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‘कृषि कानून वापस होंगे और सत्ता भी बदलेंगे’

देश में किसान आंदोलन के इतिहास पर कोई भी चर्चा स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत का उल्लेख किए बिना निश्चित ही अधूरी मानी जाएगी। उन्हीं महेंद्र सिंह टिकैत के सुपुत्र राकेश टिकैत आज  किसान आंदोलन के बड़े नेता बन उभरे हैं। मेरठ विश्वविद्यालय से एमए राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। देश में नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले कुछ महीनों से चल रहे किसान आंदोलन का राकेश टिकैत नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी नेतृत्व क्षमता का ही परिणाम है कि किसान निरंतर धरना-प्रदर्शन में जुटे हुए हैं। सामाजिक-राजनीतिक संगठन आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। ‘किसान आंदोलन की दशा और दिशा’ को लेकर ‘दि संडे पोस्ट’ ने इस बार अपने खास कार्यक्रम ‘टाॅक ऑन टेबल’ में किसान नेता राकेश टिकैत को आमंत्रित किया। उनसे हुई इस विशेष बातचीत में शामिल रहे ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री, ‘दैनिक जागरण’ के वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र चंदेल, ‘दि संडे पोस्ट’ के संपादक अपूर्व जोशी, कार्यकारी संपादक (विचार) आदेश भाटी एवं रोविंग एसोसिएट एडिटर आकाश नागर

अपूर्व जोशी: तीनों नए कृषि कानूनों के विरोध में आप लोग इतने आक्रोशित क्यों हो गए और अब जब वर्तमान किसान आंदोलन को लगभग सौ दिनों से अधिक का समय हो गया है फिर भी आप लोग तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इस आंदोलन को कैसे आगे बढ़ा रहे हैं?

राकेश टिकैत: देखिए, अब यह आंदोलन सिर्फ किसानों का नहीं रहा, हमारे साथ छात्र, मजदूर, बुद्धिजीवी और लघु स्तरीय उद्योगों का वर्ग भी बड़ी संख्या में लगातार जुड़ रहा है। जहां तक बड़ी-बड़ी कंपनियों का फूड चेन के भीतर आने का सवाल है तो जाहिर सी बात है वे आकर इस पूरी व्यवस्था को होल्ड ही नहीं करेंगी, बल्कि नियंत्रित भी करेंगी। उनका मकसद है व्यापार करना। सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर कोई ठोस कानून नहीं बना रही है, जो कानून हैं वे ठीक से लागू नहीं हो रहे तो बड़ी कंपनियों के मालिक खेतों से कम दामों में फसल उठाएंगे और उनसे बने प्रोडक्ट को महंगे करेंगे। मैं एक उदाहरण देता हूं आलू का। अभी डे़ढ महीने पहले आलू की कीमत थी चालीस रुपए किलो। आज वे 6-7 रुपए तक गिर गए हैं। ऐसे ही सरसों ले लो आप। ऐसे ही चना का हिसाब लगा लो आप। चना अभी पांच हजार रुपए था, अब चार हजार के पास चला गया। आप देखते जाइए, ये अभी 3200 तक जाएगा। बड़े व्यापारी अपने मनमाने तरीकों से मार्किट को डाउन और अप करते हैं। नए कृषि कानून से ये बड़े व्यापारी किसान को तो मारेंगे ही, साथ ही जो आम ग्राहक है वह भी इससे प्रभावित होंगे। अब समय आ गया है कि एक प्लेटफाॅर्म पर सब एक साथ आएं। अब आंदोलन को एक रूप देने की आवश्यकता है।

अभी तो वाॅलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियां आएंगी जिनके पास दस-दस हजार पानी के जहाज हैं। ये लोग तो एक देश से सामान खरीद कर दूसरे देश में डंप कर सकते हैं। इन बड़ी-बड़ी कंपनियों को जब यह कानून शह देगा तो ये लोग हिंदुस्तान को बर्बाद कर देंगे। आने वाले 40-50 साल में तो ये देश का पूरा नक्शा ही बदल देंगे, सिर्फ अपनी मनमानी करेंगे। आम ग्राहक की तो इस काले कानून से जेब पूरी तरह ढीली हो जाएगी। जैसे ये बड़े लोग माल बनाते हैं एक जगह सारी चीजें मिलती हैं, तो अब इस आंदोलन को भी ऐसा ही करना पड़ेगा कि इससे सब तरह के वे लोग जुड़ंे जिन्हें इस काले कानून से सीधा-सीधा नुकसान होगा।

अब ऐसा लग रहा है कि इन बड़ी-बड़ी कंपनियों के आने के बाद इनका कब्जा सब पर होगा। बस, दो ही चीज बचेंगी, एक वोट और दूसरा मजदूर। आप देखिएगा ऐसा ही चलता रहा तो तीसरी चीज कोई बचेगी ही नहीं सब इन कम्पनियों के हाथ में चला जाएगा।

