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टैगोर और गांधी एक दूसरे की करते थे आलोचना पर सम्मान के साथ

टैगोर और गांधी एक दूसरे की करते थे आलोचना पर सम्मान के साथ

महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर रहे थे, तो उन्हें भारत लाने के लिए सीएफ एन्ड्र्यूज को अफ्रीका भेजने वाले गोपाल कृष्ण गोखले और रवीन्द्रनाथ टैगोर ही थे। देश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी इसी दिन पहली बार शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर से मिले थे। इस मुलाक़ात के दौरान टैगोर और गांधी की एकसाथ बैठे हुए कई तस्वीरें ली गईं। वैसे तो गांधी जी 1915 और 1945 के बीच आठ बार शांतिनिकेतन में गए। पहली बार वे अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ 17 फरवरी, 1915 को शांतिनिकेतन में पहुंचे थे। लेकिन उस समय टैगोर कलकत्ता में थे, इसलिए उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई।

शांतिनिकेतन में पहली बार पहुंचने के बाद गांधी ने कहा, “आज मुझे जो ख़ुशी  हो रही है, वह मैंने पहले कभी महसूस नहीं की। हालांकि, रवींद्रनाथ यहां मौजूद नहीं हैं, फिर भी हम उनकी उपस्थिति को अपने दिल में महसूस कर रहे हैं। मुझे यह जानकर ख़ुशी हुई कि आपने भारतीय तरीके से स्वागत की व्यवस्था की है।” महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की पहली मुलाकात 6 मार्च, 1915 को हुई थी। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से लेकर उनके चरखा-प्रेम तक की तीखी आलोचना की थी। शांतिनिकेतन में हर साल 10 मार्च का दिन ‘गांधी दिवस’ के रूप में मनाया जाता था। दक्षिण अफ्रीका में अपने आश्रम जीवन के अभ्यस्त हो चुके गांधी अपना सारा काम खुद अपने ही हाथों से करते थे।

इसलिए शांतिनिकेतन में भी जब उन्होंने अपना कमरा और बिस्तर खुद ही साफ किया और अपने कपड़े और बर्तन भी खुद ही धोए तो यह देखकर शांतिनिकेतन के छात्र अपनी परावलंबिता पर बहुत शर्मिंदा हुए थे। भारत में जितना महात्मा गांधी का नाम है उतना ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को भी लोग मानते हैं। दोनों एक ही समय के थे वहीं गांधीजी से गुरुदेव काफी प्रभावित भी हुए थे, उनकी कई बातों को पसंद भी करते थे तो दूसरी ओर उनकी कुछ बातों का खुल्लमखुल्ला विरोध भी करते थे। ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार के खिलाफ जिस समय गांधी ने ‘असहयोग आंदोलन’ शुरू किया, उस दौरान टैगोर यूरोप के दौरे पर थे और पूरब तथा पश्चिम की आध्यात्मिक एकता के सूत्र तलाश रहे थे।

टैगोर को गांधी का यह संघर्षकारी रवैया खटका और उन्होंने सीएफ एन्ड्र्यूज को पत्र लिखकर इसकी आलोचना की थी। बाद में तो खुलकर सार्वजनिक रूप से वे असहयोग आंदोलन के विरोध में आ गए। टैगोर के मुताबिक, असहयोग एक नकारवादी विचार था और इससे मानवता में विश्वास की नीति की भी अनदेखी होती थी। टैगोर ने असहयोग को भी ‘एक प्रकार की हिंसा’ करार दिया था। गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध रवींद्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे।

वे अकेले ऐसे भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। गांधी और टैगोर के बारे में टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा था कि कोई भी दो व्यक्ति इतने अलग नहीं हो सकते जितने गांधी और टैगोर। दोनों एक ही विचार और संस्कृति से प्रेरित थे। फिर भी आपस में इतने अलग-अलग थे। यह भारतीय संस्कृति की खासियत है जिसने एक ही समय में दो इतने विपरीत विचारधारा वाले और महान लोगों को जन्म दिया। जाने-माने फ्रेंच लेखक रोमेन रोलैंड ने इसे ‘द नोबल डिबेट’ कहा था। जहां एकतरफ गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर कई बातों के लिए खुलकर महात्मा गांधी की आलोचना करते थे वहीं ये दोनों एकदूसरे का बेहद सम्मान भी करते थे।

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