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दिल मिल रहे हैं तो सरनेम से क्या फर्क पड़ता है

शादी के बाद लड़की सरनेम बदले या नहींए इस वाक्य से ही मन खटकने सा लग्ता है। क्योंकि नाम बदलने का सारा दारोमदार लड़की के ऊपर ही थोपा जा रहा है। भला लड़कों को इससे, कतरफा छूट देने वाले वे कौन से लोग थे जो इस दकियानूसी विचार को संतुष्ट करने के लिए या कहें अपनी सहूलियत के लिए इसे एक परम्परा बनाकर चले ग्ए। नियम, जिसे वही बनाते हैंए वही थोपते हैं। आज भी कुछ खास नहीं बदला है। रेप पीड़िता से एक जज आज भी पूछ लेता है कि क्या तुम रेपिस्ट से शादी करोगी ?

सवाल तो यह भी है कि लड़का हो या लड़की शादी के बाद सरनेम बदलना क्या किसी तर्क पर सटीक बैठ सकता है। कई मामले ऐसे हैं जहां सरनेम ही नहीं लड़की का पूरा-पूरा नाम ही बदल दिया जाता है। परेशानी इच्छा से सरनेम या नाम बदलने की नहीं हैए असल मुद्दा इसके पीछे के मकसद और दबाव का है। यहीं भारत में वो भी 21वीं सदी में सरनेम बदलने का एक और कारण भी देखा जा सकता है। बात 2016 की है गुजरात के ऊना में दलितों पर मारपीट के बाद वहां के दलितों ने जातिग्त भेदभाव को मिटाने के लिए अपने नाम से जाति हटाकर अपनी मां के नाम का इस्तेमाल किया। उनका स्पष्ट कहना था कि न केवल जातिग्त पहचान मिटाने के लिए बल्कि लैंग्कि समानता को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपनी मां का नाम इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। हालांकि यह घटना बिल्कुल हैरान करने वाली नहीं है।

खैर, आते हैं शादी के बाद लड़कियों के सरनेम या नाम बदलने की बहस पर। इस विषय पर जानते हैं उनके विचार जिन्होंने अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति से साहित्य जग्त में एक विशेष पहचान बनाई है।अंतरराष्ट्रीय महिला सप्ताह पर विशेष।

मेरा कहना है कि इस विषय पर आखिर पुरुषों से क्यों सर्टिफिकेट लेना। मेरा सीधा सा मानना है कि सर्वण पुरुषों को स्त्री विमर्श दलित विमर्श इस तरह की चीजों में न्यूनतम बोलना चाहिए। जब स्त्रियां बोल रही हों, दलित बोल रहे हों, कश्मीरी बोल रहे हों तो उन्हें चुपचाप सुनना चाहिए और मनन करना चाहिए। सवर्ण पुरुषों ने जबरदस्ती का मान अपने हाथों में रखकर सारे विमर्शों का सत्यानाश कर रखा है। सवर्ण पुरुषों की हर जग्ह नेतृत्व पर कब्जे की कोशिशों ने अक्सर काफी नुकसान पहुंचाया है।
-अशोक कुमार पांडेय, इतिहासकार एवं लेखक

मेरे मां-बाप ने या मेरे अभिभावक ने मेरे पूरे व्यक्तित्व को बनाया है, मैं भला क्यों अपना नाम बदलूं। उन्होंने मेरा नाम रखा तो इसका मतलब उन्होंने मुझे एक पहचान दी है। आप (पति) कानूनी रूप से एक दिन में हमारे पति हो जाते हैं इसका मतलब यह थोड़े है कि मैं अपनी आइडेंटिटी बदल लूं। महाराष्ट्र में लड़कियां भी अब अपना पहला नाम नहीं बदल रही है, जैसे पहले आशा रेणुका में बदल जाती थी। अब वह आशा आशा ही रहती है। सरनेम अभी भी बदल जाता है। पिता की जग्ह पति का नाम अभी भी जुड़ जाता है। हो सकता है कुछ दिनों बाद इस पर भी बात हो, लेकिन अभी यह पहली बात है कि उनका नाम नहीं बदला जा रहा। देखियेए महाराष्ट्र और ग्ुजरात में कई जग्ह तो शादी के बाद पूरा- पूरा नाम बदलने का रिवाज है पर मैंने नहीं बदला। जो लोग् यह कह कर नाम बदल रहे कि हम सम्मान में, प्रेम में नाम बदल रहे हैं वह दरअसल उनकी पितृसत्तात्मक सोच होती है। यह कैसा सम्मान है कि नाम बदल लिया और दिन-रात लड़ाई- झग्ड़े कर रहे हैं। असल में यह एक बकवास कवायद है।
-विभा रानी, साहित्यकार एवं नाटक- कर्मी

