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कोरोना संकट से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट पैदा हो गया है। भारत को भी इस संकट के दौर से निकलने का नया रास्ता खोजना होगा। संकट विेश्वव्यापी है। इसलिए समाधान भी मानवीय अर्थव्यवस्था का होगा । हम अपनी स्थिति को समझ सकते हैं। साथ ही दूसरे संकटों को देखकर हम यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारा भविष्य कैसा होने वाला है। यह भी हो सकता है कि आपसी सहयोग पर आधारित एक बड़े समाज के तौर पर परिवर्तन दिखाई दे।

कोरोना वायरस हमारी आर्थिक संरचना की ही एक आंशिक समस्या है। हालांकि, दोनों पर्यावरण या प्राकृतिक समस्याएं प्रतीत होती हैं, लेकिन ये सामाजिक रूप पर आधारित हैं। कोरोना वायरस महामारी और जलवायु परिवर्तन से निपटना तब कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा अगर हम गैर-जरूरी आर्थिक गतिविधियों को कम कर देंगे। यदि हम एक सामाजिक तौर पर न्यायोचित और एक बेहतर पर्यावरण वाला भविष्य चाहते हैं तो हमें अपने अर्थशास्त्र को बदलना होगा। इसका रास्ता हमें महात्मा गांधी ने बताया है।

 

कोरोना ने  मौजूदा व्यवस्था की खामियों को उजागर कर दिया 

 

जलवायु परिवर्तन के मामले में अगर आप उत्पादन कम करेंगे तो आप कम ऊर्जा का इस्तेमाल करेंगे और इस तरह से कम ग्रीनहाउस गैसों को उत्सर्जन होगा। कोरोना की महामारी ने हमारे मौजूदा व्यवस्था की खामियों को उजागर कर दिया है। इसके लिए एक तीव्र सामाजिक बदलाव की जरूरत होगी। बाजार और मुनाफे को अर्थव्यवस्था चलाने के मूल साधन से निकालने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए हमें कहीं ज्यादा मानवीय तंत्र का निर्माण करना होगा जो कि हमें भविष्य की महामारियों और जलवायु संकट जैसे दूसरे आसन्न खतरों से लड़ने के लिए  ज्यादा  दृढ़ और टिकाऊ बनाएगा। सामाजिक बदलाव कई जगहों से और कई प्रभावों से आ सकता है।

हमारे लिए एक अहम काम यह है कि हम यह मांग करें कि उभरते हुए सामाजिक रूप, देखभाल, जीवन और लोकतंत्र जैसी चीजों को अहमियत देने वाली व्यवस्था नैतिक सिद्धातों से पैदा हों।संकट के इस वक्त में राजनीति का मुख्य काम इन मूल्यों के इर्दगिर्द चीजों को खड़ा करने की है।इसके लिए सभी दलों की रचनात्मक राजनीति की भूमिका भी निभानी होगी। यह उनके भविष्य के लिये भी बेहतर होगा।

गांधीवादी विकल्प

 

इस संकट को महात्मा गांधी ने बहुत पहले ही भांप लिया था। इसका रास्ता भी हमें महात्मा गांधी ने ही बताया है। अब यदि कोरोना की महामारी और ग्लोबल वार्मिंग से उपजे जलवायु संकट के कहर से अब यदि देष को बचाना है तो गांधीवादी विकल्प के अलावा अब शायद कोई दूसरा रास्ता नहीं है। परमाणु युद्ध नहीं हुआ तो भी जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया की तबाही का कारण बन जायेगा। भारत में कांग्रेस की सरकारों ने उन्ही नीतियों को अपनाया जो यूरोपीय देषों ने अपनायी थी। वह गांघी को भूल गयी थी।
यह नयी अर्थव्यवस्था युद्ध के दौरान वाली नहीं होगी, जिसमें बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। बल्कि, हमें एक एंटी-वॉरटाइम अर्थव्यवस्था की जरूरत है और उत्पादन में बड़े स्तर पर कटौती की। अगर हम भविष्य की महामारियों के सामने टिके रहने की ताकत चाहते हैं तो हमें एक ऐसा व्यवस्था बनाना होगा जो कि उत्पादन को इस तरह से कम करने में समर्थ हो जिसमें लोगों की आजीविकाओं पर बुरा असर नहीं पड़े। ऐसे में हमें एक अलग तरह के आर्थिक सोच की जरूरत है।
महात्मा गांधी ने प्राकृतिक संसाधनों का विवेक और संयम के साथ उपयोग करने की ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की।
दुनिया भर के 53 नोबल पुरस्कार विजेताओं ने 25 वर्ष पहले ही यह अपील की थी कि दुनिया को शोषण और विनाश से बचाने के लिए गांधी के बताये रास्ते पर ही चलना होगा।