विनोद अग्निहोत्री: ये जो वर्तमान आंदोलन है इसका विस्तार बहुत है। दिल्ली बाॅर्डर है, गाजीपुर बाॅर्डर है, सिंधु बाॅर्डर है, टिकरी बाॅर्डर है, उधर शारदापुर बाॅर्डर है, पलवल में बैठे हुए हैं किसान, धांसा में और देश में कई और जगहों पर भी किसान विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। मौजूदा किसान आंदोलन का स्वरूप व्यापक है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस आंदोलन के जो मुद्दे हैं वे राष्ट्रीय मुद्दे हैं। मैं हाल ही में एक इलेक्ट्राॅनिक चैनल के डिबेट शो के पैनल में था। वहां पैनल में भानु किसान ग्रुप के भानु जी भी थे। उन्होंने कहा कि अब किसान आंदोलन में कुछ बचा नहीं है, यह धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। और भी लोग थे। कोई कह रहा था कि आंदोलन अब एक जगह आकर अटक गया है, रुक गया है। आंदोलनकारी भटक गए हैं आदि। लेकिन हम लोगों ने इसका प्रतिरोध किया, क्योंकि मैंने महसूस किया कि बाकी लोगों की यह चिंता है कि यह आंदोलन खत्म न हो। इसीलिए मैंने कहा कि यह आंदोलन न अटका है और न भटका है, बल्कि बीच में आकर लटका जरूर है। सरकार तीनों कानूनों को वापस नहीं ले रही। उधर किसान एमएसपी को बाध्यकारी बनाने के लिए अड़े हुए हैं। देखिए, मैं पत्रकार होने के नाते यह समझ पा रहा हूं कि 26 जनवरी की घटना के बाद यह किसान आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। 28 जनवरी को आपने जो कमान संभाली है, जो आपके आंसू आए हैं। उन्होंने इसका स्वरूप निश्चित तौर पर बदल दिया। मैं अब जानना चाह रहा हूं कि आंदोलन किस स्टेज में है, यदि अटका नहीं है तो आगे की क्या-क्या योजनाएं हैं?

एक बात तय है कि कुछ मीडिया हाउस बदतमीजी करते हैं, इनकी वेल्डिंग हमें करनी पड़ेगी। वो दिन अब ज्यादा दूर भी नहीं है। हम किसान जैसे बड़ी-बड़ी कंपनियों की वेल्डिंग कर दे रहे हैं, वैसे ही इनका भी कुछ न कुछ इलाज कर देंगे। लोग कहेंगे कि ये काम भी किसान ही कर गए। जैसे कृष्ण जी ने शिशुपाल से कहा था कि मैं तुम्हारी सौ गलती पहले माफ करूंगा। उसी तरह इनकी भी हम पहले सौ गलती तो माफ करेंगे। उनकेे दिन लगभग हो गए हैं। शुरू के एक महीने तो उन्होंने ठीक काम करा। लेकिन अब बाकी दिन जो रहे हैं, उनमें से सौ दिन जब पूरे हो जाएंगे, हम उन मीडिया संस्थान पर कार्यवाही करेंगे। उनकी पूर्ण रूप से वेल्डिंग करेंगे। श्रीकृष्ण जी के पुजारी हैं हम, उन्हीं के वंशज हैं, सौ दिन तक मौका हम भी देंगे उन्हें। इन लोगों को कोई रोकने-टोकने वाला नहीं

अपूर्व जोशी: मैं इसी के साथ दो और प्रश्न जोड़ना चाहता हूं पहला यह कि 26 जनवरी को बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों ने यह कहा कि यह आंदोलन अब अराजक हो उठा है। तो ऐसा क्या हुआ था कि वी ़एम ़ सिंह जी इससे विचलित हो गए और इस आंदोलन को ही छोड़ कर चले गए। दूसरा 26 जनवरी की शाम तक योगेंद्र यादव भी हताश नजर आ रहे थे। अगर मैं गलत नहीं हूं तो बड़े व्यथित नजर आए वे। यहां पर हम सबको आंदोलन भटकता हुआ नजर आया। इसके पीछे क्या कारण रहे?

दूसरा सवाल कि क्या आपके आंसू उस विभाजक रेखा को धुल पाए हैं जहां किसान मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हिंदू और मुस्लिम में बंट गया था? जो किसान पहले जाट, गुर्जर, हिंदू आदि में बंट गया था क्या वह वापस सिर्फ किसान बन गया है?

