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The Sunday Post Special

‘राहुल टाइम टेस्टेड जनरल हैं’

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत से विशेष बातचीत

अपूर्व जोशी : रावत जी, कांग्रेस अपनी राजनीतिक जीवन यात्रा के अब तक के सबसे कठिन दौर में है। 1977 में हालांकि कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष इंदिरा गांधी जी चुनाव हार गई थीं, उनके सुपुत्र संजय गांधी भी चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद कांग्रेस को तब दक्षिण भारत में 153 सीटें मिली थी। लेकिन 2014 में कांग्रेस को बहुत बड़ा झटका मिला। 10 साल के यूपीए शासन के बाद पार्टी मात्र 44 सीटों पर सिमटकर रह गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में मात्र एक सीट उत्तर प्रदेश से आप जीत पाए हैं। स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी से हार गए। तो ऐसे माहौल में, कठिन दौर में, कांग्रेस की भविष्य की स्ट्रेटिजी क्या है, कांग्रेस के रिवायवल का क्या प्लान चल रहा है?

हरीश रावत : कांग्रेस के लंबे इतिहास में ऐसा संकट कई बार आया है और हर बार कांग्रेस ने अपनी आंतरिक शक्ति से किसी भी चुनौती को पार पाने में सफलता पाई है। इस बार भी हमारे सामने चुनौतीपूर्ण स्थिति है, अत्याधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति है। मगर इसमें चिंता का एक नया एंगल जुड़ गया है। जो इस लड़ाई में हमारे नायक हैं और जिन्होंने अपने परिश्रम से, सूझ-बूझ से कांग्रेसजनों का विश्वास प्राप्त किया, वो त्यागपत्र देने की जिद्द पर अड़े हुए हैं। कहते हैं किसी और नॉन गांधी को आप ये दायित्व सौंपिए। सामान्यतः ये बात ऐसी नहीं है कि इसमें हम ये कहें कि रास्ता नहीं निकल सकता, मगर एक ऐसे समय में जिस समय आप अपने इतिहास की सबसे गंभीरतम चुनौती से जूझ रहे हों, उस समय कि एक जनरल चहिए। टाइम टेस्टेड जनरल चाहिए जो सबका विश्वास हासिल कर चुका हो। ऐसा जनरल चाहिए, जिसने अपनी सूझ-बूझ से चुनावी रणनीति तैयार की हो और लोगों में विश्वास पैदा किया हो कि कांग्रेस चुनौती दे रही है, कांग्रेस वापस आ सकती है। हमारा सबका मानना यह है कि इस समय केवल और केवल राहुल गांधी ही नेतृत्व की भूमिका में सबसे सटीक बैठते हैं। आज हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न एक तो ये है कि हम राहुल जी को कैसे इस बात के लिए सहमत कराएं कि वे अध्यक्ष के रूप में बने रहें, दूसरी बात हार पर मंथन होता है। हम मंथन करेंगे। हम अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर करेंगे। समय की चुनौतियों के अनुरूप अपने कामकाज में, अपने कलेवर में अपने तेवरों में जो परिवर्तन लाना है वो सब भी लाएंगे। मगर एक बात जो सामने की है और जो हमें पुकार-पुकार कर कहती है कि नहीं कांग्रेस को पूरी शिद्दत से, पूरी हिम्मत से डटे रहना है, वो ये है कि हमारे सामने कोई ऐसा विकल्प नहीं है कि जो अंततोगत्वा एक बहुलवादी भारत का प्रतिनिधित्व करता हो। जो भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, ‘सर्वधर्म सम्भाव’ की अवधारणा है, उसमें सटीक नेतृत्व करता हुआ राजनीतिक दल हो। जो हमारे आजादी के मूल्यों को, गांधी के सत्य, अहिंसा के सिद्धांत पर अनुसरण करते हुए सबको साथ लेते हुए संवैधानिक लोकतंत्र को आगे बढ़ा सकता हो या संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की रक्षा करने की लड़ाई लड़ सकता हो।

