सवालों के सैलाब लाने वाले मित्रों से विनम्रता के साथ कुछ सवाल दर्ज करना चाहता हूं। मसलन ऐसा क्यों है कि हिन्दी साहित्य में इन दिनों संदर्भ से काटकर एक तरह की क्रूरता लायी जाने वाली प्रवृत्ति बढ़ी है। क्या साहित्य पत्रकारिता का दायित्व सच को छिपाना है जो कि मीडिया में इनदिनों हो रहा है? यह भी कि कलात्मक हत्याओं के इस दौर में गलती रिवाल्वर की है,  रिवाल्वर से गोली दागने वालों की कतई नहीं। बातचीत के क्रम में त्रिपाठी जी की आपत्तिजनक बात पर बातचीत में शामिल साथियों द्वारा तुरंत आपत्ति दर्ज की गई थी, हां ये चूक जरूर हुई कि आपत्ति और कड़ी होनी चाहिए थी। मित्रों के अवलोकनार्थ यह आडियो लिंक पेश है।

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  1. यह पत्रिका पठनीय और विवादों से दूर है। यह पत्रिका निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़े, इसके लिये अनंत शुभ कामनाएं…. मुझे इस पत्रिका में प्रकाशित होकर खुशी होगी।

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