राकेश टिकैत: देखिए, मैं सबसे पहले आपके पहले सवाल पर आता हूं 26 जनवरी वाले मामले पर। हमारे गांव में कहा जाता है कि जो बड़ी कंपनियां हैं या जो भीख मांगने वाली कंपनियां हैं उन्हें देश और देश के लोगों से कोई लगाव नहीं होता। उनका एक चैराहे पर ठीक काम नहीं चलेगा तो वह दूसरे चैराहे पर चली जाएंगी। इस मुहल्ले में मुनाफा कम मिलेगा तो दूसरे मुहल्ले में शिफ्ट हो जाएंगी। इसी तरह जो काॅरपोरेट घराने हैं उन्हें एक काम सही नहीं लगता तो दूसरा काम कर लेते हैं। यहां तक कि एक शहर नहीं समझ आ रहा तो शहर बदल देंगे। वे इतने
ताकतवर होते हैं कि जब यह फेरबदली कर रहे होते हैं तो अपनी पहचान छुपा लेते हैं। कुल मिलाकर इनको न देश से लगाव है न झण्डे से लगाव है। जिन कंपनियों की, जिन लोगों की आज सरकार है, उनको तो कभी भी तिरंगे से कोई लगाव नहीं रहा। इन्होंने तो जयपुर कोर्ट पर संघ का झंडा फहरा दिया था। जबलपुर में भी इनके मुख्यमंत्री ने यही किया। तो यह तय है कि इनको तिरंगे से कोई लगाव नहीं है। जिस लालकिले की ये बात करते हैं उस लालकिले को तो इन्होंने डालमिया को बेच रखा है। जब प्रधानमंत्री उस पर झंडा फहराते हैं उस वक्त लालकिला ये किराए पर लेते हैं। तिरंगा जहां फहरा रहे हैं वो लालकिला तक इनका है ही नहीं। 26 जनवरी को भी जो झंडा लालकिले पर जहां फहरा था उस दिन भी वहीं फहरा रहा, आप तमाम वीडियो में देख सकते हैं। उसी के बराबर में एक पाइप था, एक धार्मिक ध्वज किसी ने उस पाइप पर लगाया, अब एक पाइप पर धार्मिक ध्वज लगाने की जो भी धाराएं बनती हैं वो उस व्यक्ति पर लगनी चाहिए। इस देश में कानून है, संविधान है, कोर्ट है, जो भी इस चीज के लिए धाराएं बनती हैं उस पर लगा दो। यह देश कानून और संविधान से चलता है। मुझे बताइए इस आंदोलन का और उस पाइप पर धार्मिक ध्वज लगाने का क्या संबंध है। कोई मतलब नहीं है। इस घटना को क्यों जोड़ा जा रहा है किसान आंदोलन से। देखो, कलम और कैमरे के डर से बंदूकें कांपी हैं। लेकिन यह जो दिखाया गया वह तो बड़े मीडिया संस्थानों की मजबूरी है, क्योंकि उनको अगर मीडिया संस्थान चलाना है तो जो सरकार कहेगी उन्हें वो करना पड़ेगा। लेकिन एक बात तय है कि कुछ मीडिया हाउस बदतमीजी करते हैं, इनकी वेल्डिंग हमें करनी पड़ेगी। वो दिन अब ज्यादा दूर भी नहीं है। हम किसान जैसे बड़ी-बड़ी कंपनियों की वेल्डिंग कर दे रहे हैं, वैसे ही इनका भी कुछ न कुछ इलाज कर देंगे। लोग कहेंगे कि ये काम भी किसान ही कर गए। जैसे कृष्ण जी ने शिशुपाल से कहा था कि मैं तुम्हारी सौ गलती पहले माफ करूंगा। उसी तरह इनकी भी हम पहले सौ गलती तो माफ करेंगे। उनकेे दिन लगभग हो गए हैं। शुरू के एक महीने तो उन्होंने ठीक काम करा। लेकिन अब बाकी दिन जो रहे हैं, उनमें से सौ दिन जब पूरे हो जाएंगे, हम उन मीडिया संस्थान पर कार्यवाही करेंगे। उनकी पूर्ण रूप से वेल्डिंग करेंगे। श्रीकृष्ण जी के पुजारी हैं हम, उन्हीं के वंशज हैं, सौ दिन तक मौका हम भी देंगे उन्हें। इन लोगों को कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। एक ही अजेंडा तय कर लिया है इन्होंने। या तो यूं करा करैं कि कभी विरोध में दिखाएं कभी पक्ष में दिखाएं। जो सही है बस वो दिखाएं। अब ये थोड़े ही सही है कि एकतरफा चला रहे हैं मीडिया हाउस। और भी मीडिया वाले हैं। एक बार हमारा भी पक्ष रख लो भाई, लेकिन एक ही पक्ष लेकर चलते जा रहे हैं, चलते जा रहे हैं।

रोज चला रहे हैं कि आंदोलन खत्म हो गया, आंदोलन समाप्त हो गया। अरे भाई आकर देख लो न कि कितने लोग हैं कितने लोग आ-जा रहे हैं। किसकी कब-कब बारी लग रही है। 26 को भी यही हुआ मीडिया ने एक ही साइड दिखाई। पुलिस लाल किले पर जिन्हें जाने दे रही थी उन्हें रास्ता क्यों दिया गया। इतने आराम से पुलिस उन्हें साथ में क्यों जाने दे रही थी। इसलिए कहना चाहता हूं उस दिन जो भी घटनाक्रम रहे वो सरकार की देन थी। ये लोग तो तोड़-फोड़ में ही विश्वास करते हैं।