भारत के लिए इस सुनहली माया के पीछे दौड़ना निश्चित मृत्यु को निमंत्रण देना होगा

उन्होंने इंडस्ट्रियल  विकास के दुष्परिणामों की परिकल्पना बहुत पहले ही कर ली थी। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था कि ‘‘यूरोपीय सभ्यता यूरोप वालों के लिए अच्छी है, लेकिन अगर हम उसकी नकल करेंगे तो वह भारत को बरबाद कर देगी। मेरा यह मतलब नहीं कि उस सभ्यता में जो कुछ अच्छा हो और हमारे पचाने लायक हो, उसे अपना कर हम न पचायें, न मेरे कहने का यह मतलब है कि यूरोप की सभ्यता में जो कुछ बुराई पैठ गई है उसका यूरोप के लोगों को त्याग नहीं करना पड़ेगा। भौतिक सुख सुविधा की निरन्तर खोज और उनकी बुद्धि यूरोपीय सभ्यता में घुसी हुई ऐसी एक बुराई है और मैं यह कहने का साहस करता हूॅ कि यूरोप के लोग जिन सुख सुविधाओं के गुलाम बनते जा रहे हैं। उनके बोझ के नीचे दबकर यदि उन्हें नष्ट नहीं होना है तो उनको अपने आज के दृष्टिकोण में सुधार करना होगा। संभव है मेरी यह राय गलत हो, परन्तु मैं जानता हूॅ कि भारत के लिए इस सुनहली माया के पीछे दौड़ना निश्चित मृत्यु को निमंत्रण देना होगा ।’’

उन्होंने देशवासियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘‘ऐसी भूमि में देवों के निवास की कल्पना नहीं की जा सकती, जो मिलों और कारखानों में धुंए और शोरगुल से घृणा के बेशुमार मोटर गाड़ियों को खींचने वाले इंजन हमेशा तेजी से दौड़ते रहते हैं। ये मुसाफिर ऐसे होते हैं जो अधिकतर यह नहीं जानते कि उन्हें जीवन में क्या करना है, जो हमेशा असावधान रहते हैं और जिनके स्वभाव में इसलिए कोई सुधार नहीं होता कि उन्हें सन्दूकों में भरी हुई मछलियों की तरह मोटर गाड़ियों में बुरी तरह ठूंस दिया जाता है, और ये ऐसे अजनबी लोगों के बीच अपने को पाते हैं जो बस चले तो इन्हें गाड़ी से बाहर निकाल देंगे और जिन्हें ये भी बदले में इसी तरह बाहर निकाल देंगे। मैं इन बातों का जिक्र इसलिए करता हूॅ कि ये सब चीजें भौतिक प्रगति की निशानियां मानी जाती हैं। लेकिन वास्तव में ये हमारे सुख को रत्तीभर भी नहीं बढ़ाती ।’’गांधी के अनुसार किसी व्यक्ति के या राष्ट्र के नैतिक स्वास्थ्य को क्षति पहुंचाने वाली अर्थव्यवस्था अनैतिक और पापपूर्ण है।

उनका स्वदेशी तथा स्वराज का सिद्धांत वर्तमान पूंजीवादी विकास के प्रारूप के रोगों का इलाज करने में सक्षम है।
महात्मा गांधी का स्वराज या स्वशासन तथा स्वदेशी के माध्यम से लोगों को अपने वातावरणों (पर्यावरणीय, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक) पर नियंत्रित करने का दृष्टिकोण आज के बाजार संचालित पूंजीवादी तरीके के विकास की तुलना में विश्व को ज्यादा संतुलित और पर्यावरण-मित्र विकास की ओर ले जाने में ज्यादा सक्षम है।
हमारे पास गांधी की ओर लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। गांधी का विचार था कि पृथ्वी सभी मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है। लेकिन सभी के लालचों की पूर्ति नहीं हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि आधुनिक उद्योगवाद विश्व को ऐसे नंगा कर देगा जैसे टिड्डी दल ने मैदान साफ कर दिया हो। यह बात किसी भी तर्क से नहीं समझाई जा सकती कि मानव समाज की लगातार बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की स्थिति बरकरार रहते हुए भी हम आसन्न पर्यावरणीय महाविनाश को रोक पाने में सक्षम हो सकेंगे। यह उचित ही है कि मोदी सरकार ने छोटे और मझोले उद्योगों की ओर धान दिया है।
कोरोना संकट से चरमराई विश्व अर्थव्यवस्था 
देश का बेहतर कृषि परिदृश्य और देश के बुनियादी आर्थिक घटक, वे ठोस और सबसे प्रमुख आधार हैं, जिनके बल पर कोरोना संकट से चरमराई विश्व अर्थव्यवस्था के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ कम क्षति होते हुए दिखाई दे रही है। इसी कारण अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई,एम,एफ) ने 15 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत की विकास दर 2020 में 1.9 प्रतिशत रहते हुए दुनिया की सर्वाधिक विकास दर हो सकती है। जबकि चीन की विकास दर 1.2 प्रतिशत रह सकती है।उधर सरकार ने अर्थव्यवस्था में छोटे और मझोले उद्योगों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एम,एस,एमई इकाइयों के लिए कंप्लायंस का बोझ घटाने के उपाय करते हुए ऑडिट के लिए इनके टर्नओवर की सीमा को एक करोड़ रुपये से बढ़ा कर पांच करोड़ कर दिया है।
साथ ही एम,एस,एमई इकाइयों के लिए सबोर्डिनेट कर्ज की एक स्कीम शुरू करने की घोष.णा भी की गई है। घरेलू मोर्चे पर सफल मझोली इकाइयों को विदेशी बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद भी की जाएगी। नोटबंदी और जीएसटी से सबसे प्रभावित होने और देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाले सुक्ष्म, छोटे व मझोले उद्योगों (एम,एस,एमई सेक्टर) की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने फैक्टर रेगुलेशन एक्ट में संशोधन का ऐलान किया। इसके साथ ही देश में सफलता के झंडे गाड़ने वाले मझोले उद्योगों को विदेशी बाजार में पैर जमाने के लिए भी मदद दी जाएगी।
(लेखक हिन्दी विश्वकोश के सहायक संपादक रह चुके हैं। आज कल स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य कर रहे हैं।)निरंकार सिंह
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