एक ऐसे समय में जिस समय कि आप अपने इतिहास की सबसे गंभीरतम चुनौती से जूझ रहे हों, उस समय एक जनरल चाहिए। टाइम टेस्टेड जनरल चाहिए जो सबका विश्वास हासिल कर चुका हो। ऐसा जनरल चाहिए, जिसने अपनी सूझ- बूझ से चुनावी रणनीति तैयार की हो और लोगों में विश्वास पैदा किया हो कि कांग्रेस चुनौती दे रही है, कांग्रेस वापस आ सकती है। हमारा सबका मानना यह है कि इस समय केवल और केवल राहुल गांधी ही नेतृत्व की भूमिका में सबसे सटीक बैठते हैं। आज हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न एक तो ये है कि हम राहुल जी को कैसे इस बात के लिए सहमत कराएं कि वे अध्यक्ष के रूप में बने रहें, दूसरी बात हार पर मंथन होता है। हम मंथन करेंगे। अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर करेंगे

अपूर्व जोशी : कांग्रेस अपने 70 सालों की यात्रा में क्यों एक परिवार विशेष पर केंद्रित रही है या आश्रित हो गई है?

हरीश रावत : पहली बात तो यह कि कांग्रेस के इतिहास में गांधी परिवार से बाहर के लोग अध्यक्ष रहे हैं और अच्छे अध्यक्ष रहे हैं। सत्ता में जब हम थे उस समय भी इस दायित्व को बहुत सारे लोगों ने संभाला। मगर वो स्थितियां सामान्य थी। आज सामान्य स्थितियां नहीं हैं। ये आसाधारण चुनौती है। चुनौती अकेले कांग्रेस की नहीं है, बल्कि उन सारे मूल्यों, मान्यताओं, सिद्धांतों के लिए है जिनके लिए कांग्रेस खड़ी है। कम से कम इस देश के अंदर कोई भी व्यक्ति लाख कुछ कह दे, आरोप लगा दे मगर नेहरू-गांधी परिवार के ऊपर उंगली नहीं उठा सकता है कि उनकी आस्था कभी देश के और भारत के संविधान के मूल्यों, मान्यताओं से हटी है, मूल तत्व से हटी है। तो इस समय उन चीजों पर आक्रमण हो रहा है। एक वैकल्पिक विचारधारा इस देश के अंदर लाई जा रही है। तो ऐसे समय में जो जनरल होना चाहिए वो बिल्कुल टेस्टेड एंड ट्रस्टेड होना चाहिए। ऐसे में हम नया प्रयोग करने की स्थिति में नहीं हैं। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि केवल गांधी-नेहरू परिवार ही कांग्रेस का नेतृत्व कर सकता है, बल्कि मैं ये कह रहा हूं कि आज की स्थिति में देश के हित में, लोकतंत्र के हित में, संविधान के हित में, संविधान पर आस्था रखने वाले करोड़ों-करोड़ों लोगों के हित में, हम आज दूसरे तरीके के परीक्षण की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि लड़ाई बिल्कुल साफ है।

अपूर्व जोशी : जब सोनिया जी ने राहुल गांधी जी को पार्टी का महासचिव बनाया, उसके बाद उपाध्यक्ष बनाया तब लुटियंस दिल्ली से लेकर दूर-दूर तक जहां-जहां कांग्रेस है वहां खूब चर्चा रही कि राहुल गांधी उस समय पार्टी उपाध्यक्ष के तौर पर आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते थे। तब यह बात भी उठी थी कि आपके पार्टी के कई बड़े नेता आंतरिक विद्रोह की तैयारी कर लिए थे। इस पर आप ईमानदारी से प्रकाश डालें कि क्या उस समय कोई ऐसी परिस्थितियां बनी थी कि एक ईमानदार नवयुवक पार्टी में एक नई जान फूंकने की तैयारी कर रहा है, उसके प्रयासों पर उन लोगों ने मट्ठा डाला। विद्रोह की तैयारी की गई थी।