जहां तक 28 तारीख की बात है सरकार ने मीडिया में चलवा दिया कि किसानों ने बहुत अराजकता फैलाई, उन्होंने इससे किसानों के मनोबल को कमजोर करने की पूरी कोशिश की।

हमारे जो लगभग 25 लाख किसान भाई-बहन ट्रैक्टर लेकर दिल्ली आए थे वे वापस जा रहे थे। वे नहीं जा रहे थे जो ट्रैक्टर यहीं के यहीं थे। ये बताइए लगभग साढ़े तीन लाख ट्रैकटर वापस अपने घरों को जाएंगे ही न। लेकिन जाते हुए इन ट्रैक्टरों को दिखाकर यह चलाया गया कि खाली हो गया बाॅर्डर, खत्म हो गया आंदोलन और न जाने क्या-क्या। उसी समय लगभग तीन हजार सैनिकों को विभिन्न बाॅर्डरों पर चलवाया गया, एक प्रचार स्थापित करने की कोशिश की गई कि यह मान लिया जाए कि आंदोलन खत्म हो चुका है। मैं कहना चाहता हूं कि ऐसा कुछ नहीं था, आंदोलन फिर भी चल रहा था। बाद में क्या किया गया कि कुछ इन्हीं के लोगों को पुलिस की मदद से बीच में छोड़ा गया। उनसे पत्थर मरवाए गए, उनके पास पेट्रोल भी था। उन पर पुलिस एक डंडा नहीं चला रही थी। क्यों भाई? पूरा प्लान था कि ऐसा करके आंदोलनरत किसानों के बीच भगदड़ मचेगी और बाॅर्डर खाली हो जाएगा। पुलिस यह कहती कि हम तो कुछ नहीं कर रहे, पब्लिक लगा रही है आग टेंटों में, जबकि ये उन्हीं के लोग थे, संघ के लोग थे। उन्हीं लोगों को ये काम दिया गया था कि किसानों पर पत्थर मारना, इनके ट्रैक्टर तोड़ना और भी ऐसे काम। मैंने 26 जनवरी के लगभग एक महीने पहले कह भी दिया था कि इस आंदोलन को रोकने के लिए सरकार लगभग एक हजार किसानों को मार सकती है। ये मैं नहीं कह रहा था, बल्कि मुझे बड़े पुलिस अधिकारियों ने एक महीने पहले ही इसका हिंट दे दिया था। उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन के लगभग एक हजार लोग मारे जा सकते हैं। जिसने यह प्लान बनाया होगा वो तो कुछ भी कर सकता है फिर तो।

28 जनवरी को सब लोग जब मौजूद थे, हमने वहां मोर्चा संभाला, हमने कहा कि प्रशासन चाह रहा है यहां भगदड़ हो, लेकिन हम डटे रहेंगे। हमने ये भी कहा कि इन्होंने बिजली काटी है, पानी रोका है, तो जो लोग गांव से आएंगे वे ट्रैक्टरों पर पानी भी लाएंगे। उसी के 20 मिनट बाद ही आंदोलन एक विशाल जनांदोलन में फिर से सबके सामने था। जो बड़े-बड़े पत्रकार अपने मीडिया हाउस से बाहर नहीं निकलते वे भी वहां बैठ कर देख रहे थे यह सब।

मीडिया को तो बस कवरेज करने के लिए मसाला चाहिए। इससे पहले उनके आकाओं ने जो कहा वे दिखा रहे थे। रही बात उन लोगों की जो लोग आंदोलन छोड़कर गए वे लोग सरकार के ही बैठाए हुए लोग थे। जो गए उनके बारे में मैं यही कह सकता हूं कि उनकी यह अपनी व्यक्तिगत कमजोरी होती है। किसी को अपनी प्रोपर्टी बचानी होती है तो किसी को जेल में जाने से डर लगता है।

देखिए, आंदोलन वो नहीं कर सकता जिसको अपनी प्राॅपर्टी से प्यार होगा, क्योंकि सरकार उसको आंदोलन से आसानी से तोड़ देगी। परिवार से प्यार होगा, लगाव होगा तो भी आंदोलन नहीं हो सकेगा। सरकार उसे भी तोड़ देगी। मैं इसलिए डटा हूं, क्योंकि मुझे कोई मोह नहीं है प्राॅपर्टी का।

मैं जिस दिन से आंदोलन से जुड़ा हूं उस दिन से अपने मुजफ्फरनगर जिले में नहीं घुसा हूं। मेरी बेटी आॅस्ट्रेलिया में ब्याही है। तीन महीने हो गए उससे बात नहीं की। नहीं करता परिवार से बात, क्योंकि अब मेरा परिवार वो हैं जो इस आंदोलन में मेरे साथ में हैं। जिस दिन ये लड़ाई हम जीत जाएंगे, उस दिन सबसे पहले हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर, अमृतसर) जाऊंगा। पहले घर नहीं, बल्कि इसके बाद खाप पंचायत का आॅफिस है वहां जाएंगे। फिर गांव जाऊंगा।

