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क्या सोशल मीडिया के दौर में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को नई परिभाषा की है जरूरत ?

दुनिया भर में जब भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की बात होती है नार्वे देश का नाम शीर्ष पर लिया जाता है। भारत में तो राज्द्रोह के मामलों की अगर बात करें तो विशेषज्ञों की यह राय है कि यह कानून ही एक काला कानून है और इस कानून का समय-समय पर दुरूपयोग भी किया गया है।उधर  अमेरिका के कैपिटल हिल (अमेरिकी संसद भवन) पर हुए हमले के बाद तमाम सोशल मीडिया मंचों द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के बाद अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नयी बहस की शुरुआत कर दी है। इस बहस का जो आधार है वह यह कि क्या सोशल मीडिया पर बैन करने से ट्रम्प की अभियक्ति की आजादी प्रभावित नहीं हो रही ?.

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‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले कभी इतने खतरे में नहीं थी।”  : ट्रंप

शायद इसी लिए ट्रम्प ने अपने तर्क में कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले कभी इतनी खतरे में नहीं थी। यूएस कैपिटल पर छह जनवरी को ट्रंप समर्थकों द्वारा किए हमले के बाद अपने पहले भाषण में निवर्तमान राष्ट्रपति ने अपने खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही, पिछले सप्ताह हुए हमले और अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन का इस्तेमाल करने के आह्वान जैसे तमाम मुद्दों पर बात की।

ट्रंप ने कहा, ‘‘ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले कभी इतने खतरे में नहीं थी। मुझे 25वें संशोधन से ज़रा सा भी खतरा नहीं है, लेकिन नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन और उनके प्रशासन के लिए यह आगे खतरा जरूर बन सकता है।’’

इससे काफी गुस्से एवं विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो रही है : ट्रंप

उन्होंने कहा, ‘‘ देश के इतिहास में जानबूझकर किसी  को परेशान करने के सबसे निंदनीय कृत्य को आगे बढ़ाते हुए महाभियोग का इस्तेमाल किया जा रहा है और इससे काफी गुस्से एवं विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसका दर्द इतना अधिक है कि कुछ लोग इसे समझ भी नहीं सकते, जो कि खासकर इस नाजुक समय में अमेरिका के लिए बेहद खतरनाक है।’’

 

 

ट्रंप ने पिछले सप्ताह यूएस कैपिटल में हुई घटना पर कहा, ‘‘ मैंने अपने कार्यकाल में हमेशा कहा है कि हम अमेरिका के इतिहास एवं परम्पराओं का सम्मान करने में विश्वास करते हैं, उन्हें तोड़ने में नहीं। हम कानून के शासन में विश्वास करते हैं, हिंसा या दंगों में नहीं।’’

 

गौरतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने हार स्वीकार नहीं की है और वह तीन नवम्बर को हुए चुनाव में धोखाधड़ी के बेबुनियाद दावे लगातार करते रहे हैं। उनके इन दावों के बीच ही, कैपिटल बिल्डिंग  में ट्रंप के समर्थकों ने धावा बोला था और हिंसा की थी, जिसमें कैपिटल पुलिस के एक अधिकारी तथा चार अन्य लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद ही उन पर महाभियाग चलाए जाने की मांग भी की गई । ट्रंप ने कहा कि कोविड-19 वैश्विक महामारी ने इस साल को और चुनाव को काफी कठिन बना दिया। राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘यह हमारे देश के लिए बेहतर स्थिति में आने का समय है… कानून प्रवर्तन और उससे जुड़े लोगों पर विश्वास रखें।

 

इस विषय पर विशेषज्ञों की राय क्या है ?

भारत में देखें तो आंदोलनकारियों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, किसानों, मजदूरों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों, कार्टूनिस्टों, राजनीतिज्ञों और एक्टिविस्टों पर तो इसकी गाज गिरायी ही जाती रही है और उन्हें गाहेबगाहे विरोध न करने और चुप रहने के लिए इस तरह धमकाया जाता है।  दिल्ली में जेएनयू और जामिया विश्वविद्यालयों के छात्रों पर भी इस कानून की तलवार लटक रही है।  कर्नाटक में तो एक स्कूल पर ही ये मामला सिर्फ इसलिए दर्ज हो गया क्योंकि वहां बच्चे सीएए से जुड़ा एक नाटक खेल रहे थे।

राजद्रोह एक गैरजमानती अपराध है और इसकी सजा भारीभरकम मुआवजा राशि के साथ न्यूनतम तीन साल और अधिकतम उम्रकैद रखी गयी है।  सरकारें भले ही इस कानून को खत्म करने के बजाय उसे बनाए रखने की वकालत करती हैं लेकिन न्यायपालिका इस कानून की संवैधानिक वैधता को विभिन्न मौलिक अधिकारों और उन पर लगे निर्बंधों की रोशनी में विश्लेषित करती आयी है।

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों पर लगाए गए हैं राजद्रोह के आरोप

 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो  (एनसीआरबी) के मुताबिक 2014 से 2018 के बीच 233 लोगों पर इस कानून का इस्तेमाल किया जा चुका है. सबसे ज्यादा 37 लोग असम और 37 झारखंड में गिरफ्तार किए गए हैं. 2018 में 70, 2017 में 51, 2016 में 35, 2015 में 30 और 2014 में 47 लोग इस भीषण कानून की चपेट में आ चुके है। एनसीआरबी ने 2014 से राजद्रोह के मामलों पर आंकड़े जुटाना शुरू किया है।

इनसे ये भी पता चलता है कि राजद्रोह के आरोपों में सिर्फ गिनती के मामलों में ही अदालतों में दोष सिद्ध हो पाया है. 2016 में सिर्फ चार मामले ही अदालतों में ठहर पाए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत ब्रिटिश दौर में बनाया राजद्रोह कानून अभी तक चला आ रहा है। जबकि खुद ब्रिटेन अपने विधि आयोग की सिफारिश के बाद 2010 में इस कानून से मुक्ति पा चुका है।

ट्रम्प के मामले में उन्हें सोशल मीडिया से बैन करने को लेकर और क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है यह नहीं यह एक कभी न खत्म होने वाली बहस हैं। क्योंकि जिस तरह उनके समर्थकों ने हिंसात्मक रवैया अपनाया है उसे किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता है।

प्रेजिडेंट ऑफ़ द यूनाइटेड सटेस के ट्वीटर हैंडल से जब ट्रम्प ने ट्वीट किया तो ट्वीटर ने उसे भी डिलीट कर दिया, ऐसे में ट्रम्प की अभियक्ति पर लगातार रोक लगाने का या सिलसिला इस बहस को जरूर शुरू करता है कि यह भी तो अभियक्ति की आजादी पर प्रहार ही हुआ ,लेकिन यह सब किस सीमा में रह कर और किस चीज को दांव पर लगा कर किया जा रहा है यह जरूर मायने रखता है।

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