आदमी पार्टी को भाजपा- कांग्रेस के विकल्प के तौर पर अस्वीकार कर दिया है। वहीं 23 फीसदी लोग इसे विकल्प के रूप में स्वीकार भी रहे हैं। कांग्रेस के लिए यही चिंता का विषय है। 20 फीसदी ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें अभी नहीं पता कि आम आदमी पार्टी, भाजपा-कांग्रेस का विकल्प होनी चाहिए या नहीं। यानी अरविंद केजरीवाल के मुफ्त बिजली-पानी जैसे वादों पर उत्तराखण्डवासियों का अभी भरोसा जमा नहीं है। उन्हें भरोसा जमाने के लिए अभी कुछ और करना होगा। इस सर्वेक्षण में केजरीवाल के लिए भी एक चिंता के संकेत मिले हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, उनकी पार्टी का ग्राफ गिर रहा है। छह महीने पहले के सर्वेक्षण की तुलना में इस बार कम लोग उनकी पार्टी को विकल्प मान रहे हैं। मार्च 2021 के सर्वेक्षण में करीब 30 फीसदी लोग आम आदमी पार्टी को भाजपा-कांग्रेस का विकल्प मान रहे थे। जैसे ही चुनाव नजदीक आया यह आंकड़ा 30 से गिरकर 23 फीसदी पर पहुंच गया है। टीम केजरीवाल को  सोचना होगा कि सिर्फ लोक- लुभावन वादों से उत्तराखण्ड में पैर जमाना है या फिर उसके लिए लोगों का विश्वास जीतने के लिए प्रदेश में कोई बड़ा आंदोलन करना होगा। यूं भी उत्तराखण्ड आंदोलनों का प्रदेश है। पिछले पांच साल तक न उन्होंने और न ही उनकी पार्टी ने कोई आंदोलन किया है। ऐसे में जनता उन पर क्यों भरोसा करे?

आप को 23 फीसदी लोग विकल्प तो मानते हैं लेकिन जब बात वोट करने की होती है तो फिर मतदाता पीछे हट जा रहे हैं। इसलिए अब बात पार्टी को मिलने वाले वोट की करते हैं। यह इस सर्वेक्षण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। आम आदमी पार्टी को सिर्फ आठ फीसदी लोग वोट करने की बात करते हैं। सर्वेक्षण में सवाल एकदम साफ था कि आगामी विधानसभा चुनाव में किस पार्टी के नेता को आप विधायक चुनेंगे। कुछ लोगों ने इसके जवाब में दिए गए विकल्प पर निशान न लगा कर लिखा कि वे प्रत्याशी देख कर वोट करेंगे। वहीं अधिकतर ने दिए गए विकल्प से ही जवाब दिया। इसी में आप को आठ फीसदी लोग वोट करने की बात कर रहे हैं। इस आठ फीसदी से पार्टी को एक भी सीट मिलती नहीं दिख रहा है। पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार कर्नल कोठियाल भी अपनी सीट (गंगोत्री) नहीं जीत पा रहे हैं। राज्य आंदोलन से खड़ी हुई पार्टी उक्रांद को मात्र चार फीसदी वोट मिलने की संभावना है। उक्रांद को एक सीट देवप्रयाग मिलने की संभावना है। देवप्रयाग के अधिकांश लोगों ने उक्रांद को वोट देने की बात कही है।

‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ ने राज्य की 70 में से 68 सीटों पर सर्वेक्षण करवाया है। सर्वेक्षण के नतीजे यही बतलाते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में इस बार जबरदस्त टक्कर होने की संभावना है। कांग्रेस में बड़े कद वाले नेताओं की कमी दिख रही है। वहीं भाजपा के पास कई बड़े चेहरे मौजूद हैं। इसका असर चुनाव में पड़ता है लेकिन हमारा सर्वेक्षण इस ओर इशारा करता है कि नेताओं की कमी के बावजूद कांग्रेस भाजपा के सामने बड़ी चुनौती पेश करने वाली है। सर्वेक्षण के मुताबिक कांग्रेस को तकरीबन 41 फीसदी वोटों के साथ 36 सीट मिल सकती है। वहीं भाजपा को 39 फीसदी वोट मिल सकता है। उनकी सीटों की संख्या 27 रहने की संभावना है। तीन सीट ऐसी हैं, जिस पर भाजपा और कांग्रेस के समान वोट मिला है। इसलिए इन तीन सीटों पर कोई भी बाजी मार सकता है। अन्य को भी आठ फीसदी वोट मिला है। लेकिन वह सीट में तब्दील होता नहीं दिख रहा है। इस तरह से संभावना पूरी है कि यदि अभी चुनाव हुए तो कांटे की टक्कर के बावजूद कांग्रेस पूर्ण बहुमत से सरकार बना सकती है।

अभी चुनाव में करीब चार से पांच महीने का समय है। दोनों ओर की सेनाएं अभी सजी नहीं है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा और प्रचार जोर पकड़ेगा, वैसे-वैसे तस्वीर और साफ होगी। कांग्रेस-भाजपा के बीच दो फीसदी का फासला बढ़ भी सकता है और यह कम होकर भाजपा बढ़त भी ले सकती है। हालांकि हमारे सर्वेक्षण के बाद उत्तराखण्ड की राजनीति में एक बड़ी घटना घटी है। वह यह कि तराई के बड़े दलित नेता एवं मंत्री यशपाल आर्य अपने विधायक पुत्र संजीव आर्य के साथ भाजपा छोड़ फिर से कांग्रेस में आ गए हैं। इस तरह के कई घटनाक्रम अभी घट सकते हैं। इस तरह का फेरबदल भी चुनाव को प्रभावित करता है। इसलिए नतीजों को लेकर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन हम संभावना तो जता ही सकते हैं।

प्रदेश कांग्रेस के जो नेता यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा से नाराज लोग कांग्रेस के पास आएंगे तो तय मानिये वे मुगालते में हैं क्योंकि हमारा सर्वेक्षण साफ संकेत दे रहा है कि सरकार के प्रति नाराजगी के बावजूद कांग्रेस के लिए सत्ता की कुर्सी पाना आसान नहीं है। जब हमने जनता से पूछा कि क्या वे 2022 में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं तो 51 फीसदी लोगों ने ‘हां’ में जवाब दिया, वहीं उनसे अगला सवाल यह पूछा गया कि कांग्रेस राज्य में सरकार बना सकती है तो ‘हां’ में जवाब देने वालों की संख्या घट जाती है। 51 फीसदी की तुलना में केवल 43 फीसदी जनता ने माना है कि 2022 में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। यहां 8 फीसदी का अंतर है। चुनाव में आठ फीसदी कम नहीं होता है। कांग्रेस के लिए चिंता की बात सिर्फ यही नहीं है। 43 फीसदी की तुलना में 41 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं कि 2022 में कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकती। ‘बन सकती’ और ‘नहीं बन सकती’ में महज 2 फीसदी का अंतर है। 16 फीसदी ऐसे लोग भी हैं जिन्हें अभी नहीं पता कि 2022 में कांग्रेस सरकार बना सकती है या नहीं। कांग्रेस के नेताओं को आपसी लड़ाई भूलकर इस पर काम करने की जरूरत है। तभी कांग्रेस का सपना साकार हो सकता है।

 

सर्वेक्षण के मुख्य नतीजे

 

  • भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जायेंगे और पार्टियों का चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर होगा तब ये टक्कट बहुत ही दिलचस्प मोड़ ले लेगी।

    अपने ही गृह क्षेत्र चौबट्टाखाल में सतपाल महाराज मुख्यमंत्री के रूप में लोगों की पसंद में चौथे नंबर पर हैं। ऐसे में उनकी बतौर सीएम स्वीकार्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। उन्हें केवल रामनगर के मतदाता मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। भाजपा की ओर से वे यहां सबसे आगे हैं।

