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तमिलनाडु में कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा रजनीकांत का चुनाव न लड़ना 

कुछ ही महीनों में तमिलनाडु ,पश्चिम बंगाल, असम , केरल ,पुददुचेरी  में  विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, कांग्रेस की धड़कनें तेज हो रही हैं। क्योंकि एक तरफ जहां पार्टी की चुनाव को लेकर कोई तैयारी नहीं है, वहीं तमिलनाडु में डीएमके का रुख भी पार्टी की चिंता बढ़ा रहा है। डीएमके लगातार संकेत दे रहा है कि वह गठबंधन में कांग्रेस को ज्यादा सीटें  देने के लिए तैयार नहीं है।

बिहार की तरह तमिलनाडु में भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। वर्ष 2011 के चुनाव में पार्टी ने 63 सीटों  पर चुनाव लड़ा और सिर्फ पांच सीटें  जीती थी। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 41 सीटों  पर चुनाव लड़ा और 8 सीटें  जीती। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 8 सीटों  पर जीत दर्ज करते हुए करीब 13 फीसदी वोट हासिल किये थे ।

तमिलनाडु के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि 2016 के मुकाबले इस वक्त कांग्रेस की स्थिति मजबूत है। मुस्लिम और क्रिश्चियन मतदाता कांग्रेस के साथ हैं। प्रदेश में करीब 17 फीसदी मुस्लिम और ईसाई मतदाता हैं और विधानसभा की करीब 90 सीटों  पर असर डालते हैं। इसलिए पार्टी के पिछले चुनावी प्रदर्शन या बिहार चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

इन सबके बावजूद पार्टी की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। प्रदेश प्रभारी दिनेश गुंड्डराव के साथ  प्रदेश नेताओं की  बैठक में यह मुद्दा जोर – शोर  से  उठा। प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि सभी पार्टियां चुनाव की तैयारी शुरू कर चुकी हैं , पर हमारी अभी चुनाव से सम्बंधित समिति तक नहीं बनी है।

रजनीकांत के पार्टी नहीं बनाने के ऐलान से तमिलनाडु में  विपक्ष की स्थिति मजबूत हुई है। डीएमके  नेता मानते हैं कि रजनीकांत के सियासत में कदम रखने के बाद सरकार विरोधी वोट कटने से  खतरा बढ़ सकता था, पर अब ऐसा नहीं है। यही वजह है कि सत्ताधारी एआईडीआईएमके  को विपक्षी वोटों के विभाजन का ज्यादा लाभ नहीं मिल सकेगा। चुनावी समीकरणों से उत्साहित डीएमके अब विपक्षी गठबंधन में शामिल कांग्रेस को कम सीटें देने की कोशिश करेगी। पार्टी नेता यह भी संकेत देने लगे हैं कि वह अकेले भी चुनाव में जा सकते हैं। जाहिर है कि रजनीकांत का चुनाव न लड़ने का फैसला डीएमके लिए फायदेमंद दिखाई दे रहा है तो कांग्रेस की रह भी आसान नहीं लग रही है।

दूसरी ओर तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस नेता मानते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में डीएमके पिछले चुनाव के मुकाबले उसे  कम सीटें  भी दे  सकती है।  डीएमके ने ज़्यादा दबाव डालने की कोशिश की तो तब  कांग्रेस लेफ्ट पार्टी, मुस्लिम लीग और दूसरी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करने पर विचार कर सकती है। वहीं बीजेपी की समस्या अब यही होने वाली है कि अगर वह AIADMK के साथ रही तो उसकी भूमिका एक छोटे और सहयोगी दल की ही रहेगी, और अगर AIADMK का साथ नहीं दिया तो संभव है कि DMK-कांग्रेस पार्टी की सरकार बन जाए।

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत द्वारा स्वास्थ्य कारणों से राजनीति में नहीं उतरने की घोषणा से भारतीय जनता पार्टी की तमिलनाडु चुनावी रणनीति को एक बड़ा झटका लगा है।  रजनीकांत ने कहा कि डॉक्टरों की सलाह पर वह अपनी पार्टी का अब गठन नहीं करेंगे।  राजनीति में कदम रखने के पहले ही राजनीति को बाय-बाय कह देने से उनके प्रशंसकों और बीजेपी को ठेस लगी है।

बीजेपी आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में रजनीकांत की पार्टी के साथ गठबंधन की तैयारी में थी। बीजेपी को उम्मीद थी कि  रजनीकांत का जादू चुनाव में चलेगा जिससे बीजेपी को खासा फायदा मिलेगा।  अब ऐसा होगा नहीं, इसकी उम्मीद भी कम ही है कि रजनीकांत बीजेपी की किसी रैली में शामिल होंगे या फिर अपने प्रशंसकों को बीजेपी के लिए वोट डालने की अपील करेंगे।

रजनीकांत का फैसला पिछले कुछ दिनों में बीजेपी के लिए दूसरी निराशा भरी खबर है।  बीजेपी को पहला झटका राज्य की सत्ताधारी AIADMK ने दिया।  AIADMK ने दो टूक शब्दों में घोषणा की कि भले वह चुनाव बीजेपी के साथ लड़ेंगे, पर चुनाव जीतने की स्थिति में बीजेपी को सरकार में शामिल नहीं किया जाएगा, सरकार सिर्फ AIADMK की ही होगी और ई के पलानिस्वामी ही फिर से एक बार मुख्यमंत्री बनेंगे।  AIADMK के कहने का मतलब साफ़ है, अगर बीजेपी को साथ चुनाव लड़ना है तो उसे एक सहयोगी पार्टी की ही भूमिका निभानी होगी।

तमिलनाडु का आगामी चुनाव इस दृष्टि से काफी रोचक रहेगा कि पहली बार राज्य की दो बड़ी पार्टियां AIADMK और DMK बिना जयललिता और करुणानिधि के चुनावी मैदान में उतरेंगी।  दोनों बड़े नेताओं का पिछले पांच साल में निधन हो गया।  DMKमें जहां करुणानिधि के छोटे बेटे एम के स्टालिन नेता के तौर पर पूरी तरह से स्थापित हैं, वहीं पलानिस्वामी काफी संघर्ष के बाद खुद को AIADMK का नेता स्थापित करने में सफल रहे हैं।  हालांकि उनकी लोकप्रियता को अभी पूर्णतया परखा नहीं गया है।

बीजेपी पिछले कई सालों से दक्षिण भारत में अपनी जमीन तलाशने में लगी हुई है।  दक्षिण के तीन राज्यों ,तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में असम और पश्चिम बंगाल के साथ अप्रैल-मई के महीने में चुनाव होने हैं । दक्षिण में कर्नाटक एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बीजेपी की जड़ जम चुकी है।  इसी राजनीति के तहत बीजेपी हैदराबाद नगर निगम चुनाव को विधानसभा चुनाव के तौर पर लड़ी और परिणाम काफी उत्साहवर्धक रहे।  केरल के स्थानीय निकाय चुनाव में भी बीजेपी को थोड़ा बल मिला लेकिन  तमिलनाडु हमेशा से ही बीजेपी के लिए एक टेड़ी खीर साबित होता रहा है।

केंद्र की बीजेपी सरकार ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की चार साल पहले हुई मृत्यु के बाद AIADMK को हर तरह का सहयोग दिया और AIADMK के विभाजन और सरकार को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।  बीजेपी को उम्मीद थी कि AIADMK उनके सहयोग के बदले में बीजेपी को तमिलनाडु की राजनीति में पैर ज़माने में मदद करेगी,  लेकिन  अब ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

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