ये मेरा शेड्यूल है जी। मान और अपमान में से क्या चुनना है। यह आपको तय करना है। यही मैंने बाबा रामदेव को भी कहा था जब वह रामलीला मैदान से हार कर आए थे। मैंने कहा था कि अब मान और सम्मान यही है कि हार स्वीकार करें। लड़ाई फिर से शुरू करें आप। सारे लालच छोड़कर। उन्होंने मुझसे पूछा था कि क्या लालच है? मैंने कहा था जिस दो जोड़ी से अधिक कपड़े जो हो गए, वो लालच है। आपका लालच है आपकी फैक्टरियां।

तो देखो मेरा ये मानना है कि आंदोलन वही कर सकता है जो सारे लालच छोड़ देगा। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं कि मेरे पास एक कम्पनी से नोटिस आया कि इस आंदोलन से हमारा 11 करोड़ रुपए का नुकसान हो गया है। मैंने कोर्ट को लिखकर दे दिया कि मेरी चल-अचल संपत्ति से ये 11 करोड़ दे दिए जाएं। आप मुझे बताओ अब आंदोलन कर रहे हैं तो हो गया होगा नुकसान, इससे ज्यादा क्या कर सकता हूं इसके लिए।

मैं जहां जा रहा हूं, अभी हाल ही में आनंद विहार में तमाम आटो, रिक्शा चालकों ने घेर लिया। बोला, अब पीछे मत हटना। तो मैं किसी संगठन का नहीं हूं, किसी पार्टी का नहीं हूं मैं तो बस जनता का हूं।

आदेश भाटी: हम देख रहे हैं कि इस आंदोलन से मध्यम वर्ग के लोग भी अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। लेकिन ऐसा क्या भय है कि शहर में भी जो मिडिल क्लास है वह आपके साथ सीधे-सीधे सड़क पर नहीं उतर रहा है? मान लीजिए मैं किसान हूं, मेरा परिवार शहर में रहता है तो मैं और मेरा परिवार तो आ रहा है आपके आंदोलन में। लेकिन जो और अन्य क्षेत्र के लोग हैं वे खुलकर नहीं आ पा रहे हैं आपके साथ, ऐसा क्यों है?

हमसे अब जनता खुद कहती है कि भले ही हम एक घंटे का रास्ता दो घंटे में तय कर रहे हैं, लेकिन आप पीछे मत हटना। मैं कहता हूं कि अगर ये वर्तमान सरकार किसी राजनीतिक पार्टी की होती या किसी विशेष विचारधारा की होती तो अब तक समस्या का निपटारा हो गया होता, लेकिन ये सरकार बीजेपी की सरकार नहीं है, ये सरकार तो बड़े-बड़े व्यापारियों की सरकार है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिकों की सरकार है। दुनिया में एक नया काॅन्सेप्ट आया है कि भूख पर व्यापार करना। लेकिन हम इन लोगों को भूख पर व्यापार नहीं करने देंगे। इस आंदोलन से पूरी दुनिया में यह संदेश दिया गया कि भूख कितनी लगी है इस पर फसल की कीमत नहीं तय होगी। यह आंदोलन सिर्फ अब देश का आंदोलन नहीं पूरी दुनिया में हमने अपने संदेश को पहुंचाया है। या तो अब सरकार मान जाएगी हमारी मांगों को या हम फिर दूसरा इलाज निकालेंगे

राकेश टिकैत: लोग डरे हुए हैं, वो आते हैं हमारे साथ तो पुलिस कभी उनकी गाड़ी उठा ले जाती है तो सरकार कभी उनके घर नोटिस भेज देती है। कुछ बहनें अभी कुछ दिन पहले आई थीं। उनकी गाड़ी उठा ले गई पुलिस, तो यह सब हो रहा है तो कोई भी डरेगा न। लेकिन जो लोग हमसे सीधे नहीं जुड़ पा रहे हैं मैं आपको बता दूं वे हमसे वैचारिक रूप से जुड़े हुए हैं। इधर-उधर आता जाता रहता हूं, मुझे काफी लोग मिलते हैं सब बोलते हैं हम बाॅर्डर पर नहीं जुड़ पा रहे, लेकिन हम आपके साथ हैं। बस आप पीछे मत हटना। तो ऐसा नहीं है कि लोग नहीं जुड़ रहे हैं, सब जुड़ रहे हैं इस आंदोलन से और इसीलिए इसका स्वरूप दिन प्रतिदिन व्यापक होता जा रहा है।

आदेश भाटी: मेरा दूसरा सवाल यह है कि आपने कई बार विभिन्न मंचों से कहा है कि आपने पिछले चुनावों में बीजेपी को वोट दिया था, तो क्या अब इसे आप अपनी गलती मान रहे हैं?