हरीश रावत : षड्यंत्र कहीं कुछ नहीं था। आपका कथन वास्तविकता से बहुत दूर है। सोनिया जी ने बहुत तरीके से चीजों को संभाला। राहुल जी का पदार्पण भी राजनीति के अंदर उन्होंने गांधीयन तरीकों से किया। जो नेहरू- गांधी का तरीका है कि भारत को समझो, समाज को समझो, पार्टी को समझो। उन्होंने काफी समय उस पर लगाया। हम तो 2012 में आग्रह करते थक गए कि आप सरकार में शामिल होइए। डॉ ़ मनमोहन सिंह ने कहा, हमारी पार्टी में कई लोग चाहते थे कि वे प्रधानमंत्री का पद संभालें। पर राहुल गांधी का दृढ़ निश्चय था कि ‘नहीं’ अब भी मुझे और अच्छे से समझने की जरूरत है, मैं इस जिम्मेदारी के लिए अभी अपने आपको मानसिक रूप से तैयार नहीं पा रहा हूं। मगर उन्होंने चुनौतियां ग्रहण की। हां, जब नया व्यक्ति आता है उसके साथ सवाल, आशंकाएं, मैं कहां पर रहूंगा? मेरे जगह पर कौन आएगा? ये सब सवाल राजनीति में खड़े होते हैं। इसको लेकर एक वातावरण बनाया गया कि नहीं राहुल गांधी तो होल-सोल परिवर्तन चाहते हैं। राहुल जी प्रारंभ से ही अनुभव और युवा दोनों का समन्वय चाहते थे। लोकतंत्र और पार्टी के पुराने परंपरागत तरीके दोनों का समन्वय चाहते थे। उन्होंने युवा कांग्रेस एवं एनएसयूआई के अंदर चुनावी पद्धति शुरू की। लेकिन पार्टी के बड़े हिस्से में जो पुराना तरीका था चुनावों का, उसको बनाए रखा। उन्होंने नवयुवकों को मौका दिया। उनके पिता ने भी युवाओं को बढ़ाया था।

अपूर्व जोशी : चलिए, इन चुनावों की बात करते हैं। शुरुआती दौर में देखा या महसूसा गया कि राहुल गांधी ने राफेल विमान सौदे को बड़ी प्रखरता से उठाया कि राफेल विमान सौदा पारदर्शी नहीं है। राहुल ने एक नया नारा गढ़ा कि ‘चौकीदार चोर’ है। उससे पहले गुजरात के चुनाव हो रहे थे तब उन्होंने ‘गब्बर सिंह टैक्स’ का नारा गढ़ा। जब ‘चौकीदार चोर है’, कुछ असर डालता नजर आया। तभी पुलवामा की घटना हो गई। इसके बाद चुनाव विपक्ष के हाथों से निकल गया?

हरीश रावत : देखिए, आज के संदर्भ में बहुत ही लोडेड प्रश्न है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मोदी जी, अमित शाह जी 300 का आंकड़ा पार करेंगे कहते हैं और 300 पार कर जाते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान शिव से वरदान मांगा हो और भगवान ने तथास्तु कह दिया हो। जो राफेल वाला मामला है उसमें बहुत साफ है कि दोगुनी कीमत पर जहाज खरीदा गया। 126 के जगह पर 36 जहाजों का सौदा क्यों किया गया? क्यों आपने टेक्नोलॉजी को गुडबॉय कर दिया? बिना बैंक गारंटी और सोवरिन गारंटी के आपने इतना बड़ा सौदा कर दिया? एचएएल के बजाय रिलायंस को ऑफशूट पार्टनर बना दिया?