  • श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र में वहां से विधायक एवं मंत्री धन सिंह रावत मुख्यमंत्री के रूप में दूसरे नंबर पर हैं। बाकी प्रदेश भर में उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है।
  • डोईवाला से विधायक एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सर्वे में उनके ही क्षेत्र के किसी भी मतदाता ने बतौर मुख्यमंत्री नहीं स्वीकारा है। यहीं से पूर्व विधायक और मुख्यमंत्री रह चुके डॉ. निशंक को लोग तीसरे नंबर पर पसंद करते हैं।
  •  रानीखेत से राजनीति करने वाले वर्तमान में नैनीताल सांसद एवं केंद्रीय रक्षा एवं पर्यटन राज्यमंत्री अजय भट्ट को उनके क्षेत्र के लोग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से कम पसंद करते हैं।
  • हरीश रावत पूरे प्रदेश भर में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। उन्हें 55 प्रतिशत लोग बतौर सीएम देखना चाहते हैं।
  • मुख्यमंत्री फेस के रूप में यदि बात कांग्रेस नेताओं की करें तो पूर्व प्रदेश कांग्रेसी अध्यक्ष एवं प्रतिपक्ष के नेता प्रीतम सिंह केवल विकासनगर क्षेत्र में पहली पसंद हैं। उन्हें अपने ही विधानसभा क्षेत्र चकराता के मतदाता मुख्यमंत्री का फेस नहीं मानती है। यहां के लोग हरीश रावत, गणेश गोदियाल और प्रीतम सिंह को छोड़ अन्य कांग्रेसी नेता को मुख्यमंत्री का फेस मानते हैं।
  • द्वाराहाट क्षेत्र में आश्चर्यजनक ढंग से मुख्यमंत्री फेस के रूप में हरीश रावत पीछे हैं। यहां के लोग अन्य कांग्रेसी नेताओं को सीएम फेस के रूप में देखना चाहते हैं।

पिथौरागढ़ क्षेत्र के मतदाता कांग्रेस से हरीश रावत, गणेश गोदियाल और प्रीतम सिंह को छोड़ किसी और कांग्रेस नेता को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं।

आप के मुख्यमंत्री उम्मीदवार कर्नल कोठियाल अपनी सीट गंगोत्री जीतते नजर नहीं आ रहे हैं।

उक्रांद का इस बार खाता खुलने की संभावना है। देवप्रयाग के मतदाता भाजपा-कांग्रेस को छोड़ यूकेडी उम्मीदवार को वोट करने के मूड में हैं।

आम आदमी पार्टी जिस जोर-शोर से प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरी है, उस तरह के नतीजे उन्हें नहीं मिल रहे हैं। प्रदेश के मतदाता अभी भी आम आदमी पार्टी को भाजपा-कांग्रेस का विकल्प नहीं मानती है।

आपको विकल्प के रूप में सबसे ज्यादा 31 प्रतिशत अल्मोड़ा जिले के लोग देखते हैं। इन्हें विकल्प के रूप में सबसे कम 7 प्रतिशत सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के लोग मानते हैं।

देहरादून जैसे शहरी और मैदानी क्षेत्र में भी आप का ग्राफ ज्यादा बढ़ता नहीं दिख रहा है। देहरादून जिले के मात्र 16 प्रतिशत लोग इस पार्टी को भाजपा- कांग्रेस का विकल्प मानते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी आज भी उत्तराखण्ड में अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा चमोली जिले में लोकप्रिय हैं। यहां के करीब 91 फीसदी मतदाता मोदी के काम को बढ़िया या बहुत बढ़िया मानते हैं।

  • देहरादून जिले में 83 फीसदी तो अल्मोड़ा के 80 प्रतिशत मतदाता प्रधानमंत्री के काम को बहुत बढ़िया और बढ़िया मानते हैं।