राकेश टिकैत: देखिए, सबकी अपनी-अपनी विचारधारा होती है। तब विभिन्न मुद्दों पर विचार मिल रहे थे। आज नहीं मिल रहे हैं। यह वैचारिक लड़ाई है, इसे विचारों से ही लड़ना
होगा। जितनी भी सभाएं हो रही हैं वहां एक नारा जरूर लगता है कि किसान एकता जिंदाबाद। क्योंकि किसान ही देश का निर्माता है। किसान ही है जो सबको एक सूत्र में बांधता है।

धर्मेन्द्र चंदेल: टिकैत साहब, वर्तमान किसान आंदोलन की वजह से दिल्ली में और अन्य जगह मार्ग बंद हैं, जिससे आम जनता को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। क्या आपके आंदोलन का कोई स्वरूप यह नहीं हो सकता, जिससे आमजन को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े?

राकेश टिकैत: बिल्कुल इसका रास्ता है, हमने कहा सरकार से हमें ले चलो जहां ले चलना है हम वहीं बैठ जाएंगे। आप आगे-आगे चलो पीछे-पीछे हमारी ट्रैक्टर चलेंगी। लेकिन मैं आपको बता दूं कि हमसे अब जनता खुद कहती है कि भले ही हम एक घंटे का रास्ता दो घंटे में तय कर रहे हैं, लेकिन आप पीछे मत हटना। मैं कहता हूं कि अगर ये वर्तमान सरकार किसी राजनीतिक पार्टी की होती या किसी विशेष विचारधारा की होती तो अब तक समस्या का निपटारा हो गया होता, लेकिन ये सरकार बीजेपी की सरकार नहीं है, ये सरकार तो बड़े-बड़े व्यापारियों की सरकार है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिकों की सरकार है। दुनिया में एक नया काॅन्सेप्ट आया है कि भूख पर व्यापार करना। लेकिन हम इन लोगों को भूख पर व्यापार नहीं करने देंगे। इस आंदोलन से पूरी दुनिया में यह संदेश दिया गया कि भूख कितनी लगी है इस पर फसल की कीमत नहीं तय होगी। यह आंदोलन सिर्फ अब देश का आंदोलन नहीं पूरी दुनिया में हमने अपने संदेश को पहुंचाया है। या तो अब सरकार मान जाएगी हमारी मांगों को या हम फिर दूसरा इलाज निकालेंगे।

 

धर्मेन्द्र चंदेल: सरकार, तीनों कृषि कानूनों को लेकर अब संशोधन की भी बात कर चुकी है, तो किसान अपना अड़ियल रवैया क्यों नहीं छोड़ रहा। आप बताइए कि यदि सरकार नहीं  मानी तो आप कब तक इस आंदोलन को जारी रखेंगे?

 

राकेश टिकैत: हम कब तक यह आंदोलन जारी रखेंगे इसके लिए आप सब निश्चिंत रहो। अभी तो किसान सिर्फ कøषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अभी देश के युवा ने सत्ता परिवर्तन की मांग नहीं की है। वह दिन भी दूर नहीं। जब हम सत्ता परिवर्तन की लड़ाई छेड़ देंगे। अभी तो हम पार्लियामेंट के बाहर एमएसपी पर ही अपनी फसलों को बेचेंगे।

जब नारायण दत्त तिवारी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री थे, तब भी हमने कहा था कि आप उत्तराखण्ड को आर्गेनिक स्टेट घोषित करो। उस टाइम सरकार ने नहीं ध्यान दिया। फिर हरीश रावत मुख्यमंत्री बने, उनको भी हमने पांच एजेंडे वहां पर दिए। इस बाबत उनसे करीब हमारी 4-5 बार मीटिंग्स भी हुईं। फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत से इन्हीं मुद्दों पर दो बार बातचीत हुई। उन्होंने दो इशू पर काम भी करना शुरू किया। एक तो यह कि विलेज टूरिज्म पाॅलिसी पूरे देश में लागू हो, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में, क्योंकि यह पाॅलिसी हिमाचल प्रदेश में है तो बकायदा इसके लिए उत्तराखण्ड से कुछ अधिकारी वहां गए, यह जानने के लिए कि इसको सफलतापूर्वक कैसे लागू किया जाए। अगर यह ‘विलेज टूरिज्म पाॅलिसी’ पूरी तरह लागू होती है तो इससे उत्तराखण्ड ही नहीं विशेषकर उत्तर प्रदेश के भी गांवों को सीधा फायदा मिलेगा। वहां के किसानों का प्रत्यक्ष रूप से हित होगा

आकाश नागर: टिकैत साहब, जहां गाजीपुर बाॅर्डर पर आप लोग आंदोलन कर रहे हैं वहां से महज दस किमी की दूरी पर एक गांव है बम्हैटा, वहां कई किसान परिवारों की जमीन कृषि आदित्य वल्र्ड सिटी ने जबरन हड़प ली है। मतलब कुछ किसान हैं जिन्होंने आदित्य ग्रुप को अपनी जमीन बेची, लेकिन कई किसान ऐसे थे जिन्होंने अपनी जमीन के लिए किसी से भी कोई सौदेबाजी नहीं की थी। अभी लगभग 15-20 दिन पहले की बात है अपने हक की लड़ाई लड़ रहे इन किसानों पर प्रशासन की मदद से सरकार ने लाठीचार्ज किया। उनकी फसलों को बुलडोजर से तहस-नहस कर दिया गया। लगभग 29 लोगों को जेल भी भेज दिया गया। पूनम पंडित, सामाजिक कार्यकर्ता वहां पहुंची भी थीं। लेकिन उनका यह रोष था कि किसान नेता राकेश टिकैत उनके समर्थन में वहां क्यों नहीं आए?

