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रात कितनी ही अंधेरी क्यों न हो, लेकिन उम्मीद रहती है कि सवेरा जरूर होगा। लंबे संघर्ष के बाद आखिर 9 नवंबर 2000 को पौ फटी। परिंदों ने पंख फड़फड़ाए। सवेरा भी हुआ, मगर कुहासे से भरा। उत्तराखण्ड के जन्म लेते ही उस पर भ्रष्टाचार कुंडली मारकर बैठ गया। देवभूमि का देवत्व मर गया और लूट-खसोट की संस्कृति शुरू हुई। दिखावे के लिए जनहित में बड़े-बड़े वादे हुए। योजनाएं भी बनीं, लेकिन पहाड़ का पानी और जवानी आज भी उसके काम नहीं आ पा रहे हैं। राज्य निर्माण के बाद की बारह वर्षीय विकास यात्रा और विसंगतियों की परतें खोलता ‘दि संडे पोस्ट’ का यह विशेष आयोजन

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