तो राहुल जी ने इन सवालों को उठाया। उन्होंने नहीं कहा ‘चौकीदार चोर है’। उन्होंने तो कहा प्रधानमंत्री अपने को ‘चौकीदार’ बताते हैं और चौकीदार के समय में ये सब हुआ है। अब आप बताइए चौकीदार तो लोगों ने कहा ‘चोर है’। क्योंकि जनमानस की उस समय इस सवाल से सोच बदल गई थी। मोदी जी की जो ईमानदार की छवि थी वो छवि गहरे तौर पर डेंट हो गई थी। अब यहां से कैसे निकला जाए ये सवाल था मोदी जी और आरएसएस के सामने। हमारे सामने था कि हम केवल नेगेटिव चुनाव प्रचार-प्रसार नहीं कर सकते थे इसलिए हम एक पॉजिटव एजेंडे को लेकर आए। जिसमें ‘न्याय’ का कॉनसेप्ट था, सरकारी नौकरियां में भर्तियों को भरने का, किसानों के ऋण माफी का, लेकिन इन लोगों ने इतने साल में देश के शरीर में एक मवाद पैदा कर दिया था साम्प्रदायिकता का, हिंदू-मुस्लिम का। पाकिस्तान उस मवाद का फोड़ा है। ये सवाल गौण हो गया कि 300 किलो आरडीएक्स कैसे पहुंचा? क्यों नहीं आवश्यक सिक्योरिटी बरती गई? मोस्ट सिक्योर्ड हाइवे में कैसे आतंकियों की कार 30 किलोमीटर तक पीछा करती रही? क्यों इतना बड़ा इंटेलीजेंस कोलैप्स हुआ? तो पुलवामा ने उस फोड़े को बढ़ा दिया। और बालाकोट में एयर स्ट्राइक से फोड़ा फूट गया। लोगों को राहत जैसी महसूस हुई। मीडिया ने इमेज बनाई। मोदी सफल हो गए। आप मुझे बताइए देश का यह पहला ऐसा चुनाव है, जिस चुनाव में पहले क्या वायदे थे, न उसकी चर्चा हुई न आगे क्या वायदे किए हैं उसकी चर्चा की। भाजपा के घोषणा पत्र को कोई जानता है? 2019 का तो सिर्फ एक ‘एम’ है चाहे मोदी मैजिक हो या मशीन। एक असाधारण तरीके का निष्कर्ष आता है और मैनडेट देने वालों को मालूम ही नहीं है कि उन्होंने मैनेडेट दिया है।

 

आज के संदर्भ में बहुत ही लोडेड प्रश्न है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मोदी जी, अमित शाह जी 300 का आंकड़ा पार करेंगे कहते हैं और 300 पार कर जाते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान शिव से वरदान मांगा हो और भगवान ने तथास्तु कह दिया हो। कई इंटेलीजेंट लोग एनालाइज करते हैं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की जीत का कि जैसे शेर को फांसने के लिए बकरी लगाई जाती है, वैसे ही वहां नॉर्मल चुनाव होने दिए गए। ताकि एक प्रश्न खत्म हो जाए ईवीएम का। अब कहते हैं लोग कि तुम जीतते हो तो तुम्हारी जीत है और हारते हो तो ईवीएम का दोष है। हमारा प्रश्न ये है ही नहीं कि ईवीएम में छेड़छाड़ हुई या नहीं। लोकतंत्र में मतदाता को जानने का हक है कि उसका वोट वहीं जा रहा है जहां वो पहुंचाना चाह रहा है। आज संदेह है। चाहे 10 प्रतिशत लोगों को ही हो। इस संदेह को दूर करना चुनाव आयोग का काम है। चुनाव आयोग उतना ही महत्वपूर्ण तंत्र है जितनी संसद है, न्यायपालिका है या मीडिया है। गंगोत्री से ही गंगा ठीक रहे, इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है

पूर्व जोशी : पुलवामा की घटना और फिर बालाकोट की एयर स्ट्राइक के बाद देश का माहौल बदल रहा था। आपका मैनेफेस्टो उसके बाद आया। आपकी तरफ से भी तो चूक हुई कि ‘ऑफ्सपा’ को हटाने की बात आपने कर दी?