मैं अपना किस्सा बताती हूं कि वो 1967 का दौर थाए मुझे लंदन जाना था तो मैं नासिरा अली के नाम से कैसे जा सकती थी। उस वक्त कानून था कि मुझे मैरिज सर्टिफिकेट दिखाना था, वाइफ आफ बताना था। पहले मैं नासिरा अली थी बाद में नासिरा शर्मा बनी। पासपोर्ट में तो बदलना पड़ा। बाद में इसी नाम से लेखिका बनीए लोग् जानने लगे । नाम सबके मुंह पर चढ़ ग्या। यहां यह भी है कि अग्र मैं शादी के पहले लिखना शुरू करती और लोग् नासिरा अली नाम जानने लग्ते तो शायद मैं दूसरी तरह सोचती। देखिएए बहुत सारी वजहें होती हैं नाम बदलने की। सिर्फ पसंद के तौर पर नहीं देखा जा सकताए कभी- कभी कुछ कानूनी हालात भी होते हैं। अब जो तलाकशुदा औरतें हैं वे अपने पति का नाम लेकर कैसे चलेंग्ी। मेरा मानना है कि नाम या सरनेम बदलने को लेकर कोई नहीं होना चाहिए। हां, अग्र कानून बना दिया जाता है तो अलग् बात है।
-नासिरा शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार

अगर मैं अपनी मां का सरनेम अपने नाम के आग्े लगती तो वो भी तो मेरे नाना का सरनेम होता। तो कुल मिलाकर जो सरनेम की सोशियोलाॅजी है या हिस्ट्री है वह पुरुषों से ही जुड़ी हुई है। इसलिए मैंने अपना नाम नहीं बदला। हालांकि यह स्त्रियों की चाॅइस है कि वो नाम बदलना चाहती हैं या नहींए जब हम चाॅइस की बात करते हैं तो यह सही नहीं है कि जो स्त्रियां अपनी मर्जी से अपने पति का सरनेम अपने नाम के आगे लगती हैं हम उनकी आलोचना करें। मैं ये मानती हूं कि नाम बदलना या न बदलना यह सब बहुत बेकार की बाते हैं। यह सब मध्य वर्ग के लोगें या जिनका बहुत पेट भरा हुआ है उनके चोंचले हैं। क्योंकि यह सब बातें तब सही होतीं जब इससे मेरी पीढ़ी की औरतों की स्थितियों में बदलाव होता। उनकी दुनिया में क्या इससे कुछ खास बदलाव हो ग्या।यह सब भरे पेट का स्त्रीवाद है।
-क्षमा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार

 कहते हैं, नाम में रखा क्या है? लेकिन कुछ लोगें का मानना है नाम में बहुत कुछ रखा है। भारतीय संस्कृति में पितृ सत्ता को बनाये रखने के लिए स्त्री का शादी के उपरांत सरनेम बदलने का रिवाज रहा है। लेकिन जब से ग्लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ है। तब से स्त्री सिर्फ होम मेकर नहीं रही। वह घर के आर्थिक बोझ उठाने में भी सहभागी बनने लगी है। बाहर जाॅब करती हैए काम करती है और आर्थिक रूप से सबल होने लग्ी है। जिस कारण उसका पुराना सरनेम अधिकतर आॅफिसियलए सरकारी और बैंक के काग्जों पर लिख जाता है। आज की तारीख में शादी के बाद नाम बदलवाना बड़ा तकलीफदेह हो ग्या है। सिर्फ आत्मसंतुष्टि के लिए नाम बदलवाने के लिए इतनी मेहनत करने का मुझे कोई कारण समझ नहीं आता। अगर दिल मिल रहे हैं तो सरनेम मिले न मिले क्या फर्क पड़ता है।
-भगवंत अनमोलए युवा कथाकार

कुछ लड़कियां कहती हैं कि हमने प्यार में सरनेम बदला पर प्यार मतलब यह थोड़े ही होता है कि प्यार में आप बदल जाएं, नाम बदल लें। जो जैसा है उसे वैसे ही प्यार करो तब तो प्यार है न। अग्र अपवाद छोड़ दिया जाए तो क्या आपने कभी किसी पुरुष को शादी के बाद नाम बदलते देखा है। मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात कर रही हूंए कहीं भी होए शादी के बाद स्त्रियों को ही नाम बदलना होता है। शादी के बाद पत्नियों को पतियों को सब आर्डिनेट या प्राॅपर्टी माना जाता है। जरूरत है इस चीज से छुटकारा पाया जाए। जो स्त्रियां शादी के बाद स्वतंत्र रूप से भी अग्र सरनेम बदल रही हैं तो वो कहीं न कहीं उस सोच में बंधी हुई हैं जो बचपन से उन्हें सिखाई गयी है कि शादी के बाद तुम पति की हो जायेगी  या अब सब निर्णय  तुम्हारा पति ही लेग आदि। जैसे सोनम कपूर ने अपना नाम बदलकर सोनम कपूर आहूजा कर लिया और स्वतंत्र रूप से किया लेकिन वो भी एक कंडीशनिंग का हिस्सा है।
-अणुशक्ति सिंह, युवा लेखिका

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