राकेश टिकैत: मेरी लड़ाई तो किसानों के लिए ही है। मुझे इस मामले की जानकारी बिल्कुल नहीं थी। मुझे बताया जाएगा तभी तो मुझे पता चलेगा न। मैं एक दिन यहां रहता हूं तीन दिन बाहर रहता हूं। जब तक मुझे किसानों की समस्याओं के बारे में नहीं पता चलेगा मैं उन तक कैसे पहुंचुंगा। आपने बताया यह सही है। आप मुझे पूरी डिटेल दीजिए, हम इस पर निश्चित तौर पर बैठेंगे, बात करेंगे।

आकाश नागर: दूसरा सवाल वेव सिटी से जुड़ा है, वहां लगभग 18 गांवों के किसानों को उनके जमीन के पैसे चेक द्वारा दिए गए। साथ ही कुछ पैसा कैश दिया गया। वेव सिटी वाले तो चेक और कैश देकर चले गए। लेकिन किसानों ने जब वो चेक बैंक में लगाए और कैश पैसा एकाउंट में जमा कराने गए, तो बैंक उनसे पूछताछ कर रहा है। इतना ही नहीं इंकम टैक्स से सभी के पास नोटिस आ रहे हैं कि इतना पैसा आया कहां से, किसानों को परेशान किया जा रहा है। प्रशासन के साथ मिलकर आयकर विभाग इन किसानों के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है, जबकि उनकी कोई गलती भी नहीं है। बार-बार आ रहे नोटिसों से वह किसान डरे हुए हैं। चेक वेव सिटी वालों का था, पैसा किसानों की जमीन का था। बस इतना कसूर है उनका। एक और बात मैं आपके सामने रखना चाहता हूं कि वेव सिटी ने क्या किया कि जैसे किसी की दस बीघा जमीन है उससे आठ बीघा जमीन ली। उसमें से किसान ने दो बीघा जमीन अपने लिए छोड़ दी। अपनी आबादी आदि के लिए। लेकिन वेव सिटी ने क्या किया कि वो दो बीघा भी प्रशासन से सांठ- गांठ करके जबरन कब्जे में कर लिया।

उनकी जमीनों की नाली, चकरोट भी तोड़ दी गई है। किसान जो उसकी दो या चार बीघा जमीन थी उस पर न तो फसल उगा पा रहा है न आबादी बसा पा रहा है, अपनी ही जमीन पर कुछ नहीं कर पा रहा है?

राकेश टिकैत: उन्हें मेरे पास भेज दो। मुझको बताओ ये 18 गांवों के किसान कर क्या रहे हैं। अगर वे डरे हैं तो मैं यह कहना चाहता हूं कि मुझे बताओ कि ये आयकर विभाग का कार्यालय कहां है। वेव सिटी वाले कहां हैं। आप मेरे पास इन किसानों के 5-6 प्रतिनिधियों को भेजो, पूरा एक घंटा या इससे अधिक हम इस पर बात करेंगे और हल निकालेंगे। जो गलत है वह गलत है। किसानों के साथ हो रहे किसी भी तरह के अन्याय के खिलाफ हम सशक्त होकर आवाज उठाएंगे। किसानों को यहीं बुला लेंगे, वेव सिटी वालों को बुलवा लेंगे, अधिकारियों को बुलवा लेंगे।

आकाश नागर: सर मैं पिछले दस दिनों से उत्तराखण्ड के दौरे पर था, मैंने देखा आपकी रुद्रपुर की रैली बहुत ही जबरदस्त रही। यह उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार था कि किसी किसान आंदोलन में 50 हजार से अधिक लोग जुड़े थे। मैदानी इलाकों में जहां-जहां मैं अपने सर्वे के लिए गया सबने आंदोलन की सरहाना की। लेकिन जैसे ही मैं उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर जाता हूं, लोग आपसे खफा नजर आते हैं। उनकी आपसे नाराजगी है क्योंकि पहाड़ों पर जो किसान हैं उनकी खेती बंद हो चुकी है। जो बंदर हैं या अन्य जानवर हैं जो फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं उनकी वजह से लगभग पहाड़ पर खेती समाप्त हो चुकी है। पहाड़ पर जो किसान हैं इसी मजबूरी में पलायन कर रहे हैं, उनकी आपसे मांग है कि टिकैत साहब तराई के किसानों पर तो ध्यान दे रहे हैं, लेकिन पहाड़ के किसानों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो हमारी खेती फिर से बहाल हो इसके लिए किसान नेता टिकैत हमारा भी साथ दें?