नरेंद्र मोदी की सबसे कम लोकप्रियता नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों में है। इन दोनों जिलों में इनकी लोकप्रियता 50 फीसदी से कम है। नैनीताल में 41 फीसदी तो ऊधमसिंह नगर में 43 फीसदी लोग मोदी के कामकाज से खुश हैैं। इसका एक कारण किसान आंदोलन हो सकता है।

मोदी का जादू कायम

पिछले सात सालों के दौरान देश की आर्थिक स्थिति, बढ़ती बेरोजगारी, नोटबंदी, हमारी विदेश नीति, पड़ोसी मुल्कों के साथ कमतर होते संबंध, राफेल लड़ाकू विमान सौदे में अनिल अंबानी समूह की इंट्री से लेकर हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति में आया बड़ा विकार, लखीमपुर खीरी कांड, किसान आंदोलन या फिर कोविड कुप्रबंधन, इससे केंद्र सरकार की छवि खराब हुई है। ऐसा मानने वालों में देश के आर्थिक विशेषज्ञ, मीडिया का एक हिस्सा, बुद्धिजीवी वर्ग के साथ-साथ विदेशी मीडिया शामिल है। लेकिन उत्तराखण्ड में कराए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट इसके विपरीत है। ऐसा क्यों है, यह एक अलग शोध का विषय है। देश में महंगाई विकराल रूप धारण कर चुकी है। पेट्रोल, डीजल, गैस से लेकर खाने-पीने का सामान काफी महंगा हो गया है। खुदरा महंगाई दर भी उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। देश की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। इसके बावजूद उत्तराखण्ड के लोगों का केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास कायम है। कम से कम ‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ का सर्वे तो यही इशारा कर रहा है।

सर्वे में प्रदेश की जनता से दो सवाल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज से संबंधित पूछे गए थे उसमें पहला सवाल लोगों से पूछा गया था कि केंद्र सरकार के कामकाज से आप कितना खुश हैं? इसके जवाब में 30 फीसदी लोगों ने केंद्र सरकार के कामकाज को बहुत बढ़िया कहा। इससे थोड़ा कम 27 फीसदी लोगों ने बढ़िया कहा। इस तरह 57 फीसदी लोगों का मानना है कि केंद्र सरकार का कामकाज बढ़िया या बहुत बढ़िया है। 10 फीसदी लोगों ने इस सवाल के जवाब में अपनी कोई राय नहीं दिया है। वहीं 20 फीसदी लोग केंद्र सरकार के कामकाज को बहुत बेकार मानते हैं तो 13 प्रतिशत लोग ऐसे भी हैं जो केंद्र सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। वे इनके कामकाज को बेकार मानते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संबंधित भी एक सवाल सर्वेक्षण में पूछा गया था। सवाल – नरेंद्र मोदी कैसे प्रधानमंत्री साबित हुए हैं? इसके जवाब में 42 फीसदी लोगों का मानना है कि वह बहुत ही बढ़िया प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। इससे आधे यानी 21 फीसदी लोगों ने कहा कि नरेंद्र मोदी बढ़िया प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। इस सवाल के जवाब में 7 फीसदी लोगों ने अपनी कोई राय नहीं दी है जबकि 15 फीसदी लोगों ने बहुत बेकार और इतने ही लोग नरेंद्र मोदी को बेकार प्रधानमंत्री माना है। 6 माह पूर्व कराए गए सर्वे से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज की तुलना करें तो इनकी लोकप्रियता लगभग स्थिर है। मार्च 2021 के सर्वेक्षण में करीब 53 फीसदी लोगों ने केंद्र सरकार के कामकाज को अच्छा और बहुत अच्छा कहा था। इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 57 फीसदी हो गया है। मार्च 2021 के सर्वे में करीब 63 फीसदी लोगों ने नरेंद्र मोदी को बढ़िया और बहुत बढ़िया प्रधानमंत्री माना था। इस बार भी मोदी का ग्राफ समान है। इस तरह से कहें तो प्रधानमंत्री मोदी का जादू अभी भी उत्तराखण्ड में बरकरार है।

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