हरीश रावत : जो ज्यादा विद्वान होते हैं वो भी कभी-कभी श्लोक के उन अक्षरों का भी वाचन कर देते हैं जो उस समय सटीक नहीं होता। मैं नाम लेना नहीं चाहूंगा लेकिन अपनी अधिक विद्वता के कारण कुछेक ने ऐसी बात कर दी जो उस वक्त उचित नहीं थी। ये भी कहना चाहूंगा कि राहुल गांधी जी ने उस वक्त भी बिल्कुल सही स्टैंड लिया। जहां उन्होंने निंदा की वहीं उन्होंने ये भी कहा कि हम सरकार के साथ हैं। आतंकवाद के खात्मा के लिए सरकार चाहे जो फैसला करेगी हम सरकार के साथ हैं। मोदी जी और सारे प्रचारतंत्र ने जिसमें चुनिंदा चैनल भी सम्मिलित हैं, उन्होंने एक ही कोरस को दोहराया कि हम वीरता दिखा रहे हैं, लाशें गिनने की बात कर रहे हैं, लेकिन विपक्ष इस पर हमारे साथ नहीं है। आपने 2014 में भ्रष्टाचार के गर्भ से सरकार पैदा की और इस बार एक उन्माद के गर्भ से पैदा की। ये दोनों स्थितियां भारत के लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं हैं।

अपूर्व जोशी : आपने उत्तराखण्ड में पराजय को झेला है। आप लोगों को लगता है कि ईवीएम की भी प्रॉब्लम है। संक्षेप में जानना चाहूंगा।

हरीश रावत : एक बात को मानता हूं कि जिस तरीके का वातावरण बनाया गया उसमें हार के संकेत थे। मगर जिस प्रकार का मार्जिन हार-जीत का आया है उससे बिल्कुल ऐसा लगता है मानो तय किया गया मैनडेट है। अल्मोड़ा सीट का मिजाज अलग तरीके का है। टिहरी का मिजाज कुछ अलग तरीके का है।
सोशल कम्पोजिशन इस तरीके का है कि वहां किसी भी पार्टी की हार एक लाख वोटों से नहीं हो सकती। बाकी जगहों पर ऐसा हो सकता है, लेकिन अल्मोड़ा और टिहरी में पार्टी की ऐसी हार मुझे असंभव लगती है।

अपूर्व जोशी : कांग्रेस क्या भविष्य में ईवीएम पर चर्चा करने जा रही है? साथ ही कांग्रेस के लोग भी कह रहे हैं कि यदि बीजेपी जैसे एक वेल ऑर्गेनाइज्ड, संगठन से लड़ाई लड़नी है तो आपके पास अपना भी थिंक टैंक होना चाहिए। बीजेपी के साथ जैसे पूरा संघ खड़ा है?

हरीश रावत : कई इंटेलीजेंट लोग एनालाइज करते हैं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की जीत का कि जैसे शेर को फांसने के लिए बकरी लगाई जाती है, वैसे ही वहां नॉर्मल चुनाव होने दिए गए। ताकि एक प्रश्न खत्म हो जाए ईवीएम का। अब कहते हैं लोग कि तुम जीतते हो तो तुम्हारी जीत है और हारते हो तो ईवीएम का दोष है। हमारा प्रश्न ये है ही नहीं कि ईवीएम में छेड़छाड़ हुई या नहीं। लोकतंत्र में मतदाता को जानने का हक है कि उसका वोट वहीं जा रहा है जहां वो पहुंचाना चाह रहा है। आज संदेह है। चाहे 10 प्रतिशत लोगों को ही हो। इस संदेह को दूर करना चुनाव आयोग का काम है। चुनाव आयोग उतना ही महत्वपूर्ण तंत्र है जितनी संसद है, न्यायपालिका है या मीडिया है। गंगोत्री से ही गंगा ठीक रहे इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है।

अपूर्व जोशी : कांग्रेस ऐसा कोई संगठन तैयार करेगा जो उसका थिंक टैंक होगा, जैसे कि आरएसएस बीजेपी को सपोर्ट करता है?

हरीश रावत : यदि मैं अपने अध्यक्ष के मन को पढ़ पाया हूं या समझ पाया हूं तो वे इस दिशा में काम कर रहे हैं। आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए बहुत आवश्यक है कि हम इस काम को करें।

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