राकेश टिकैत: आपने अगर रुद्रपुर रैली की स्पीच मेरी नहीं सुनी है तो मैं बता देना चाहता हूं कि वहां हमने इस समस्या को उठाया भी और इस पर विस्तृत बात की। मैं यहां भी बताना चाहता हूं कि वहां हम पिछले 6-7 वर्षों से काम कर रहे हैं।

जब नारायण दत्त तिवारी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री थे, तब भी हमने कहा था कि आप उत्तराखण्ड को आॅर्गेनिक स्टेट घोषित करो। उस टाइम सरकार ने नहीं ध्यान दिया। फिर हरीश रावत मुख्यमंत्री बने, उनको भी हमने पांच एजेंडे वहां पर दिए। इस बाबत उनसे करीब हमारी 4-5 बार मीटिंग्स भी हुईं। फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत से इन्हीं मुद्दों पर दो बार बातचीत हुई। उन्होंने दो इशू पर काम भी करना शुरू किया। एक तो यह कि विलेज टूरिज्म पाॅलिसी पूरे देश में लागू हो, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में, क्योंकि यह पाॅलिसी हिमाचल प्रदेश में है तो बकायदा इसके लिए उत्तराखण्ड से कुछ अधिकारी वहां गए, यह जानने के लिए कि इसको सफलतापूर्वक कैसे लागू किया जाए। अगर यह ‘विलेज टूरिज्म पाॅलिसी’ पूरी तरह लागू होती है तो इससे उत्तराखण्ड ही नहीं विशेषकर उत्तर प्रदेश के भी गांवों को सीधा फायदा मिलेगा। वहां के किसानों का प्रत्यक्ष रूप से हित होगा।

दूसरा मुद्दा है ‘हिल अलाउंस’ का। जैसे उत्तराखण्ड के पहाड़ पर या अन्य कहीं पहाड़ में हमारी पोस्टिंग हुई है तो हमें हिल अलाउंस दिया जाएगा। हालांकि यह पाॅलिसी चीन की है। लेकिन यदि आप पहाड़ पर रहने वाले लोगों को हिल अलाउंस देते हैं चाहे वह सरकारी नौकरी में है या नहीं तो इससे भी वहां रहने वाले किसानों को कुछ फायदा होगा।

तीसरा है ट्रांसपोर्ट सब्सिडी यानी कि आप किसान की फसल को खेत से मंडी तक ले जाने की व्यवस्था मुहैया कराएं। और सबसे अहम जो हमारे इंटरनेशनल बाॅर्डर हैं वहां एससी/एसटी रिजर्वेशन हो नौकरियों में। इन सभी पाॅलिसी के ठीक से लागू होने पर निश्चित ही पहाड़ों से पलायन को रोका जा सकता है।

विनोद अग्निहोत्री: टिकैत साहब, वर्ष 2013 के पहले की बात करूं तो हमने वह दौर देखा है जब चैधरी महेंद्र टिकैत के मंच से अगर हर-हर महादेव का नारा लगता था तो मंच के नीचे से अल्लाह-हू-अकबर का नारा लगता था। मंच से अगर अल्लाह-हू-अकबर का नारा लगता था तो मंच के नीचे हर-हर महादेव का नारा लगता था। उनके मंच पर एक मुअज्जम
मुसलमान चेहरा जरूर होता था। हालांकि 2013 के बाद किसान के मंचों से यह एकता धूमिल होने लगी थी। यह बात अलग है कि आपके प्रयास से फिर से वही दौर आ रहा है। अब सवाल यह है कि अगर सरकार आपकी मांगों को मान लेती है तो सभी अपने-अपने घर चले जाएंगे। चुनाव में जिसको जहां वोट देना होगा दे देगा। लेकिन अगर आंदोलन चलता रहा तो अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में चुनाव है, 2024 में देश में चुनाव है। तब आप लोग किसान बनकर वोट देंगे या सभी मुस्लिम, कुर्मी, यादव, जाट, गुर्जर, त्यागी, ब्राह्मण आदि बनकर वोट देंगे?

राकेश टिकैत: मुझे विश्वास है, किसान, किसान बनकर ही वोट देगा। अपना धर्म है किसानी, हमें उसी पर कायम रहना चाहिए। देखिए, जाति से लोगों को हर हाल में ऊपर उठना होगा, क्योंकि किसान बचेगा, तो ही जाति, धर्म यह सब बचेगा।

अपूर्व जोशी: चैधरी साहब, आप हमारे इस खास कार्यक्रम के लिए कार्यालय आए। मैं आपका शुक्रगुजार हूं।

राकेश टिकैत: धन्यवाद साहब!
(प्रस्तुति: शोभा अक्षर, सहायक संपादक ‘दि संडे पोस्ट’)

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